शुक्रवार, नवंबर 17, 2017

कला

सिनेमा और साहित्य - किश्त चार


"गंभीर, सुरचित फिल्में - ऐसी फिल्में जो अंतर्दृष्टि और कल्पनाशीलता के साथ सिनेमा की भाषा का उपयोग करती हैं, हमारी संवेदनाओं को उसी तरह चुनौती देती हैं जैसे पेंटिंग, संगीत और साहित्य की असाधारण कृतियां। यहां तक कि साधारण शिल्प वाली एक फिल्म, जो हमारी भावनाओं पर सीधे प्रभाव डालती है, गहरी समझ की मांग करती है।"


महान फिल्मकार सत्यजीत रे का यह कथन एक स्तर पर विभिन्न कलाओं में एक साम्य तलाशने की राह देता है वहीं, एक परत यह भी खोलता है कि फिल्मों की अपनी एक भाषा होती है। शुरुआती समय में न सही लेकिन समय के साथ सिनेमा ने अपनी एक भाषा गढ़ने का प्रयास किया है जिसके लिए एक समझ का विस्तार हुआ भी है और होना चाहिए भी।

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दूसरी ओर, यदि किसी साहित्यिक कृति पर एक फिल्म बन रही है, तो उसमें महत्वपूर्ण क्या है? साहित्यिक कृति, जिसकी अंतर्वस्तु पर फिल्म आधारित है, या फिल्म, जिसके कारण साहित्य एक अलग माध्यम में प्रवेश करता है? सवाल पेचीदा है और निजी अनुभवों से इसका जवाब खोजने पर संभव है कि उत्तर अलग-अलग मिलें। उत्तर तलाशने की प्रक्रिया में कुछ और प्रश्नों से गुज़रना होता है जैसे कि ऐसी फिल्म को देखने के बाद यदि उस साहित्य को पढ़ा जाये तो पाठक के मन में क्या शब्दों के साथ छवियां चलेंगी? और यदि पहले साहित्य पढ़कर फिर फिल्म देखी जाये तो पाठक के सामने चल रही छवियां क्या उसके अनुभव एवं कल्पनाशीलता को एक संतोषजनक स्तर पर जस्टिफाई करेंगी? साहित्य और सिनेमा के बीच का संबंध ऐसे ही कुछ उलझे प्रश्नों और द्वंद्वों की तरह दिखायी देता है।

सत्यजीत रे ने ही एक व्याख्यान में कहा था - 
"एक फिल्म चित्र है, एक फिल्म शब्द है, एक फिल्म नाटक है, एक फिल्म संगीत है, एक फिल्म हज़ारों तरह के अभिव्यंजक श्रव्य व दृश्य विगत है। वर्तमान में एक और बात जोड़नी होगी कि एक फिल्म रंग है..."

वास्तव में, साहित्य और सिनेमा न केवल दो अलग माध्यम हैं बल्कि दोनों के सृजन एवं उद्देश्यों में कई स्तरों पर अंतर हैं। साहित्य का सृजन एक व्यक्ति करता है जबकि सिनेमा अनेक कलाकारों की सामूहिक रचना है। साहित्य सृजन के समय लेखक अपने अनुभव, दृष्टि एवं प्रतिभा को आधार बनाता है जबकि सिनेमा में कुछ कलाकारों का दख़ल होता है जिसकी बागडोर निर्देशक के हाथ होती है। साहित्य सृजन का उद्देश्य लोकमंगल होता है जबकि सिनेमा का उद्देश्य लोकरंजन। साहित्य सृजन के समय किसी प्रकार की बाज़ार चिंता या भावना न्यूनतम प्रभावी होती है जबकि सिनेमा सृजन में अधिकतम।

उपरोक्त संदर्भ में यह समझना भी अनिवार्य है कि पाठ्य माध्यम एवं दृश्य-श्रव्य माध्यम का नैरेटिव, ढांचा और पहुंच अलग-अलग होती है। इस भूमिका के बाद यह तो स्पष्ट है कि साहित्य किसी फिल्म का आधार हो सकता है, फिल्म का पूरा चेहरा नहीं। संभवतः इसी कारण फिल्म की श्रेणियों जैसे व्यावसायिक सिनेमा, कला सिनेमा, पीरियड सिनेमा आदि में अब तक साहित्यिक सिनेमा जैसी किसी श्रेणी की चर्चा नहीं होती है। ऐसी तमाम श्रेणियों में कभी-कभी साहित्य का आश्रय अवश्य लिया जाता है। इस संदर्भ में गुजराती फिल्म समीक्षक बकुल टेलर का कथन समीचीन है – 
“साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्म अपने आप अच्छी हो, ऐसा नहीं होता। वास्तविकता यह है कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्यशास्त्र और सिनेमा का सौन्दर्यशास्त्र अलग-अलग हैं और सिनेमा सर्जक भी साहित्यकृति के पाठक रूप में साहित्यिक आस्वाद तत्वों पर मुग्ध होकर उनका सिनेमेटिक रूपांतरण किए बगैर आगे बढ़ जाते हैं।“

हिंदोस्तान में जब बोलते हुए सिनेमा की शुरुआत हुई, उससे पहले किसी भाषा का सिनेमा तो बन नहीं रहा था इसलिए उसे हम भारतीय सिनेमा कहते हैं। मूक सिनेमा में अधिकांश स्थानों पर साहित्य का प्रश्रय या आधार दृष्टव्य है। दादासाहेब फालके निर्मित पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ ही भारत के प्राचीन साहित्य पर आधारित थी और कुछ विद्वान इसे 19वीं सदी के हिंदी साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र लिखित नाटक पर आधारित भी घोषित करते हैं। बहरहाल, यहां से हिंदी साहित्य के सिनेमा के साथ जुड़ाव को स्वीकार कर लिया जाये तो इसके आगे की यात्रा से पहले साहित्य और सिनेमा के बारे में तत्कालीन महत्वपूर्ण घटनाओं एवं परिदृश्य से वाकिफ़ होना ज़रूरी है।

