शनिवार, मार्च 28, 2020

भूमिका

सकोरों में भरे गंगाजल से छलछलाते गीत


'ज़िन्दगी ठहरी नहीं है' का अगला संस्करण है 'अभी दूर चलना है'. विगत संग्रह के आमुख के तौर पर मैंने राही जी के काव्य की भावभूमि, विचारभूमि के साथ ही भाषा, शिल्प और प्रदेय को लेकर चर्चा की थी. इस बार कुछ अलग पहलुओं पर बात करने की चेष्टा. राहीजी के प्रस्तुत गीत संग्रह के मद्देनज़र मुख्यत: तीन कोणों इमेजरी, वैचारिक समृद्धि और नॉस्टैल्जिया, के माध्यम से इस 'त्रिकोणीय गीत संग्रह' को सामने रखने का मन है.


इमेजरी. बिम्ब शब्द मैं जानबूझकर इस्तेमाल नहीं करना चाहता. एक तो यह शब्द दुरुपयोग के चलते बहुत कम समय में घिसा हुआ शब्द हो चुका है और दूसरे, इमेजरी शब्द में मुझे बिम्ब के साथ ही इमैजिनेशन यानी कल्पना का पुट भी शामिल लगता है इसलिए ये ज़्यादा विस्तृत है. राही जी के काव्य में इमेजरी हालांकि मुख्य तत्व नहीं कहा जा सकता है लेकिन जितनी मात्रा और गुणवत्ता के साथ है, उसका सानी समकालीन गीत काव्य में मिलना मुश्किल है.

Cover Image of Book By Y.N. Rahi.
दृष्टांत कम करने से बात ज़्यादा हो सकती है और इस संग्रह को पढ़ने का रचाव भी ज़्यादा रह सकता है. इमेजरी के लिए एक पंक्ति देखें :

'फिसल रहे हैं शब्द अधर से/जाने क्या कहने का मन है.'

अभिव्यक्ति की पूर्णता का सार सटीक भाषा और सार्थक बिम्ब में निहित है. काव्यानुशील पाठक यक़ीनन 'बहते शब्द', 'गिरते शब्द', 'रिसते शब्द', 'सुलगते शब्द', 'मचलते शब्द' या 'होंठों पर अटके शब्द' जैसे कई प्रयोग पढ़ चुके होंगे. ये 'फिसल रहे शब्द' एक नयी और अलहदा किस्म की इमेजरी है. जैसे मन में कहने को कुछ है, कहने वाले शब्दों का मन कुछ और है लेकिन द्वार रूपी अधर पर एक फिसलन सी है, कि शब्द पूरी तरह बयान नहीं बन रहे बल्कि लड़खड़ाते हुए निकल रहे हैं. 'जाने क्या कहने का मन है', शब्दों के फिसलने से यह सवाल उपज रहा है और एक भ्रम, संशय तथा कुंठा की स्थिति बन रही है. यहां से यह इमेजरी अपनी कल्पनाशीलता की मदद से समाज की कई स्थितियों को इंगित करती है. पारिवारिक विघटन से लेकर राजनीतिक संकट तक और धार्मिक आडंबरों से लेकर काव्य के पतन तक यही फिसलते हुए शब्द ही ज़िम्मेदार दिखते हैं कि 'मन की बात' भी भ्रामक और संदेहास्पद हुई जा रही है.

इस तरह की कुछ और बेहतरीन इमेजरीज़ आपको राही जी के काव्य में अचानक किसी मोड़ पर अचंभित करती हुई मिलेंगी. ख़ासियत यह भी कि ऐसी हर इमेजरी अलग से जड़ी या मढ़ी हुई नहीं होगी, वह कविता के प्रवाह में इतनी सहजता और अनायास होगी कि बहुत मुमकिन है कि पहली नज़र में आप उसे पकड़ भी न सकें.

'गाल नोंच लें आसमान के', आपने कभी कविता में ऐसा फ्रेज़ पढ़ा है? 'गीत कहां से लाएं' शीर्षक वाले गीत के दूसरे अंतरे में 'बलात्कार' या 'बलात छल' का अघोषित चित्रण पढ़ें. आसमान के गाल नोंचने की बात अनायास एक प्रवाह में आती है लेकिन अगर आप कविता के गंभीर पाठक हैं तो यहां रुकेंगे. फिर देखेंगे कि बलात्कार की कोई भूमिका बनाए बगैर, इस शब्द के प्रयोग के बगैर कैसे एक पूरा अंतरा इस दृश्य को रच रहा है. फिर आप समझेंगे कि यह बलात्कार किसी नवयौवना के साथ अत्याचार का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ, समूची मानवता के साथ होने वाला बलात्कार है. इसकी खिन्नता का चरम बिंदु है आसमान के गाल नोंच लेना. लहूलुहान करने वाली कथित दिव्य व्यवस्था को नोंच लेने की इस खिन्नता में हिंसा नहीं, प्रतिरोध और आत्मरक्षा का चरम अधिक है.

अहिंसा को सूक्ष्म सूत्रों तक परिभाषित करने वाले महात्मा गांधी के शब्द भी याद कीजिए कि आत्मरक्षा और प्रतिरोध प्राणिमात्र का नैसर्गिक अधिकार है. राही जी के काव्य को जब आप गंभीरता से समझेंगे तो उसमें आपको गांधीवादी दर्शन के प्रामाणिक सूत्र दिखायी देंगे. अपने जीवन में नितांत सरल, सहज और सभी के प्रति अति उदार राही जी स्वयं एक निश्छल मन हैं. स्वाभाविक तौर पर उनके काव्य में यही गुण स्पष्ट रूप से हैं और व्यवस्था के लाख विरोध के बावजूद उनके काव्य में आपको भड़काऊ नारेबाज़ी, विद्वेषपूर्ण उक्तियां या किसी का चरित्र हनन करने की चेष्टा करने वाली कोई बात नज़र नहीं आएगी. राही जी के काव्य में प्रतिरोध और व्यवस्था विरोध मौजूद है लेकिन नैतिकता के साथ. झंडों और डंडों के बगैर. यह उनके काव्य का गांधीवादी दर्शन के प्रति सहज झुकाव है और बहुत मुमकिन है कि वह स्वयं कभी इस तरह के प्रचार या विज्ञापन में शामिल नहीं रहे हों. लेकिन, पाठकों और आलोचकों को राही जी के काव्य में इस दर्शन के अनुशीलन के बिंदुओं पर गहन चिंतन करना चाहिए.

'पांचजन्य बन गयी बांसुरी', यह सामाजिक प्रवृत्तियों के हिंसा के प्रति झुकाव का एक अद्भुत प्रतीक है. हमारे समाज में पिछले कुछ समय में समरसता कितनी खत्म हुई है, खोखले नारों को लेकर हिंसा कितनी बढ़ गई है, मॉब लिंचिंग जैसे शब्द क्यों ईजाद हुए हैं और सड़क चलते लोग पहले से ज़्यादा कितने आक्रामक हैं... कृष्ण के किस प्रतीक को समाज का आदर्श होना था और कौन सा प्रतीक समाज में घर कर रहा है, जो युद्धभूमि के लिए था? समाज ही युद्धभूमि क्यों बनता जा रहा है? इन तमाम पहलुओं पर विचारें कि एक सभ्य गीत ने क्या इससे बड़ा और बेहतर प्रतीक आपको सौंपा है! क्या इस एक पंक्ति में आपको महात्मा के उस कथन की गूंज सुनाई देती है 'आंख के बदले आंख का क़ाएदा पूरी दुनिया को अंधा कर देगा'?

भावभूमि के साथ ही राही जी की विचारभूमि बेहद समृद्ध है. जीवन के 93 वसंत और 93 शरद देख चुके एक गीतकार से सहज अपेक्षा भी होनी चाहिए.

'अंधे वर्तमान से पूछो/क्या देखे हैं कल के सपने', इस गीत की इस पहली पंक्ति को पढ़ते हुए मेरे मन में सवाल उठा कि वर्तमान को अंधा क्यों कहा गया? वही हमारे समय की विडंबना यहां भी है कि किसी के पास कोई दृष्टि नहीं, जो दिखाया जा रहा है, उस पर आंख मूंद कर भरोसा किया जा रहा है. दृष्टि के बगैर स्वप्न क्या होगा? एक और विसंगति की ओर इशारा. लेकिन, क्या बस यही? इतना ही? मुझे याद आता है इतिहास. सदियों में कितनी बार यही स्थितियां रही हैं. 'कल के सपने' हमने क्या देखे? ये बड़ा सवाल है. महात्मा गांधी के सपनों का भारत तो दूर हम कलाम के विज़न 2020 से भी कोसों दूर खड़े हैं. वर्तमान को अंधा कहने वाली इस एक पंक्ति में ओशो की उस दार्शनिक स्थापना की भी गूंज सुनायी देती है कि 'समय दो ही प्रकार का है, भूत और भविष्य. वर्तमान समय का नहीं शाश्वत का हिस्सा है, जो हमेशा था, हमेशा रहेगा.'

