शुक्रवार, मार्च 01, 2024

आलेख

डार्विन, मार्क्स और ग़ालिब की 19वीं सदी!


(27 दिसंबर 2022 को मूल रूप से न्यूज़18 हिंदी की वेबसाइट पर यह लेख प्रकाशित हुआ था. ग़ालिब की याद के दिन छपे इस लेख में यह नवाचार है कि ग़ालिब के समकालीन दो क्रांतिकारी विचारकों के बरअक्स उनकी शायरी को समझा जाये.)


Hindi.News18.Com से साभार


19वीं सदी में दुनिया के कई कोनों में पीड़ा जीवन का जैसे केंद्र थी. कहीं मज़दूरों का शोषण, कहीं औपनिवेशिक युद्ध व षडयंत्र, कहीं गुलामी तो कहीं दकियानूसी सांप्रदायिक ताकतों का वर्चस्व. मानव समाज बुरी तरह छटपटा रहा था. इसके बरअक्स, 19वीं सदी पूरी दुनिया के लिए बड़े इन्क़िलाब की सदी है. भारत में मुग़ल साम्राज्य का पतन और अंग्रेज़ी सत्ता का वर्चस्व कायम हो रहा था, तो पश्चिम में दो बड़ी क्रांतियां हो रही थीं. एक, चार्ल्स डार्विन अपने जीवविज्ञानी सिद्धांतों के ज़रिये कर रहे थे तो दूसरी, एंगेल्स और कार्ल मार्क्स अपने उन दार्शनिक सिद्धांतों से, जिनके मूल में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शोषण के नज़रिये से इतिहास को समझा जा रहा था. आंडबर, पूंजीवाद, उपनिवेशवाद के विरुद्ध विद्रोह के सुरों के बीच मानवाधिकार, प्रगतिशील विचार और समानता जैसे मूल्य बीच बहस में आ रहे थे. इस पूरे परिप्रेक्ष्य में मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी को यक़ीनन एक बड़ी घटना के रूप में दर्ज करने और समझने की ज़रूरत बनी हुई है.

निस्या-ओ-नक़्दे-दोआलम की हक़ीक़त मालूम
ले लिया मुझसे मेरी हिम्मते आली ने मुझे

अतार्किकता को ग़ालिब कई जगह अपनी शायरी में निशाना बनाते हैं. स्वर्ग-नर्क की अवधारणा पर सवाल खड़े करने जैसे उनके रवैये उन्हें कबीर, राबिया और ललदैद (ललद्यद) जैसे सूफ़ी संत कवियों की परंपरा में लाते हैं, तो ऐसे ही बयान उन्हें न्यूटन के बाद की सदी में वैज्ञानिक सोच का कवि भी साबित करते हैं. उनकी जीवन यात्रा में चूंकि अभाव, दुख, असफलता, आरोप और असम्मान के कई प्रसंग रहे इसलिए एक मोहभंग तो उनकी शायरी में स्वाभाविक था ही, लेकिन यह सहज नहीं था कि वह एकदम से प्रगतिशील भी नज़र आये. इस लिहाज़ से भी ग़ालिब के रचनाकर्म को प्रकाश में लाने के कुछ रास्ते तो हैं ही.

समाजी, सियासी और सांस्कृतिक उथल-पुथल

भारत में राजनीतिक उथल-पुथल का आलम यह था कि मिर्ज़ा ग़ालिब अपनी आंखों से बहुत कुछ टूटता देख रहे थे. ब्रितानी सत्ता पिछली सत्ताओं के कई प्रतीकों, दिल्ली की पहचान रहे कई नामों और पहचानों को तबाह कर रही थी. दिल्ली के लिए ग़ालिब की तड़प हो या उनके दिल में दिल्ली की टूटन, कई शेरों में पुरअंदाज़ बयान होती रही.

रोज़ इस शहर में एक हुक्म नया होता है
कुछ समझ में नहीं आता कि क्या होता है

वास्तव में, ये अशआर उस दौर के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संकटों के इशारे के रूप में इतिहास के हिस्से भी समझे जा सकते हैं.

