सोमवार, मार्च 30, 2020

कला

मृत्यु सत्य है, लेकिन अंतिम?


नेल्सन मंडेला के जीवित रहते उनकी मौत को दर्शाने वाले एक चित्र पर बड़ा विवाद हुआ था. कला के अपने तर्क थे और लोक के अपने. इस पूरी स्थिति से उपजा एक संक्षिप्त आलेख.


Mandela's painting by Damaso. (Image : The Guardian)

प्राचीन काल से अब तक हमारे पास जीवन का जितना साहित्य और इतिहास है, उतना ही मृत्यु का. समय-समय पर कला की विविध विधाओं ने मृत्यु को अपने ढंग से परिभाषित किया है. कविता, चित्रकारी, संगीत, रंगमंच और लगभग हर विधा के कलाकारों ने यह विषय छुआ है. एक तथ्य यह भी है कि कला हो या विज्ञान, दोनों ही मृत्यु को सत्य मानते तो हैं, लेकिन अंतिम नहीं. क्योंकि, कला उसके बाद की कल्पना कर सकती है और विज्ञान अब तक यह साबित नहीं कर सका है कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं होता. यानी देह तो कुछ ही समय में अपनी सभी गतियों से मुक्त हो जाती है, लेकिन क्या मन या प्राण या चेतना (या अन्य कई नाम) भी नष्ट हो जाते हैं? यदि हां, तो कैसे और नहीं तो क्यों? इस उलझन में विज्ञान भी अब तक उलझा है क्योंकि बायोलॉजिकली हर प्राणी की मृत्यु निश्चित है, लेकिन हाइड्रा यहां भी एक अपवाद है. बायोलॉजी भी इसे अमर कहने के लिए अब तक बाध्य है. कुल मिलाकर, सत्य तो माना जा सकता है, लेकिन अंतिम नहीं. अब तक.

कला और विज्ञान के अलावा, मृत्यु को लेकर धर्म का हस्तक्षेप भी हमेशा से रहा है. लगभग हर धर्म में मृत्यु का विश्लेषण, विश्वास व मत के आधार पर किया गया है और, इससे संबंधित सभी नीतियां व विधियां भी बतायी गयी हैं. धर्म और कला के कुछ धड़े हमेशा से मृत्यु को अंतिम न मानते हुए पुनर्जन्म और मृत्योपरांत जीवन की व्याख्या करते रहे हैं. यहां से विज्ञान की मुश्किलें और बढ़ी हैं. चेतना के अस्तित्व के अलावा, चेतना की उत्पत्ति और प्रकृति को लेकर भी विज्ञान के पास पर्याप्त या सर्वमान्य तर्क नहीं हैं. इसी भ्रम की स्थिति के कारण हज़ारों साल के मानव इतिहास में मृत्यु अब तक सहज स्वीकार की वस्तु नहीं बन सकी है. नये समय के चर्चित चिंतक ओशो ने मृत्यु को उत्सव का क्षण तक कहा, फिर भी मनुष्य अपने विश्वासों, अंधविश्वासों और अविश्वासों के कारण मृत्यु को अंतिम एवं जीवन के परम सत्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सका है.

विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं में मृत्यु को लेकर अनेक प्रकार की रीतियां एवं मन:स्थिति देखी जाती है. भय, दुख, चिंता, पीड़ा जैसे मनोविकार और अपशकुन, सामाजिक खेद व कर्मकांड जैसे चलन मृत्यु से जुड़े हैं. दुनिया के हर कोने में मृत्यु की कामना या कल्पना उस व्यक्ति के लिए की जाती है, जिससे दुर्भावना, वैमनस्य या शत्रुता जुड़ी हो. यह एक सार्वभौमिक भावबोध है इसलिए कोई यदि किसी अपने के लिए मृत्यु की कल्पना करता है तो उसे सहज नहीं लिया जाता.

जिस बात पर चर्चा करना है, उसके लिए इतनी भूमिका तो ज़रूरी थी ही. आजकल अफ्रीका में ज़्यादातर लोग एक चित्रकार पर नाराज़ हैं क्योंकि उसने अपने चित्र के माध्यम से अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान नेता नेल्सन मंडेला की मृत्यु का दृश्य उकेरा है. कई लोग चित्रकार की आलोचना करने में लग गये हैं, वहीं चित्रकार का अपना नज़रिया है. कुछ दिनों पहले बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया था कि अफ्रीका में मंडेला की मृत्यु को किसी अभिशाप से कम नहीं समझा जाएगा. अफ्रीकी इस सच को स्वीकार करने में सहज नहीं हैं कि मंडेला मृत्यु की ओर हैं और वह खुद को मंडेला के बगैर अनाथ महसूस करेंगे. रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि प्रार्थनाएं जारी हैं और अफ्रीकी सार्वजनिक तौर पर यह बात करने से कतरा रहे हैं कि मंडेला वाकई मरने वाले हैं. यह उनके लिए दु:स्वप्न है.

