रविवार, नवंबर 05, 2017

हास्य-व्यंग्य

साहित्यिक गोष्ठियों का मनोरंजक योगदान


यह लेख या व्यंग्य, जो भी है, वर्ष 2002 में लिखा गया था। यह एक सच्ची घटना पर आधारित था और साहित्यिक पत्रिका साहित्य सागर के मार्च 2002 अंक में प्रकाशित हुआ था।


अब मुझे गोष्ठियों का काफी अनुभव हो चुका है और उसमें निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। वास्तव में, विचार गोष्ठियां साहित्य के सतत मूल्यांकन में महती भूमिका का निर्वाह करती हैं। नवयुवकों तथा नवलेखकों में क्रांतिकारी विचारों की नींव डालती हैं। ऐसे युवकों को जहां-तहां मित्रमंडली में भांति-भांति की गोष्ठियों की रूपरेखा तैयार करते देखा जा सकता है और इनमें इन गोष्ठियों का विषय, भागीदारों के नाम, गोष्ठी की रपट का लेखन और उसका प्रकाशन आदि की चर्चा प्रमुख रूप से की जाती है।

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वैसे इन गोष्ठियों का आयोजन कोई सरल कार्य नहीं है। हालांकि कुछ लोगों जो अपने गुट या मंडली या मठों की बैठकों को इस तरह की संज्ञाएं देते हैं और उनके प्रेस तथा मीडिया में अच्छे हस्तक्षेप होते हैं, के लिए यह कार्य कतई मुश्किल नहीं। आयोजक के सिर पर कई सारी धारदार तलवारें लटकी रहती हैं। यदि किसी ने तय कर लिया कि ऐसा आयोजन करना है तो पहली उलझन है कि किस विषय पर? दूसरी समस्या, कहां, तीसरा मसअला, दिन तथा समय? चौथी दिक्कत, कितने लोगों की शिरकत? पांचवी परेशानी कार्यक्रम की रूपरेखाएवं हस्तियों की तलाश? छठा सिरदर्द, स्वल्पाहार का मीनू? सातवीं हैरानी, आमंत्रण पत्र, स्मारिका, प्रपत्र, समीक्षा आदि का प्रकाशन? वगैरा, वगैरा।

चलिए, इन मुद्दों को एक थोड़े विस्तृत कैनवास पर देखें। प्रथमतः विषय। आज के युग में यूं तो विषय हाल उपलब्ध हो जाते हैं लेकिन आयोजक इस पर कई प्रकार से परिक्रमा करते हैं जैसे विषय की व्यापकता, उसकी समकालीनता, उसके वक्तागण, विचारकों की उपलब्धता, कुछ नयापन और हां, अपने इष्ट मित्रों को ऑबलाइज करने का ख़याल आदि-आदि। फिर यह तय करना होता है कि इसे कहां आयोजित किया जाये? यदि स्थान नगर में प्रसिद्ध है तो फिर उसे निशुल्क या सस्ते में हासिल करने की जुगत लगाना होती है। समय तो अक्सर शाम का। रहा दिन, तो अवकाश हो तो बेहतर। उस दिन इतिहास में कोई विशेष घटना या जयंती अथवा पुण्यतिथि के सुयोग विचारणीय बिंदु होते हैं। फिर, खाने-बैठने वाले अदद, मीडिया, साहित्यिक बंधु, आयोजन के सहभागी, मुख्य अतिथिगण और दस-बीस अन्य को जोड़कर लगभग पच्चीस-पचास तो आमतौर पर आ ही जाते हैं।

तत्पश्चात स्वल्पाहार में चाय ही स्सती व सुंदर है और साथ में समोसा या दो बिस्कुट या चखना टाइप की कोई चीज़। किसी को, विशेषकर कार्यक्रम के अध्यक्ष या मुख्य अतिथि को डायबिटीज़ हो तो उसका भी ध्यान रखते हुए शुगर फ्री इंतज़ाम करना होता है। आयोजक सर्वाधिक हैरान रहता है प्रिंटिंग में। कोई सहयोगी न हो तो शुरू-शुरू में यह एक सिरदर्द रहता है। सबसे मनोरंजक परेशानी है क्रमांक पांच। इसमें दिमागी कसरत और शारीरिक ताकत दोनों का उपयोग होता है। कार्यक्रम की शुरुआत, फिर स्वागत बेला, स्वागत उद्बोधन, संचालन, अतिथि, अध्यक्ष तथा प्रमुख व्यक्तियों के वक्तव्यों का क्रम निर्धारण व समय सीमा, वैचारिक परिवेश की मिर्मिति, कृतज्ञता ज्ञापन, प्रकाशन वितरण जैसे अनेक पायदानों की नियति आदि। इन सभी को सेट करने में हर सहभागी अपना-अपना राग अलापता है। अन्य बातें जो समापन के बाद तक चलती रहती हैं उनमें, दो चार वाहनों तथा व्यक्तियों की सदा उपलब्धता, हर व्यवस्था का एक विकल्प आदि आयोजक को दूरदर्शी कहलाने में सहायक सिद्ध होते हैं। आयोजन उपरांत प्रमुख तलवारों में प्रचार, प्रतिक्रियाएं एवं लेनदारों की कतारें शाश्वत हैं।

आइए, एक विचार गोष्ठी के कुलरंग से आपका साक्षात्कार भी करा दूं। फर्ज़ कीजिए कि आप समय से आधे घंटे बाद पहुंचे तो आप देखेंगे कि आपके अलावा गिनती के दो-चार लोग और मिलेंगे। घबराइए मत और भ्रमित भी न होइए, गोष्ठी यहीं होगी। धीरे-धीरे और आएंगे और अगले आधे घंटे यही बात होती रहेगी कि समय से आना चाहिए। आगंतुकों में आप वृद्धों की वैरायटी देखेंगे। एक आपको पहचाना सा या शानदार व्यक्तित्व का मालिक लगेगा जिसके आस-पास अनेक लोग जुटते दिखेगे। समझ लीजिए संभवतः वही कार्यक्रम का मंच सुशोभित करने वाला है।

आप किसी भी ऐसे कार्यक्रम में जाएं, एक न एक शख़्स ऐसा मिल ही जाएगा जो आपका ध्यान आकर्षित करेगा, अपने अजीब चेहरे, लिबास, आवाज़ या हरकतों से। ऐसे शख़्स को आप बहुत दिन तक याद रखेंगे। ख़ैर, कार्यक्रम शुरू होगा तो कुछ देर रस्म अदायगी और औपचारिक हंसी-ठिठोली का दौर चलेगा। धीरे-धीरे कार्यक्रम गंभीर होता जाएगा। कुछ लोग वाक़ई चले जाएंगे और कुछ आएंगे-जाएंगे। आप अपने पड़ोस में बैठे मित्रों से हर वक्तव्य तथा व्यक्तित्व पर तात्कालिक प्रतिक्रियाएं सुनने को विवश होंगे। हां, हूं, ना, नूं भी करना पड़ेगी। कुछेक शब्द जैसे बोरिंग, क्लिष्ट, झिलाउ, केयरफुली केयरलेस, अल्टीमेट, भ्रष्ट आदि आप भिन्न-भिन्न संदर्भों में सुनेंगे। और, आख़िरकार शैकसपियरियन कॉमेडी के तरह का कार्यक्रम अंततः आपको भला लगने लगेगा जब आप स्वल्पाहार के लिए आमंत्रित किये जाएंगे और कुछ प्रकाशित सामग्री अपने हाथ में महसूस करेंगे।

