सोमवार, अप्रैल 17, 2017

आलेख

फिर सवालों के घेरे में - राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार


भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र "सुबह सेवेरे" के 16 अप्रेल 2017 के संस्करण में "अपनी साख गंवाते राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार" शीर्षक से प्रकाशित भवेश दिलशाद लिखित आलेख


एक बार फिर यह विमर्श जन्म रहा है कि क्या राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपना औचित्य, अपनी गुणवत्ता और अपनी निष्पक्षता सिद्ध कर पा रहे हैं? 2016 में रची गयीं फिल्मों के संदर्भ में पिछले दिनों घोषित किये गये राष्ट्रीय पुरस्कारों में कुछ विसंगतियां नज़र आने पर इस संवाद ने फिर मुखरता पायी है। इन विसंगतियों में सबसे प्रमुख है, अक्षय कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए पुरस्कार दिया जाना।

अक्षय कुमार प्रशंसनीय अभिनेता के रूप में दर्शकों के चहेते हैं। लेकिन, एक दर्शक किसी फिल्म या कलाकार को स्वीकार करता है, उसे प्रेम देता है तो क्या यह माना जा सकता है कि यह आधार ही पुरस्कार के लिए एकमात्र या सबसे महत्वपूर्ण पैमाना है? विचार तो किया ही जाना चाहिए। स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आप मनोरंजन करने वालों को पुरस्कृत कर रहे हैं या कला की किसी विशिष्ट उपलब्धि को। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का इतिहास देखें तो आप पाएंगे कि यह कला के प्रति समर्पित रहे कलाकारों और कृतियों को केंद्र में रखता रहा है। प्रतिष्ठित कलाकारों ने माना है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की स्थापना का उद्देश्य यही रहा है कि उन फिल्मों को सम्मान दिया जाये जिनमें प्रासंगिकता, मौलिकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, तकनीकी श्रेष्ठता, कलात्मक सौंदर्य की गुणवत्ता जैसे तत्व सफलतापूर्वक उभरकर आते हों।

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पिछले कुछ समय में ऐसा दिखने लगा है कि राष्ट्रीय पुरस्कार भी व्यावसायिक सिनेमा की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इस वर्ष अक्षय कुमार को उक्त पुरस्कार दिये जाने को लेकर कहा जा रहा है कि यह राष्ट्रीय नहीं राष्ट्रवादी फिल्म पुरस्कार जैसा है। अक्षय ने पिछले कुछ समय में जो कदम उठाये हैं, उन सबके मद्देनज़र माना जा रहा है कि वह सत्ता की गुडलिस्ट में हैं। साथ में, तर्क यह भी है कि इस वर्ष फिल्ममेकर प्रियदर्शन राष्ट्रीय पुरस्कारों की निर्णायक समिति के प्रमुख रहे हैं। अक्षय को इस पुरस्कार का मिलना कई प्रश्न उठाता है जिनमें से कई तार्किक भी हैं और इन्हीं कारणों से पक्षपात का आरोप एक स्तर पर जायज़ भी है।

पहले भी ऐसा होता रहा है जब राष्ट्रीय पुरस्कार सवालों के घेरे में आये। सैफ अली खान, अजय देवगन और संजय लीला भंसाली को औसत या हल्के दर्जे का कलाकार नहीं कहा जा सकता लेकिन जिन फिल्मों के लिए इन्हें पुरस्कृत किया गया, उनके संदर्भ में उनकी प्रतिभा उस स्तर की रही, जिसके लिए उन्हें पुरस्कार दिये गये? विचारणीय यह है।

इन विसंगतियों का कारण क्या है? राष्ट्रीय पुरस्कारों की नियमावली में कई बार स्पष्ट उल्लेख होता है कि निर्णायक मंडल के निर्णय को अंतिम माना जाएगा और उन पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं होगा। लेकिन, क्या इस लिखित नियम का पालन ईमानदारी से हो पाता है? दूसरी बात, निर्णायक मंडल का चयन सरकार का एक मंत्रालय ही करता है तो क्या पिछला नियम प्रभावित नहीं होता? वास्तव में, यह एक भूलभुलैया है जिसमें शब्दजाल ऐसा बिछा है जो आपको हर बार उलझा या भटका देता है।

राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए तय किये जाने वाले निर्णायकों की भूमिका को प्रतिष्ठित एवं सम्मानित फिल्माकर अडूर गोपालकृष्णन ने 2016 के दिसंबर माह में कठघरे में खड़ा किया था। गोपालकृष्णन ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को लिखे एक पत्र में कहा था कि निर्णायक मंडल का चयन किस योग्यता के आधार पर होता है, इसे सबके सामने रखा जाये ताकि पारदर्शिता आ सके। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा था कि कम योग्य लोग ज़्यादा योग्य कलाकारों को जांचें, यह उपयुक्त नहीं है। उन्होंने 2015 के पुरस्कार चयन को लेकर निराशा जतायी थी और कहा था कि इस तरह के चयन से राष्ट्रीय पुरस्कार अपनी गरिमा और औचित्य खो देते हैं। यही नहीं, उन्होंने इसे कला के लिए समर्पित और श्रेष्ठ कलाकारों का नुकसान व अपमान बताया था।

गजेंद्र चौहान को एफटीआईआई में नियुक्त करने वाली व्यवस्था ने शायद इस समय के महान फिल्मकारों में शुमार गोपालकृष्णन के इस पत्र को भी नज़रअंदाज़ कर दिया, इस बार के चयन से ऐसा ही प्रतीत होता है। अयोग्यों या कम प्रतिभाशालियों को बढ़ावा देकर, उन्हें प्रशस्ति देकर कोई व्यवस्था यदि इस मुग़ालते में है कि वह फल-फूल सकती है तो उसे पुरानी कहावत याद रखना चाहिए कि मूर्ख की मित्रता से बेहतर होती है बुद्धिमान की शत्रुता। साख खोते जा रहे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए नये सिरे से नीति एवं पारदर्शी प्रणाली बनाया जाना समय की मांग है।

शुक्रवार, अप्रैल 14, 2017

आलेख

दास्तानगोई - यह आसान हुनर नहीं है कोई


भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र "सुबह सेवेरे" के 9 अप्रेल 2017 के संस्करण में "नियमित कर्मचारी के रूप में नौकरी पाते थे दास्तानगो" शीर्षक से प्रकाशित भवेश दिलशाद लिखित आलेख


मुसाफ़िरों की सरायों में जन्मी, चौक-चौराहों और अफ़ीमख़ानों में पनपी और घर-घर की ज़रूरत बन गयी एक कला आज बतौर दूसरे दर्जे की कला सिर्फ कुछ मंचों, कुछ औपचारिक कार्यक्रमों में बची रह गयी है। एक लोककला थी, जो जनमानस से जुड़ी थी, वह अब केवल प्रदर्शन की वस्तु है! इसे आप एक कला का पतन भी कह सकते हैं और समय के साथ होने वाला बदलाव भी। दास्तानगोई नाम की कोई कला अब जीवित है या उसे प्रनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं, कुछ भी कहिए लेकिन सच यह है कि अब उसके अवशेष मात्र ही रह गये हैं।

