शुक्रवार, मार्च 08, 2024

Beyond The Review

Laapata Ladies : लेडीज़ के लापता किरदारों को खोजती फ़िल्म


'बुड़बक होना शर्म की बात नहीं है, बुड़बक होने पर गर्व करना शर्म की बात है.' इसे कहते हैं फ़िल्म. इंटरवल हो या फ़िल्म ख़त्म होने पर सिनेमाहॉल से निकलने का वक़्त, दर्शकों की ज़ुबान पर बस यही एक तसल्ली, 'वाह क्या फ़िल्म है'. फ़िल्म ऐसी कि जैसे, जैसे नानी की कोई भूली-बिसरी कहानी मिल जाये, जैसे बचपन की कोई ख़ास स्केचबुक अरसे बाद हाथ लगे, जैसे बुआ या मौसी के हाथ का बरसों पुराना स्वाद अचानक ज़ुबान पर आये, जैसे पेट भर जाये, मन भर जाये. 'लापता लेडीज़' देखने के बाद जो कैफ़ियत रही, उसे बतलाऊं तो जैसे, जैसे दिल में घुलते महादेवी के गीतों की कोई किताब, जैसे प्रभा अत्रे का 'जमुना किनारे मोरा गांव' वाला राग खमाज, जैसे सुधा मूर्ति की हज़ारों टांकों की दास्तान...


Laapata Ladies Poster : Instagram

कोई भी कलाकृति हो, उसकी आलोचना से पहले उसका आस्वाद है. यदि वह कृति आपको रस से सराबोर करती है, तभी उसका कथ्य और शिल्प विचार योग्य है. किरण राव निर्देशित 'लापता लेडीज़' देखने के बाद हर पीढ़ी की आंखों में एक सुकून, चेहरे पर एक संतोष देखकर महसूस होता है कि रस का साधारणीकरण कमाल का हुआ. इसके लिए न केवल निर्देशक बल्कि परदे पर अपने अभिनय से कथा को प्रवाहित और काग़ज़, कैमरे व एडिटिंग डेस्क पर बैठकर फ़िल्म को आकल्पित-रूपांकित करने वाले सभी कलाकारों को भरपूर दाद पहुंचनी चाहिए. एकबारगी ऐसा लगेगा या स्वस्थ मनोरंजन चाहने वाले एक आम दर्शक को महसूस होगा कि फ़िल्म हल्के फुल्के ढंग-से एक दिलचस्प कहानी कहती है, बच्चों की तरह आपको रुलाती हंसाती है और संदेश देने का अपना काम भी कर जाती है. फ़िल्म का यही बड़ा उद्देश्य और सरोकार है, जो पूरा हो जाता है. लेकिन यह फ़िल्म कहती क्या और कैसे है?

धोबी घाट जैसी क्लिष्ट और गंभीर फ़िल्म बना चुकीं किरण 'लापता लेडीज़' में अपने भीतर के कलाकार की नये सिरे से शिनाख़्त करती हैं. पिछली फ़िल्म उनके हुनर का उदाहरण थी और यह फ़िल्म हुनर की सफ़ाई के रूप में सामने आती है. एक होता है कलात्मक ढंग से बुनना और एक होती है इतनी सहज बुनाई कि कोई जोड़, कोई गिरह, कोई लोच नज़र न आये. यही लगे कि बुनने वाले के हाथ बुनाई के लिए ही बने हैं. फ़िल्म इसी तरह की सहज कारीगरी दिखायी देती है और इसके क्रेडिट में लेखकों का भी बड़ा हिस्सा है. एक बेहतरीन कहानी को स्पष्ट पटकथा और परिवेशगत सटीक संवादों से परदे पर साकार किया गया है.

कथा काल्पनिक होते हुए भी पात्र और घटनाएं देखी-सुनी-सी लगती हैं. हर पात्र के साथ दर्शक ख़ुद को कनेक्ट कर पाता है. आंचलिकता की महक उसके मन से उठने लगती है. साथ ही एक दिलचस्पी बनी रहती है कि अब ऐसा होने वाला है या वैसा होगा क्या? अस्ल में, यह औरतों की कहानी है और औरतों की ही ज़ुबानी है, ऐसा कहा जा सकता है. फ़िल्म का ट्रेलर भी अगर आपने देखा है तो यह तो आपको पता ही है कि घूंघट की वजह से दुल्हन ट्रेन से उतरते वक्त बदल गयी है. बदलकर आ गयी दुल्हन को उसके घर पहुंचाने और जो छूट गयी, उसे खोजने के माजरे के बीच पूरी फ़िल्म चलती क्या बहती है. आपके दिल में उतरती है और बहुत महीन बातें आपके दिल दिमाग़ में छोड़ जाती है.