राही जी के संपूर्ण काव्य पर एक से ज़्यादा शोध किये जाने की संभावनाएं हैं, लेकिन अकादमियों और यूनिवर्सिटियों की दुकानदारी कुछ इस तरह की है कि उन कवियों या कृतियों पर शोध होते हैं, जिन्हें कविता का 'क' यानी ककहरा तक हासिल नहीं हुआ. मैं राही जी के गीतों का पाठक हूं, उनके साथ बैठकर उनके गीतों को सुना, गुना और समझा है. एक आमुख, एक आलेख या एक समीक्षा में उनके गीतों को समेट पाना मेरे लिए संभव नहीं है. अंतत: मैं इस संग्रह के गीतों की एक और ख़ासियत नॉस्टैल्जिया पर संक्षेप में और चर्चा करना चाहता हूं.

अतीत की यादें, गीतों का प्रिय विषय रही हैं. शहर के बरक़्स गांव, मिलों के बरक़्स खेत और बिल्डिंगों के बरक़्स नदी व पहाड़ जैसे विषय गीतों में हम और आप बरसों से पढ़ रहे हैं. राही जी के गीत इन मायनों में परंपरावादी करार दिए जा सकते हैं लेकिन, परंपरा से जुड़कर भी यहां राही जी का सृजन कितने अलग आयाम छूता है, यह समझना आपको फिर हैरत में डालेगा. राही जी के नॉस्टैल्जिया की सबसे बड़ी विशिष्टता उनकी समृद्ध देशज भाषा का संस्कार और उनकी अनुभूतियों का अनोखापन है. यहां यादों के बक्से से बेकार की या फटी-पुरानी या सड़ी-गली चीज़ें नहीं निकल रहीं, बल्कि जेब घड़ी, दस्तावेज़ी चिट्ठियों, हाथ के कढ़े रूमाल और इत्र की शीशियों की तरह कुछ ऐसा हाथ लग रहा है, जो रुचिकर है, प्रीतिकर है और विरासत है.

An Image of Published Preface by Bhavesh Dilshaad.

'सकोरों में भरी गंगाजली सा छलछलाता मन', नॉस्टैल्जिया की इस तरह की अनेक पंक्तियां अतीत के प्रसंगों को छूती हुई वर्तमान की विडंबनाओं को रेखांकित करते हुए एक आध्यात्मिक संदेश तक आपको देंगी. मिट्टी के शरीर में एक द्रवित यानी तरल प्रवाहित मन. ये हुआ करता था, अब नहीं है लेकिन होना तो चाहिए. हम प्रकति के खिलाफ़ हैं. क्यों हैं? एक एक पंक्ति से विचार की कई परतें उघड़ जाएं तो नॉस्टैल्जिक कविता परंपरावादी होने से बच जाती है. प्रकृति और मौसम केंद्रित जो गीत इस संग्रह में हैं, उनमें यादों का संसार भी है, परंपरा, दर्शन और समसामयिक चिंतन भी. वृद्धाश्रम भेज दिये गये एक पिता का पुत्र के नाम पत्र रूपी एक गीत है, जो हिन्दी के गीति काव्य में एक नया और शानदार प्रयोग साबित हो सकता है. ये तमाम गीत धरोहर हैं, सहेजिए.

आख़िरश, राही जी के प्रस्तुत संग्रह में आपको कटाक्ष करते गीत मिलेंगे लेकिन सशस्त्र प्रहार करते नहीं, विचार करते गीत मिलेंगे लेकिन अकर्मण्य नहीं, भूली बिसरी यादें समेटते गीत मिलेंगे लेकिन वर्तमान और भविष्य से मुंह फेरकर खड़े नहीं और जो गीत मिलेंगे, उन्हें आपको हर बार पढ़ने पर कुछ नया मिलेगा क्योंकि इनमें अभिव्यक्ति से गहन अनुभूतियां और संवेदनाएं छुपाकर रखी गयी हैं. गहरे उतरिए तो एक पूरा भाव व विचार संसार आपका इंतज़ार कर रहा है.

श्रद्धेय राही जी के पिछले गीत संग्रह के लिए औघड़ समझ के हिसाब से कुछ लिख पाने का दुस्साहस उनके स्नेह और वरदहस्त के कारण ही संभव हो सका था. इस बार भी मैंने राही जी से स्वयं कहकर कुछ अपने मन की कह देने का अधिकार ले ही लिया है. 'ज़िन्दगी ठहरी नहीं है' संग्रह से 'अभी दूर चलना है' तक के बीच हुआ ये कि पेशेवराना हालात के सिलसिले में भोपाल से मैं दिल्ली चला आया, लेकिन मोबाइल फोन वार्ता और साल में भोपाल के संक्षिप्त प्रवासों के दौरान राही जी के दर्शन हर बार करने का सिलसिला तो रहा. उनके गीत सृजन की निरंतरता से वाकिफ़ रहा और फोन पर अनेक ताज़ा गीत उनकी बूढ़ी मगर उत्साही आवाज़ में सुनने की ख़ुशनसीबी भी मुझे हासिल हुई. इस संग्रह के प्रकाशन की तैयारी के साथ वह लगातार रच रहे हैं और अचरज की बात तो हिन्दी गीत जगत के लिए यह हो सकती है कि शायद उनका सर्वश्रेष्ठ आना अभी बाकी है. इस प्रणम्य संग्रह का भरपूर स्वागत कीजिए और फिर कह रहा हूं, राही जी के सृजन का समुचित मूल्यांकन आलोचकों को खुले दिल से कर आने वाले इतिहास के एक बड़े आरोप से बच लेना चाहिए.

(दीवाली 2019 पर प्रकाशित गीत संग्रह 'अभी दूर चलना है' (यतींद्रनाथ राही कृत) के लिए लिखी गयी भूमिका यहां अविकल प्रस्तुत की गयी है.)

सिनेमा

BEYOND THE CLOUDS : माजिद मजीदी का यादगार क्राफ्ट


'बियॉण्ड द क्लाउड्स' ग्लोबल सिनेमा है क्योंकि यह मुंबई के एक वर्ग विशेष की कहानी है जिसे हिंदी, तमिल और अंग्रेज़ी भाषाओं के ज़रिये कई प्रांतों व देशों के कलाकारों के साथ एक ईरानी फिल्मकार के नज़रिये से परदे पर उतारा गया है.


Still From The Movie Beyond The Clouds. (Image Source: Firstpost.Com)

पहले दृश्य में एक पुल यानी फ्लाईओवर है, जिस पर महंगे और चमचमाते चार पहिया वाहन दौड़ रहे हैं. इसी हल्के शोर में फ्लाईओवर के आसपास महानगर की चकाचौंध के नज़ारे हैं. फ्लाईओवर के एक किनारे एक गाड़ी रुकती है और एक युवक बाहर निकलकर फ्लाईओवर की दूसरी तरफ से सीढ़ियां उतरता है. कैमरा अब फ्लाईओवर के नीचे धीरे धीरे उतरता है और इस संपन्नता के नीचे दिखती है दूसरी दुनिया, जो ग़रीबी, अभाव और त्रासदी भोग रही है. बियॉण्ड द क्लाउड्स यहां से शुरू होती है, जहां विकास का अर्थ फ्लाईओवर बनाकर नीचे की समस्या को छुपा देना भर है.

काफी समय के बाद ऐसी फिल्म दिखी है जो कई परतों और पहलुओं को अपने भीतर समेटे हुए है. तो अब हाल यह है कि "कहां से छेड़ूं फसाना कहां तमाम करूं". किस सिरे से बात शुरू की जाये और किस सिरे पर खत्म? और ऐसी फिल्मों पर बात शुरू करने में एक जोखिम यह भी है कि "बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी". बहरहाल, मायने समझते हैं ऐसी फिल्म के, जिसे आज नहीं तो कल वर्ल्ड क्लासिक्स में शामिल किया ही जाएगा.

बियॉण्ड द क्लाउड्स ग्लोबल सिनेमा है क्योंकि यह मुंबई के एक वर्ग विशेष की कहानी है जिसे हिंदी, तमिल और अंग्रेज़ी भाषाओं के ज़रिये कई प्रांतों व देशों के कलाकारों के साथ एक ईरानी फिल्मकार के नज़रिये से परदे पर उतारा गया है. एक कलाकार और कलाकृति की सफलता इसमें भी है कि वह क्रूर सच्चाइयों को कितने असरदार ढंग से दर्शकों को सौंप सकता है. इस पैमाने पर बेशक यह फिल्म, इस फिल्म के कलाकार और फिल्मकार माजिद मजीदी पूरी तरह कामयाब हुए हैं.

बियॉण्ड द क्लाउड्स, इस फिल्म के शीर्षक में सिम्बॉलिज़्म इतना ज़बरदस्त है कि सोचते ही यह खूबसूरत लगने लगता है. फिल्म में बारिश, चांद और होली के रंगों को मैटाफर यानी रूपक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है जो डायरेक्टर की मैच्योरिटी दर्शाता है. जीवन के अनेक और अद्भुत रंगों की झांकी बन जाती है यह फिल्म जिसमें प्रेम, नफ़रत, गुस्सा, विनम्रता, बदले की भावना, परोपकार और पाप व पुण्य जैसी विरोधाभासी भावनाएं अपने जीवन्त रूप में उतरती हैं. बियॉण्ड द क्लाउड्स वह सिनेमा है जिसकी ज़रूरत है और रहेगी.