हिन्दी में संस्कृत परंपरा से चली आ रही कथावाचन की परंपरा के बाद भारत में उर्दू की दास्तानगोई मुग़लकाल में पनपी। ईरान से आयी यह कला 16वीं सदी के आसपास अपने पंख भारत की सरज़मीं पर फैला रही थी और संयोग है कि उसी वक़्त रामकथा और कृष्णकथाओं के कालजयी साहित्य का प्रचार-प्रसार भी हिन्दू समाज में हो रहा था। रामलीलाओं आदि का इतिहास तो उससे भी पहले का रहा है। ईरान से आयी दास्तानगोई की कला में बहुत समय तक भारत में भी इस्लाम संबंधी कुछ पात्रों के कारनामों या घटनाओं को ही तरजीह दी गयी लेकिन भारतीय लोकमानस से जुड़ने या उससे प्रभावित होने के कारण 19वीं सदी के आसपास उर्दू दास्तानगोई में भी समकालीन कहानियों और घटनाओं का ज़िक्र होने लगा था।

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ख़ैबर-पख़्तूनी इलाक़े से कनिष्क कारोबारियों का आना जाना हुआ करता था। यह इलाक़ा एक तरह से इन व्यापारियों की आरामगाह बना रहा। दिन भर वो यहां अपना व्यापार करते थे और रातें सरायों में गुज़ारते थे जहां अलाव जलाये जाते, कहवा पिया जाता और क़िस्से-कहानियां साझा की जातीं। इन क़िस्से-कहानियों की चर्चा और लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी थी कि आजकल के पेशावर के इस इलाक़े को उस समय से किस्साख़्वानी बाज़ार कहा जाता है। इसी रास्ते से मुग़लकाल में भारत में इन व्यापारियों के साथ यह कला पहुंची। पहले पहल दिल्ली दास्तानगोई का केंद्र बना रहा और फिर 18वीं सदी के अंत तक लखनउ इसका केंद्र हो गया। 1857 की क्रांति के बाद तो दिल्ली में जो दास्तानगो रह गये थे, उन्होंने भी लखनउ का रुख़ किया।

अब लखनउ में यह चौक-चौराहों पर बैठकें जमतीं और रात को अफ़ीमख़ानों में। क़िस्साख़्वानी बाज़ार जैसे पेशावर से उठकर लखनउ में बस गया। लखनउ में इस लोकरंजन को और बढ़ावा मिला और आलम यह हुआ है कि कोठियों, हवेलियों में बाक़ायदा एक दास्तानगो को नियमित कर्मचारी की हैसियत से नौकरी पर रखा जाता। इस शौक़ से मध्यम वर्गीय परिवार भी नहीं बचे और वे भी दास्तानगो से मिन्नतें कर क़िस्से सुनते रहने के आदी हो चले थे। मुंशी प्रेचंद लिखित शतरंज के खिलाड़ी कहानी में इस परंपरा के हवाले भी देखे जा सकते हैं। वास्तव में यह कहानी मुंशी जी ने दास्तानगोई की शैली में ही लिखी है, ऐसा निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है।

दास्तानगोई का हुनर अस्ल में है क्या? एक, किसी कहानी को रोचक ढंग से कहना कि श्रेाता उसका भरपूर आनन्द ले सके। दो, एक अच्छा दास्तानगो वह होता है जो श्रेाता को अपने सुनाने की कला से दृश्य दिखा सकता है, छुअन, गंध और आवाज़ें महसूस करा सकता है। तीन, एक अच्छा दास्तानगो वह होता जिसकी अदायगी इतनी असरदार हो कि श्रेाता भले ही यह जानता हो कि यह बात सच नहीं है लेकिन उसे एक स्तर पर यह विश्वास या अनुभव हो जाये कि यह सच है या हो सकता है। और फिर कल्पना, यानी ज़रूरी नहीं कि हर श्रोता कल्पनाशील हो लेकिन एक अच्छा दास्तानगो उसमें कल्पनाशीलता पैदा कर सकता है। जादूगरी, अय्यारियों और हैरतअंगेज़ कारनामों के क़िस्से इसलिए इस कला में बरसों ज़िंदा रहे कि छास्तानगो अपनी अदायगी से श्रेाताओं में एक रोमांच, एक आश्चर्य और एक अनोखे अनुभव को पैदा करते रहे।

आजकल चूंकि मंचों और बंद सांस्कृतिक सभागारों में ही इस कला का प्रदर्शन होता है इसलिए इस कला पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है और बहुत सारे टूल्स और रूल्स बताये जा रहे हैं कि आप एक अच्छे दास्तानगो कैसे बन सकते हैं लेकिन यह कोई ऐसी कला तो है नहीं कि एक ट्रेनिंग से आप कलाकार बन जाएं। कहीं न कहीं इसके लिए एक मौलिक रुझान का होना ज़रूरी है। हो सकता है कि आप अपने आसपास किसी व्यक्ति को देखें जो प्रभावी ढंग से किसी घटना का वर्णन करता हो, तो आप समझ सकते हैं कि उस घटना के कई साक्षी थे लेकिन उसका बयान इतना प्रभावी कैसे हो गया! बस यही वह गुण है, जो एक दास्तानगो में प्राथमिकता से होना ज़रूरी है। फिर तराशने का काम हो सकता है।

वॉइस मॉड्यूलेशन यानी आवाज़ का उतार-चढ़ाव, आवाज़ की विविधताएं, हाव-भाव या थोड़ा स्वांग आदि कुछ टूल्स हैं एक दास्तानगो के लेकिन उसकी समझ, अध्ययन और उसकी कहन सबसे ज़्यादा मायने रखती है। पहले मीडिया भी नहीं था इसलिए शायद दास्तानगोई एक बड़ी कला थी जो लेागों को उनके समाज और आसपास के वातावरण से जोड़ने का काम करती थी। कारण बहुत से हो सकते हैं लेकिन अब यह कला जनजीवन का हिस्सा नहीं रह गयी है इसलिए अगर इस कला पर कुछ फिल्में जैसे तमाशा, कथाकार आदि बन रही हैं, कुछ कार्यक्रम हो रहे हैं या कुछ किताबें लिखी जा रही हैं या वेइसाइट्स बन रही हैं तो यह एक ज़बरदस्त कला के अवशेष ही हैं या फिर उसकी स्मृतियों को संजोने की कोशिशें जो तारीफ़ के क़ाबिल तो हैं ही।