चित्रकार यिउल दामासो ने इसी रिपोर्ट के तथ्यों से आहत होकर अफ्रीका के लोगों को अपने चित्र के ज़रिये समझाने की कोशिश की है कि मंडेला एक महान मनुष्य हैं, लेकिन मनुष्य ही हैं... इसलिए एक दिन अफ्रीका और दुनिया को उनकी मौत का दृश्य देखने के लिए खुद को तैयार और मज़बूत करना चाहिए. इस चित्र में मंडेला का पोस्टमार्टम होते दिखाया गया है, साथ ही, मंडेला को अर्धनग्न चित्रित किया गया है. इस कारण भी इस चित्र को अशोभनीय करार दिया जा रहा है. वास्तव में, यह चित्र 17वीं सदी के कलाकार रैम्ब्रैंट वैन रीन के एक प्रसिद्ध चित्र 'दि एनाटमी लेसन ऑफ डॉक्टर निकोलस टल्प' की तर्ज़ पर उकेरा गया है और इस चित्र में दिखने वाले शव के स्थान पर मंडेला को दर्शाया गया है.

चित्रकला में नग्नता हमेशा से ही कलाकारों को आकर्षित करती रही है. विंची, माइकलेंजेलो से लेकर एमएफ हुसैन और तैयब मेहता तक चित्रकारों ने नग्नता को परिभाषित किया है. विक्टोरियन व क्लासिकल दौर की पेंटिंग में सौंदर्य बोध या वासना चित्रण के लिए नग्नता का प्रयोग किया जाता रहा. फिर समाज की कड़वी सच्चाइयों के लिए दुनिया भर के चित्रकारों ने इसे दर्शाना शुरू किया. धार्मिक और परंपरागत जीवन शैली को चित्रित करने के लिए ​भी चित्रकारों ने नग्नता को कैनवास पर उतारा. सब-सहारन अफ्रीका और तीसरी दुनिया के कई देशों के आदिवासियों के नग्न चित्रों को एक समय में काफ़ी कीमत मिली. सभ्य समाज ने आदि समाज की नग्नता को कभी मात्र मनोरंजन समझा तो कभी यथार्थ बोध. धीरे धीरे चित्रकला में नग्नता बहस का विषय बनी और कलाकारों ने इसे अभिव्यक्ति की शैली के तौर पर कलाकार की स्वतंत्रता कहा.

वास्तव में, एक अत्यंत सूक्ष्म लकीर है, जिसके एक तरफ नग्नता कला है और दूसरी तरफ, अश्लीलता. जिन कलाकारों ने इस सूक्ष्मता को समझा, उन्होंने नग्नता की वक़ालत तो कर दी लेकिन इससे उन्हें भी बहाने और तर्क मिल गये, जिन्हें वास्तव में कला से कोई लेना देना नहीं था, बल्कि सिर्फ़ सस्ती ख्याति और व्यवसाय से सरोकार था.

ख़ैर, दामासो के इस चित्र में नग्नता के नाम पर उंगली उठाना कला के दृष्टिकोण से जायज़ नहीं है. हां, यदि लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं, तो कलाकार की आलोचना की जा सकती है, लेकिन फिर एक नयी बहस का सूत्रपात होता है कि इस आलोचना से कलाकार की भावना भी तो आहत होती है. यदि लोग कलाकार की भावना नहीं समझ सकते तो कलाकार के लिए कितना ज़रूरी है कि वह लोगों की भावना को समझे. इस मुद्दे पर एक तर्क यह भी है कि यदि कला लोकमंगल के लिए नहीं है तो उसका औचित्य क्या है. तर्क-वितर्क और वाद-विवाद कितना भी हो, फिर भी प्रश्न शायद बना रहेगा कि कला के लिए साध्य क्या है, लोक या सत्य. चूंकि पूर्ण सत्य निश्चित तौर पर अब तक अबूझ है इसलिए यह प्रश्न भी बड़ा है कि लोक का सत्य यदि भ्रम है, तो कलाकार को सही अर्थों और दिशा का अनुसंधान करने का अधिकार है या नहीं. यदि विज्ञान इस खोज के लिए स्वतंत्र है तो कला के लिए सीमाएं और अनुशासन क्यों और कहां तक?

(यह लेख साल 2010 में एक अख़बार के संपादकीय पेज के लिए उस समय के मुद्दे पर केंद्रित एक त्वरित टिप्पणी के तौर पर लिखा गया था, जो किसी कारणवश अप्रकाशित ही रहा.)

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