चिल्ड्रन ऑफ हेवन के लिए माजिद मजीदी चर्चित एवं प्रशंसित रहे हैं. बियॉण्ड द क्लाउड्स एक स्तर पर, मजीदी की इसी फिल्म का विस्तार या एक और डायमेंशन कही जा सकती है. बियॉण्ड द क्लाउड्स की कहानी के किरदार देखकर दर्शक समझते हैं कि ये भी "चिल्ड्रन ऑफ हेवन" हैं बस हैं "हैल यानी जहन्नुम" में. हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि बाहर के कलाकारों को भारत में नकारात्मकता ही दिखती है या वे भारत के बदहाल और वीभत्स रूप को ही उकेरते हैं. लेकिन देखा जाये तो यह कहानी दुनिया के बहुत से हिस्सों की हो सकती है, कम से कम जो विकासशील या तीसरी दुनिया के हिस्से हैं, उनकी तो यकीनन. खुद मजीदी भी यह बात स्वीकार चुके हैं.

Another Still From The Movie Beyond The Clouds. (Image : IMDB.Com)

माजिद मजीदी का सिनेमा वास्तव में वह सिनेमा है जो जीवन की सच्चाइयों की कहानी कहता है और झूठा आदर्शवाद नहीं गढ़ता. भावनाओं और एहसासों की ज़मीन पर वहां तक सफ़र करता है, जहां तक मुमकिन है. इस सिनेमा की परिपक्वता और सफलता इसी में है कि यह धर्म, भाषा, सीमा और नस्ल जैसे तमाम भेदों के परे मानवीयता का पैरोकार है और सेन्सेशनल न होते हुए सेन्सिबल है. मसलन, बियॉण्ड द क्लाउड्स की कहानी पर अगर बॉलीवुड की कोई कमर्शियल फिल्म बनती तो वह एक्शन, थ्रिलर और सनसनीखेज़ हो सकती थी.

बियॉण्ड द क्लाउड्स.. यह शीर्षक बार-बार कहता है कि इसे खोला जाये. ये कौन से बादल हैं जिनका ज़िक्र करना ज़रूरी है? अस्ल में, इस फिल्म को कई तरह से समझा जा सकता है. सामाजिक एवं राजनीतिक सिरे से इसे देखा जाये तो इस शीर्षक में क्लाउड्स का अर्थ मुमकिन है पाखंड या दिखावा. विकास, समाजवाद और इस तरह के तमाम नारों का जो दिखावा है, उसके परे एक और दुनिया है. यानी भारत में कई भारत हैं, एक दुनिया में कई दुनियाएं हैं. नारे बादलों की तरह छाये हुए हैं लेकिन उसके पीछे एक और सच है और यही है बियॉण्ड द क्लाउड्स.

मानवीय भावनाओं और साइकोलॉजी के सिरे से इस फिल्म को समझा जाये तो हमारे मन और चेतना पर भी कई किस्म के बादल छाये हुए हैं. इन बादलों के पीछे है इंसानियत. धीरे-धीरे ये बादल छंटते हैं और एक इंसानी मन नज़र आता है. तो यह है बियॉण्ड द क्लाउड्स. मजीदी का कारनामा यही है कि वह बादलों के छंटने की प्रक्रिया को बारीकी से समझते और दर्शाते हैं. इस पूरे सिलसिले में एक तुलना भी की जा सकती है, स्लमडॉग मिलेनियर के साथ इस फिल्म की. स्लमडॉग में ये सब कुछ है लेकिन थोड़ी थोड़ी कसर के साथ. भावनाओं का विस्तार पूरी मानवता के स्तर तक नहीं हो पाता. निजी राय में, मजीदी की यह फिल्म डैनी बॉयल की फिल्म से आगे निकल जाती है.

आलोचना का भी एक पहलू है. मजीदी का सिनेमा बेशक कामयाब और सार्थक है लेकिन उनको चाहने वाले दर्शक उनसे कुछ और की उम्मीद भी करते हैं. होता यह है कि हर फिल्मकार के मन की एक केंद्रीय धुरी होती है. वह उसी पर घूमता हुआ दुनिया देखता है. लेकिन महान कलाकार केंद्रीय धुरी और केंद्रीय भाव का अंतर समझते हैं. एक भाव, विचार या संवेदना पर ही नहीं टिकते. मजीदी खुद सत्यजीत रे जैसे महान फिल्मकारों से प्रभावित रहे हैं तो भविष्य में उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वह खुद को और शिद्दत से एक्सप्लोर करेंगे और कुछ और नायाब फिल्में सौंपेंगे.

फिल्म के बाकी पहलुओं पर एक ओवरव्यू कुछ ऐसा है कि सभी अभिनेता नैचुरल और प्रतिभावान हैं. विशेष रूप से मालविका मोहनन ने बाज़ी मार ली है. सिनेमटोग्राफर अनिल मेहता ने कैमरे से करिश्मा किया है. एआर रहमान का संगीत उनके स्तर के अनुरूप प्रभावी नहीं है. विशाल भारद्वाज के हिंदी संवादों में फ्लो है और विषय व किरदारों के लिहाज़ से सटीक हैं. कहानी कहने-सुनने लायक है और पटकथा लगभग मैच्योर है. मजीदी के निर्देशन में बियॉण्ड द क्लाउड्स एक यादगार क्राफ्ट है. इसके ज़रिये वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में सम्मान के साथ हमेशा याद किये जाएंगे.

(यह समीक्षा न्यूज़18 हिंदी के लिए लिखी गयी थी, जो वेबसाइट पर 22 एप्रिल 2018 को प्रकाशित हुई थी. hindi.news18.com से साभार इस लेख में एक अंश और यहां जोड़ा गया है.)

भूमिका

शोर के सन्नाटों में आवाज़ के गीत


वस्तुतः राही जी की काव्य यात्रा से गुज़रना एक जीवन, विशेषकर एक कवि जीवन और कवि मन को समझने की यात्रा करने जैसा है। राही जी के काव्य के माध्यम से हम समझते हैं कि कवि मन परिवर्तन अथवा प्रगति का हामी होता है।


हिन्दी कविता पिछले कुछ दशकों में एक बड़े परिवर्तन की साक्षी भी रही है और पक्षधर भी। यह परिवर्तन कविता की भाषा, शिल्प, भावभूमि, विचारभूमि एवं अंतर्वस्तु के संयोजन आदि अनेक स्तरों पर दिखायी देता है। एक बड़ा परिवर्तन, जो कविता की अंतर्वस्तु में हम महसूस कर सकते हैं, वह है नवयथार्थवाद की पक्षधरता के कारण कल्पनाशीलता का लोप अथवा भारी कमी। अब कवि कल्पनाशील कम है, यथार्थ चित्रण के माध्यम से सत्योद्घाटक अधिक। इसी कल्पना और यथार्थ के द्वंद्व के बीच श्रद्धेय राही जी का काव्य खड़ा है, जो कहीं विस्मित करता है, कहीं अभिभूत तो कहीं विचारमग्न।

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 वस्तुतः राही जी की काव्य यात्रा से गुज़रना एक जीवन, विशेषकर एक कवि जीवन और कवि मन को समझने की यात्रा करने जैसा है। राही जी के काव्य के माध्यम से हम समझते हैं कि कवि मन परिवर्तन अथवा प्रगति का हामी होता है। उनका एक गीत है – ‘मौसम’, जिसकी कुछ पंक्तियां उद्घोष कर रही हैं -

“मौसम तो आता है, तुमको,/कभी पूछकर कब आया है?
... पथ के पर्वत अवरोधों से/तूफानों के कदम रुके कब
किसके रोके रुक पाये हैं/चले मचलकर ज्वार कभी जब
गति में है कल्याण जगत का/यह परिवर्तन है, माया है।“

यह गति और परिवर्तन की अविरल धारा राही जी के इन गीतों में केंद्रीय अंतर्निहित वस्तु है। इसी के इर्द-गिर्द राही जी की अनेक मनोभावनाएं इन गीतों में गूंजती हैं। इस गति और परिवर्तन की दिशाहीन आपाधापी के बीच एक शोर जन्म लेता है। शोर भी ऐसा कि आवाज़ तक दूभर हो जाये। जब ऐसा होता है तो कवि अपने एकाकीपन को महसूसता हुआ इस महाशोर में उपजे सन्नाटों की चीन्हता है। परिवर्तन के गीत गाती इस कृति का मूल तत्व यही महाशोर और सन्नाटा है। महाशोर, महामौन के बीच एक आवाज़ की तलाश में राही जी के गीत संघर्ष कर रहे हैं। मैं, इन गीतों को शोर से उपजे सन्नाटों में आवाज़ के गीत कहना चाहता हूं, जिनकी प्रतिध्वनियां इस संग्रह में बार-बार भिन्न-भिन्न रूपों में हैं। कुछ पंक्तियां उदाहरणार्थ -