मंगलवार, अप्रैल 04, 2017

कला

सिनेमा और साहित्य - किश्त तीन


सिनेमाई दुनिया का आकर्षण इतना खतरनाक रहा है कि जो इसकी ओर खिंचा, खिंचता ही चला गया। बहुत हौसला और बहुत संयम चाहिए इस मायाजाल से बचने या छूट जाने के लिए। शब्द चितेरा, गीतों का शहज़ादा, यहां तक कि गीत ऋषि भी कहा गया उस शब्दशिल्पी को, जिसने यह चुनौती स्वीकार की कि एक दिन वह इस मायाजाल से साफ़ निकल जाएगा।


देश आज़ाद हो चुका था और एक काव्य संग्रह हिन्दी में प्रकाशित हुआ कारवां गुज़र गया। इस संग्रह के शीर्षक गीत ने पूरे काव्य परिदृश्य को मोहित कर लिया। विशुद्ध शृंगार गीत भी कहा गया इसे और इसमें दर्शन के तत्व भी खोजे गये। कवि सम्मेलनों का हर मंच इस गीत के बिना न तो संपन्न होता था और न ही सफल। श्री गोपालदास नीरज का यह गीत उनकी ही आवाज़ में, उनकी ही धुन में जिस-जिसने सुना है, उसकी यादों में आज भी गूंजता है कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे..

इस गीत से नीरज को अपार लोकप्रियता मिली। उनकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए हिन्दी फिल्म उद्योग दोनों बांहें फैलाये बैठा था। और हुआ भी यही कि नीरज जा पहुंचे बंबई। नयी उमर की नयी फसल शीर्षक से एक फिल्म बनी और उनका यह गीत मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में जब अवाम तक पहुंचा तो यह वर्जन भी काफी लोकप्रिय हुआ। फिर भी, नीरज की अभूतपूर्व लोकप्रियता का सबूत यह रहा कि कई प्रशंसकों ने बार-बार यही कहा कि जो बात नीरज की आवाज़ में इस गीत में पैदा होती है, वह कहीं और नहीं।

Gopaldas Neeraj source - google

बहरहाल, नीरज की फिल्मी यात्रा शुरू हो चुकी थी और एक परिभाषा गढ़ने की ओर अग्रसर होने को थी। इस यात्रा में राज कपूर और देव आनंद नीरज के प्रशंसकों और मित्रों में शुमार हुए। देव साहब से तो नीरज की दोस्ती ऐसी जमी कि देव साहब के अंतिम समय तक एक बेहतरीन रिश्ता बना रहा। राज कपूर के महत्वाकांक्षी सिनेमा के लिए एक सिचुएशन थी सर्कस के रिहर्सल और शो के माहौल की। राज साहब कुछ गीतकारों की रचनाओं को खारिज कर चुके थे। ऐसे में, नीरज ने चुनौती को स्वीकार किया और एक रचना ऐ भाई ज़रा देख के चलो, उनके सामने पेश कर दी। राज साहब ने हाथों-हाथ इस गाने को पास किया। राज साहब नीरज की प्रतिभा से प्रभावित रहे। हालांकि दोनों ने साथ में बहुत काम नहीं किया लेकिन राज साहब से नीरज को इज़्ज़त बहुत मिली। एक रोज़ बातों-बातों में बात चल पड़ी और राज साहब ने चैलेंज दे दिया तो नीरज ने वादा करते हुए कहा कि "आप देखना, मैं एक दिन इस फिल्मी दुनिया को छोड़कर साहित्य की दुनिया में लौट जाउंगा"

एकाध दशक के बाद ही नीरज ने वास्तव में फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया और कवि सम्मेलनों और साहित्य की दुनिया में लौट आये। लेकिन, लौटने से पहले कई यादगार नग़मे फिल्मों को दे गये। प्रेम पुजारी, गैंबलर, कन्यादान, शर्मीली इत्यादि फिल्मों के कई गाने सभी रसिकों को याद हैं। नीरज का कमाल यह भी था कि फिल्मी गीतों में वह एक बेहद ताज़ा शब्दावली लेकर आये जिसे अक्सर फिल्मकार विशुद्ध साहित्यिक कहकर फिल्मी गीतों के अनुकूल नहीं मानते थे और सीधे नकार देते थे। गीतांजलि, जुही की कली, राजधानी जैसे शुमार लायक शब्द नीरज ने साहित्य की किताबों से निकालकर फिल्मी ज़ुबान में ऐसे ढाले कि श्रोताओं की ज़ुबान पर चढ़े और दिल में उतरे।

नीरज की फिल्मी यात्रा पर ज़रूर ब्रेक लगा लेकिन उनकी काव्य यात्रा सतत चलती रही। वह आज भी सक्रिय हैं करीब 92 साल की आयु में। कुछ साल पहले जब देव साहब का देहांत हुआ तब एक मीडिया समूह के लिए आलेख तैयार करने के लिए मैंने उनसे बात की थी। तब भी उन्होंने यही कहा कि देव साहब नेक इंसान थे और दोस्ती हमेशा बनी रही। देव साहब ने अपनी जो आख़िरी फिल्म बनायी, उसमें भी एक गीत नीरज से लिखवाया था। और नीरज ने मुझे वह गीत पूरा सुनाकर देव साहब को भावुकता से श्रद्धांजलि दी। मेरा सौभाग्य रहा है कि नीरज जी से कई बार मुलाकातें, बातें हुईं। बहुत कुछ सीखने-समझने को मिला उनसे और कुछ इंटरव्यू भी लिये मैंने उनके जो कुछ अख़बारों में छपे भी।

कुछ साल पहले नीरज ने रंगमंच में बतौर अभिनेता भी दस्तक दी थी। लाल किले का आखिरी मुशायरा शीर्षक नाटक में उन्होंने बहादुर शाह ज़फ़र का क़िरदार निभाया था। बहुत उत्साह और उमंग के साथ बताया था मुझे कि शायद मैं पहला एक्टर हूं जिसने 80 बरस से ज़्यादा की उम्र में पहली बार थिएटर में अभिनय किया हो। और मैं सोचता था कि उनकी इस ख़्वाहिश या अभिनेता बनने की ललक का बीज शायद बंबई की उसी फिल्म नगरी की देन है, जिसे बहुत पहले उन्होंने शान के साथ छोड़ दिया था।

अजीब इत्तेफ़ाक है कि प्रेमचंद घुटन महसूस करने के कारण बंबई की फिल्मी दुनिया छोड़ देते हैं, मजाज़ उस चकाचौंध की भयानकता की वजह से उसके हो ही नहीं पाते और एक नीरज है जो उसे अपनाता है, उस दुनिया में अपनी एक अमिट छाप रचता है और फिर एक ज़िद के लिए उसे छोड़ देता है। बहरहाल, नीरज की कलम और आवाज़ का जादू यूं ही क़ायम रहे और वह शतायु हों, यही दुआ है, आमीन।

