शुक्रवार, अप्रैल 14, 2017

आलेख

दास्तानगोई - यह आसान हुनर नहीं है कोई


भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र "सुबह सेवेरे" के 9 अप्रेल 2017 के संस्करण में "नियमित कर्मचारी के रूप में नौकरी पाते थे दास्तानगो" शीर्षक से प्रकाशित भवेश दिलशाद लिखित आलेख


मुसाफ़िरों की सरायों में जन्मी, चौक-चौराहों और अफ़ीमख़ानों में पनपी और घर-घर की ज़रूरत बन गयी एक कला आज बतौर दूसरे दर्जे की कला सिर्फ कुछ मंचों, कुछ औपचारिक कार्यक्रमों में बची रह गयी है। एक लोककला थी, जो जनमानस से जुड़ी थी, वह अब केवल प्रदर्शन की वस्तु है! इसे आप एक कला का पतन भी कह सकते हैं और समय के साथ होने वाला बदलाव भी। दास्तानगोई नाम की कोई कला अब जीवित है या उसे प्रनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं, कुछ भी कहिए लेकिन सच यह है कि अब उसके अवशेष मात्र ही रह गये हैं।

हिन्दी में संस्कृत परंपरा से चली आ रही कथावाचन की परंपरा के बाद भारत में उर्दू की दास्तानगोई मुग़लकाल में पनपी। ईरान से आयी यह कला 16वीं सदी के आसपास अपने पंख भारत की सरज़मीं पर फैला रही थी और संयोग है कि उसी वक़्त रामकथा और कृष्णकथाओं के कालजयी साहित्य का प्रचार-प्रसार भी हिन्दू समाज में हो रहा था। रामलीलाओं आदि का इतिहास तो उससे भी पहले का रहा है। ईरान से आयी दास्तानगोई की कला में बहुत समय तक भारत में भी इस्लाम संबंधी कुछ पात्रों के कारनामों या घटनाओं को ही तरजीह दी गयी लेकिन भारतीय लोकमानस से जुड़ने या उससे प्रभावित होने के कारण 19वीं सदी के आसपास उर्दू दास्तानगोई में भी समकालीन कहानियों और घटनाओं का ज़िक्र होने लगा था।

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ख़ैबर-पख़्तूनी इलाक़े से कनिष्क कारोबारियों का आना जाना हुआ करता था। यह इलाक़ा एक तरह से इन व्यापारियों की आरामगाह बना रहा। दिन भर वो यहां अपना व्यापार करते थे और रातें सरायों में गुज़ारते थे जहां अलाव जलाये जाते, कहवा पिया जाता और क़िस्से-कहानियां साझा की जातीं। इन क़िस्से-कहानियों की चर्चा और लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी थी कि आजकल के पेशावर के इस इलाक़े को उस समय से किस्साख़्वानी बाज़ार कहा जाता है। इसी रास्ते से मुग़लकाल में भारत में इन व्यापारियों के साथ यह कला पहुंची। पहले पहल दिल्ली दास्तानगोई का केंद्र बना रहा और फिर 18वीं सदी के अंत तक लखनउ इसका केंद्र हो गया। 1857 की क्रांति के बाद तो दिल्ली में जो दास्तानगो रह गये थे, उन्होंने भी लखनउ का रुख़ किया।

अब लखनउ में यह चौक-चौराहों पर बैठकें जमतीं और रात को अफ़ीमख़ानों में। क़िस्साख़्वानी बाज़ार जैसे पेशावर से उठकर लखनउ में बस गया। लखनउ में इस लोकरंजन को और बढ़ावा मिला और आलम यह हुआ है कि कोठियों, हवेलियों में बाक़ायदा एक दास्तानगो को नियमित कर्मचारी की हैसियत से नौकरी पर रखा जाता। इस शौक़ से मध्यम वर्गीय परिवार भी नहीं बचे और वे भी दास्तानगो से मिन्नतें कर क़िस्से सुनते रहने के आदी हो चले थे। मुंशी प्रेचंद लिखित शतरंज के खिलाड़ी कहानी में इस परंपरा के हवाले भी देखे जा सकते हैं। वास्तव में यह कहानी मुंशी जी ने दास्तानगोई की शैली में ही लिखी है, ऐसा निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है।

दास्तानगोई का हुनर अस्ल में है क्या? एक, किसी कहानी को रोचक ढंग से कहना कि श्रेाता उसका भरपूर आनन्द ले सके। दो, एक अच्छा दास्तानगो वह होता है जो श्रेाता को अपने सुनाने की कला से दृश्य दिखा सकता है, छुअन, गंध और आवाज़ें महसूस करा सकता है। तीन, एक अच्छा दास्तानगो वह होता जिसकी अदायगी इतनी असरदार हो कि श्रेाता भले ही यह जानता हो कि यह बात सच नहीं है लेकिन उसे एक स्तर पर यह विश्वास या अनुभव हो जाये कि यह सच है या हो सकता है। और फिर कल्पना, यानी ज़रूरी नहीं कि हर श्रोता कल्पनाशील हो लेकिन एक अच्छा दास्तानगो उसमें कल्पनाशीलता पैदा कर सकता है। जादूगरी, अय्यारियों और हैरतअंगेज़ कारनामों के क़िस्से इसलिए इस कला में बरसों ज़िंदा रहे कि छास्तानगो अपनी अदायगी से श्रेाताओं में एक रोमांच, एक आश्चर्य और एक अनोखे अनुभव को पैदा करते रहे।

आजकल चूंकि मंचों और बंद सांस्कृतिक सभागारों में ही इस कला का प्रदर्शन होता है इसलिए इस कला पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है और बहुत सारे टूल्स और रूल्स बताये जा रहे हैं कि आप एक अच्छे दास्तानगो कैसे बन सकते हैं लेकिन यह कोई ऐसी कला तो है नहीं कि एक ट्रेनिंग से आप कलाकार बन जाएं। कहीं न कहीं इसके लिए एक मौलिक रुझान का होना ज़रूरी है। हो सकता है कि आप अपने आसपास किसी व्यक्ति को देखें जो प्रभावी ढंग से किसी घटना का वर्णन करता हो, तो आप समझ सकते हैं कि उस घटना के कई साक्षी थे लेकिन उसका बयान इतना प्रभावी कैसे हो गया! बस यही वह गुण है, जो एक दास्तानगो में प्राथमिकता से होना ज़रूरी है। फिर तराशने का काम हो सकता है।

वॉइस मॉड्यूलेशन यानी आवाज़ का उतार-चढ़ाव, आवाज़ की विविधताएं, हाव-भाव या थोड़ा स्वांग आदि कुछ टूल्स हैं एक दास्तानगो के लेकिन उसकी समझ, अध्ययन और उसकी कहन सबसे ज़्यादा मायने रखती है। पहले मीडिया भी नहीं था इसलिए शायद दास्तानगोई एक बड़ी कला थी जो लेागों को उनके समाज और आसपास के वातावरण से जोड़ने का काम करती थी। कारण बहुत से हो सकते हैं लेकिन अब यह कला जनजीवन का हिस्सा नहीं रह गयी है इसलिए अगर इस कला पर कुछ फिल्में जैसे तमाशा, कथाकार आदि बन रही हैं, कुछ कार्यक्रम हो रहे हैं या कुछ किताबें लिखी जा रही हैं या वेइसाइट्स बन रही हैं तो यह एक ज़बरदस्त कला के अवशेष ही हैं या फिर उसकी स्मृतियों को संजोने की कोशिशें जो तारीफ़ के क़ाबिल तो हैं ही।

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