“सन्नाटे हैं/महाशोर है ... किसकी यहां कौन सुनता है”
“कुछ तो सुनें/किसी को समझें ... कुछ सोचें, कुछ बोलें बतियाएं”
“कहां गये संवाद मौन के/नयनों की भाषा के दर्पण ... कलम खड़ी रह गयी ठगी सी/शब्द हो गये कितने बौने?”
“शब्द गूंगे हैं अधर पर/मौन के ताले जड़े हैं”
“सिर उठे हैं संशयों के/चीखते कोलाहलों में”

वास्तव में, यह कोलाहल दृश्य मात्र नहीं, अपितु कवि की वेदना और संवेदना की वह भूमि है, जहां से कवि के सृजन का पल्लवन हो रहा है। गीतों की इस विषयवस्तु की पूर्वपीठिका के तौर पर राही जी पिछला गीत संग्रह सौंप चुके हैं – ‘कांधों लदे तुमुल कोलाहल’ शीर्षक से। मेरी दुष्टि में, कोलाहल के स्वर एवं विभिन्न संस्करण प्रस्तुत संग्रह के गीतों में अधिक हैं, अधिक प्रासंगिक हैं। वर्तमान संदर्भों में, नारों, प्रदर्शनों, विरोधों का शोर है तो दूसरी तरफ, अनीतियों, व्यभिचारों, आडंबरों का। एक ओर, संस्कृति, संस्कारों एवं सभ्यताओं का संदेश शोर बन चुका है तो दूसरी ओर, निरर्थक विकासशीलता एवं अस्वाभाविकता के कारण एक कोलाहल हर ओर व्याप्त है। कहा जा सकता है कि इन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं वैश्विक संदर्भों में, मनुष्य के सामने मनुष्यता के लोप का संकट समय की सबसे बड़ी चिंता है, जिसे अदम गौंडवी ने इस तरह व्यक्त किया था-

“माफ़ कीजै सच कहूं तो आज हिंदोस्तान में
कोख ही ज़रख़ेज़ है एहसास बंजर हो गया।“

राही जी यूं व्यक्त करते हैं -

“मर गयीं संवेदनाएं, आदमीयत मर गयी है
और हम नवजागरण के गीत गाये जा रहे हैं”

इन पंक्तियों से कवि सीधे-सीधे नवजागरण एवं नवयथार्थवाद की नारेबाज़ी को शोर करार दे रहा है। इन गीतों का कवि समाज के समानांतर साहित्य की तथाकथित धाराओं के पतन का भी साक्षी है। इस पतनोन्मुखी समय में प्रगतिशीलता का हामी कवि यदा-कदा नैराश्य में डूबता है। इस शोर में दम घुटता सा महसूस करता है। राही जी इस निराशा को कई बार दर्ज करते हैं -

“गाओ गीत सुभाषित लिख दो/दुनिया नहीं बदलने वाली।“

परन्तु, यह निराशा कवि की किन्हीं क्षणों की एक मनोदशा मात्र है। इन पंक्तियों से राही जी को निराशावादी कवि करार दिया जाना उचित नहीं है। यह संकेत है कि कवि इस युग में टूटन का अनुभव करता है। कवि अपने कर्तव्य-बोध का निर्वहन करता हुआ, उष्मा, आशा एवं सृजन का संदेश देता हुआ, इस हताशा को व्यक्त करने से स्वयं को रोक पाता भी नहीं, रोकना चाहता भी नहीं। इस निराशा के बरक़्स इस संग्रह में कम से कम दो गीत – “भिन्नता ओढ़े खड़े हैं”, एवं “कुछ सोचें कुछ समझ विचारें”, पाठक को आश्वस्त करते हैं कि कवि की वैश्विक आशावादी दृष्टि क्या है और वह मनुष्य में किस प्रकार की सृष्टि का अनुसंधान चाह रहा है।

“वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूं आवाज़ में असर के लिए।“

आवाज़ में असर की दुआ के क़ुबूल होने की घड़ी को देखने के लिए बेक़रार इन गीतों का कवि दुनिया के भयावह शोर के प्रति चिंतित है परन्तु, वह अपने भीतर की आवाज़ को सुन पा रहा है। वह अपने आप से संवाद कर पा रहा है, अपनी आत्मा का अनुभव कर पा रहा है। यही इन गीतों की चैतन्यता का कारण भी है और हासिल भी।

An Image of Preface by Bhavesh Dilshaad.

राही जी के इन गीतों में ‘स्व’ के प्रति कोई मोह नहीं है। ध्यान से देखें तो इन गीतों में अनेक वस्तुओं की विराट् सत्ता का अनुभव है जैसे महाशोर, महामौन, महाप्रलय, महानाश, महाउदय, महाकल्प, महातम, महानगर आदि। कवि सूक्ष्म अवलोकन कर पा रहा है इसलिए उसे ये सभी सत्ताएं स्थूलाकार दिख पा रही हैं। वह अपने ‘स्व’ का भी सूक्ष्म अवलोकन कर पा रहा है इसलिए अपनी सत्ता को विराट् के समक्ष अकिंचन अनुभव कर रहा है। देखिए -

“तुम कोई ईसा, कोई सुकरात गांधी तो नहीं
एक पिद्दी सी कलम है, भाव इतना खा रहे हो।“

यह अपनी सत्ता के प्रति निर्मोही भाव है जिसे कवि ने कई बार आवाज़ दी है जैसे पूर्ववर्णित पंक्तियां – “दुनिया नहीं बदलने वाली” या “…और हम गीत गाये जा रहे हैं”। इन शब्दों में कबीर के अकिंचन संदेश का सार भी है। वैसे, काव्य परंपरा के लिहाज़ से राही जी के गीतों में तुलसी की छाया अधिक है। तुलसी की अनेक काव्योक्तियों को राही जी वर्तमान संदर्भों एवं आज की भाषा में गढ़ने की चेष्टा करते हैं। एक दृष्टांत -

“नज़र अपनी, समझ अपनी, हृदय की भावना अपनी
किसी के हेतु पत्थर है, किसी को देवमूरत है।“

राही जी के काव्य में कवि मन की स्वाभाविकता अथवा नैसर्गिकता के दर्शन अभिभूत करते हैं। प्रकृति पर रचे गये अपने गीतों में राही जी भारतीय दर्शन एवं अध्यात्म परंपरा के विचारों को पोसते हैं और कुछ रहस्यों को खोलते हैं। इस संग्रह में श्रंगार गीतों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, सांध्य गीतों की अधिक। आयु के 91 बरस पार की अवस्था में यह स्वाभाविक भी है। इस अवस्था को ‘बचपन का पुरागमन’ कहा गया है। ऐसे में स्मृतियों की बहुलता इन गीतों में है। सांध्य गीतों में निराशा, हताशा का भाव कम है जबकि सार्थक जीवन जीने का आनंद एवं गुण-दोषों की स्वीकारोक्ति अधिक है। हां, इन गीतों में एक सदी में हुए सामाजिक/पारिवारिक पतन के प्रति क्षोभ एवं चिंता ज़रूर स्पष्ट है। इन गीतों में नॉस्टैल्जिक टोन बोझिल नहीं है। इन गीतों में युवा पाठकों के लिए उस विश्व का दर्शन है, जिसका कोई दृश्य उनकी कल्पना में नहीं है इसलिए नॉस्टैलजिया इन गीतों को आकर्षक एवं पठनीय बनाता है।

मैं, पहले भी कई बार यह उल्लेख कर चुका हूं कि राही जी इसलिए भी प्रणम्य हैं क्योंकि इस अवस्था में भी वह हिंदी गीत कविता में भाषा, प्रतीक, बिम्ब एवं शिल्प प्रयोगों में युवा कवियों की अपेक्षा अधिक नव्यता लाये हैं। यह सब उनका प्रदेय है। उनके गीतों में भाषा के प्रति कोई संकीर्णता नहीं है। अंग्रेज़ी, उर्दू, देशज आदि शब्दों के साथ वह प्रांजल भाषा का भी प्रयोग करते हैं। वास्तव में, वह जीवंत एवं काव्यानुकूल भाषा को तरजीह देते हैं। मिथकीय प्रयोग पूरी सार्थकता के साथ हैं, जो कविता का नये आयाम देते हैं।

मैं ग़ज़ल का शायर हूं, लेकिन गीतकारों की गोद में खेला हूं और युवावस्था तक गीत के सान्निध्य में रहा हूं। कोई दावा नहीं है कि मैं गीत के क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप रखता हूं लेकिन राही जी जैसे कवियों के सान्निध्य से गीत को समझने की समझ विकसित करने का लाभ ज़रूर लेता हूं। फिर कहना चाहता हूं कि पिछले कुछ दशकों की हिंदी कविता में राही जी के सृजन के प्रदेय का उचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए। हमारे समय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण गीत कवियों की प्रथम पंक्ति में राही जी का स्थान है, यह मेरा विचार है। आलोचना अपना धर्म निभाये और व्यक्तिगत संबंधों, पक्षपात एवं स्वयंभू मठाधीशों के चंगुल से बाहर निकलकर राही जी के सृजन का मूल्यांकन केवल साहित्यिक निकष पर करे, इसी अनुरोध के साथ, मेरा विश्वास है कि शोर की महात्रासदी में अपनी आवाज़ बनाते इन गीतों का राही जी कृत यह संग्रह हिंदी कविता प्रेमियों के लिए उपयोगी एवं संग्रहणीय है।

(वसंत 2018 पर प्रकाशित गीत संग्रह 'ज़िन्दगी ठहरी नहीं है' (यतींद्रनाथ राही कृत) के लिए यह भूमिका लिखी गयी थी, जिसका अविकल पाठ यहां प्रस्तुत किया गया है.)