समालोचना

हिन्दी साहित्य के इतिहास का पुनर्लेखन - एक विमर्श


हिन्दी के अकादमिक प्रांगणों में कुछ समय से हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन को लेकर एक गहमागहमी का माहौल बना हुआ है। कोशिशें किस स्तर पर हो रही हैं, यह स्पष्ट नहीं है लेकिन विमर्श और संवाद कई स्तरों पर हो रहे हैं।


इस विषय में पहला प्रश्न तो यही है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास को फिर से लिखने की आवश्यकता क्या और क्यों है? इस बारे में जो तर्क दिये जाते हैं, उनमें सामान्य रूप से यही बात निकलकर आती है कि अंतिम उल्लेखनीय इतिहास के बाद से साहित्य का एक पूरा कालखण्ड अपने मूल्यांकन की बाट जोह रहा है। अर्थात् कुछ समय पहले ही जो साहित्यकार शीर्ष पर पहुंचे हैं, वे अपना नाम हिन्दी साहित्य के इतिहास में दर्ज करवाने के इच्छुक हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि हिन्दी साहित्य का सर्वाधिक प्रामाणिक इतिहास आचार्य शुक्ल द्वारा लिखित है जो छायावाद के प्रमुख कवियों का नाम लेकर समाप्त हो जाता है। इसके बाद तो कई इतिहास लिखे गये परन्तु आधुनिकतम वह इतिहास, जिसे सर्वाधिक स्वीकार्यता व प्रामाणिकता प्राप्त हुई हो, वह डॉ नगेंद्र लिखित है। यह भी प्रयोगवादी व प्रगतिशील आंदोलन के उल्लेख के साथ समाप्त हो जाता है। संभवतः डॉ रमेशचंद्र शाह तक के समय के साहित्यकारों के कुछ प्रमुख नाम इसमें सम्मिलित हैं। तो उनके बाद के साहित्यकार उल्लेख से वंचित हैं।

दूसरा तर्क इस प्रश्न को लेकर यह है कि इतिहास लेखन के प्रति नयी चेतना जाग्रत हुई है और साहित्य के इतिहास और उसके प्रति दार्शनिक दृष्टि को नये ढंग से रेखांकित किये जाने का समय है। इसे आप कोरी जुमलेबाज़ी भी कह सकते हैं और गंभीर होकर इसे किसी विशेष राजनीतिक धारा की प्रेरणा भी समझ सकते हैं। फिर भी, इतना हल्ला हो रहा है तो कोई आधार तो होगा। वास्तव में, श्री हरमेंद्र सिंह बेदी ने "साहित्य इतिहास दर्शन" की भूमिका में कुछ बिंदु रेखांकित किये हैं जिसे लेकर एक पूरा वर्ग हिन्दी साहित्य के इतिहास के दोबारा लिखने के लिए प्रेरित हुआ है। इसके मूल में प्रमुख बात यह है कि कोई भी विचार या विचारधारा अकस्मात तो उठ खड़ी होती नहीं। उसकी एक विकास यात्रा होती है। आज के भारत में अनेक विचार अपनी जड़ें जमाये हुए हैं और इस संदर्भ में हिन्दी साहित्य के विकास पर कोई महत्वपूर्ण या प्रामाणिक कार्य नहीं हुआ है। अस्तु इन विचारों और साहित्य के परस्पर संबंध एवं परस्पर प्रभाव के अध्ययन की आवश्यकता के चलते इतिहास लेखन पुनः किये जाने की लहर दौड़ पड़ी है।

अब बात है कि साहित्य के इतिहास का पुनर्लेखन प्रामाणिक कैसे हो? इस विषय में उत्तर की आवश्यकता तो है नहीं क्योंकि यह एक आदर्श पर ही आधारित है। उदाहरणार्थ इतिहास लिखा जा रहा है तो निष्पक्ष तथा सम्यक् दृष्टि हो, गहन पड़ताल व शोध हो, एक सटीक दर्शन बोध हो, समाजशास्त्रीय एवं राजनीतिक स्थितियों का आंकलन हो और उस इतिहास के प्रति साहित्य और इतिहास दोनों क्षेत्रों के मूल स्रोत के प्रति तथा उसकी लोकप्रियता के प्रति समभाव-समादरपूर्ण व्याख्या हो, आदि-आदि। परन्तु, ऐसा संभव हो पाता है? यदि हो पाता तो कितने ही साहित्येतिहास उल्लेखनीय हो गये होते और शायद पुनर्लेखन की आवश्यकता अनुभव ही न होती। भाषा साहित्य और देश के पहले अध्याय में डॉ हज़ारीप्रसाद द्विवेदी महत्वपूर्ण कथन करते हैं -

आपने जब एक सामान्य भाषा को बनाने की ठानी है तो आप से आशा होती है कि आप यहीं नहीं रुकेंगे। यह भी बाहरी बात है। और भी आगे चलिए। एक साहित्य बनाइए। गलतफहमी दूर कीजिए। ऐसा कीजिए कि एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को समझ सके। एक धर्मवाले दूसरे धर्मवाले की क़दर कर सकें। एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश वाले के अन्तर में प्रवेश कर सकें। ऐसा कीजिए कि इस सामान्य माध्यम के द्वारा आप सारे देश में एक आशा, एक उमंग और एक उत्साह भर सकें।

देश की एक सामान्य भाषा के विषय में लिखी गयीं डॉ द्विवेदी जी की ये पंक्तियां प्रतीकार्थ में यह समझाती हैं कि वैमनस्य नहीं सामरस्य और सामंजस्य की दृष्टि होना अधिक उपयोगी है। साहित्य और साहित्य के इतिहास के विषय में भी इस दृष्टि को ही लक्ष्य किया जाना चाहिए। आचार्य शुक्ल ने "हिन्दी साहित्य का इतिहास" ग्रंथ के वक्तव्य में इतिहास लेखकों के हाथ कारगर कुंजी देते हुए कहा है कि -

भिन्न-भिन्न शाखाओं के हज़ारों कवियों की केवल कालक्रम से गुंथी वृत्तमालाएं साहित्य के इतिहास के अध्याय में कहां तक सहायता पहुंचा सकती थीं? सारे रचनाकाल को केवल आदि, मध्य, पूर्व, उत्तर इत्यादि खंडों में आंख मूंदकर बांट देना - यह भी न देखना कि खंड के भीतर क्या आता है, क्या नहीं, किसी वृत्तसंग्रह को इतिहास नहीं बना सकता।

साहित्य के इतिहास के लेखन के समय चुनौती यही होती है कि आप रचनाकारों के नामों के उल्लेख को ही इतिहास मान रहे हैं या रचनाओं के आधार किसी प्रवृत्ति, किसी चेतना और किसी धारा को समझा पा रहे हैं। रचनाकारों का नामोल्लेख शुक्ल जी के मत से केवल वृत्तसंग्रह होता है, इतिहास नहीं। इन दृष्टियों से वर्तमान में साहित्य का इतिहास लिखा जाना अत्यंत दुष्कर कार्य है।