एक ओर, 30 के दशक में साहित्य जगत में ऐतिहासिक चेतना का संचार हो रहा था। मार्क्सवाद और फिर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुई रूस क्रांति के बाद क्रांतिकारी विचार सामने आ रहे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रगतिशील विचार का उदय हुआ। इससे हिंदी, उर्दू सहित तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्यकार और कलाकार जुड़े। साहित्य और सिनेमा संबंधी एक और महत्वपूर्ण स्थिति यह थी कि हिंदी के साहित्यकार बहुत कम संख्या में सिनेमा से जुड़े और जो जुड़े भी, उनमें बहुत कम लंबे समय तक संबद्ध रहे। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा की नींव में बांग्ला, मराठी, उर्दू, पंजाबी भाषा के लेखकों और कलाकारों का नाम लिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, सिनेमा निर्माण यानी वित्तीय प्रबंधन उपरोक्त कलाकारों के साथ ही पारसियों के हाथ में रहा। यह शुरुआती स्थिति थी, जो बोलती फिल्मों के आगमन से करीब दो दशक तक प्रभावी रही।

इन स्थितियों एवं घटनाओं के मद्देनज़र हिंदी साहित्य की ओर झुकाव कम होना, शुरुआती फिल्मों पर पारसी थिएटर का प्रभाव होना और कथित हिंदी सिनेमा की भाषा पूरी तरह हिंदी नहीं बल्कि ‘हिंदोस्तानी’ होना स्वाभाविक ही था। वास्तव में, जिसे हिंदी सिनेमा कहा जाता है, वह एक मिली-जुली भाषा यानी हिंदोस्तानी ज़बान का सिनेमा ही है। जब आप उर्दू सिनेमा का इतिहास लिखने बैठेंगे तो उन्हीं फिल्मों का ज़िक्र करेंगे, जिनका हिंदी फिल्मों के रूप में किया जाता है।

तो क्या हिंदी साहित्य को सिनेमा से पूरी तरह ख़ारिज ही समझा जा सकता है? ऐसा नहीं है। 30 के दशक में बोलती फिल्मों की शुरुआत के साथ ही करीब एक दशक तक सिनेमा एक प्रकार से अपने माध्यम को समझने की ही चेष्टा कर रहा था। एक नया माध्यम, नये कलाकार और नयी चुनौतियों से जूझते हुए सिनेमा अपने स्वरूप को परिभाषित एवं स्थापित करने की जद्दोजहद में था। इस समय में मुंशी प्रेमचंद सिनेमा के संपर्क में आये। प्रेमचंद की एक कहानी पर एक फिल्म ‘मिल मज़दूर’ बनी जो उन्हें अपने साहित्य के अनुरूप नहीं लगी। निर्माता एवं अंग्रेज़ी सेंसर पर आरोप लगाते हुए उन्होंने यह तक कह दिया कि “यह प्रेमचंद की हत्या” होने जैसा है। खिन्न होकर वह ज़्यादा समय तक सिनेमा से जुड़े रह नहीं सके।

इसी प्रकार कई और हिंदी साहित्यकारों का जुड़ाव एक-दो फिल्मों तक ही सीमित रह गया। एक अमृतलाल नागर ही थे, जो सिनेमा से लंबे समय तक जुड़े रहे। हालांकि उन्होंने सिनेमा में संवाद एवं पटकथा लेखन तक ही स्वयं को सीमित रखा और साहित्य लेखन को सिनेमा से अलग रखा। बाद में एक नाम रहा कमलेश्वर, जिनका सिनेमा के साथ जुड़ाव उल्लेखनीय रहा। 1948 में उदय शंकर निर्देशित फिल्म ‘कल्पना’ के लिए नागर ने जहां संवाद लेखन किया, वहीं सुमित्रानंदन पंत ने गीत रचे। फिल्म को विश्व स्तर पर सराहना मिली। बावजूद इसके पंत जी भी फिर कभी सिनेमा से नहीं जुड़े। इसी प्रकार भगवतीचरण वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, पांडेय बेचन उग्र, उपेंद्रनाथ अश्क, फणीश्वरनाथ रेणु जैसे कुछ तत्कालीन साहित्यकारों की एकाध कृति पर फिल्मों का निर्माण हुआ लेकिन हिंदी के साहित्यकारों का लंबा जुड़ाव सिनेमा के साथ रह नहीं पाया।

दूसरी ओर, उर्दू के लेखक मंटो, राजेंदर सिंह बेदी, कृष्णचंदर, ख़्वाजा अहमद अब्बास, कमाल अमरोही, आगा हश्र कश्मीरी, राही मासूम रज़ा, अबरार अलवी आदि सिनेमा से लगातार जुड़े रहे। स्वाभाविक रूप से, हिंदी सिनेमा की भाषा, चरित्र एवं अवधारणा स्थापित करने में इन कलाकारों का योगदान हिंदी साहित्यकारों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण रहा है। एक पहलू है लोकभाषाओं के सिनेमा का। भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी आदि भाषाओं के सिनेमा में यदा-कदा हिंदी साहित्य की करवटें ज़रूर हैं लेकिन दर्शक वर्ग सीमित होने के कारण सिनेमा के स्वर्ण समय में एक तो फिल्में ही कम बनीं, दूसरी इन फिल्मों से भी साहित्यकारों की संबद्धता प्रत्यक्ष नहीं रही।