बुधवार, फ़रवरी 21, 2018

ग़ज़ल

"दिल में जगह बना लेगा एक-एक शेर"


4 फरवरी 2018 को भवेश दिलशाद की पांच चुनिंदा ग़ज़लों को सौतुक.कॉम ने साहित्य खंड में प्रमुखता से प्रकाशित किया। इन ग़ज़लों पर दिल्ली निवासी युवा कवि, कथाकार एवं बारीक़बीं समीक्षक श्रीमति अनिता मंडा लिखित आलेख विशेष रूप से ब्लॉग के लिए प्राप्त हुआ है, जो यहां प्रस्तुत है -


ग़ज़ल इसलिए भी लोकप्रिय विधा है कि इसे गाया जा सकता है। हिंदी छंदों में जहाँ भक्तिकाल में साहित्य अभिव्यक्ति चरम पर रही, तो छंद एक तरह से भक्ति रचनाओं के लिए रूढ़ हो गये। तो आमजन ने जिस विधा में अपने हृदय के भाव कहे वो ग़ज़ल ही थी, यही कारण है कि भारत में ग़ज़ल अपने आगमन से लेकर ख़ुसरो, कबीर से होती हुई मीर ग़ालिब से समृद्ध होती हुई आती है, उसमें हृदयानुभूतियां अपने चरम पर हैं।

ग़ज़ल बहुत बारीकियों वाली विधा है, इसे साध लेना सहज नहीं है। आजकल जितनी ज्यादा मात्रा में ग़ज़ल लिखी जा रही हैं, उतनी शायद ही कभी लिखी गई हों, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि वह ग़ज़ल है भी या नहीं। क्योंकि सिर्फ व्याकरण निभा देना भर ग़ज़ल नहीं है।

ग़ज़ल क्या है? इसका जवाब हमें भवेश दिलशाद की ग़ज़लों में मिलेगा। इनकी ग़ज़लों से साल भर से परिचय है मेरा और सुखद बात यह कि दिलशाद जी आज की गलाकाट प्रतियोगिता से बाहर हैं। इनकी ग़ज़लों में जो बात मिलती है, वह साधना के बिना नहीं आ सकती। खानापूर्ति के लिए शेर कहकर संग्रह निकालना होता तो शायद अब तक दस-बारह ग़ज़ल-संग्रह भवेश जी के भी आ चुके होते। पर एक-एक शेर आपके ज़ेह्न में जगह बना ले, ऐसा लक्ष्य शायर का लगता है और कहना पड़ेगा कि इसमें इन्हें क़ामयाबी भी मिली है।

ग़ज़ल में मुझे जो बात सबसे अधिक अपनी तरफ़ अधिक खींचती है वह है, इसकी मारक क्षमता। दो मिसरों में ऐसी बात कह देना कि वह आपके दिल में जगह बना ले, यह ग़ज़ल में ही सम्भव है। भवेश दिलशाद जी की ग़ज़लों में यह मारक क्षमता, वक्रता है कि आप बरबस 'वाह' कह दें। कहन की ऊंचाई इन्हें भीड़ से अलग करती है।

दिलशाद जी की शायरी जदीद तेवर लिए हुए है, और यही कारण है कि कुछ शेर कई जगह कोट किये हुए भी पढ़ने को मिल जाते हैं। बिना उपदेशक हुए भी बड़ी बात कह जाने का हुनर आप इस शेर में देखिए -

जड़ की मज़बूती ज़मीं में गड़े रहने में है
यूं न मेआर हवाओं में उछालो अपने।

ख़ुद्दारी की एक ख़ुश्बू जो इंसानी किरदार को महकाती है देखिए -

अब तो हम छीन के लेंगे जो हमारे हक़ हैं
भीख में फेंके हुए आप उठा लो अपने।

कहन में नवीनता किसी भी लेखक, शायर के लिए कसौटी है, इसे बरक़रार रखना बहुत मेहनत वाला काम है, जैसे किसी कहानी के पचास तरीके कहने के हो सकते हैं, वैसे ही एक शेर में शायर किस तरह चमत्कार पैदा करता है उसका एक उदाहरण देखिए -

वो जो दिलशाद था अक्सर ये कहे था बेशर्म
देखना है तुम्हें मल्बूस हटा लो अपने।

सरल भाषा की पहुँच ज़्यादा लोगों तक होती है, उस पर बात भी सबसे जुड़ी हो तो क्या कहने, एक नया मुहावरा सा जुड़ता यहाँ दिख रहा है - 

और कुछ दिन देखता जा देखता रह जाएगा
सूख जाएगी नदी ये पुल खड़ा रह जाएगा।

वर्तमान हालात को बताता हुआ एक शेर जिसमें लफ़्ज़ों का इस्तेमाल भी क़ाबिले-ग़ौर है, देर तक ज़ेह्नो-दिल में ठहरने वाला मफ़हूम है -

गोलमेज़ें जब उठेंगी बात करके प्यास पर
बिसलरी की बोतलों का मुंह खुला रह जाएगा।

शायर के दर्द ज़माना कब समझा है, जो चैन आम इन्सां को हासिल है, वो उसकी बैचेन रूह को कहाँ, यही तो कबीर अपने अंदाज़ में कह गये थे, यही आज भी सच है -

कहके शब-बा-ख़ैर सब सो जाएंगे और रात भर
इक ग़ज़ल के साथ शायर जागता रह जाएगा।

शायर अपनी चेतना से आने वाले वक़्त की दस्तक को समझता है, और बाकियों को भी चेताना चाहता है, ओर इसे ज़रा भी रूखापन लाये बिना कह देना आसान बात नहीं –

हादसे की चाप है दिलशाद साहिब ये ग़ज़ल
जो समझ लेगा वो शायद कुछ बचा रह जाएगा।

यह शेर पढ़ते हुए मुझे पता नहीं क्यों साहिर याद आ गये। एक पर्दे के पीछे पोशीदा नग्न दुनिया की हक़ीक़तें जो टीस एक संवेदनशील मन में पैदा करती हैं वही यहाँ हो रही हैं। पीठ पीछे के कारोबार बताने की ज़रूरत ही नहीं कि हर कोई आज इनका कितना शिकार है, सब कोई अपने दर्द में डूबा इस शेर से जुड़ता है और यही जुड़ाव शायरी का फैलाव है। आमजन तक पहुंच है।

ये हसीन चेहरों के इश्तहार ज़िंदाबाद
और जो पीठ पीछे हैं कारोबार ज़िंदाबाद।

कुछ बगावती तेवर की झलक वो भी तंज़ की नोक पर देखिए क्या असर लेकर आई है –

बोलो कि लोग ख़ुश हैं यहां सब मज़े में हैं
ये मत कहो कि ज़िल्ले-इलाही नशे में हैं।

आम बोलचाल की भाषा में, बिना कोई भारी भरकम शब्द रखे अपनी बात कहने का हुनर बहुत मश्क़ चाहता है, किस नाज़ुकी से इंसानों के बीच की दूरियां यहाँ बताई गई हैं क़ाबिले ग़ौर है -

मेरी मुश्किलों से तुझे है क्या तेरी उलझनों से मुझे है क्या
ये तक़ल्लुफ़ात से मिलने का जो भी सिलसिला है ये ठीक है।

भवेश दिलशाद ने ग़ज़ल में ग़ज़लियत बरक़रार रखी है। नज़ाकत, मासूमियत को बरक़रार रखते हुए भी नई सोच, नये लहजे को आज़माया है। ये ग़ज़लें अदबी ज़हाँ में अपना ख़ास मुक़ाम बनाएंगी। अपने तजरुबात और मश्क़ से शायरी को जिस मेयार तक लाये हैं वो आसान बात नहीं है। यही वजह है कि इनकी ग़ज़लें सीधे दिल की ज़मीं पर जड़ें जमा लेती हैं। यही सलीका, यही अंदाज़, यही ज़दीद खयालात इन्हें नई ऊँचाइयाँ देंगे।

(लेख साभार) - अनिता मंडा

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रविवार, फ़रवरी 18, 2018

समालोचना

कविता क्यूं ज़रूरी है? क्यूं लिखी जाये? - 2


कवि होने का दंभ नहीं बल्कि कवि होने के कर्तव्य का निर्वहन श्रेयस्कर है। वास्तव में, कवि का कर्तव्य निर्वहन और कविता का प्रयोजन लगभग समानार्थी हैं। कविता की उपयोगिता क्या है? क्यों चाहिए किसी समाज को कविता? इन प्रश्नों के मूल में इसी तलाश की ज़रूरत है कि कविता और उसका प्रयोजन क्या है..।