यूं तो मैं कई गोष्ठियों में जा चुका हूं लेकिन हाल में आयोजित एक विचार गोष्ठी ने बहुत प्रभावित किया। दरअस्ल, यह प्रभाव ही इस लेख का कारण है। एक पत्रिका ने ने एक लेखिका पर केंद्रित एक विशेषांक का प्रकाशन किया जिसके विमोचन उपलक्ष्य में इस गोष्ठी का उपक्रम हुआ। गोष्ठी में, लेखिका की पूर्व में प्रकाशित एक पुस्तक पर चर्चा तथा लेखिका के सामाजिक, साहित्यिक सरोकारों से संबंधित विचार प्रस्तुत किये जाने थे। शायद मैं अकेला ही नवयुवक था इस गोष्ठी में, बाकी वृद्ध, प्रौढ़ और महिलाएं। वृद्धों में एक श्वेतकेशी अध्यक्ष पद पर पधारे। एक अदद विचित्र जीव और वही शब्दों की जुगाली। सब कुछ पूर्ववर्णन जैसा ही था लेकिन एक तत्व जो ज़ह्न में उतर गया, वह था, गोष्ठी का आधार और उस पर खड़ी हुई इमारत।

अस्ल में, गोष्ठी उस कृति के विभिन्न पहलुों या मूल्यों पर विचार करने के लिए आयोजित की गयी थी। इसी वज्ह से पहले एक नवोदिता ने अपनी लिखित समीक्षा निवेदित की। तत्पश्चात अन्य आमंत्रितों विद्वानों को उस कृति पर अपने विचार प्रकट करने के साथ ही सवाल-जवाब सत्र शुरू हुआ। लेकिन हुआ कुछ और। और, जो कुछ हुआ वह कम से कम मुझे तो चकित कर गया। मैं तो पहले से ही नर्वस था क्योंकि मैं ही सबसे छोटा था इसलिए कहीं सर्वप्रथम संचालक मुझे अवसर न दे डालें, यह सोचकर। उस कृति को पढ़ना तो दूर, मैंने तो उसका नाम तक न सुना था पहले। जाने कैसे संचालक महोदय का आभार प्रकट करूं कि उसने मेरी ओर देखा तो अर्थपूर्ण किंतु मौक़ा नहीं दिया। लेकिन आश्चर्य यह था कि तमाम उपस्थित विद्वानों में से किसी ने भी वह कृति नहीं पढ़ी थी जिन्हें उस पर विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया था।

धीरे-धीरे सारे के सारे लोग मेरे सामने खुलते चले गये। यक़ीन मानिए उस लेखिका तथा समीक्षिका के अलावा तीसरा कोई शायद पढ़ा-लिखा नहीं था। सबसे उस समीक्षा को आधार मानकर कुछ प्रशंसाएं और विचार ठोक दिये।

ख़ैर यह भी एक अनुभव हुआ जिसने समझा दिया कि नर्वस होने की कोई ज़रूरत नहीं होती। ज़रूरी नहीं कि पर्वत पत्थरों का ही बना हो, राई का भी हो सकता है। हो सकता है, यह सब जो हुआ, पूर्व नियोजित रहा हो। आयोजक शायद कुछ "नया या हटकर" करना चाहते हों। लेकिन साहब मुझे तो गवारा नहीं था, यह तय है। चाहे किसी को कुछ भी लगे। सोचता हूं उस लेखिका को इस गोष्ठी के बाद खुद को राष्ट्रीय स्तर की लेखिका कहने या समझने में कैसा लगता होगा?

शनिवार, नवंबर 04, 2017

एक ग़ज़ल

तारीख़ में औरत के एहसास के ज़ाविये


भोपाल शायरी के गढ़ के रूप में पहचान बना चुका है और दौरे-हाज़रा में जो शायर सरज़मीन-ए-भोपाल का नाम दुनिया भर में रोशन कर रहे हैं, उनमें से एक हैं मोहतरमा नुसरत मेंहदी। मेंहदी साहिबा को दुनिया भर में मुशायरों में न सिर्फ़ बाइज़्ज़त बुलाया जाता है बल्कि उन्हें चाव से सुना जाता है।



Nusrat Mehdi.
भोपाल के उर्दू अदब में पिछले कुछ वक़्त से एक नाम जो बड़ी तेज़ी के साथ मक़बूल हुआ है, वह है नुसरत मेंहदी। सूबे की उर्दू अकादमी के सचिव का ओहदा संभालने के बाद गुज़रे कुछ सालों में मेंहदी साहिबा ने भोपाल में न केवल शायरी बल्कि उर्दू ज़बान और अदब के हवाले से जिन सरगर्मियों को अंजाम दिया है, उनकी गूंज बहुत दूर तक पहुंची है और पहुंच रही है। बहरहाल, यहां उर्दू अकादमी की सेक्रेट्री नुसरत मेंहदी नहीं बल्कि शायरा नुसरत मेंहदी की एक ग़ज़ल के तआल्लुक से कुछ लाज़िमी पहलुओं पर गुफ़्तगू की हसरत है।

भोपाल के तक़रीबन हर क़ाबिले-ग़ौर मुशायरे, महफ़िल या नशिस्त में अपनी बावक़ार मौजूदगी दर्ज करने वाली मेंहदी साहिबा की एक ताज़ा ग़ज़ल औरत के वजूद और पूरी तारीख़ को चन्द मिसरों में समेटने के लिहाज़ से ख़ास तवज्जो का तक़ाज़ा करती है। अब तक यानी 3 नवंबर 2017 की रात तक, इस ग़ज़ल में कुल सात शेर ख़ुद शायरा की जानिब से मेरी जानकारी में आये हैं, जिनमें से 5 शेर इस सिलसिले में सीधे तौर पर शामिल होते हैं।

उठा रही थीं इक के बाद एक सर तो ये हुआ
कि ख़्वाहिशों की इक बड़ी क़तार मार दी गयी।

मत्ले के बजाय इस ग़ज़ल पर इस शेर से बात शुरू करने की वज्ह यह है कि इस शेर की हैसियत और वुस्अत बहुत ज़्यादा है। मेरे ख़याल से पूरी तारीख़ और हालिया दौर के हवाले से हर औरत का बयान इस शेर में आवाज़ पाता है। यह औरत का मुक़द्दर रहा है या आदमी की हुक़ूमत वाले समाज में औरत के वजूद को कुचलने की साज़िश, इस शेर के पसमंज़र में एक बड़ी, पुरानी और जारी-व-सारी दास्तान सुबकती हुई सी है। अब ग़ज़ल का मत्ला देखिए - 