फिर आता है 70 का दशक। हालांकि कला सिनेमा का एक धरातल 40 के दशक से ही सिनेमा में तैयार हो चुका था जिसकी पूर्वपीठिका के रूप में 30 के दशक में वी. शांताराम एवं अब्बास जैसे कलाकारों की फिल्मों को माना जा सकता है। 70 के दशक में शासन सिनेमा से प्रत्यक्ष रूप में जुड़ चुका था और कला सिनेमा को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं एवं गतिविधियां होने लगी थीं। राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, मुक्तिबोध, धर्मवीर भरती जैसे कुछ तत्कालीन हिंदी साहित्यकारों के साहित्य पर फिल्मों का निर्माण हुआ भी लेकिन इन फिल्मों में सिनेमा की अभिव्यंजकता एवं संप्रेषणीयता को लेकर एक विमर्श निरंतर बना रहा। इस समय में एक उम्मीद जागी थी कि अब हिंदी साहित्य का सीधा हस्तक्षेप सिनेमा में संभव है। लेकिन ऐसा फिर नहीं हो सका। एक आलेख में इक़बाल रिज़वी लिखते हैं –
“हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर फिल्म न बनने का शोर 60 के दशक में सरकारी वर्ग तक भी पहुँचा। फिल्म वित्त निगम ने आगे बढ़कर सरकारी खर्च पर अनेक ख्याति प्राप्त साहित्यकारों की कृतियों पर फिल्मों का निर्माण कराया। इनमें से अधिकांश फिल्में डिब्बों में बंद हैं। कुछ फिल्में गिने-चुने स्थानों पर रिलीज जरूर हुईं लेकिन वे इतनी नीरस और शुष्क थीं कि सीमित बौद्धिक वर्ग के अलावा किसी ने उनकी चर्चा तक नहीं की। इन फिल्मों को बनाने वाले अधिकतर फिल्मकारों ने फिल्म तकनीक का तो ध्यान रखा, लेकिन दर्शक उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं था।“

अब, दूसरा पक्ष है हिंदी काव्य और सिनेमा का संबंध। हिंदी के मुख्यधारा के लेखकों की ही भांति कवि भी सिनेमा से उसी प्रकार का परहेज़ करते दिखायी दिये। पंडित सुदर्शन, पंडित इंद्र जैसे कुछ गीतकार 30 और 40 के दशक में सक्रिय रहे लेकिन मुख्यधारा के सिनेमा से नहीं जुड़ सके। इस प्रसंग में भी उर्दू के मशहूर शायर ही फिल्मी गीतों के स्तंभ रूप में उभरे। पंडित भरत व्यास, कवि प्रदीप और शैलेंद्र को हिंदी गीतकारों की वह तिकड़ी करार दिया जा सकता है जिसने सिनेमाई गीतों में हिंदी काव्यधारा का सूत्रपात किया। शैलेंद्र की भाषा हिंदी परंपरा की न होकर हिंदोस्तानी के क़रीब रही लेकिन व्यास एवं प्रदीप ने हिंदी गीत परंपरा से सिनेमा को कालजयी रचनाएं प्रदान कीं। इसके बाद एक और उल्लेखनीय नाम गोपालदास नीरज का है।

वस्तुतः हिंदी के गीतकारों ने कुछ अमर रचनाएं हिंदी सिनेमा को अवश्य दीं लेकिन हिंदी सिनेमा के काव्य का कोई स्वरूप या सौंदर्यशास्त्र रचा हो, ऐसा कहना कठिन है। साहिर, शकील, हसरत, मजरूह जैसे गीतकारों ने जो कारनामा इस स्तर पर किया, वह अधिक महत्वपूर्ण रहा है। समय-समय पर कुछ नाम आते रहे और कुछ मरणोपरांत किन्हीं संदर्भों में गूंजते रहे लेकिन हिंदी के मुख्यधारा के साहित्य ने हिंदी के मुख्यधारा के सिनेमा से हमेशा एक दूरी बनाये रखी, यही सच प्रतीत होता है। एक सिरा यह भी है कि साहित्य की दुनिया में फिल्मी लेखन को हिकारत की नज़र से देखा जाता था। यदि किसी कवि ने फिल्मों में गीत लिखे तो उसे साहित्यिक बिरादरी से खदेड़ने की कवायद शुरू हो जाती थी। ऐसे कई उदाहरण हैं। राज कपूर के पहले न्यौते पर शैलेंद्र ने कहा कि “मैं बिकना नहीं चाहता”। उन्हीं शैलेंद्र ने बाद में कहा कि “लो मैं बिकने आ गया”। नीरज ने भी ऐसी ही उधेड़बुन में फिल्मी दुनिया को छोड़ा।

साहित्य की बदलती धाराओं एवं स्थापनाओं के कारण ऐसा हुआ या हिंदी साहित्य के शुद्धतावादी कलात्मक दृष्टिकोण के कारण या सिनेमा को साहित्य का शोषण करने वाला माध्यम मानने के कारण, कारण कुछ भी रहे हों, हुआ यह कि हिंदी साहित्य का सिनेमा से अन्तर्संबंध जिस तरह का अपेक्षित था, वह स्थापित हो नहीं सका। सिनेमा पर लेखकों एवं कवियों की रचनात्मकता का अतिक्रमण या शोषण करने का आरोप एक हद तक जायज़ मालूम होता है और सिनेमा की दुनिया का बाज़ारवाद भी एक कारण प्रतीत होता है जिसने साहित्य जगत में एक उद्विग्नता पैदा की। इस पूरे परिप्रक्ष्य में कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य की परंपरा जितनी समृद्ध एवं गौरवशाली रही है, सिनेमा में उसकी एक चौथाई झलक भी प्रविष्ट नहीं हो सकी।