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काव्य के प्रयोजन को लेकर भारतीय परंपरा में प्राचीन समय से ही विचार हुआ है और निरंतर जारी है। हर समय में, समयानुकूल विमर्श होता रहा है और कुछ ऐसे तथ्य प्रकट हुए हैं जिन्हें हर समय याद रखा जा सकता है या जो हर समय के लिए वैसे ही रहेंगे यानी मूल्य की तरह स्थापित हुए हैं। काव्य के प्रयोजन को लेकर विभिन्न विद्वानों के विचारों पर एक दृष्टि -

  • आचार्य वामन - आनन्द और कवि की कीर्ति। (काव्यालंकारसूत्रवृत्ति)
  • कुन्तक - चित्त को आनन्द देना एवं धर्मादि की सिद्धि। (वक्रोक्तिजीवितम्)
  • मम्मट - यश, संपत्ति, सामाजिक व्यवहार की शिक्षा, उच्च कोटि का आनन्द, उपदेश। (काव्यप्रकाश)
  • कुलपति - यश, संपत्ति, आनन्द। (रस रहस्य)
  • सोमनाथ - कीर्ति, आनन्द, लोकमंगल एवं उपदेश। (रसपीयूषनिधि)
  • भिखारीदास - तपफल, संपत्ति, यश एवं आनन्द। (काव्य निर्णय)
  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल - काव्य या कवि कर्म के लक्ष्य को क्रम से तीन भागों में बांट सकते हैं - शब्द विन्यास द्वारा श्रोता का ध्यान आकर्षित करना, भावों का स्वरूप प्रत्यक्ष करना, नाना पदार्थों के साथ उनका प्रकृत संबंध प्रत्यक्ष करना। मेरी समझ में काव्य का अंतिम लक्ष्य तीसरा है। श्रोता के संबंध में यदि विचार करें तो पहले दो विभागों के कारण कविता केवल आनन्द या मनोरंजन की वस्तु प्रतीत होती है। (रस मीमांसा)
  • आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी - काव्य का प्रयोजन आत्मानुभूति ही है। ...वह काव्य भी काव्य ही है जिसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति की पूर्ण एकरूपता न हो, जिसमें कवि अपनी अनुभूति के प्रकाशन का उपयुक्त और आदर्श माध्यम प्राप्त करने में असफल रहा हो। पर वह रचना काव्य नहीं है, जिसमें वास्तविक अनुभूति का ही अभाव हो। (आधुनिक साहित्य)


काव्य प्रयोजन अथवा उद्देश्य अथवा लक्ष्य को समझने के लिए आधुनिक साहित्य के शीर्ष रचनाकारों के विचारों के अनुशीलन से कुछ और तथ्य भी स्पष्ट होते हैं। भारतेंदु ने आनन्द एवं लोकरंजन के साथ ही साहित्योद्देश्य के रूप में समाज-संस्कार एवं देश वत्सलता की चर्चा की है। समाज की कुरीतियों के विरुद्ध एवं देश की उन्नति के पक्ष में संदेश प्रसारित करना उनकी दृष्टि में साहित्य का परम लक्ष्य है। उनके परवर्ती जयशंकर प्रसाद जी ने भी आनन्द के अतिरिक्त इसी समाज संस्कार को महत्वपूर्ण माना है। प्रसाद जी के शब्दों में –
“काव्य से नैतिकता की सिद्धि केवल उस हद तक होती है कि पाठक अथवा प्रेक्षक अधिक संवेदनशील बनता है और इस प्रकार उसमें जीवन के उच्चतर मूल्यों के ग्रहण करने की क्षमता जागरूक होती है।“

मोहन राकेश कहते हैं –
“कोई भी उच्चकोटि की कलाकृति सचमुच उच्चकोटि की तभी होती है जब वह कई स्तरों पर प्रभावित करने की क्षमता रखती है। जो रचना केवल तथाकथित बुद्धिजीवियों को प्रभावित करती है, उसमें उतनी ही कमी है, जितनी उसमें जो सस्ता मनोरंजन करती है।“

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए जगदीशचंद्र माथुर का कथन है – “कौन ऐसा लेखक होगा जिसकी कलम पर सामाजिक समस्याएं सवार न होती हों, अनजाने या डंके की चोट पर। ...मेरी धारणा है कि कभी-कभी मानसिक और सामाजिक रोगों का जितना ही हास्यास्पद रूप दिखाया जाता है, उतना ही अधिक उसके निदान की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट होता है।“

इस अध्ययन के बाद निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आनन्द कविता का परम उद्देश्य है। न केवल कवि के लिए बल्कि श्रेाता अथवा पाठक के लिए भी जो रचना आनन्द का स्रोत बनती है, वह कविता है। यश, धन, कीर्ति आदि को कविता के बाह्य प्रयोजनों के रूप में समझना चाहिए जिसकी चर्चा अनेक विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से की भी है। ये गौण उद्देश्य हैं या यों कहा जाये कि ये उद्देश्य कवि के नहीं होते, यह कविता एवं कवि के लिए समाज उपलब्ध करवाता है। आनन्द के अलावा कविता के जो प्रमुख उद्देश्य माने जा सकते हैं, वे समाज एवं मानवता के उच्चतर मूल्यों के प्रति सतर्कता एवं जागरूकता हैं।

अब इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि कविता समाज में परिवर्तन की संवाहक होती है अथवा साहित्य कोई क्रांति लाता है। ऐसा अपवादस्वरूप हुआ हो तो ठीक है, लेकिन साहित्य या कविता इस प्रकार के परिवर्तनों और क्रांतियों में एक अहम रोल अदा ज़रूर करती हैं। वास्तव में, कविता या साहित्य मनोवैज्ञानिक रूप से समाज को तैयार करने का काम करती है। वह समाज के अंतस में उतरकर कभी एक भूमिका, कभी एक रूपरेखा या कभी एक घटना के उपरांत एक उपसंहार का माहौल बना सकती है। मूलतः कविता जो एक सृजन है, वह समाज या अन्य मनुष्यो के भीतर जो कुछ जोड़ती है, विभिन्न रासायनिक एवं मानसिक क्रियाओं के बाद, उसी के दूरगामी परिणाम के रूप में कोई परिवर्तन या क्रांति जैसी घटनाएं दृष्टिगोचर होती हैं।

एक पहलू है अनुभूति और अभिव्यक्ति को लेकर। इस संदर्भ में नंददुलारे वाजपेयी का पूर्ववर्णित लेख पठनीय है जिसमें उन्होंने कई प्रश्नों एवं बिंदुओं का उचित विवेचन किया है। अनुभूति सबके पास है, परंतु सब कवि नहीं हैं बावजूद इसके कि अभिव्यक्ति भी सबके पास है। इस संबंध में समाधान करते हुए वाजपेयी जी संकेत रूप में बहुत कुछ समझाते हैं। प्राकृतिक, वैज्ञानिक या रासायनिक, कारण जो भी हैं, यह तो है कि अनुभूति व अभिव्यक्ति होने के बावजूद अन्य व्यक्तियों एवं कवियों में अंतर है। वास्तव में, इसी भेद को समझना और अभिव्यक्ति में जो पूर्णरूपेण सक्षम नहीं हैं, उनकी भावनाओं, संवेदनाओं, कल्पनाओं अथवा अनुभवों को शब्द देना ही कवि का कर्तव्य है। इसी कर्तव्य का पालन कवि को निष्ठा एवं सतर्कता के साथ करना चाहिए। सच्चे, मौलिक एवं उपयुक्त शब्द अनुकूल अर्थों की परतों के साथ सौंपना कवि की ज़िम्मेदारी है। या यों कहूं कि कविता समाज के मनोभावों की सामूहिक भाषा होती है। कविता भावना व संवेदना के स्तर पर लोगों को आपस में जोड़ती है। इस प्रकार कविता के ये लक्ष्य महान होते हैं जो सृष्टि में सृजन के आनन्द के उत्प्रेरक होते हैं। जो इन महान लक्ष्यों को समझते हुए, कर्तव्य निर्वहन करते हुए, वास्तव में सृजन करता है, वह कवि है और उसका ऐसा सृजन कविता है।

अंततः कविता जीवन के लिए है। जीवन को व्याख्यायित करने के लिए है। जीवन को समझने-समझाने के लिए है, न कि जीवन के किसी एक पक्ष के प्रति राग-द्वेष उत्पन्न करने के लिए। जीवन के तमाम पहलुओं की तरह, कविता के भी कई कोण होने चाहिए। कविता पहले है, कविता का शास्त्र बाद में। कवि की प्रतिभा से कविता जन्मती है जो शास्त्रों में परिवर्तनों का कारण बनती रहती है। कविता गणित नहीं है, मात्र गणना के आधार पर नहीं है। कविता विज्ञान नहीं है, कुछ रासायनिक नियमों के आधार पर नहीं है। कविता कोरा दर्शन भी नहीं है और कविता केवल संगीत भी नहीं है। कविता व्यापक है, अद्भुत है, जीवन की तरह ही विचित्र है और नित-नूतन है क्योंकि कविता सृजन है, सृजन का अनुकरण नहीं है।

समालोचना

कविता क्यूं ज़रूरी है? क्यूं लिखी जाये?