एक पहलू और है। साहित्य लोक और समाज की प्रवृत्तियों से उपजता है और वापस लोक और समाज की प्रवृत्तियों में कुछ हलचल मचाता हुआ उसी में विलीन हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे पानी बर्फ बनता है और फिर बर्फ उसी पानी में पिघल जाती है। यहां ध्यातव्य यह है कि साहित्य इतिहास के लेखकों का लोक साहित्य के क्षेत्र में गहन अध्ययन एक आवश्यकता है? "हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास" ग्रंथ के एक खंड की भूमिका में श्री राहुल सांकृत्यायन इस बिंदु को उठाते हुए कथन करते हैं -

हिन्दी साहित्य के इतिहास के सम्यक् अनुशीलन के लिए लोकसाहित्य की पृष्ठभूमि से परिचित होना एक आवश्यक कर्तव्य हो जाता है। अतः हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों का यह धर्म है कि वे लोकसाहित्य के परिप्रेक्ष में हिन्दी साहित्य के अनुशीलन तथा शोध का प्रयास करें।
सांकृत्यायन जी एक नया शब्द भी थमा जाते हैं - शोध। आप पुनः हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने के लिए उत्सुक हैं, स्वागतेय है परन्तु, क्या आप दावे के साथ प्रस्तुत हैं कि आपके पास पर्याप्त शोध संपदा है? क्या आप निश्चयपूर्वक यह कथन कर सकते हैं कि पूर्ववर्ती इतिहासों के अतिरिक्त आपके पास व्यक्त करने के लिए शोधों के आधार पर कुछ नये परिणाम या विश्लेषण हैं? इन प्रश्नों का उत्तर यदि हां है, तो आप साहित्य का इतिहास लिखने के लिए शुभकामनाओं के साथ अग्रसर हो सकते हैं।

हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की योजना के अंतर्गत चर्चित साहित्यिक पत्रिका साहित्य सागर ने करीब एक दशक पूर्व एक महत्वपूर्ण सिलसिला प्रकाशित किया था। कीर्तिशेष संपादक श्री कमलकांत सक्सेना के संपादन में इस पत्रिका छत्तीसगढ़, पंजाब, मालवा, उत्तराखंड आदि अंचलों के हिन्दी साहित्य के इतिहास पर प्रामाणिक सामग्री का प्रकाशन किया था जिसे प्रशंसा एवं प्रोत्साहन दिया गया था। वास्तव में, लोक और समाज से साहित्य के जुड़ाव की दृष्टि इस इतिहास माला में दृष्टिगोचर हुई थी। लोकभाषाओं और हिन्दी के अंचलों से हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की इस परिकल्पना में एक दृष्टि थी, दर्शन था और एक विस्तार भी था। पिछले कुछ समय में प्रस्तुत हुए साहित्येतिहास के प्रयासों में यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा, ऐसा कहा जा सकता है।

हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन के क्षेत्र में कई चुनौतियां हैं जिनको स्वीकार कर ही इस प्रकार का कदम उठाया जाना समीचीन होगा। इन चुनौतियों से नज़र नहीं बचायी जा सकती क्योंकि पूर्ववर्तियों की तुलना में अब ये अधिक गूढ़ एवं कठोर हैं।

कला

सिनेमा और साहित्य - किश्त दो


प्रेमचंद के क़िस्से के बाद उसी कड़ी में दूसरा ख़ास नाम मजाज़ का है। ऐसा महसूस होता है कि मजाज़ इस दुनिया के लिए बने ही नहीं थे। उनका मिज़ाज, उनकी क़ैफ़ियत और तबीयत दुनिया से मेल ही नहीं खाती थी। उनका क़िस्सा भी वहीं से शुरू होता है जहां प्रेमचंद का लगभग ख़त्म हो जाता है।


साहित्य में जो क्रांति हो रही थी 1930 के दशक में, जिसे हिन्दी में प्रगतिशील आंदोलन कहा गया और उर्दू में तरक़्क़ी पसंद तहरीक़। यह तहरीक़ मजाज़ की ज़िन्दगी में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। पढ़ाई के दौरान और कुछ बाद तक आगरा में रहकर इश्क़-मोहब्बत और रवायती क़िस्म की शायरी करने वाला यह शायर इस तहरीक़ से इतना मुतास्सिर हुआ कि एक तरह से इसका अलमबरदार बन गया। 20 बरस की उम्र थी मजाज़ की, जब वह अपने पिता की मर्ज़ी की इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर बीए करने अलीगढ़ जा पहुंचे। आगरा छूटा और अलीगढ़ का माहौल क्या मिला, मजाज़ के तो तेवर ही बदल गये।

यहां उन्हें उस्ताद शायरों के साथ ही अपने हमउम्र आला शायरों की सोहबत भी मिली। बावजूद इसके, मजाज़ का अपना एक रंग रहा, अपना एक अलग ढंग रहा। वह अपने हमउम्रों और अपने ऐन पहले के शायरों से अलग खड़े नज़र आये। उनकी शायरी उनकी अपनी अलहदा पहचान का सबूत बनी रही।

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1939 में सिब्ते हसन और अली सरदार जाफ़री के साथ मिलकर मजाज़ ने एक रिसाले नया अदब का संपादन किया था लेकिन आर्थिक मुश्किलों से वह ज़्यादा दिन तक चल न सका। यहां से मजाज़ का मत लखनउ से उचट गया और उन्होंने दिल्ली का रुख़ किया। यहां एकाध नौकरी की और यहां भी मन नहीं लगा। दिल्ली से विदाई लेते हुए कहा - नौहागर जाता हूं मैं नाला-ब-लब जाता हूं मैं..। दिल्ली छोड़ी तो बंबई पहुंचे। यहां कुछ दोस्तों के साथ मिलकर कुछ दिन काटे लेकिन बंबई की भयानक चकाचौंध और बनावटी फ़िज़ा से भी तालमेल नहीं बिठा पाये। बंबई की सड़कों पर भटकते हुए उन्होंने अपनी सिग्नेचर नज़्म कही -

शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूं
जगमगाती, जागती सडकों पे आवारा फिरूं
गैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूं
ऐ ग़मे दिल क्या करूं, ऐ वहशते-दिल क्या करूं।

दरअस्ल, यह नज़्म उनकी ज़िन्दगी, उनकी ज़ह्नी क़शमक़श और उनकी दुनियावी फ़िक्र का शाहकार के बतौर आज तक ज़िन्दा है। बंबई से उकताहट को ज़ाहिर करने वाली इस नज़्म को 1953 में आयी फिल्म ठोकर में संगीतबद्ध किया गया। तलअत मेहमूद और आशा भोसले की आवाज़ों में। लेकिन फिल्म के लिहाज़ से इसके चुनिंदा अंतरों को ही इसमें शामिल किया गया। बाद के दौर में प्राइवेट एल्बमों के लिए इस नज़्म को कई आवाज़ें मिलीं। इस नज़्म का जादू कुछ ऐसा रहा कि यह नज़्म आज भी कहीं न कहीं किसी हवाले से सिनेमा में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाती रहती है। कुछ बरस पहले की फिल्म खोया खोया चांद के एक नग़मे में इस नज़्म का एक हिस्सा कोट हुआ था।