हिंदी साहित्य और सिनेमा के बीच एक महत्वपूर्ण पहलू का उल्लेख और आवश्यक है और वह है सिने पत्रकारिता। 50 के दशक में सिनेमा से जुड़ी मूल्यपरक पत्रकारिता का विकास हुआ। एक ओर उर्दू पत्रिका ‘शमां’ उल्लेखनीय रही तो वहीं ‘माधुरी’ ने अनेक नूतन परिभाषाएं गढ़ीं। फिल्म लेखकों, कवियों और कलाकारों से संवाद के समानांतर माधुरी ने हिंदी के शीर्ष साहित्यकारों से संवाद बनाया और सिनेमा पर साहित्यकारों की दृष्टि को महत्व दिया। अपने एक लेख में इतिहासकार रविकांत लिखते हैं –
“साहित्य और सिनेमा के बीच सेतु बनाने में माधुरी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, हिन्दी को हरेक अर्थ में प्रतिष्ठित करने की भी हर कोशिश इसने की। इसरार करके हिन्दी के दिग्गजों से लेख लिखवाए, हरिवंश राय बच्चन से गीतों पर, पंत से फ़िल्मों की उपादेयता, उनके गुण-दोषों पर और दिनकर को तो बाक़ायदा एक फ़िल्म दिखवाकर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी भी छापी..”

इसके बाद कुछ और पत्रिकाओं ने सिनेमा और साहित्य के तालमेल के कुछ प्रयास किये जिसमें कन्हैयालाल नंदन के संपादन में प्रकाशित होने वाली ‘सारिका’ और ‘दिनमान’ का नाम विशिष्ट है। समय के साथ सिनेमा केंद्रित पत्रिकाएं व्यावसायिक होती चली गयीं और साहित्य का दामन छूट गया।

साहित्यकारों एवं फिल्मकारों के बीच लगातार संवाद होते रहे हैं, हो रहे हैं परन्तु अब तक किसी ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका है, जो हिंदी साहित्य और सिनेमा के संबंध को प्रगाढ़ करने के प्रति किसी सकारात्मक बोध का सूचक हो। दोनों माध्यमों को एक-दूसरे को समझने की चेष्टा करने की आवश्यकता एवं अपने-अपने अहंकारों एवं स्वार्थों से परे जाकर समूह बनने की गुंजाइश बनी हुई है। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक होगा यही, कि प्रेमचंद फिल्मी दुनिया छोड़ते रहेंगे और उनके फ़ना होने के सालों बाद कोई सत्यजीत रे आएगा और सिनेमा में प्रेमचंद के साहित्य को पुनर्परिभाषित करने की चेष्टा करेगा।

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सिनेमा और साहित्य - किश्त तीन
सिनेमा और साहित्य - किश्त दो
सिनेमा और साहित्य - किश्त एक

बुधवार, नवंबर 15, 2017

ग़ज़ल

हम फ़नकार हैं, तुम पागल कह लो..!


ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ 
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ

एक रूह होती है फ़नकार की, जो अपने फ़न के ज़रीये इंसानियत के हक़ में इंसानों को जोड़ने के लिए कोशिशें करती रहती है। कहते हैं हज़रत ख़ुसरो ने फ़न का बेमिसाल नमूना पेश किया इस ग़ज़ल में और ग़ज़ल के हर शेर में तीन भाषाओं को साधा। फ़ारसी, हिन्दी (लोकभाषा) और उर्दू की मिली-जुली शब्दावली में कही हज़रत ख़ुसरो की यह ग़ज़ल आज भी शायरी में अपना मक़ाम रखती है। मैं बात करना चाहता हूं कि ख़ुसरो ने ऐसा क्यूं किया? यानी उनके दिल में क्या आया होगा कि उन्होंने यह प्रयोग किया?


मेरा ख़याल है कि हज़रत ख़ुसरो ने ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं किया होगा कि वह कई भाषाओं पर अपनी महारत या कमांड साबित करना चाहते होंगे। इसलिए भी नहीं किया होगा कि ऐसा करने से तीन भाषाओं का पाठक वर्ग उन्हें नसीब हो सकेगा। शायद इसलिए भी नहीं किया होगा कि आने वाले ज़माने इस कला-कौशल पर हैरान होते रहें और उन्हें महान समझते रहें। फिर? मेरा ख़याल है कि हज़रत ख़ुसरो दूरदृष्टा रहे होंगे। सूफ़ी तो थे ही तो रोशन इल्हाम और नूर नज़र तो रही ही होगी। उन्होंने समझा होगा कि आने वाले ज़मानों में लोग ज़ुबानों को लेकर लड़ेंगे, झगड़ेंगे और आपस में उलझेंगे। इस उलझन की गिरफ़्त में शायर और अदीब भी आ जाएंगे। ज़ुबानों की ख़ेमेबाज़ी और सियासत होगी। ऐसे माहौल में अदब में, फ़न में एक मिसाल ऐसी होनी चाहिए जो रोशनी दिखाये कि एक साथ कई भाषाओं से मुहब्बत की जा सकती है। इस मुहब्बत की ज़रीये आपस में जुड़ा जा सकता है। इस जुड़ाव के ज़रीये एक मुल्क़ और दुनिया को अपना घर बनाया जा सकता है यानी "वसुधैव कुटुंबकम"।