न हो बहरज़ा बयाबां नवर्दे-वहमे-वजूद
हनोज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फराज़

इससे पिछले शेर में जिस तरह शहर को हम जिंदगी या नियति के तौर पर समझ सकते हैं, उसी तरह इस शेर के भी आध्यात्मिक पहलू हैं. एक दार्शनिक व्याख्या के ख़िलाफ़ ये पंक्तियां समझी जाती हैं, लेकिन मजाज़ी तौर पर इस शेर को इन अर्थों में भी देखा जा सकता है कि हमारे दिमाग में असमानता को पोसने वाले संस्कार कई सच्चाइयों को स्वीकार करने में रोड़ा बन जाते हैं. हम एक रटी हुई ज़ुबान बोलते हैं. यक़ीनन इस तरह की सोच 19वीं सदी के जनजीवन में प्रमुख लक्षण के तौर पर थी. 19वीं सदी भारत में बड़े सांस्कृतिक परिवर्तन के लिहाज़ से भी उल्लेखनीय थी.

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ग़ालिब की उम्र के पूर्वार्द्ध के समकालीन राजा राममोहन राय औेर उत्तरार्ध के समकालीन ज्योतिबा फुले के सुधारात्मक विचारों की एक लहर थी. ऐसे समय में एक शायर का प्रगतिशील हो जाना क्या मायने रखता है? यह बड़ी घटना इसलिए भी था कि ‘ग़ज़ल’ जैसी विधा को तब तक ऐसे काव्य रूप का दर्जा न मिल सका था, जिसमें समाज, सियासत या समय की कड़वी सच्चाइयों को दर्ज किया जाए. ‘पर्दा प्रथा’ के उस दौर में ग़ज़ल को नाज़ुक, रूमानी ख़याल, एक ‘पर्दादार शर्मीली और सुंदर औरत’ के हवाले से ही बखाना जाता रहा. एक बड़ा वर्ग अब तक इस तरह की सोच की पैरवी करता है. उस समय तो ग़ज़ल या शेर में इस तरह के विषयों को उठाना ही किसी क्रांति से कम न था! ‘हुआ है शह का मुसाहिब’ जैसे शेर इस बात की गवाही देते हैं. मिर्जा ग़ालिब की शायरी में उनका समय और समाज तल्ख़ी के साथ दर्ज होने से भी परहेज़ करता नहीं दिखता.

बादशाही का जहां ये हाल हो ग़ालिब तो फिर
क्यों न दिल्ली में हर एक नाचीज़ नवाबी करे

यह भी याद रखना चाहिए कि 19वीं सदी में ही हिंदी और उर्दू के बीच दीवार खड़ी करने की कोशिशें की जा रही थीं. पहले बंगाल की ज़मीन से दोनों भाषाओं के बहाने अंग्रेज़ों की ‘डिवाइड एंड रूल’ पॉलिसी सामने आती है, धीरे-धीरे आधिकारिक भाषा फ़ारसी का विरोध, लिपि पर वबाल और फिर सदी के उत्तरार्ध में खड़ी बोली आंदोलन में तेज़ी. इस पूरे विषय में उपनिवेशवाद की सांप्रदायिक साज़िश को भी ग़ालिब भांपते हैं और उनके कुछ प्रसंग इस सिलसिले में मिलते हैं, जब वह भाषाओं को लेकर सत्ता से लगभग टकराते हैं. परिवर्तन और क्रांतियों के ऐतिहासिक समय में ग़ालिब अपने इल्हाम, ईगो और विद्रोही तेवरों के चलते ख़ुद भी इतिहास होते जाते हैं.

पश्चिम के आंदोलनों की रोशनी में ग़ालिब

ऐतिहासिक तौर पर धर्म की बड़ी सत्ता रही. इस सत्ता ने दुनिया के इतिहास में सर्वाधिक नरसंहार और रक्तपात किया. जब भी इसे चुनौती दी गयी, यह तिलमिलाती सी दिखी. गैलिलियो से लेकर न्यूटन तक. न्यूटन के एक सदी बाद चार्ल्स डार्विन इस सत्ता को हिलाता है. जीवन के विकास के सिद्धांत के ज़रिये दुनिया के बनने की तमाम धार्मिक मान्यताओं को ढकोसला साबित करता है. देखते ही देखते खलबली मच जाती है. विज्ञान की लौ से सांप्रदायिकता के अंधेरे जलने लगते हैं. उस वक़्त इंटरनेट जैसी कोई चीज़ होती तो ग़ालिब की शायरी के मुरीदों में डार्विन का इक़रारनामा भी होता!