तो ये हुआ कि फिर अना की जंग हार दी गयी
उदास था कोई तो उसपे जीत वार दी गयी।

हमारा समाज औरत को देवी बना देता है। इफ़्फ़त, क़िरदार, हया, फ़र्ज़, उसूल यानी कि हर तरह से औरत होने के मआनी एक आदर्श के सांचे में क़ैद कर दिये गये हैं। मां, बीवी, बेटी तमाम शक़्लों में औरत से इसी तरह के बर्ताव की उम्मीद की जाती है कि वह बेटे, शौहर या बाप सभी के लिए अपनी ख़ुशी और अना को क़ुर्बान कर दे। अब इस शेर में ज़बान की शाइस्तगी और लफ़्ज़ बरतने का हुनर भी क़ाबिले-दाद है। “तो ये हुआ...” इन अल्फ़ाज़ से मिसरा उठाना अपने आप में एक मायूसी समेटता है। “कि फिर...” ये लफ़्ज़ एक तवील रवायत की तरफ़ इशारा करते हैं। “वार दी गयी...” ये लफ़्ज़ लोकभाषा या हिंदोस्तानी की एक बोली से आते हैं। यानी एक ज़ुल्म को रवायत के तौर पर दर्ज करने के लिए ज़बान की रवायत का ख़याल ख़ूबसूरती से रखा गया है। इस शेर में आप कम अज़ कम दो ज़बानों का उफ़ुक तो तलाश ही सकते हैं।

तमाम उम्र मैंने कोई शर्त ही नहीं रखी
कहा गया गुज़ार दो तो बस गुज़ार दी गयी।

यह शेर उसी क़िरदार को ढोती हुई ज़िंदगी का हवाला देता है जो किताबों और रवाजों की बिना पर औरत के लिए तय कर दिया गया है। ये क़िरदार ढोना औरत की मजबूरी बन गयी है क्यूंकि वक़्त के साथ सोच पत्थर हो चुकी है। आदमी के समाज को औरत की कोई शर्त गवारा ही नहीं। एक और कामयाब शेर। ज़बान के फ़न से लबरेज़। इस शेर के सानी मिसरे में जो लफ़्ज़ है “बस...” इस शेर के पूरे मफ़हूम से मुताल्लिक़ मजबूरी या लाचारी इसी एक लफ़्ज़ की शीशी में बंद कर दी गयी है।

दरअस्ल, यह पूरी ग़ज़ल जौन एलिया के ग़ज़ल के एक मिसरे या एक शेर की ज़मीन का इस्तिफ़ादा है। जौन एलिया का शेर है -

उसकी उमीदे-नाज़ का हमसे ये मान था कि आप
उम्र गुज़ार दीजिए उम्र गुज़ार दी गयी।

इस शेर की ज़मीन से मेंहदी साहिबा ने अपनी ग़ज़ल की ज़मीन तलाश की है जो एक सत्ह पर इस शेर की वुस्अत कही जा सकती है लेकिन अस्ल में, मेंहदी साहिबा की ग़ज़ल इतनी वसीअ है कि जौन साहब के शेर के दायरों के बाहर निकलकर एक बड़ा दायरा नज़्म करती है। मेंहदी साहिबा इसलिए भी मुबारकबाद की हक़दार हैं कि वह अपनी इस ग़ज़ल को सामईन के हवाले करते वक़्त जौन की ज़मीन का ज़िक्र करती हैं और समझने वालों के लिए बात आगे तक लेकर जाती हैं।

खुलेंगे कितने ज़ख़्म और सुलग उठेगी ज़िंदगी
ख़मोशियों की ये परत अगर उतार दी गयी।

अब ये शेर ग़ज़ल में एक इन्क़िलाबी शेर की तरह आता है लेकिन इसकी आंच भड़कते हुए शोलों जैसी नहीं, बल्कि राख में दबी चिंगारी की तरह महसूस होती है। ये एक धमकी से कम सख़्त लहजे की बात है, तक़रीबन चेतावनी जैसी। चूंकि पहला मिसरा एक मुलायम या दर्दनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया गया है इसलिए सानी मिसरे की आंच मद्धम हो जाती है। इस शेर को शायद दो मोड़ दिये जा सकते थे, एक दमदार धमकी का तेवर और दूसरे मोड़ से इसे तारीख़ के उन हवालों से वाबस्ता किया जा सकता था जहां औरतों ने बग़ावत की है, सर उठाया है या आवाज़ बुलंद की है। लेकिन, मेंहदी साहिबा ने जिस तर्ज़ को इस शेर में मुनासिब समझा है उसकी वज्ह यह भी हो सकती है कि एक तो औरतों की जानिब से कोई बड़ा इन्क़िलाब मर्दों की दुनिया के ख़िलाफ़ हुआ नहीं है और शायद यह कि औरतें अगर मुख़ालफ़त पर उतारू हो गयीं तो एक समाज का ढांचा टूटेगा और नया बनने में जो वक़्त लगेगा, उस दरमियान एक लंबे वक़्त तक ज़िंदगी सुलगती ही रहेगी।

किताबे-ज़ीस्त खोलकर है नुसरत आज सोच में
सफ़ाई किन ख़ताओं की ये बार-बार दी गयी।

तो इस तरह ग़ज़ल मक़्ते तक पहुंचती है। औरत के दर्द के एक और ज़ाविये को आवाज़ देता यह शेर पुरअसर महसूस होता है। डॉ. नसीम निक़हत हिंदोस्तान की एक और ऐसी शायरा हैं जो इस पूरी तम्हीद में अपने शेरों के हवाले से याद आती हैं। औरत के जज़्बात, एहसास, दर्द और सोच को डॉ. निक़हत ने भी कुछ अशआर में बड़े पुरअसर ढंग से ढाला है। पाकिस्तान की शायरात का ज़िक़्र करूं तो परवीन शाकिर, फ़हमीदा रियाज़ और किश्वर नाहीद का नाम बरबस ही ज़ह्न में उतरता है। जिन शायरात ने औरत के वजूद के मुताल्लिक यादगार शायरी की है, उनमें मेंहदी साहिबा का नाम किस सत्ह पर लिया जा सकता है, यह तो उनके दीवान से गुज़रकर ही कह पाना मुनासिब होगा लेकिन अगर बात सिर्फ़ इस ग़ज़ल की है तो इतना तो यक़ीनी तौर पर कह सकता हूं कि औरत की आवाज़ जो शायरी बनती है या जिस शायरी को औरत की आवाज़ के नाम से आइंदा वक़्तों में याद किया जाएगा, उसमें यह ग़ज़ल शामिल ज़रूर होगी।