मुझे हमेशा लगता रहा है कि यह ग़ज़ल भाषा और साहित्य की दुनिया की तरफ़ से पूरी दुनिया को एक बहुत बड़ा संदेश है प्रेम का, पैग़ाम है पज़ीराई का और शायद पहला कलात्मक उल्लेख है भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब के हक़ में। इस सूत्र को समय-समय पर शायरों ने समझा और इस परंपरा से जुड़ते रहे। हिंदोस्तान की शायरी के इतिहास से ऐसी कई मिसालें हाथ लगती हैं जो भाषा से प्रेम के इस पैग़ाम को बार-बार दुहराती रहीं। पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, पिया बाज पियाला पिया जाये ना, लाम की मानिंद हैं गेसू मेरे घनश्याम के और न जाने ऐसे कितने मिसरे और शेर आपको मिलेंगे जिन्हें आप उर्दू शायरी के इतिहास में शामिल पाएंगे। एक और मिसाल देखिए। इक़बाल साहब का मशहूर मिसरा -

गोदी में खेलती हैं जिसकी हज़ारों नदियां

इक़बाल साहब शायरी के उस्ताद थे, माहिरे-फ़न और ज़ुबान थे। चाहते तो ऐसा भी कह सकते थे -

गोदी में खेलते हैं जिसके हज़ारों दर्या

न इसमें लय या वज़्न संबंधी कोई समस्या आती है और न ही समझने में भाषा की कोई क्लिष्टता पैदा होती है, फिर इक़बाल साहब ने उर्दू की एक ग़ज़ल में यह हिन्दी का मिसरा क्यूं सजा दिया? समझने वाले समझते हैं कि यह वही दर्स है, उसी रूह का कारनामा है जो जोड़े रखना चाहती है, मुहब्बत का माहौल रचना चाहती है। तो, इस पूरी भूमिका के बाद मैं अर्ज़ यह करना चाहता हूं कि ज़ुबान के नाम पर अपने ज़ह्न में बड़े सख़्त सांचे बना लेना कोई अच्छी बात नहीं है। उर्दू की ग़ज़ल में एक लफ़्ज़ हिंदी का या हिंदी की रचना में एक लफ़्ज़ उर्दू का आने पर अगर उस पर ऐतराज़ किया जाएगा, तो यह दोनों ही भाषाओं के लिए न तो सेहतमंद उपाय है और न ही अदब की जानिब से कोई वाजिब पैग़ाम है।

यह समय वास्तव में, इंसान के प्रकृति से दूर जाने का समय है। कमाल की बात यह है कि प्रकृति के लिए समानार्थी शब्द हिंदी में स्वभाव, उर्दू में कुदरत और अंग्रेज़ी में नेचर हैं, जो सीधे मनुष्य के मन और मूल से जुड़े शब्द हैं। इशारा यह है कि पर्यावरण के बहाने से अपने भीतर झांकें और मंथन करें कि हम अपने मूल, मन या कुदरती दिशा के विपरीत क्यूं जाने लगे हैं। इसका जवाब मिलते ही भाषा, रंग, जाति, धर्म से जुड़े बहुत से मसअले तो अपने आप ही सुलझ सकते हैं।

बात यहां तक बढ़ चुकी है कि अगर ग़ज़ल में एकाध लफ़्ज़ हिंदी का आ जावे तो उसे फ़ौरन हिंदी ग़ज़ल कह दिया जाये और इसके उलट भी यही। मैं यहां डॉ. बशीर बद्र साहब को कोट करना चाहता हूं जो अक्सर कहा करते थे कि ग़ज़ल की अपनी एक ज़बान है और ग़ज़ल को अपनी ही एक ज़बान रचने के सफ़र पर आगे बढ़ने से ही मंज़िल मिल सकती है। यह जो हिंदी ग़ज़ल का बड़ा शोर पिछली कुछ दहाइयों से मचा हुआ है, इसके बारे में फिर कभी विस्तार से बात करूंगा लेकिन इशारा कर दूं कि मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर "साये में धूप" के प्रकाशन के समय श्रद्धेय दुष्यंत कुमार जी वह संक्षिप्त भूमिका न लिखी होती तो इस तरह का इतना हंगामा नहीं हुआ होता। बक़ौल ख़ुद दुष्यंत भी, हंगामा खड़ा करना मक़सद नहीं था लेकिन कुछ स्वार्थी सियासी तत्वों की कारगुज़ारियां हैं कि हंगामा ज़्यादा है, सूरत बदलने की कोशिश हाशिये पर है।

उर्दू की दुनिया वाले, जो हिन्दी को और हिन्दी की दुनिया वाले, जो उर्दू को या तो ख़ारिज करते फिरते हैं या अपनी मनगढ़ंत शर्तों के मुताबिक़ अपनाना चाहते हैं, उनसे बहुत इल्तिमास के साथ मैं अर्ज़ यह भी करना चाहता हूं कि जनाब एक ज़ुबान है हिंदोस्तानी। यह कोई विलुप्त हो चुकी चिड़िया नहीं है कि इसे आप दरकिनार कर दें। अगर विलुप्त हो भी रही है तो आप जैसे ही इसके ज़िम्मेदार हैं। और हम जैसे कुछ हैं जो इसको बचाना चाहते हैं, इसे एक पूरी तारीख़ और तहज़ीब के हवाले से और जानदार करना चाहते हैं। आपकी आप जानें, यक़ीन यह है कि इतिहास और आने वाली नस्लें फ़नक़ार कहेंगी हम जैसों को, आप चाहें तो पागल, नासमझ और कमइल्म कह सकते हैं। फ़िलहाल अपने कुछ अशआर के साथ इस वक़्त इजाज़त लेता हूं -