फ़ेमिनिज़्म के पहलू

औरतों के घूंघट, बुर्क़ा और परदादारी के विषय पर कटाक्ष करने वाली यह फ़िल्म लाउड क़तई नहीं है. ग्रामीण या आंचलिक जीवन की कुप्रथाओं पर डंडे बरसाने वाले लेखों, हर प्रथा के लिए मर्दानगी या पुरुष प्रधान समाज को कारण और आरोपी बताने वाली कविताओं या किसी मुद्दे पर तख़्तियां लेकर सड़क पर उतर जाने वाले एक्टिविज़्म के बरअक्स यह फ़िल्म एक नया रास्ता बनाती है. पारंपरिक लोगों को एक व्यावहारिक ढंग से कैसे समझाया जा सकता है, यह इस फ़िल्म के मूल स्वर में है.

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प्रताड़ना के बाद पुरुषों को छोड़ चुकी महिला का पात्र है, मंजू माई. यह पात्र पुरुष प्रधान समाज से सीधे अखाड़े में दो-दो हाथ करने वाले फ़ेमिनिज़्म का प्रतीक बनता है. बदली हुई जो दुल्हन आयी है जया, यह पात्र महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए सकारात्मक सोच और बदलाव के लिए रास्ता बनाने वाले फ़ेमिनिज़्म का प्रतीक है. गुमी हुई दुल्हन यानी फूल का पात्र दुर्भाग्य और स्थितियों व नये परिवेश से प्रेरित होकर स्वाबलंबी बनाने की दिशा का बोध देता है और अन्य महिला पात्र भी पुरुष समाज में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा करते हुए नज़र आते हैं.

दैहिक इच्छाओं और संबंधों, महत्वाकांक्षाओं के लिए समान अवसरों और मनमर्ज़ी के कपड़े पहनने जैसी स्वतंत्रताओं की पैरवी जो फ़ेमिनिज़्म करता है, उसके संदर्भ शहरी या पाश्चात्य जीवन संदर्भ में समझे जा सकते हैं, लेकिन भारत जैसे अनेक अविकसित एशियाई देशों में फ़ेमिनिज़्म के सामने 21वीं सदी में भी ग्रामीण या क़स्बाई महिलाओं की रोज़मर्रा की समस्याएं बड़ी चुनौतियां हैं. लड़कियों की शिक्षा, जागरूकता, परवरिश, पोषण, बाल विवाह, दहेज, घरेलू हिंसा, शोषण और श्रम के मोर्चे पर शहरी फ़ेमिनिस्टों की बढ़ती बेरुख़ी भी समस्या बनती जा रही है.

व्यवस्था पर कटाक्ष

फ़िल्म के लगभग सभी महिला पात्र सामाजिक व्यवस्थाओं के शिकार, पीड़ित हैं लेकिन इसे अपनी नियति मानकर सरलता से जीते हुए भी. अपने स्तर से थोड़ा ऊपर उठने की हर पात्र की जिजीविषा को व्यवस्था विरोध के रूप में समझा जा सकता है. यही नहीं, सियासत पर भी ये महिला पात्र तंज़ करते हैं. घटना के संदर्भ में बहुत मासूमियत के साथ शब्द आते हैं, 'पहले गांव का नाम इंदिरानगर था, फिर अटलनगर हुआ, फिर मायापुरम...' जैसे संवाद रोचकता से वोटरों की ज़ुबान पर आ जाते हैं. या एक विधायक के ऊटपटांग भाषण का दृश्य सरल कटाक्ष हैं.

बुड़बक होने पर गर्व करना शर्म की बात है, जैसे जुमले संवादों में आते तो किसी और प्रसंग में हैं लेकिन गौर किया जाए तो वर्तमान के सियासी (ख़ासकर सत्ता समर्थकों) हालात या माहौल को लेकर तंज़ की तरह सुनाई देते हैं. सियासत, समाज और अशिक्षा की एक पूरी साज़िश के साथ जो परिवेश बनता है, वह किस तरह लड़कियों के भविष्य, समझ और प्रतिभा के साथ अन्याय करता है, एक दमनकारी छलावा साबित होता है, यह फ़िल्म की परतों से छुपा हुआ है, लाउडस्पीकर पर चिल्लाया नहीं गया है.