अब इस ग़ज़ल के बारे में दीग़र बातें ये भी करता चलूं कि एक तो चूंकि पूरी ग़ज़ल में कहीं औरत लफ़्ज़ सीधे नहीं आया है तो इसके और भी मआनी या तफ़्सीलात पेश की ज़रूर जा सकती हैं, लेकिन यह ग़ज़ल के शेरों में तहदारी की बात है कि एक ही शेर को मुख़्तलिफ़ थीम्स या मुद्दों पर उतारा जा सके। एक बात यह कि इस ग़ज़ल की ज़बान को मैं हिंदोस्तानी ज़बान कहना ज़्यादा मुनासिब समझता हूं बजाय उर्दू कहने के। और यह भी कि इस ग़ज़ल के मिसरों की मुहावरेदानी की वज्ह से एक ख़ुशरंग ज़बान रोशनी में आती है। यह ग़ज़ल एक सत्ह पर रवायती भी है तो दूसरी सत्ह पर ग़ालिबन इसमें जदीदियत की निशानदेही भी है।

मेंहदी साहिबा अपने तरन्नुम के लिए भी ख़ासी मशहूर हैं। यह ग़ज़ल उनसे तरन्नुम में सुनी है इसलिए कह सकता हूं कि चन्द और ग़ज़लों की तरह इस ग़ज़ल में भी उनका तरन्नुम डॉ. बशीर बद्र के तरन्नुम से मुतास्सिर है। इस ग़ज़ल की सिफ़त यह है कि मेंहदी साहिबा से तरन्नुम में इसे सुनें, तहत में सुनें या ख़ुद कहीं भी पढ़ें, यह ग़ज़ल आपके साथ जुड़ जाती है और शायद कुछ मुरीदों की याददाश्त में रह भी जाएगी। आख़िर में इस ग़ज़ल के बाक़ी दो शेर भी आप तक पहुंचाता चलूं जिन पर बात फिर कभी, क्यूंकि अभी जिस मक़ाम और क़ैफ़ियत से इस ग़ज़ल का तब्सरा कर रहा हूं, वहां से इन दो शेरों पर बात कर पाना वाजिब नहीं होगा।

जब उसके लफ़्ज़ कुंद होके बेअसर हो गये
तो फिर ज़बान पर नये सिरे से धार दी गयी।

बुखार सच का उसके सर पे इस क़दर सवार था
कि टोने टोटके से उसकी लू उतार दी गयी।

क्या फ़िक़्रअंगेज़ वाक़या है कि एक रोज़ पहले पढ़ी ख़बर ज़ह्न में करवटें ले रही थी कि साउथ अमेरिका के पेरू में मिस पेरू मुक़ाबले के दौरान शरीक़ मॉडल्स ने रस्म को तोड़ते हुए अपने साइज़ का ब्यौरा देने के राउंड में अपने इलाक़े में होने वाले उन ज़ुल्मों और गुनाहों के आंकड़े रखे, जो औरतों के ख़िलाफ होते हैं। और इसी सोच में डूबा हुआ मैं एक दिन बाद मेंहदी साहिबा की इस ग़ज़ल से रूबरू हुआ, जो आंकड़ों से नहीं, परत-दर-परत घुले एहसासों से तक़रीबन उसी आवाज़ की गूंज है।

आख़िरश, ये ग़ज़ल औरत की तारीख़ या तारीख़ में औरत की जिस ज़मीन पर नुमाइंदगी करती है, वहां किसी मज़हब की औरत, किसी इलाक़े की औरत या किसी ख़ास रंग की औरत की बात बेमानी है। इन शेरों में औरत सिर्फ़ औरत है - यानी ठीक आधी दुनिया।

शुक्रवार, नवंबर 03, 2017

ग़ज़ल

"दिलशाद ही होना है सिकंदर नहीं होना"


मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर भोपाल सिथत राज्य संग्रहालय में मप्र उर्दू अकादमी की जानिब से "जश्ने-सुख़न" का आयोजन किया गया। बुज़ुर्ग, आला और उभरते हुए अदीबों से सजे स्टेज पर भवेश दिलशाद ग़ज़लसरा हुए। समारोह की सदारत डॉ. मुख़्तार शमीम साहब ने की जबकि मेहमाने ख़ुसूसी के तौर पर जनाब रईस सिद्दीकी साहब, जनाब हमीदुल्लाह मामू साहब और जनाब यूसुफ़ खान मौजूद थे। डॉ. नुसरत मेंहदी की सरपरस्ती में हुए इस समारोह में निज़ामत जनाब बद्र वास्ती साहब ने की। इस मौक़े की चन्द तस्वीरें और वीडियो यहां प्रस्तुत हैं।



Mrs Nusrat Mehdi welcomes Bhavesh Dilshaad.


Bhavesh Dilshaad recites his poetry.

मंगलवार, अक्टूबर 31, 2017

सिनेमा

बेनेगल बाबू के सिनेमा के 50 साल


70 के दशक में हिंदी सिनेमा में जिस धारा को कला सिनेमा या समानांतर सिनेमा या नयी धारा का सिनेमा संबोधित किया जा रहा था और जिस पर कला जगत में विभिन्न सिरों से तेज़ी से विमर्श हो रहा था, बेनेगल बाबू उस दशक में उस विमर्श के केंद्र बिंदुओं में शुमार थे और आने वाले लगभग दो दशकों तक वह इस श्रेणी के सिनेमा के शीर्ष कलाकारों में सक्रिय रहे।


गुरुदत्त के खानदान से ताल्लुक रखने वाले श्री श्याम बेनेगल का अगर कोई परिचय हो सकता है तो यह हो सकता है कि एक दर्जन फिल्मों के नाम ले लिये जाएं और आपसे कह दिया जाये कि इनके फिल्मकार हैं श्याम बेनेगल। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने नाम से ज़्यादा अपने काम से जाने जाते हैं। भले ही, हिंदोस्तान के सिनेप्रेमियों में से कुछ ने बेनेगल बाबू का नाम न सुना हो या ठीक से परिचित न हों लेकिन उनकी फिल्मों और पुरस्कारों की फेहरिस्त जानने के बाद किसी को भी यह यक़ीन हो ही जाएगा कि एक ऐसे कलाकार का ज़िक्र हो रहा है जिसकी कला का लोहा दुनिया मानती है।

Shyam Benegal.image source: Google

1967 में बेनेगल बाबू ने पहली डॉक्युमेंट्री फिल्म बनायी थी "क्लोज़ टू नेचर"। डॉक्युमेंट्री से उनका प्रेम यूं समझिए कि अगले 40 साल यानी 2007 तक बेनेगल बाबू ने तीन दर्जन से अधिक डॉक्युमेंट्री फिल्में बनायी हैं। उनके द्वारा निर्देशित पहली फीचर फिल्म "अंकुर" 1973-74 में बनी थी। दो दर्जन से ज़्यादा फीचर फिल्मों का निर्देशन करते हुए बेनेगल बाबू एक साथ वृत्तचित्रों और टेलिविज़न के परदे पर भी काम करते रहे। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा और अभिव्यक्ति की कला के प्रति उनकी लगन और जुनून का स्पष्ट प्रमाण है। 