इन्हें उर्दू से है परहेज़ वो हिन्दी से हैं नाराज़
चली आओ ज़बानों सब कुशादा दर हमारे हैं।
लचीले तक नहीं हैं वो बनाये हमने सांचे जो
जो फिट हो जाएं इनमें ख़ुदबख़ुद आकर हमारे हैं।
बड़े बंगलों में रहते हैं बड़े शायर हैं जितने भी
नगर की शान पर बट्टे ये कच्चे घर हमारे हैं।

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गुरुवार, नवंबर 09, 2017

आलेख

इसका मतलब यह साहित्य का सेल्फ़ी युग है..!


तस्वीर बदलने के लिए हैं सभी तैयार
उम्मीद में बैठे हैं पहल होके रहेगी।

साहित्य बदलता रहा है और बदलता रहता है। बदलाव का यह कुदरती नियम चूंकि हर तरफ लागू होता है इसलिए साहित्य पर भी। बदलाव होता है, लेकिन कुछ मूलभूत सिद्धांत या ढांचे नहीं बदलते। इन्हें आधार या बुनियाद भी कहा जा सकता है। यूं भी कह सकते हैं कि इनमें बदलाव आने में बहुत लंबा वक़्त लगता है। तो, साहित्य का स्वरूप बदलता रहता है। उसकी प्रवृत्तियां बदलती रहती हैं। नज़रिये और तेवर बदलते रहते हैं।

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साहित्य के साथ बदलाव अनेक स्तरों पर जुड़ता है। एक उपन्यास के पहले शब्द से लेकर अंतिम शब्द तक लेखन और पाठक के भीतर बहुत कुछ बदल जाता है। उपन्यास तो बहुत बड़ी चीज़ है, एक कविता में भी इतनी ताकत होती है और एक पंक्ति तक में भी। संस्कृत काल के एक कला आचार्य ने कहा था कि "कवि या कलाकार होने के लिए नवनवोन्मेषशालिनी बुद्धि का होना ज़रूरी है"। ज़ाहिर है कि ऐसी बुद्धि नव्यता के माध्यम से बदलाव को ही लक्ष्य करती है। साहित्य में नव्यता आती है दृष्टिकोण, भाषा और शैली जैसे स्तरों पर। संवेदना के धरातल, भावनाओं के प्रवाह एवं विचारों के शून्य संभवतः जल्द नहीं बदलते लेकिन इनसे उपजने वाला कथ्य नव्यता के साथ पनपते हुए अलग रंगों और शेड्स का सृजन करता है।

"ये दुनिया एक रंगमंच है और हम सब क़िरदार हैं जिनका आना-जाना तय है।" शेक्सपियर ने जब यह कहा था तब फिल्में नहीं थीं। कुछ लोग कहते हैं कि अगर उस समय में फिल्में होतीं तो शेक्सपियर दुनिया को रंगमंच नहीं एक फिल्म कहता। चलिए, मान लिया कि ऐसा होता। सवाल यह है कि रंगमंच की जगह फिल्म कह देने से इस विचार में क्या इज़ाफ़ा होता? विचार की अभिव्यंजकता तो वही रहती। उसके अर्थ तो इस शब्द से नहीं बदलते। एक शब्द का यह बदलाव केवल समय के बदलाव की सूचना देता है।

"साहित्य समाज का दर्पण होता है।" महावीर प्रसाद द्विवेदी ने यह कथन शुरुआती 20वीं सदी में किया था। इस वाक्य को भी साहित्य के बदलते वक़्तों और तेवरों के अनुसार कई तरह से बदलकर कहने का प्रयास किया गया। मंतव्य वही रहा। बस, हम नयी तकनीक से पैदा हुए शब्दों के खांचे में इस परिभाषा को समझने की चेष्टा करते हैं। वास्तव में, कुछ कालजयी वाक्यों या शब्दों में इतनी शक्ति होती है कि वह एक मूल विचार या संदेश को अपने में इस तरह कैप्चर कर लेती है कि उसमें एक शब्द बदलने से केवल आप अपने समय को इंगित कर पाते हैं, उसकी मौलिकता से इतर कुछ और कह नहीं पाते।

कुछ लोग जो गंभीरता या बारीक़ी से बदलाव को नहीं समझ पाते, बाहरी बदलावों पर ही रुक जाते हैं। पहले साहित्य में डाकिया या क़ासिद था, लेकिन अब नहीं है। अब फोन, ईमेल और मैसेज है। पहले दीये और चराग़ साहित्य में ज़्यादा जलते-बुझते थे लेकिन अब बल्ब और बिजली के उपकरण आ गये हैं। यह भाषा के स्तर के बदलाव हैं। ये हमेशा होते रहे हैं। गुरुदेव रबींद्रनाथ ने अंग्रेज़ी में लिखा लेकिन उनका कथ्य भारतीय था इसलिए उन्होंने अंग्रेज़ी में घड़ा (GHURRA) ही लिखा क्यूंकि अंग्रेज़ी में उसके लिए कोई शब्द उन्हें मिला ही नहीं।