थोड़े पहले समय की तुलना में, पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि क्रिकेट बहुत ज़्यादा खेला जा रहा है, कमोबेश हर खेल, फिल्में ज़्यादा संख्या में बन रही हैं, प्रधानमंत्री जी की यात्राओं की संख्या ज़्यादा हो गयी है और इसी तरह कविता की पुस्तकों का प्रकाशन एवं कविता का सृजन भी थोक के भाव हो रहा है। जब ऐसा कोई भी कार्य अपेक्षा अथवा ज़रूरत से ज़्यादा होता है तो गुणवत्ता और स्मरणीयता पर विचार किया जाता है। उसे उपयोगी माना जाता है, जिसमें इस प्रकार के गुण हों।


कुछ समय पहले तक हैरानी रहा करती थी कि इतने कवि कैसे पैदा हो रहे हैं? तकनीक के इस दौर में क्या कविता की कोई तकनीक रूपी कुंजी हाथ लग गयी है, जिसे समझ लिया और बन गये कवि..! भाषा विज्ञान की तरह क्या कोई काव्य विज्ञान भी अस्तित्व में आ गया है? इन तमाम हैरानियों से दो-चार होते हुए शोध और अध्ययन करना शुरू किया तो गुत्थियां कुछ सुलझीं और कुछ समझ बढ़ी। उस यात्रा का संक्षेप प्रस्तुत कर रहा हूं।

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कवि होना क्या कोई ईश्वर प्रदत्त कृपा है या प्राकृतिक रूप से उत्पन्न किसी प्रतिभा विशेष का कोई परिणाम? कविता एवं कला के संदर्भ में आपने इस विषय पर पहले कुछ सुना-पढ़ा ज़रूर होगा। कुछ पश्चिम विचारकों की राय यह है कि कविता में 10 फीसदी प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा का योगदान होता है जबकि 90 फीसदी परिश्रम अथवा अभ्यास का। अब यहां विचारणीय यह है कि 10 फीसदी का पता कैसे चले और प्रश्न यह है कि पता चल भी जाये तो 90 फीसदी परिश्रम अथवा अभ्यास कौन करता है, इसका पता कैसे चले? ऐसा नहीं है कि इन सवालों के उत्तर नहीं हैं। इसके लिए आप पश्चिमी काव्य सिद्धांतों का अनुशीलन कर सकते हैं और उलझते-सुलझते हुए किसी संतोषजनक बिंदु तक पहुंच भी सकते हैं। चूंकि मेरा अध्ययन भारतीय काव्य व काव्यशास्त्र तक रहा है, इसलिए मैं उसके हवाले से कुछ पहलुओं को उकेरना चाहता हूं।

हमारे समय के प्रतिष्ठित एवं लोकप्रिय कवि गोपालदास नीरज का एक दोहा चर्चित हुआ है -

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य
मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य

नीरज स्वयं श्रंगार के कवि के रूप में एक सुदीर्घ यात्रा कर चुके हैं इसलिए स्वाभाविक है कि पहले चरण में वह आत्मा के सौंदर्य का उल्लेख कर रहे हैं। सौंदर्य की परिकल्पना कालिदास से होते हुए अंग्रेज़ी साहित्य के रोमांसिज़्म दौर तक पहुंचती है, जहां वर्ड्सवर्थ और शैली जैसे कवियों के नाम मिलते हैं और फिर हिन्दी साहित्य के मध्यकाल से होती हुई छायावादी काव्य तक पहुंचती है। इस परिदृश्य से इतर, मैं सौंदर्य शब्द को सतत परिष्कार रूप में ग्रहण करना चाहता हूं। आत्मा के परिष्कार की अवधारणा ग्रहण करने से बात अपनी पूरी प्राचीनता के साथ उत्तर आधुनिक समय के संदर्भों से भी जुड़ जाती है।

अब दोहे की दूसरी पंक्ति पर विचार करें। भाग्य की अवधारणा से स्पष्ट हो जाता है कि नीरज जी किसी ईश्वरीय शक्ति की कृपा को स्वीकार कर रहे हैं। ‘कवि होना...’ होना- यह शब्द संकेत है कि कवि होता है, बनता नहीं है। जैसे आप मानव होते हैं, मानव रूप में जन्मते हैं, आप मानव बनते नहीं हैं। यह और बात है कि किसी प्रकरण में मानवीय गुणों का लोप होना पाया जाये। अंततः बात भाग्य और सौभाग्य की। नीरज जी मंच के कवि ज़रूर रहे हैं लेकिन उनकी गंभीरता किसी शक़ के दायरे में नहीं रही। उन्होंने ऐसा कहा है तो यह कोई हवा-हवाई गल्प तो नहीं होगा। वह किस रहस्य तक पहुंचे हैं? कौन सा सत्य उनके सामने खुल गया है, जिसके कारण वह कवि होने को सौभाग्य निरूपित करने को विवश हुए हैं?

यश, धन, कीर्ति एवं स्वीकार्यता, यह सब नीरज जी को कविता के माध्यम से प्राप्त है। तो क्या इसलिए वह ऐसा कह रहे हैं? यदि हां तो यह सब कुछ तो किसी और को कविता के अलावा व्यापार, विज्ञान या अन्य माध्यमों से भी प्राप्त हो सकता है। ऐसे में, इसके पीछे कोई रहस्य अवश्य है जिसे खोजना चाहिए। विचार की धारा में बहते-उतरते हुए एक सत्य का मोती हाथ लग गया है। इस सत्य का उद्घाटन भाषा स्वयं कर रही है। प्रतिभा या ज्ञान के अनेक क्षेत्रों पर दृष्टि डालें - संगीत, शिल्प, गणित, विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा, लेखन आदि। ज्ञान के इन क्षेत्रों के लिए भाषा में उपर्युक्त शब्दों में कर्म प्रधान शब्द ही मौलिक हैं। इन मौलिक शब्दों से कर्ता शब्द बनते हैं जैसे संगीतज्ञ, शिल्पी, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, दार्शनिक, चिकित्सक, लेखक आदि। अर्थात मूल में ये ज्ञान है जो इन्हें प्राप्त कर रहा है, समझ रहा है या इनका अनुशीलन कर रहा है, वह उस क्षेत्र का अनुयायी या कर्ता कहला रहा है। केवल एक शब्द है - 'कवि'। कवि शब्द से कविता या काव्य शब्द बन रहा है। कविता से कवितज्ञ या काव्य से काव्यज्ञ शब्द नहीं बन रहे हैं। थोड़ी उर्दू और थोड़ी अंग्रेज़ी जानता हूं और आश्चर्यचकित रह गया हूं कि यह रहस्य इन दोनों भाषाओं में भी छुपा हुआ है। POET से POETRY बन रहा है और शायर से शायरी। PHILOSOPHY, SCIENCE, ART आदि शब्दों से PHILLOSPHER, SCIENTIST एवं ARTIST जैसे कर्ता शब्द बनते हैं। उर्दू में भी फ़न से फ़नकार, फ़ल्सफ़ा से फ़ल्सफ़ी और अरूज़ से अरूज़ी जैसे शब्द बनते हैं। अर्थात कविता के संदर्भ में, कर्म नहीं कर्ता मौलिक है, प्रधान है।

कवि जो सृजित कर रहा है, वह कविता है। अन्य में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि गणितज्ञ जो सिद्धांत दे रहा है, वह गणित है या दार्शनिक जो उद्घाटन कर रहा है वह दर्शन है। यहां स्थिति भिन्न है। गणित, दर्शन व अन्य ज्ञान प्रकृति में रहस्य रूप में ही सही, पहले ही विद्यमान है। जो इस ज्ञान तक पहुंच रहा है वह ज्ञानी है। मात्र कवि ही एक ऐसी प्रतिभा है जो पहले से विद्यमान किसी ज्ञान का रहस्योद्घाटन नहीं कर रहा है। वह रच रहा है, वह सृजन कर रहा है। संभवतः इसी कारण शास्त्रों में शब्द को ब्रह्म माना गया है क्योंकि शब्द में रचने का, सृजन कर पाने का गुण है। अस्तु, कवि होना सौभाग्य है क्योंकि कवि एक मौलिक सर्जक है। मानव होना भाग्य है क्योंकि मानव भी प्रजनन के माध्यम से रचना करता है, जो अन्य जीव भी करते हैं लेकिन इस सृजन के अतिरिक्त एक और सृजन कवि करता है जो अन्य कोई जीव नहीं करता।

इस भूमिका के बाद स्वतः स्पष्ट है कि कवि वह है जो इस विराट् बोध को प्राप्त कर चुका है। कवि वह है, जो रच पा रहा है, सृजन कर पा रहा है। यदि पूर्व में हो चुकी रचना को ही किसी और प्रकार से अभिव्यक्त किया जा रहा है, तो वह कविता नहीं है। रचने का ढोंग संभव भी नहीं है। रचना एक वास्तविक क्रिया है। प्रसव वेदना की तरह ही, एक वेदना वहन कर ही रचना संभव है। अर्थात कविता वह है, जो एक वास्तविक रचना है। यह रचना पाठक अथवा श्रेाता तक पहुंचकर उसके भीतर भी कुछ नया जोड़ती है। जो किसी और के अंतस में कुछ योग नहीं करती है, वह कविता नहीं है। पुनःश्च कवि होना सौभाग्य है परंतु, सौभाग्य का दंभ श्रेयस्कर नहीं है, कर्तव्य बोध एवं निर्वहन श्रेयस्कर है।