डॉक्युमेंट्री से पहले बेनेगल बाबू ने शॉर्ट फिल्में भी बनायी थीं। यह उनका फिल्म अभ्यास माना जा सकता है और यह भी उल्लेखनीय है कि वह एक एडवरटाइज़िंग फर्म के साथ जुड़े रहे थे जो विज्ञापन फिल्में बनाने के व्यवसाय में सक्रिय थी। यानी कि बेनेगल बाबू की फिल्मकार के रूप में प्रतिष्ठित होने की भूमिका पहले से ही तैयार हो चुकी थी।

बेनेगल बाबू एक जाग्रत फिल्मकार रहे और एक बड़े फलक पर कहा जा सकता है कि फिल्म के माध्यम से वह सामाजिक चिंतक, विश्लेषक एवं सुधारक की भूमिका का निर्वहन करते रहे। बेनेगल बाबू के सिनेमा के कई आयाम हैं जिन पर सार्थक चर्चा हो चुकी है और होती रही है। बेनेगल बाबू के सिनेमा ने वास्तव में भारत के सिनेमा में एक अपूर्व योगदान दिया है और अब तो यह भी कहा जा सकता है कि उनकी एक लीगेसी है। उनसे प्रेरित होकर फिल्में बनाने वाले कलाकारों की सूची भी बड़ी है।

एक ओर बेनेगल बाबू के सिनेमा पर सत्यजीत रे, ख़्वाजा अहमद अब्बास और बिमल राय जैसे पूर्ववर्ती फिल्मकारों का प्रभाव रहा वहीं, राजनीतिक रूप से वह पंडित जवाहरलाल नेहरू से प्रभावित रहे। न केवल नेहरू पर वृत्तचित्र का निर्माण उन्होंने किया बल्कि नेहरू की चर्चित किताब "दि डिस्कवरी ऑफ इंडिया" को एक टीवी शो "भारत एक खोज" के रूप में ढाला जो एक कालजयी टीवी रचना सिद्ध हुई। नेहरू से प्रभावित होने का अर्थ बेनेगल बाबू के संदर्भ में यह नहीं माना जा सकता कि वह एक कलाकार के रूप में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता की तरह रहे। समय-समय पर उन्होंने कांग्रेस की आलोचना भी की और अपनी फिल्मों में कटाक्ष भी किये। वह हमेशा 1975 के आपातकाल को देश की बेहद चिंताजनक घटना मानते रहे और इसे लोकतंत्र के लिए शर्मनाक समय करार देते रहे।

(2007 में भवेश दिलशाद द्वारा किया गया श्री श्याम बेनेगल का साक्षात्कार पढ़ने के लिए निम्नांकित शीर्षक पर क्लिक करें।)

"अब लोकतंत्र में साझेदारी ज़रूरी: श्याम बेनेगल"


बेनेगल बाबू की निष्ठा विचारपरक रही, न कि व्यक्ति या संगठनपरक, ऐसा कहा जा सकता है। बहरहाल, सिनेमा में 50 सालों की बेहद सार्थक एवं कामयाब यात्रा पूरी कर चुके बेनेगल बाबू का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। यूं भी कहा जा सकता है कि सिनेमा की यात्रा की अनोखी घटना है कि उसने बेनेगल बाबू जैसा एक हमसफ़र पाया। तमाम सिनेप्रेमियों और मुझ जैसे मुरीदों की ओर से इस महान और सशक्त कलाकार को लाल, नीला, हरा और हर रंग का सलाम।

सोमवार, अक्टूबर 30, 2017

आलेख

तो कब ख़त्म होने वाला है भाषा का झगड़ा..?


भाषा से प्रेम करते हैं हम। कहते हैं साहित्य वहां से शुरू होता है जहां भाषा शब्दों का नहीं बल्कि भावों/विचारों का अर्थ देती है। यानी भाषा इतनी महान होती है कि वह अभिव्यक्ति का माध्यम बनते ही आपको व्यक्ति के योग्य या मूर्ख होने की पहचान करा देती है।


इस आलेख के पीछे एक प्रेरणा है और एक कारण। पहले प्रेरणा का खुलासा करूं तो वह है एक साक्षात्कार। हिंदी-उर्दू के प्रचंड विद्वान और पद्मभूषण से सम्मानित किये जा चुके साहित्यकार व लेखक श्री गोपीचंद नारंग का एक साक्षात्कार मैंने 2007 में एक समाचार पत्र समूह के लिए किया था। उस साक्षात्कार से फिर गुज़रा तो यह लेख लिखने की तरक़ीब सूझ गयी। फिर शुक्रिया नारंग साहब, उन यादों के लिए जो बार-बार किसी पहलू पर चिंतन के समय उपयोगी साबित हो जाती हैं।

Gopichand Narang. image source: Google

वज्ह मुलाहिज़ा करें - कल यानी 29 अक्टूबर 2017 की शाम यहां भोपाल में वरिष्ठ कवि श्री जंगबहादुर श्रीवास्तव 'बन्धु' जी के सम्मान में एक कार्यक्रम हुआ। इस मौक़े पर पेशे से सरकारी प्रोफेसर डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र को बन्धु जी के काव्य संग्रह 'कुछ बेलपत्र कुछ तुलसीदल' पर समीक्षा प्रस्तुत करनी थी। मिश्र जी तो तयशुदा कार्यक्रम में पहुंचे नहीं, अलबत्ता समीक्षा की प्रति भिजवा दी। फिर सम्माननीय बुज़ुर्गों के आदेश पर उस समीक्षा के वाचन की ज़िम्मेदारी मुझे सौंप दी गयी।

समीक्षा मुझे कार्यक्रम स्थल पर ही दी गयी तो मैं उसे पहले से पढ़ नहीं सका, सीधे मंच से ही पढ़ना थी। मतलब यह कि मैं वाचन करते हुए ख़ुद भी पहली बार वह समीक्षा सुन रहा था। अकादमिक ढंग से लिखी गयी वह समीक्षा इन दिनों लिखी जा रही समीक्षाओं की परिपाटी के हिसाब से ही लिखी गयी थी। एक स्थान पर मिश्र जी ने उल्लेख किया कि बन्धु जी अपने गीतों में तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दावली का अनूठा प्रयोग करते हैं। अब इस प्रसंग में उन्होंने "आज़ाद" शब्द को विदेशी क़रार दे दिया..!