मूल परिवर्तन के बारे में हमें समय के प्रति एक दृष्टि विकसित करना होगी, तब हम साहित्य के बदलावों को रेखांकित कर सकेंगे। हिंदी के भक्तिकाल में प्रवृत्तियों का विवेचन मिलता है। इन प्रवृत्तियों या चेतनाओं के कारण ही उस समय महान साहित्य रचा गया। उसके बाद कई तरह के विज्ञान, औद्योगिकीकरण और सामाजिक, राजनैतिक क्रांतियों का प्रभाव साहित्य पर देखा गया। अब कथ्य के स्तर पर बदलाव इस तरह से रेखांकित किया जा सकता है कि गुरुदेव के साहित्य में ही ब्राह्मणवाद से मानवतावाद की ओर यात्रा दिखायी दी।

साहित्य अपने समय से चूंकि सीधे तौर पर संबद्ध होता है इसलिए उसमें बाहरी बदलाव जल्दी आते हैं और फिर आंतरिक। इस समय में हम चारों ओर से बाज़ार और तकनीक से घिर चुके हैं। मनुष्य ने रोबोट तक ऐसे विकसित कर लिये हैं जो इंटेलिजेंट भी हैं। स्टीफन हॉकिंग्स मानते हैं कि "कुछ समय बाद इसी नकली बौद्धिकता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का मानव सभ्यता की सबेस खतरनाक व खराब घटना के तौर पर याद किया जाएगा"। हॉकिंग्स का यह भी मानना है कि प्रदूषण इसी तरह बढ़ता रहा तो कुछ ही सदियों में हमारी पृथ्वी आग का गोला बन जाएगी।

दूसरी सोच यह है कि मनुष्य विजेता है, वह हर स्थिति से जूझना और उसका विकल्प खोजना जानता है। किसी और ग्रह पर जीवन की तलाश इसलिए मानव का सबसे बड़ा मिशन है। यह हमारे समय की दर्दनाक, खतरनाक परिस्थितियां हैं जो साहित्य में कुछ स्तरों पर प्रवृत्तियों की भांति इंगित हो रही हैं। कुछ प्रवृत्तियों को बिंदुवार देखते हैं -

  1. हमारा सामाजिक ढांचा जिस प्रकार समूह से व्यक्तिपरक होता जा रहा है, उसी प्रकार साहित्य में एक व्यष्टिवादी विचार घर कर रहा है। कृतित्व से लेकर व्यक्तित्व तक।
  2. हमारे साहित्य में एक नकली बौद्धिकता (Artificial Intelligence) का प्रवेश तेज़ी से हो रहा है। क्या हम साहित्य में रोबोट प्रणाली विकसित करने में लगे हैं?
  3. संभवतः पूर्व के किसी भी समय की तुलना में वर्तमान साहित्य में पलायनवादी सोच के उदाहरण बहुत अधिक हैं।
  4. साहित्यकार जिस प्रकार बाज़ार के कब्ज़े में आ रहे हैं, उससे साफ़ है कि वे साहित्य में बाज़ार का विरोध भले कर रहे हों लेकिन अपने यश एवं सम्मान के लिए उसी बाज़ारवाद को बढ़ावा भी दे रहे हैं। साहित्य में भी इसी बाज़ारवाद से प्रेरित सृजन को साफ चीन्हा जा सकता है।

ऐसी ही और प्रवृत्तियों में बदलाव को सीधे तौर पर समझा जा सकता है। और प्रदूषण के स्तर पर साहित्य में प्रदूषण से तो सभी वाकिफ़ हैं। द्विवेदी जी के शब्दों को पुनर्गठित करने का प्रयास किया जाये तो कहा जा सकता है कि हम साहित्य के सेल्फ़ी युग में हैं। यह परिभाषा कुछ नये अर्थ प्रतिपादित कर सकती है। सेल्फ़ी के अर्थ को एक प्रचलित अर्थ के साथ ही अन्य संभावनाओं में भी समझें। इस समय का साहित्य और साहित्यकार जिस तरह आत्ममुग्धता, आत्मव्यामोह और स्वकेंद्रितता के शिकार हैं, जिस तरह समाज के विघटन को रेखांकित किया जा रहा है, जिस तरह एक संकुचित दायरे को पोसा जा रहा है और इसी तरह की और बहुत सी प्रवृत्तियों की रोशनी में सेल्फ़ी के अर्थ को समझा जा सकता है। दर्दनाक अवश्य है लेकिन सवाल सच्चा है कि क्या यह समय वाक़ई साहित्य का सेल्फ़ी युग है? या होने की तरफ अग्रसर है?

बुधवार, नवंबर 08, 2017

नोट्स

भक्तिकालीन आंदोलनों के प्रमुख संप्रदाय एवं मत


एमए के दौरान भक्तिकालीन साहित्य विशेष रुचि का क्षेत्र रहा। उस समय तैयार किया गया यह ब्योरा अनेक स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर है। यह धार्मिक प्रवृत्तियों को तो रेखांकित करता ही है, इन संप्रदायों के हवाले से भक्तिकालीन आंदोलनों एवं परवर्ती साहित्य की अनेक धाराओं का स्पष्ट जुड़ाव निर्विवाद है इसलिए यह साहित्य के पाठकों एवं विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकता है।