रही बात मजाज़ की तो वह बंबई से उकताकर लखनउ लौट गये थे। इश्क़ की नाकामी और तरह-तरह के अफ़सोसों से ग्रस्त होकर शराब पीने की आदत पाल बैठे जो कई रोग देकर उनकी जान ले गयी। लेकिन, उनका इसरार यही रहा कि वह शराब नहीं छोड़ेंगे और घड़ी तो नहीं, अगर बस चले तो घड़ा रखकर पिएंगे। दरअस्ल, मजाज़ की मनःस्थिति को उस दौर की बेचैनी, खिन्नता और बौखलाहट कहा जा सकता है। र्काइे उन्हें इन्क़िलाबी शायर कह गया तो किसी ने कम उम्र में बड़ा साहित्य रचने के कारण उर्दू का कीट्स कहा तो फ़ैज़ उन्हें क्रांति का ढिंढोरची नहीं क्रांति का गायक कह गये। लेकिन, मजाज़ अपने दौर का प्रतीक शायर था। मजाज़ अपने दौर की कुरूपता, घुटन और कड़वाहट को इस तरह जी गया था जैसे वो वक़्त मजाज़ की शक़्ल लेकर जी रहा हो।

सिने जगत ने मजाज़ नाम के एक मुक़म्मल दौर को भी क़ायदे से अपनाने में गुरेज़ किया। न किया होता तो तस्वीर में कुछ और हसीन रंग होते। ऐसी ख़बर है कि मजाज़ की ज़िंदगी पर अब कोई फिल्म भी बन रही है। यह भी बहुतों को पता है कि मजाज़ के ख़ानदान के कई नाम सिनेमा की दुनिया के अहम हिस्से बने और रहे। बस, मजाज़ ही इस दुनिया के लिए मुफ़ीद नहीं था। जैसे अपने सही वक़्त से बहुत पहले या बहुत बाद में दुनिया में आया हो। जैसे ग़लती से इस दुनिया में आ गया हो, एक एलियन की तरह। शायद इसलिए अपनी शायरी में एलिनिएशन और एसकेपिज़्म के बहुत से संकेत भी छोड़ गया है।

सोमवार, अप्रैल 03, 2017

कला

सिनेमा और साहित्य - किश्त एक


भारत का सिनेमा सौ साला हो चुका। इस लम्बे और यादगार सफ़र में सिनेमा कभी साहित्य की उंगली पकड़कर चला, कभी हाथ थामकर, कभी आगे-कभी पीछे तो कभी कंधों पर भी। इस दिलचस्प और मक़ामी सफ़र के कई मोड़ों पर, कई सिरों से, कई पहलुओं को टटोला जा सकता है।


मुझे तो होश नहीं आप मशवरा दीजै
कहां से छेड़ूं फ़साना कहां तमाम करूं। बस ऐसी ही एक पेचीदगी है कि सिनेमा और साहित्य के तालमेल पर किस सिरे से बात शुरू की जाये। एकदम शुरू से, किसी बेहतरीन मोड़ से या फिर उल्टी गिनती की तरह? बहरहाल, इस पहेली को पहेली रहने देते हैं और इस वक़्त जिस वक़्त का ख़याल करवटें ले रहा है, उसी की पड़ताल से आगाज़ करता हूं।

Munshi Premchand source - google

वक़्त करवट लेने लग गया था। साहित्य में एक नये दौर की शुरुआत हो रही थी। 1930 के दशक में लखनउ में प्रगतिशील लेखक संघ बन रहा था। छायावाद और द्विवेदी युग अपने अंतिम समय में था। इधर उर्दू की दुनिया में इक़बाल, हाली व दाग़ जैसे शायरों का दौर ख़त्म हो रहा था और फ़िराक़ का शुरू। 40 के दशक में फ़ैज़, इंशा, मजरूह, साहिर और मजाज़ आदि शायर एक नयी आवाज़ लेकर आ रहे थे। इप्टा (IPTA) की नींव डाली जा रही थी। साहित्य में ये दो दशक बड़े बदलाव के साक्षी बन रहे थे।

सिनेमा में भी इस समय में बड़े बदलाव हो रहे थे। सिनेमा का छायावादी युग समाप्त हो रहा था। सिनेमा नयी दुनिया में कदम रख चुका था और अब उस नयी दुनिया में अपने वजूद की हांक लगाने को बेक़रार था। एक नयी लहर, एक नया जुनून और एक नयी आवाज़ साहित्य और सिनेमा के गलियारों में बुलन्द हो रही थी। आज़ादी मिलने के आसपास के वक़्त में कई शायर और साहित्यकार मुंबई की तरफ़ कूच कर रहे थे और सिनेमा कभी उन्हें बुला रहा था या वे सिनेमा की तरफ़ आकर्षित हो रहे थे। शब्दों के कुछ जादूगरों ने सिनेमा से चोली-दामन का साथ जोड़ा तो कुछ ने आधा-अधूरा सा रिश्ता क़ायम किया। और कुछ ऐसे भी थे जिन्हें सिनेमा के चौबारे सुहाये ही नहीं।

एक महत्वपूर्ण बात यहां कुछ इस ज़ाविये से करने वाली है कि मुंशी प्रेमचंद का सिनेमा से जुड़ाव किस तरह का रहा। अपनी शोहरत, इज़्ज़त के साथ मुंशी जी बंबई जा पहुंचे थे। तमाम शोहरतों के बावजूद मुंशी जी अभाव का जीवन जीने के लिए मजबूर थे। इसी सिलसिले में लेखक के तौर पर नौकरी के लिए मुंशीजी फिल्मों की नगरी में जा बसे। कुछ फिल्मों के लिए केवल पैसों के लिए लेखन करते रहे, मौक़ा मिलने पर मज़दूर जैसी दो-एक फिल्मों में एकाध दृश्य में बतौर अभिनेता भी नज़र आये। इस पूरी चहल-पहल के बीच मुंशी जी फिल्म उद्योग से खिन्न रहे। लेखन के हल्केपन और निर्माताओं की स्तरहीन मांगों के लिए कलम चलाना उन्हें नागवार गुज़रा। अपने अंतिम समय से कुछ ही समय पहले उन्होंने बंबई से नाता तोड़ लिया और अपने देस लौट गये। 1936 में उनका देहांत हुआ और 1937-38 में उनके उपन्यास बाज़ार-ए-हुस्न पर एक तमिल फिल्म बनी सेवासदनम। इस फिल्म ने खूब धूम मचायी, तब जाकर बंबई की फिल्म नगरी को समझ आया कि मुंशी जी की प्रतिभा क्या थी। ख़ैर तब तक तो देर हो चुकी थी और मुंशी जी लौटकर न आ पाने वाले सफ़र पर चले गये थे।