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है

दुनिया उस वक़्त चूंकि बहुत बड़ी थी इसलिए किस कोने में, कौन, किसका हमख़याल था या रहा, अरसे में मालूम चलता. नियति यह थी कि उस सदी के दूसरे क्रांतिदूत मार्क्स तक ग़ालिब का यह शेर पहुंच गया. अंग्रेज़ी सत्ता भारत के कुछ चुनिंदा कवियों के कलाम को अनुवाद करवाकर इंग्लैंड पहुंचाया करती थी. ऐसी ही किन्हीं फाइलों में यह ‘जन्नत की हक़ीक़त’ मार्क्स को मिल गयी. वह क़ायल हो गया. अपरिचय की स्थिति में भले ही मार्क्स ने ग़ालिब से अपने आंदोलन पर समर्थन मांगा और बुढ़ापे में थके ग़ालिब ने उल्टे उन्हें नसीहतें भले ही भेज दीं लेकिन इस क़िस्से से दोनों के बीच एक तार यह पकड़ा जा सकता है कि सोच में कहीं दोनों टकरा रहे थे.

ज़बाने अहले ज़बां में है मर्ग़ ख़ामोशी
ये बात बज़्म में रोशन हुई ज़बानिए शम्अ

मार्क्स जिस तरह आवाज़ उठाने की अपील कर रहा था, उसे ग़ालिब पहले ही दर्ज करते हुए मिल जाते हैं. इस प्रसंग से अर्थ थोड़ा साफ होना चाहिए. ‘जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है’, जैसे तेवर उछालने वाले ग़ालिब को डार्विनिस्ट या मार्क्सिस्ट कहना क्या जायज़ होगा? अपने निधन से चार साल पहले बीमारी और बुढ़ापे की हालत में 1865 में एक ख़त में ग़ालिब ने लिखा :

"मुझे ख़ुदा ने इतना न दिया, वरना आरज़ू थी कि मैं तमाम दुनिया की मेहमाननवाज़ी करता और अगर पूरी दुनिया को कुछ न खिला-पिला पाता, तो कम से कम इस शहर में तो कोई भूखा नंगा न रहता."

एक दर्दमंद दिल के इस ख़याल को क्या हमें वैचारिक साम्यता के तौर पर देखना चाहिए? ग़ालिब को इस तरह मार्क्सिस्ट साबित करना मज़ाक होगा. मार्क्सवादी विद्वान एजाज़ अहमद ने भी जब ग़ालिब की शायरी के अंग्रेजी अनुवाद किये तो उन्होंने भी ऐसे किसी पुरज़ोर दावे से परहेज़ ही किया. अस्ल में, एक तो ग़ालिब पूर्ववर्ती हैं, दूसरे उनके परिवेश के समाजी और सियासी हालात के साथ ही जीवन की उलझनें और दर्शन के अंतर भी महत्वपूर्ण हैं. बेशक सोच या ख़याल का टकराना एक घटना के तौर पर देखा जा सकता है, फिर भी इस आधार पर कोई वैचारिक संबंध घोषित करने से पहले पर्याप्त शोध व प्रमाण ज़रूरी होंगे.

‘बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे’ जैसे तेवर वाला यही शायर ‘मैं हूं अपनी शिकस्त की आवाज़’ और ‘कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक’ जैसे तसव्वुर और भी शिद्दत से रखता है. एक एक्टिविस्ट और एक शायर में यही फ़र्क भी है. एक स्टैंड या मोर्चे पर डटे रहने के बजाय शायर एक ज़िंदा-जावेद, धड़कता दिल होता है. शायरी को स्टैंड नहीं पूरी ज़िंदगी क़रार देता है. दिल-दिमाग़-रूह के तमाम रंगों को महसूसता हुआ. जो आम इंसान के हक़ में लड़ता है, वही आम इंसान की तरह टूटकर कहता है, ‘रोएंगे हम ज़ार-ज़ार कोई हमें रुलाये क्यूं’. इस तरह कह पाना डार्विन या मार्क्स के बस में था? ग़ालिब किसी ख़ेमे, किसी धारा या किसी वर्ग के नहीं बल्कि भरपूर जीवन यात्रा के शायर थे, हैं.

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