संप्रदाय
प्रवर्तक/कवि
विशेष
श्री
रामानुजाचार्य
विशिष्टाद्वैत
रामावत (तपसी शाखा)
रामानंद
नाम स्मरण, दशधा भक्ति, रामभक्ति
नानक पंथ
गुरु नानक देव
'जपुजी' नानक दर्शन का सार तत्व
उदासी
श्रीचंद
गुरु नानक के पुत्र
विश्नुई
जंभनाथ
देहभेद, योगाभ्यास विषय, नाथपंथ से प्रभावित, 'संभराथल' समाधि स्थल
निरंजनी
स्वामी निरंजन
प्रवर्तक जगन हरिदास निरंजनी भी मान्य, नाथपंथ-संत मत का मध्यवर्ती
लाल पंथ
लालदास
नाम जप, रामभक्ति, अलवर में ही प्रचार
दादू पंथ
संत दादूदयाल
ब्रह्म से परब्रह्म संप्रदाय और इससे दादू पंथ बना, सत्संग स्थल 'अलख दरीबा'
बाबालाली
बाबालाल
इस नाम के 4 साधक, 'बाबालाल का शैल' नामक मठ बड़ौदा में, वेदांत सूफ़ी प्रभाव
बावरी पंथ
बावरी साहिबा (प्रमुख संत)
यारी साहब इस संप्रदाय के प्रमुख संत
साध
संत वीरभान (प्रमुख कवि)
'निर्वान ग्यान' इस संप्रदाय का प्रसिद्ध ग्रंथ
ब्रह्म
श्री मध्वाचार्य
द्वैतवाद, आठ मंदिरों का निर्माण
रुद्र
श्री विष्णुस्वामी
इस नाम के 3 आचार्य, शिष्य वल्लभचार्य
सनकादि (निंबार्क)
निम्बार्काचार्य
भेदाभेद या द्वैताद्वैत
वल्लभ
वल्लभाचार्य
शुद्धाद्वैत, पुष्टिमार्ग, रुद्र संप्रदाय के अंतर्गत
राधावल्लभ
हितहरिवंश गोस्वामी
राधा अधिक महत्वपूर्ण, रसोपासना
हरिदासी (सखी टट्टी)
हरिदास
निम्बार्क संप्रदाय की शाखा माना जाता रहा
चैतन्य (गौड़ीय, गोसाईं संघ)
कृष्ण चैतन्य महाप्रभु
अचिन्त्य भेदाभेद
रैदासी
रैदास (संत रविदास)

वारकरि
तुकाराम

धारकरी
रामदास

ऋषि
शेख़ नूरुद्दीन

सत्यनामी (सतनामी)
जगजीवनदास
दादूदयाल के शिष्य, कोटवा में समाधि तथा संप्रदाय की गद्दी
चरनदासी
संत चरनदास
52 शिष्यों द्वारा 52 शाखाएं, 21 ग्रंथ
शिवनारायणी
शिवनारायण
पिंड अंतर्गत हठयोग द्वारा दिव्य ज्योति प्राप्ति
साहब पंथ
तुलसी साहब
गद्दी समाधि हाथरस में आज भी
गरीबदासी
गरीबदास

राधास्वामी
स्वामी शिवदयाल
योग, साधना, संत संबंधी उपदेश, साहित्य दृष्टि से महत्व नहीं
नाथ
मत्स्येंद्रनाथ
इनकी गोरखनाथ की गणना सिद्धों में भी
स्मार्त (स्मृति)
शंकराचार्य
पंचदेवोपासना व्यवस्था, बाद में अंधविश्वास, तीर्थ, मंदिर व्यापार केंद्र बने और पंडे-पुरोहित अमर्यादित हुए
मत
संप्रदाय
विशेष
शैव
पाशुपत, वीरशैव, लिंगायत, कश्मीरी शैव तथा नाथ-योगी उपसंप्रदाय
स्वामी रामानंद अनुयायियों ने लोकभाषा का आश्रय लिया, मूल में श्रमणण् संस्कृति की प्रेरणा जनसंपर्क का परिणाम
वैष्णव
द्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत, विशिष्टाद्वैत तथा उपसंप्रदायों में रामावत, सहजिया, वारकरी, पंचसखा, महानुभाव
दर्शन आधारित भक्ति, योग साधना का प्रभाव, उपसंप्रदायों द्वारा दर्शन पर बल नहीं
शाक्त
दो श्रेणियां - दक्षिणमार्गी, वाममार्गी
वाममार्ग पर कबीर ने अनास्था जतायी
बौद्ध
दो शाखाएं - महायान, हीनयान। महायान में मंत्रयान, वज्रयान, सहजयान, कालचक्रयान उपशाखाएं
उपशाखाएं पुराणपंथी परंपराओं के विरुद्ध चले आंदोलन की उपज। सूफ़ी साधकों सुधारवाणी का योगदान
इस्लाम
मुख्य संप्रदाय - शरा, बेशरा। अन्य संप्रदाय - चिश्ती, क़ादरी, सुहरवर्दी, नक़्शबंदी, शत्तारी
बेशरा संप्रदाय के उपसंप्रदाय - मदारी, मलंग, कलंदरी, रसूलशाही, लाल शाहबाज़िया, मूसासुहागिया। बेशरा साधक मलामती कहलाते हैं
अन्य
केरल का शास्तापूजक, बंगाल के धर्म-ठाकुर, सहजिया, बाउल, कर्ताभाता, उड़ीसा का प्रचसखा, महाराष्ट्र के वारकरी, महानुभाव
सभी भक्ति आंदोलन से संबद्ध। इनके द्वारा विपुल साहित्य सृजन

इनके अतिरिक्त कुछ अन्य संप्रदायों एवं उनके प्रवर्तकों के बारे में जानकारी इस प्रकार है -

शैव विशिष्टाद्वैत - श्रीकंठ
अविभागद्वैत - विज्ञानभिक्षु
वीरशैवविशिष्टाद्वैत - श्रीपति
पाशुपत - श्रीकंठ तथा लकुलीश
भेदाभेद - भास्कराचार्य