मेरा माथा ठनका, मैंने आपत्ति दर्ज करते हुए वाचन पूरा किया और चला आया। तबसे उपरोक्त सवालों से जूझ रहा हूं। अब तक उर्दू को विदेशी भाषा मानने की प्रवृत्ति ख़त्म नहीं हुई। ये ग़लत मानसिकता अब तक हमारी सोच में समायी हुई है। यह कट्टरता नहीं है तो और क्या है? जिस साक्षात्कार का ज़िक्र मैंने पहले किया उसी से नारंग साहब का एक कथन यहां प्रस्तुत करता हूं -

"एक भाषा की मोहब्बत दूसरी भाषा को नहीं मारती। भाषा के नाम पर झगड़ा करने वाले राजनीति करते हैं और इसके लिए सिर्फ भाषा का शोषण करते हैं।
...भाषाई झगड़ा खड़ा करने वालों को समझना चाहिए कि हम बहुभाषी हैं। रोजमर्रा के जीवन में हम कम से कम दो या तीन भाषाओं से रूबरू होते हैं यानी हम एक साथ कई भाषाओं से जुड़ते हैं। और फिरए हिंदी तो इतनी उदार भाषा है कि वह किसी भाषा के आड़े नहीं आती और खुद को सबसे जोड़कर चलती है। मैं कहता हूं कि प्रयोग की सतह पर हिंदी की सबसे बड़ी ताकत उर्दू है और उर्दू की सबसे बड़ी ताकत हिंदी। बंटवारे की राजनीति में यह झगड़ा पैदा हो गया लेकिन अब इसके खत्म होने के दिन आ गए हैं।"
(श्री गोपीचंद नारंग से लिये गये साक्षात्कार को पूरा पढ़ने के लिए निम्नांकित शीर्षक पर क्लिक करें)

"हिंदी और उर्दू एक-दूसरे की ताक़त हैं"


इस रोशनी में मैं समझता हूं कि मिश्र जी जैसे लोगों को स्वयं को साहित्यकार कहने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए और कुछ जायज़ सवालों के जवाब अपने अंदर तलाशने चाहिए।
  • क्या आप भाषा से प्रेम करते हैं? क्या आप साहित्य से भी प्रेम करते हैं?
  • क्या आप भारत को एक बहुभाषी देश के रूप में स्वीकारते हैं?
  • क्या आप जानते हैं कि उर्दू का जन्म भारत में ही हुआ है? या आप अपने पूर्वाग्रहों को ही सत्य मानते हैं?
  • क्या आप यह स्वीकार करने में तार्किक दृष्टि रखते हैं कि भारत की हिन्दी पट्टियों में उर्दू की बस्तियां भी हैं और यहां बोली जाने वाली भाषा में दोनों की मिली-जुली शब्दावली सांस लेती है?
  • क्या आप भाषा और साहित्य को वैमनस्य को बढ़ावा देने का हथियार बनाते हैं या समरसता क़ायम करना कला का अर्थ, औचित्य अथवा लक्ष्य समझते हैं?
  • भाषा और अदब के सच्चे फ़नक़ार एक बड़ी मुद्दत से आस लगाये बैठे हैं कि इस तरह के झगड़े ख़त्म होने वाले हैं। क्या एक साहित्यकार की हैसियत से आप इन सच्चे आशिक़ों की उम्मीदें तोड़ने बैठे हैं?
ऐसे ही तमाम सवालों और विचारों से गुज़रें और ऐसे बेढंगे, तथ्यहीन और किसी व्यक्ति या संगठन की अंधश्रद्धा से ग्रसित जुमलों को न लिखकर भाषा और साहित्य की दुनिया पर बराए-करम मेहरबानी करें। अपने ही एक शेर से इस बात को फ़िलहाल यहीं विराम देता हूं:

दे इत्रदान का अदब दे पानदान का शऊर
हों ख़ुश्बुएं ख़याल में हो ज़ायक़ा ज़बान में।

रविवार, अक्टूबर 29, 2017

सिनेमा

तस्वीरें पढ़ें और नज़्में देखें


एक श्रेष्ठ फिल्म "दि आर्टिस्ट" के बहाने से लिखा गया यह आलेख 2012 में उत्तर प्रदेश से उस समय प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक पत्र "नवजन्या" में प्रकाशित हुआ था।


The Artist poster. image source: Google

एक ज़माना था जब हम 'शेक्सपियरियन' अंग्रेज़ी से हैरान थे। जहां-तहां से किताबें खोजकर उसका अंग्रेज़ी अनुवाद तलाशते थे और फिर समझते थे। और एक ज़माना यह है जब 'इंटरनेटियन' अंग्रेज़ी ने घनचक्कर बना रखा है। तुर्रा यह है कि इसका कोई अनुवाद उपलब्ध नहीं है। ऐसे-ऐसे प्रयोग और शब्द हैं कि बरसों से अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाने वाले प्रोफेसर भी चकरा जाएं। डूड, कूलिश, यप्पी... तो छोड़िए, यह समझिए - आय एम नॉट ओशो परसन या वी डोंट डू गोल्ड - इनका अर्थ समझते ही आपको वह सब स्कूली पढ़ाई बेकार लगने लगेगी जिसमें आपको व्याकरण के नाम पर न जाने क्या-क्या पढ़ाया जाता था। और, अब तो सारी अंग्रेज़ी भाषा स्टाइल के नाम पर प्रचलित हो रही है। उस ज़माने में हम दिग्गज लेखकों की भाषा की स्टाइल के बारे में पढ़ते थे और अब कमाल है! हर डूड भाषा के स्टाइल के मामले में तमाम दिग्गजों का बाप लगता है।

इसी सांस्कृतिक उलट-पुलट स्टाइलिश भाषा ने कई शब्द प्रचलित कर दिये हैं। अधिकतर तो न समझने लायक हैं लेकिन कुछेक हैं जो किसी प्रवृत्ति को इंगित करते दिखायी देते हैं। इन कुछेक शब्दों में से एक है 'मूवी'। कुछ ही अरसे पहले तक जिसे फिल्म या पिक्चर कहा जाता था, उसे मूवी कहा जाने लगा है। वैसे इस संकल्पना के लिए जिसे यहां फिल्म कहा जाएगा, के लिए और भी शब्द इस्तेमाल किये जाते रहे हैं, लेकिन मूवी से ही शुरू करते हैं। मूवी शब्द क्या अर्थ देता है: गतिशीलता। फिल्म शब्द के मायने क्या हैं: जब कैमरा ईजाद हुआ तो उसके जिस हिस्से से चित्र बनाने का काम हुआ, उसे फिल्म कहा गया। पिक्चर का मतलब तो सभी जानते हैं।