मुंशी प्रेमचंद के बंबई से मनमुटाव या खिन्नता या कहें मन उचाट के कारण ही शायद ऐसा हुआ कि प्रमुख हिन्दी लेखक और कवि बंबई के फिल्म उद्योग से कभी जुड़ नहीं सके। दो-एक अपवाद ज़रूर होंगे लेकिन आज तक स्थिति यही है कि हिन्दी के शीर्ष लेखक और कवि फिल्मों के आलोचक ज़्यादा हैं, साथी कम। कारण और भी बेशक़ हैं और होंगे, लेकिन अक्सर यही ख़याल आता है कि मुंशी जी के कटु अनुभव इस स्थिति के मूल में रहे हैं। फिर सोचता हूं काश ! बंबई की फिल्म नगरी ने मुंशी जी को ससम्मान अपनाया होता और यह स्थिति नहीं होती तो भारत को और कितने बेहतरीन चलचित्र मिले होते, शायद एक अलग ढंग और धारा का सिनेमा भी विकसित हुआ होता और शायद हमारे सिनेमा में विश्व स्तरीय चित्रों की संख्या बहुत अधिक होती।

जो होना है, अक्सर हो कहां पाता है। मुंशी जी का जीवन भारत के लेखक के जीवन का यथार्थ उदाहरण आज भी बना हुआ है। कितने ही लेखकों का उचित मूल्यांकन उनके जीवन में नहीं हो पाता। कितने ही लेखकों की प्रतिभा उसके समय की समझ में नहीं आती। कितने ही लेखक अभूतपूर्व या अद्वितीय हुनर के बावजूद तंगहाली या कमज़ोर माली हालत में जीने को मजबूर हैं। कितने ही लेखक अभिशप्त हैं कि उनका जीवन उनकी मौत के बाद ही रंग लाएका। जैसा कि मुंशी जी के जाने के बाद हुआ। उन्हें कथासम्राट या उपन्याससम्राट कहकर अब हमारी ज़ुबान नहीं थकती। उनके सृजन और जीवन पर लगातार शोध किये जा रहे हैं। उनके लेखन पर बिमल राय, सत्यजीत रे और गुलज़ार जैसे फिल्मकार उनके जाने के बाद फिल्में बनाते हैं और उन्हें वह सब कुछ अब मिलता है, जिसके हक़दार तो वह तब भी थे।

रविवार, अप्रैल 02, 2017

समालोचना

कागद की लेखी और आंखिन की देखी..


भारतीय साहित्य के निर्माता शीर्षक के अंतर्गत साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा 2016 में प्रकाशित एवं श्री प्रभाकर माचवे लिखित पुस्तिका 'कबीर' पर एकाग्र समालोचना।


क्या कबीर का जन्म होता है? यदि मान ले हां - तो एक प्रश्न और उठता है कि कबीर पैदा क्यों होता है? कबीर को समझने और मथने से पहले ज़रा पहले की स्थितियों को समझना अपरिहार्य हो जाता है।

कबीर का समय मोटे तौर पर 15वीं सदी मान लिया जाता है। तब और उससे ठीक पहले तक भारतीय समाज और संस्कृति की क्या दशा थी, इस पर कई विद्वानों ने दृष्टिपात पात किया है और उसके साक्ष्य भी जुटाये हैं। उदाहरण के लिए मुग़ल शासन के संदर्भ में पेलसपार्ट की पुस्तक में जिक्र मिलता है कि समाज के मुख्यतः तीन वर्ग थे जिनमें नौकर, श्रमिक और दुकानदार थे। स्वेच्छा से कार्य करने पर मनाही थी, उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता था, दुकानदार शासकीय कर्मचारियों की क्रूरता से परेशान थे.... और दूसरी तरफ़, साधु समाज भी पाखण्ड से ग्रस्त हो चला था। इस प्रकार के कई साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि मध्यकाल या जिस समय को हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के रूप में समझा जाता है, तब और उससे कुछ पहले से भारतीय समाज में धर्मों के बीच संघर्ष की स्थिति थी, जातियां-उपजातियां बढ़ने के कारण आपसी वैमनस्य बढ़ रहा था, दास प्रथा, सती प्रथा, हिन्दू व मुस्लिम महिलाओं की दुर्गति, परदा प्रथा, बहुविवाह प्रथा जैसे हालात समाज के कलंक बने हुए थे।

दूसरी ओर धर्म के क्षेत्र में भी पाखंड हावी हो रहा था। साध्य की अपेक्षा साधन और साधना पर अधिक बल दिया जाने लगा था जिसकी आलोचना उपनिषद् काल से श्रमण युग तक होती रही थी। कर्मकाण्डों की बाढ़ में धर्म अपने मूल अर्थ को खोने लगा था। शैव और वैष्णव संप्रदाय के बीच कटुता हिंसा और हत्याओं की सीमा तक बढ़ चुकी थी। सारांशतः कहा जा सकता है कि तब समाज और संस्कृति एक गहन अंधकारमय पीड़ा को भाग रहे थे जिससे सर्वथा छुटकारे की खोज एवं स्पृहा लोकमानस में बनी हुई थी।

इन स्थितियों में हिन्दी साहित्य के भक्ति आंदोलन का प्रादुर्भाव होता है। भक्ति आंदोलन की पूर्वपीठिका एवं प्रवृत्ति, संप्रदाय एवं उपासना भेद के अनुसार किये जाने वाले वर्गीकरण के जाल में न उलझते हुए सीधे कबीर और उनके सृजन को लक्ष्य करते हैं।

पूर्ववर्णित स्थितियों से यह तो स्पष्ट है कि भक्ति आंदोलन या भक्ति साहित्य की एक उपयुक्त भूमिका बन चुकी थी। कबीर से पहले इन स्थितियों के विरुद्ध कुछ स्वर सुनायी देते हैं। ज़रा पहले ही गोरखनाथ कह रहे थे - अवधू मन चंगा तो कठौती में गंगा - अर्थात् समाज मन के शुद्धिकरण के प्रति जागरूक नहीं था और गंगास्नान से पाप धुल जाने की एक पाखंडी सोच के जाल में उलझा हुआ था। डॉ हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने आठवी सदी के सहजयोगी सिद्ध कवि सरोरूहपाद या सरहपा के काव्य से भी ऐसे उद्धरण प्रस्तुत किये हैं जो ब्राह्मणाों द्वारा फैलाये जा रहे आडंबरों के विरोध में मुखरता से आपत्ति दर्ज कराते हैं।

सहजयोगी सिद्ध, नाथ-सिद्ध संप्रदाय, हठयोगी संप्रदाय, बुद्ध दर्शन के अनुयायी, औपनिषदिक चिंतन आदि के माध्यम से भक्तिकाल के निर्गुण काव्य की नींव पड़ती है। यहां से कबीर एक प्रकाशपुंज की भांति प्रकट होते हैं। कबीर के जीवन पर आंशिक रूप से और सृजन पर मुख्य रूप से एकाग्र पुस्तक में श्री माचवे एक आवश्यक एवं अनिवार्य पूर्वदृश्य को नज़रअंदाज़ कर गये हैं। श्री माचवे ने चूंकि पुस्तक में स्वकथन भी नहीं प्रस्तुत किया है इसलिए यह निर्धारित कर पाना भी पहेली बन गया है कि इस पुस्तक की अवधारणा व औचित्य वास्तव में क्या है..!