Laapata Ladies Still

आलोचना के पक्ष

पिछले कुछ समय में समस्या प्रधान फ़िल्में हों, विषय प्रधान, ड्रामाई या फिर बायोपिक, लगभग सभी में एक शोर, एक बयानबाज़ी या एक आक्रामकता महसूस होती रही है. बहुत सी फ़िल्में तो साफ़ तौर से सियासी एजेंडों की वजह से ही बनती हुई नज़र आ रही हैं. ऐसे में एक साफ़ सुथरी, संदेशपरक फ़िल्म बहुत उम्मीद जगाती हुई आती है. इस​ फ़िल्म का सबसे उजला पक्ष भी यही है और मोहभंग करता भी कि हर पात्र अच्छा है या उतना बुरा नहीं है, जितनी वास्तविकता होती है. रिश्वत लेने वाला, भ्रष्टाचार की कल्पना से ही लार टपकाने वाला पुलिस अफ़सर भी अंत में नर्मदिल, संवेदनशील नायक साबित हो जाता है. दुल्हन बनी दो किशोरियां या नवयुवतियां तक़रीबन हफ़्ते भर तक अनजानों के बीच हैं, लेकिन उन्हें किसी भयानक दुर्घटना या दुर्व्यवहार का सामना नहीं करना पड़ता.

यह आशावाद एक आदर्शवाद है. यदि इस कथा को किसी परिचित स्थान से जोड़ दिया जाता तो यह इस फ़िल्म की बड़ी कमज़ोरी हो जाती. एक का​ल्पनिक स्थान 'निर्मल प्रदेश' की ज़मीन पर गढ़ना ठीक रहा. यह यूटोपियन सेटिंग यानी 'लापतागंज' वाला कॉंसेप्ट कोरे आदर्शवाद के आरोप का जवाब बन सकता है. एक पक्ष है, गीत-संगीत जिसके लिए जवाब नहीं मिलता. फ़िल्म का सबसे कमज़ोर पक्ष संभवत: यही है. बेहतरीन लोकगीत और लोकसंगीत के साथ कविताई की बड़ी गुंजाइश का लाभ न उठाया जाना खलता है. पात्र के हिसाब से थिएटर का प्रचलित फॉर्मूला अपनाने वाले रवि किशन कहीं-कहीं कुछ बनावटी अभिनय भी करते दिखते हैं. इसके उलट छाया कदम और गीता अग्रवाल जैसे अभिनेता अपनी परिपक्वता दिखाते हैं. यह बात सही है कि '12वीं फ़ेल' फ़ेम गीता को एक इमेज से हटकर रोल भी करने होंगे. दूसरी ओर, स्पर्श, प्रतिभा, नितांशी जैसे नये कलाकार छाप छोड़ते हैं. विशेष तौर से स्पर्श की भाव-भंगिमाएं अधिकांश दृश्यों को लाजवाब बनाती हैं. कहानीकार बिप्लब गोस्वामी और फ़िल्म लेखक स्नेहा भरपूर दाद के हक़दार हैं.

महिलाओं की, महिलाओं के द्वारा यह फ़िल्म सिर्फ़ महिलाओं के लिए नहीं है, यही इसकी लोकतांत्रिक भावना है. आप सिनेमाप्रेमी हैं तो ज़रूर देखिए और समझकर देखिए यह चित्र, जिसमें अंतर्मुखी विमर्श है जैसे एक अच्छा साहित्य अपने पाठक के मन में सदियों गूंजता है, इसमें एक लय है जैसे अच्छा संगीत श्रोता के साथ सदियों बहता है और ऐसा बहुत कुछ है. इस फ़िल्म को देखने के बाद अपने परिवेश में झांककर देखिए कि कितनी महिलाएं अपने मन से 'लापता' हैं, अपने समाज में, अपने परिवार में रहते हुए. हिंसा और लाउड विज़ुअल्स के इस दौर में यह फ़िल्म एकदम अलग खड़ी दिखती है. बेशक पटाखा, पहेली से लेकर बालिका वधू जैसी कुछ पूर्ववर्ती फ़िल्मों की परंपरा इसके साथ ज़रूर जोड़ी जा सकती है.

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