अब कुछ और संज्ञाओं की बात करते हैं। फिल्म के लिए शुरुआत में पिक्चर और फिर मोशन पिक्चर नाम का इस्तेमाल किया गया। मोशन पिक्चर यानी ऐसी तस्वीरें जिनमें गतिशीलता थी या चलती-फिरती तस्वीरें। इसी दौर के तुरंत बाद जब फिल्म मूक नहीं रही, उनमें आवाज़ भी आ गयी तो एक शब्द ईजाद हुआ 'टॉकी'। टॉकी का अर्थ हुआ बातचीत करने वाला/वाली। इसके बाद एक और शब्द जो काफ़ी प्रचलित रहा, वह था 'सिनेमा'। सिनेमा का अर्थ मूलतः वह स्थान है जहां फिल्म देखी/दिखायी जाती है। दूसरा अर्थ है फिल्म या फिल्म जगत से जुड़ा हुआ। हमारे सेंसर बोर्ड ने भी लंबे समय तक सेंसर प्रमाणपत्र पर फिल्मों के शीर्षकों के आगे इसी शब्द का प्रयोग किया।

इन सभी पर्यायवाची शब्दों पर अचानक चर्चा क्यों? वज्ह बिल्कुल है। इन सभी शब्दों के अर्थों के अनुसार कला की अभिव्यक्ति के एक माध्यम की प्रवृत्तियां जानी जा सकती हैं। शायद यह शोध दिलचस्प हो कि किस प्रवृत्ति के अनुसार कौन सी और कैसी फिल्में बनीं या बन रही हैं। यूं देखते हैं - आजकल जो फिल्में, खासकर हिंदी फिल्में बन रही हैं, इनमें ज़्यादातर किस श्रेणी में हैं? विज़ुअल इफेक्ट, कैमरे की तेज़ चालें, पल भर में ढेर सारी गतिविधियां परदे पर जब दिखती हैं, तो लगता है कि इसमें गतिशीलता ही प्रधान तत्व है। इसी प्रधान तत्व के आधार पर इसे मूवी कहना उचित है। लेकिन, क्या गतिशीलता ही फिल्म का प्रधान तत्व है? यह विचार करने लायक प्रश्न है।

एफटीआईआई में कुछ अरसे पहले हुए एक सम्मेलन में हिस्सा लेकर कई निेर्दशकों और फिल्मी कलाकारों को सुनने का मौक़ा मिला था। वहां गुलज़ार साहब की कही बात याद आ रही है - 
"फिल्में अपनी एक भाषा बना रही थीं, किसी भाषा की मोहताजी से परे जा रही थीं, लेकिन न जाने क्या हुआ कि यह काम नतीजे तक पहुंच नहीं पाया... वरना आज हम तस्वीरें सुन रहे होते और नज़्में देख रहे होते।"

अस्ल में, फिल्म का प्रधान तत्व यही ख़ूबसूरती है। गतिशीलता हो, लेकिन इतनी नहीं कि सोच, चित्रात्मकता का प्रभाव, ठहराव और दृश्यात्मकता का अतिक्रमण हो जाये। फिर, गतिशीलता कैमरे या चित्रों की नहीं, बल्कि कथानक की हो तो मायने रखती है। भाव-प्रवाह, विचार-प्रवाह और मन, उस गतिमान तस्वीर के साथ बहता चले, तो गतिशीलता है अन्यथा तो दौड़-भाग ही है। और, दौड़-भाग को गतिशीलता नहीं, दौड़-भाग ही कहते हैं। तो, इस हिसाब से, फिल्म या मोशन पिक्चर सटीक संज्ञाएं हैं, शेष बदलते वक़्तों और बदलते स्टाइलों के कारण से उपजे शब्द हैं।

उम्मीद है, कि इतने अलफ़ाज़ कहना ज़ाया नहीं हुआ होगा। और, अचानक इतने अलफ़ाज़ क्यों? इसकी वज्ह है बेहतरीन फिल्म 'दि आर्टिस्ट'। इस फिल्म को देखकर काफ़ी हद तक तस्वीरों को सुनने और नज़्मों को देखने का एहसास हुआ। फिल्मों की अपनी एक भाषा हो सकती है, यह भी साबित हुआ और बेहद कलात्मकता के साथ। इस फिल्म को ऑस्कर पुरस्कार मिल गये हैं, तो संभव है कि भाषा के बेमानी स्टाइल के चक्करों में फ़ितूरी अलफ़ाज़ ईजाद करने वाले नौजवान डूड भी इसे देखें। अगर देखें तो यह ज़रूर समझें कि ख़ामोशी और सधी हुई भाषा सब कुछ कहने में सक्षम है, अगर कुछ कह नहीं भी पाती, तो उसे कहा जाना ज़रूरी है भी नहीं।

एक पहलू और है कि मूक या अभाषी फिल्मों में शब्दों की कितनी अहमियत, कितना मतलब और कितना सम्मान है। और, बोलती फिल्मों ने शब्दों को कितना निरर्थक बना दिया है... इस पर बातचीत फिर कभी।

शनिवार, अक्टूबर 28, 2017

चिट्ठी

परवीन शाक़िर के नाम एक ख़त

मेरे एहसास की तर्जुमानी करतीं तुम


यह चिट्ठी 13 अक्टूबर 2005 को लिखी गयी थी और इसके कुछ ही बाद मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी की पत्रिका "साक्षात्कार" में इसका प्रकाशन हुआ था।


नाम सुना था और कुछेक अशआर भी, लेकिन धुंधले हो चुके थे। पिछले दिनों एक शाम अचानक पढ़ने को मिलीं तुम्हारी ग़ज़लें और नज़्में। मुरीद के सिवाय क्या होना था इख़्तियार में। सोचा तुम्हें ख़त लिखूं, कभी मुलाक़ातें हों, बातें हों और हो सके तो कुछ और भी। बस, बेतरह तुम्हारे तसव्वुर में रात ढलने लगी।

Parveen Shakir. image source: Google
सोच भी ली थी, ख़त लिखने की तरतीब, एक तरक़ीब कह लो। लिखता तो शायद यूं लिखता कि मेरे एहसास की तर्जुमानी करतीं तुम्हारी ग़ज़लें, नज़्में पढ़ीं। सोचा कि कुछ बात कर लूं, फ़िलहाल ख़त के ज़रीये ही। बात करने लगा तो बात निकलती ही गयी जैसे चादर हटा के बर्फ़ की लहराने लगे हों हर्फ़ और तुम्हारी ग़ज़लों का तआस्सुर ये कि इन हर्फ़ों ने मेरा लिहाज़ भी रखा जैसे सूरज की शह पे तिनके भी बेबाक़ हो गये। चाहो तो ख़ता कह देना लेकिन ये क़तई नहीं कि बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गये। यक़ीन मानो मैं तुम्हारे अलफ़ाज़ से इतना मुतास्सिर हुआ कि तुम्हारे हुस्न का क़ायल हो गया। जी में आया कि तुम फ़ौरन हिंदोस्तान चली आओ और ये भी ऐतबार था मुझे कि अगर ऐसा हो जाये तो फिर तुम्हारी रिफ़ाक़त के लिए, मौसमे-गुल मेरे आंगन में ठहर जाएगा।