श्री माचवे ने इस पुस्तक में एक तिहाई भाग में कबीर के जीवन पर चर्चा की है और दो तिहाई भाग में कबीर के दर्शन, काव्य, छंद, भाषा आदि पर। पूरी पुस्तक के पाठ से यह तो प्रतीत हो जाता है कि कबीर के दर्शन एवं काव्य पर लेखन करते हुए श्री माचवे एक कुशल लेखक भी दिखते हैं तथा उनका मन इन विषयों में अधिक रमता है। कबीर के सृजन की व्याख्याओं में श्री माचवे प्राचीन संस्कृत वांग्मय से लेकर पाश्चात्य विचारकों के अभिमतों के प्रकाश में कबीर को समझने-समझाने के प्रति मुग्ध भाव से लेखनी चलाते हैं। यही नहीं, इस दो तिहाई भाग में वह कबीर के बारे में अपना एक मत भी रख पाते हैं और किसी स्थापना के स्तर तक भी पहुंचते हुए लगते हैं।

एक स्थान पर श्री माचवे कहते हैं - "कबीर की कविता कभी बासी नहीं होती"। यह एक महत्वपूर्ण कथन है। कबीर को जो स्वर है, वह समाज, देशकाल एवं मानवता की चिरंतन सत्तमा की अनुगूंज है। इस स्वर किसी एक विशेष मत, स्वरूप या भाव को लेकर आसक्ति या पूर्वाग्रह नहीं है इसलिए श्री माचवे का यह कथन युक्तियुक्त भी है एवं ग्राह्य भी। वह एक और महत्वपूर्ण कथन करते हैं - "कबीर की आस्तिकता स्वीकार न करते हुए भी, उनकी कविता में बहुत कुछ बचा रहता है, जो मूल्यवान है। कबीर का आनन्द लेने के लिए कबीरपंथी होना ज़रूरी नहीं। कवि के नाते इसी में उनकी चिरंतन श्रेष्ठता निहित है। वह दिक्कालातीत हैं"।

यहां ध्यातव्य है कि एक कवि की श्रेष्ठता कबीर में किस प्रकार निहित है, उसके दिक्कालातीत होने में। वैसे भी जिसने जीवन भर अपने व्यवहार और संदेशों में संप्रदायों, मठों और पंथों के आडंबर का विरोध ही किया हो, उसे समझने के लिए किसी खास पंथ से जुड़ना ज़रूरी हो जाये तो यह दुर्गुण ही कहलाएगा। इस दृष्टि से श्री माचवे कबीर के बारे में यह अर्थपूर्ण उद्घोष करते हैं और पाठक को उस विचार से जोड़ने के लिए कहीं प्रेरित भी करने की चेष्टा भी रखते हैं कि कबीर को समग्र मन से, बिना पूर्वाग्रह के एवं मानवीय तटस्थता के साथ ग्रहण करना ही श्रेयस्कर है।

कबीर वाणी के दर्शन अध्याय में भी श्री माचवे ने कई परतों को उघाड़ने का उत्तम कार्य किया है। परन्तु यहां वह कबीर के बारे में कोई उद्घोषण करने से बच गये हैं और पूर्व के विद्वानों के विचारों को ही व्याख्यायित या विस्तारित कर पाये हैं।

इस पुस्तक का वह एक तिहाई भाग, जिसमें कबीर के जीवन को लेकर चर्चा है, व्यक्तिगत रूप से मुझे निराशाजनक अधिक लगता है। प्रथमतः बिना किसी शोध के श्री माचवे ने केवल पूर्व में दिये गये विभिन्न विद्वानों के मतों को ही एकत्र किया है। कबीर के जन्मवर्ष, मृत्युवर्ष एवं धर्म जाति आदि के बारे में वह अपना कोई मत स्पष्ट नहीं कर सके हैं। यह प्रमाण है कि उन्होंने इस विषय में किसी शोध का सहारा नहीं लिया है। दूसरी बात यह कि कबीर के धर्म के बारे में मान्यताओं का हवाला देते हुए वह कहीं इस आग्रह के हामी दिखते हैं कि कहीं से कबीर को हिन्दू घोषित करने का रास्ता मिला जाये। वैचारिक रूप से मुझे इन तमाम व्याख्याओं से इसलिए भी असंतोष है कि कबीर के धर्म, जाति, वर्ण आदि पर इतनी चर्चा है ही औचित्यहीन। एक साधु, फकीर, सूफ़ी, संत, या कुछ भी कहें, एक विचारक या सुधारक को इस दायरे में बांधने की या इस नज़रिये से जानने की चेष्टा होना ही नहीं चाहिए। जाति न पूछो साधु की... यह बानी रटने से क्या हासिल अगर इस पर अमल ही न किया जाये? ऐसा करते हुए साहित्यकार उसी समाज का अंग प्रतीत होता है जो समाज मूर्तिपूजा का विरोध करने वाले बुद्ध की ही मूर्तियां बनाता बनाता है या भक्ति के संप्रदायों, पंथों की आलोचना करने वाले कबीर के नाम पर ही पंथ और गद्दी की स्थापना करने लगता है। जाग्रत साहित्यकार को इससे बचने या इसका विरोध करने की दृष्टि रखना चाहिए और इस मोर्चे पर श्री माचवे विफल हुए हैं।

वास्तव में, कुछ वाक्यों की मौलिकता के बावजूद, यह पुस्तक कबीर पर किसी प्रकार के मौलिक लेखन की पुस्तक नहीं है। कबीर पर लिखे गये करीब 50 ग्रंथों का अनुशीलन कर एक सारांश पुस्तक के रूप में इसे प्रस्तुत किया गया है इसलिए श्री माचवे को इस पुस्तक का संकलक कहा जाना चाहिए, लेखक नहीं। संभवतः यह पुस्तक किसी पाठ्यक्रम को लक्ष्य करते हुए तैयार की गयी हो सकती है। यही इस पुस्तक की उपयोगिता भी कही जा सकती है और इसी को इस पुस्तक का सीमित व संकुचित दायरा भी माना जा सकता है।