हालांकि हम पहले कभी नहीं मिले। फिर भी न जाने क्यूं मुझे लगता है जैसे हम एक ही रूह के टुकड़े हों। हमारे आंगन अलग सही मगर उन पर एक ही बादल बरसता हो, हमारी प्यासी प्यास अलग सही लेकिन समंदर उतना ही चाहिए हो और जैसे मुझ पर एहसान करती हवा तेरी ख़ुश्बू का पता करती है। इन्हीं सब बातों के बीच मेरी दीवानगी ने तुमसे एक रिश्ता सा क़ायम कर लिया। एक पुल जिसके दोनों सिरे किसी धुंध में ग़ायब हों, यही ख़्वाहिश कि मैं वो सिरा तलाश लूं और तुम ये। एक डर तो रहता ही है सो था कि आख़िर किसकी तलाश पूरी हुई है। इन्हीं ख़्वाहिशों को लिये कितने बुलंदो-बाला शजर ख़ाक हो गये। बस, इसी तरह शब ढल गयी।

अगली शाम फिर तुम्हारी ग़ज़लों और नज़्मों की महफ़िल सजी। मैं कभी मुस्कुराया, कभी उदास हुआ, कभी तुम हो गया तो कभी रूह तक आ गयी तासीर मसीहाई की। आज तुम्हारी तस्वीर भी देखने को मिली। यक़ीन मानो तुम्हारी शायरी से कम ख़ूब नहीं लगी। तुम्हारा ही मिसरा याद आया चांद भी ऐन चैत का उस पे तेरा जमाल भी। सोचने लगा कि बख़्शने वाले ने तुम्हें सब कुछ बख़्शा। ऐ क़ाश कुछ कमी छोड़ देता। कम से कम तुम्हारे जैसे मासूम फूल को दुख न बख़्शता। लेकिन, वो तुमसे बहुत पाकीज़ा मुहब्बत करता होगा, इसीलिए तो फूल के सारे दुख ख़ुश्बू बनकर बह निकले हैं। यक़बयक़ महसूस हुआ कि ये मैं क्या कह रहा हूं? अगर ऐसा होता तो ये ख़ुश्बू कैसे बिखरती और मुझे कैसे महकाती। और फिर इस महरूमी के क्या मायने होते मेरे लिए, मुआफ़ करना शायद ये मेरी ख़ुदगर्ज़ी ही है। लेकिन ये बहुत बड़ा सच ही मानो कि मेरे लिए तुम्हारे वजूद का हर पहलू लाज़िमी है, ख़ास है और रहेगा।

ख़ैर, मेरी बातें छोड़ो। आगे सुनो, रात हुई और बिस्तर पर तुम्हारे एक शेर की सलवटें उभरने लगीं बिछा दिया था गुलाबों के साथ अपना वजूद/वो सो के उठे तो ख़्वाबों की राख उठाउंगी। हर सलवट पर बतौर औरत तुम्हारी पाकीज़गी, संजीदगी, समर्पण और मासूमियत मुझे साफ़ दिख रही थी। मैं तुम्हारा क़ायल हो रहा था। सांसों की जगह ग़ज़ल भरतीं तुम अपनी ही नज़्मों के बदन में ढलकर मेरे आसपास थीं उस वक़्त। मैं चाहता रहा कि मेरी निगाहें तुम्हारे चेहरे पर ग़ज़ल लिखती जाएं मगर... कुछ देर बाद उठा तो खिड़की पर चांद ने दस्तक दी। तुम्हारे ख़यालों में डूबा मैं उसे तकने लगा कि अचानक एक बादल ने उसे पूरा ढांक लिया। तब एक और खुलासा हुआ मुझ पर कि इतने घने बादल के पीछे/कितना तनहा होगा चांद। तुम समझ सकती हो कि बादल और चांद के मायने क्या थे मेरे लिए। मालूम नहीं था सिर्फ़ एक ध्यान रहा कि शायद पाकिस्तान में भी रात हो रही होगी और एक बज रहे होंगे। मेरे होंठों की लर्ज़िश से आवाज़ ये निकली सोता होगा मेरा चांद। कहीं नींद न टूट जाये, मैंने तड़पकर अपने लबों पर उंगली रख ली। लेकिन मजबूरी शायद इसी को कहते हैं कि मैं अपने बोलते हुए तसव्वुरात पर उंगली नहीं रख पाया। अपने अहवाल का ज़िक्र ज़रूरी तो नहीं लेकिन कहे बगैर रह नहीं पाउंगा तुम्हारा शेर ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने/सुब्हें जब अपनी थीं शामें उसकी। और रात का इज़ाफ़ा समझाने की बात तो नहीं। ये कोई शिक़ायत नहीं क्योंकि मेरी नींद ये सोचकर टूट चुकी थी कि किस तरह कटती हैं रातें उसकी। थोड़ी देर बाद अधूरी नींद में नीम ख़्वाबीदा आंखों में तुम्हारा ही ग़ुमान उतरने लगा। फिर दिन हो गया और दुनियावी मसाइल मुझे अपने आग़ोश में लेने लगे।

शाम ढली और मुझे ख़बर नहीं थी कि एक सदमा मुझे आज झेलना होगा। तुम्हारा लाइफ़ स्कैच पढ़ने को मिला। आख़िर तक पहुंचा और अंदर-अंदर कुछ चटकने की आवाज़ों की तासीर मेरी पलकों ने बयान की। काश, 1994 के कैलेंडर में 26 दिसंबर की तारीख़ ही नहीं होती। काश ऐसा होता, काश वैसा होता... इस शाम बड़ा मन था कि तुमसे मुलाक़ात होगी, और बातें होंगी मगर..! अजीब तर्ज़े-मुलाक़ात अबकि बार रही/रवायतन ही सही कोई बात तो करते। मेरा एक सुनहला सपना धुंधला हुआ है। इरादा करता हूं कि इसे अंधेरों या ग़र्द की चादर के पीछे गुम नहीं होने दूंगा। वादा करता हूं कि जो सपना देख लिया था तुमसे मिलने का, बातें करने का और हो सके तो कुछ और का भी, उसे पूरा करने की कोशिश ताउम्र करता रहूंगा। मैं देख रहा हूं कि तुम "वहां" एक नीली झील के पास खड़ी हुई पानी में अपना अक़्स देख रही हो और हैरान हो रही हो कि क्या-क्या दिख रहा है। मुझे भी वहां आना नसीब हो कभी, वहीं मेरे उस सुनहले सपने की ताबीर हो। तुम्हारी क़सम अबसे मैं एक नेक इंसान बनने की राह पर ही क़दम रखूंगा क्योंकि अब मैं सब कुछ बर्दाश्त कर सकता हूं लेकिन ये क़तई नहीं कि मैं "वहां" न आ सकूं जहां तुम हो।

चाहो तो पुकार लो
दिलशाद