क्रमशः

सोमवार, जनवरी 22, 2018

नोट्स

निराला की प्रतिनिध काव्य रचनाएं: अध्ययन


वसंत पंचमी का अर्थ एक ज़माने से मेरे लिए निराला जयंती ही रहा है। तो, इस मौके पर आलेखनुमा यह अध्ययन एक बार फिर स्मरण हो रहा है। कॉलेज के दिनों में निराला और ‘राम की शक्ति पूजा’ के संबंध में जुटाये ये नोट्स, एक अभूतपूर्व कवि और कालजयी रचना को समझने में मदद कर सकते हैं।


Sooryakant Tripathi Nirala. image source: Google

1933 में जब ‘मतवाला’ का प्रकाशन हुआ, तब निराला ने उसके लिए दो पंक्तियां लिखीं -

“अमिय गरल शशि सीकर रविकर राग-विराग भरा प्याला
पीते हैं जो साधक उनका प्यारा है यह मतवाला।“

किन्तु, न ‘मतवाला’ इन पंक्तियों को सार्थक करता था, न हिन्दी का और कोई तत्कालीन पत्र। इन पंक्तियों के योग्य थी केवल निराला की कविता, जिसमें एक ओर राग-रंजित धरती है – “रंग गयी पग-पग धन्य धरा”, तो दूसरी ओर, विराग का अंधकारमय आकाश है – “है अमा निशा उगलता गगन घन अंधकार...”।

कवि जो कुछ लिखता है, उसे पहले कल्पना में ही देखता है, इसीलिए कल्पना को त्याग कर कविता रचना संभव नहीं, किन्तु एक कल्पना वह होती है जिसमें कवि यथार्थ जीवन को देखता है, औरों की तुलना में अधिक गहरायी से देखता है। दूसरी कल्पना वह होती है जो यथार्थ को धुंधला कर देती है, उस पर खूबसूरती का मुलम्मा चढ़ाती है। निराला की कल्पना इस धरती से दूर कोई मनोरम अपार्थिव लोक नहीं रचती। वह पृथ्वी की दृढ़ आकर्षण-शक्ति से बंधी हुई है -

“बुझे तृष्णाशा विषानल झरे भाषा अमृत निर्झर,
उमड़ प्राणों से गहनतर छा गगन लें अवनि के स्वर।“

इस धरती के सौंदर्य से निराला का मन बहुत दृढ़ता के साथ बंधा है। आकाश में उड़ने वाले रोमांटिक कवियों और धरती के कवि निराला में यही अन्तर प्रमुख है।

पृथ्वी का गुण है गन्ध। अपने सबसे परिष्कृत सुखद रूप में यह गन्ध फूलों के माध्यम से सुलभ होती है। जैसे कीट्स ने ‘नाइटिंगेल’ और शैली ने ‘स्काईलार्क’ पक्षियों को अमर कर दिया, वैसे ही जुही, बेला या नर्गिस का नाम लेते ही निराला का स्मरण हो जाता है। चांदनी रात, मलयानिल, उपवन, सर-सरित, गहन गिरि-कानन - इन सबके केंद्र में ‘जुही की कली’। गंगा के कगार, आकाश में नक्षत्र, चंद्रमा, विश्व का तारतम्य सघन - इन सब का केंद्र ‘नर्गिस’। धरती पर लू के झोंके, आकाश में जलता सूर्य, चारों ओर धूल, कवि का अशांत मन और इन सबके केंद्र में ‘वनबेला’। निराला को फूलों से ऐसा ही प्रेम था। प्रकृति के केंद्र में धरती की सुगंध।

निराला उल्लास और विषाद के ही कवि नहीं, संघर्ष और क्रांति के कवि भी हैं। प्रेमचंद और निराला का ऐतिहासिक महत्व यह है कि उन्होंने समझा कि भारतीय स्वधीनता आंदोलन की धुरी है – ‘किसान क्रांति’। साम्राज्यवाद के मुख्य समर्थक सामन्तों के खिलाफ ज़मीन पर अधिकार करने के लिए किसानों का संघर्ष।

अनेक छायावादी कवियों के गंभीर लेखन के विपरीत निराला की रचनाओं में हास्य और व्यंग्य की मात्रा काफी है। इस तरह की रचनाओं में ‘कुकुरमुत्ता’ का स्थान अन्यतम है। छायावाद के विरोधियों, जनता को धोखा देने वाले राजनीतिज्ञों, देश की प्रगति रोकने वाले तरह-तरह के निहित स्वार्थों पर निराला व्यंग्य करते ही थे। किन्तु, ‘कुकुरमुत्ता’ जैसी रचनाओं में वह कुछ छायावादी मान्यताओं पर भी व्यंग्य करते हैं जो उन्हें प्रिय थीं, यद्यपि उन्हें संशय की निगाह से वह पहले भी देखते थे। ‘कुकुरमुत्ता’ ब्रह्म के समान अनेक रूप धारण करता है। वही विष्णु का सुदर्शन चक्र है, यशोदा की मथानी है, सुबह का सूरज और शाम का चांद है। भास-कालिदास ने उसमें गोते लगाये हैं और हाफ़िज़, रबींद्रनाथ किनारे खड़े देखते रहते हैं। ‘कुकुरमुत्ता’ अगर ब्रह्म के समान व्यापक न होगा तो उसमें कोई गोते कैसे लगाएगा? उसके किनारे खड़े होकर टुकुर-टुकुर ताकेगा कैसे? ‘कुकुरमुत्ता’ में प्रच्छन्न व्यंग्य स्वयं निराला की ब्रह्म संबंधी विचारधारा पर आश्रित है।

ब्रह्म और माया वाले सिद्धांत के प्रति निराला के मन में संशय बहुत पहले से था। इस संशय की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति उनकी ‘अधिवास’ कविता में है। “कौन तम के पार, रे कह” - इस तरह के गीतों में सच्चिदानंद ब्रह्म का पक्ष छोड़कर अंधकार, शून्य या प्रकृति को एकमात्र सत्य मानकर निराला उससे संसार और मनुष्य का संबंध जोड़ते हैं। अधिकांश प्रकाश-प्रेमी छायावादी कवियों की तुलना में निराला की रचनाओं में प्रकाश से अधिक अंधकार है। ‘राम की शक्तिपूजा’ उनकी सबसे ओजपूर्ण रचना है और उसमें अंधकार भी अन्य कविताओं की अपेक्षा अधिक है।

‘राम की शक्तिपूजा’, जैसे उदात्त काव्य और ‘कुकुरमुत्ता’ जैसी व्यंग्य-हास्य रस की रचना में आकाश-पाताल जैसा अन्तर है, फिर भी इनकी एक सामान्य विचारभूमि है। राम के मन में जो संशय है – “स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर फिर संशय” - इस संशय का संबंध कहीं उस संशय से भी है जिसे निराला ने ‘अधिवास’ में प्रकट किया था। राम ब्रह्म हैं, माया ब्रह्म की शक्ति है, वेदान्ती का लक्ष्य माया का आवरण पार करके ब्रह्म तक पहुंचना होता है, ब्रह्म शक्ति की पूजा क्यों करें? यदि मान लें कि राम मनुष्य हैं या मानव चरित कर रहे हैं तब प्रश्न होगा कि मनुष्य ब्रह्म की पूजा न करके माया की पूजा क्यों करता है? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं निराला के इस प्रश्न से मिलेगा – “कौन तम के पार, रे कह...”। इसलिए रावण से युद्ध में पराजित होकर संशयचित्त राम शक्ति की साधना करते हैं।

कालिदास और रबींद्रनाथ के काव्य संसार में मन को लुभाने वाली रंगीली है, उसमें करुणा की नीलिमा भी है किन्तु निराला के काव्य-लोक का अंधकार उसमें नहीं है। उस अंधकार से परिचित हैं भवभूति और शेक्सपियर। कालिदास, रबींद्रनाथ की काव्य परंपरा और भवभूति-निराला की काव्य परंपरा में यही मौलिक अंतर है।

‘कुकुरमुत्ता’ के प्रारंभिक वर्णनात्मक अंश के बाद – “अबे सुन बे गुलाब” से ‘कुकुरमुत्ता’ का भाषण आरंभ होता है। गुलाब को रूमानी कविता का प्रतीक मानकर निराला की तर्क श्रंखला की परिणति वहां होती है जहां कुकुरमुत्ता कहता है -

“ख़्वाब में डूबा चमकता हो सितारा
पेट में डण्ड पेलते चूहे, ज़बां पर लफ़्ज़ प्यारा”

तर्क की दूसरी श्रंखला में बिम्बों की प्रधानता है जिनके द्वारा ब्रह्म के समान ‘कुकुरमुत्ता’ अपनी विराट सर्वव्यापी सत्ता की घोषणा करता है। निराला वक्तृत्वकला का उपयोग हास्य-व्यंग्य के लिए, वीर भावना जगाने के लिए, परस्पर विरोधी लगने वाले उद्देश्यों की सिद्धि के लिए कर सकते हैं। हिंदी में यह कला अन्यत्र दुर्लभ है। ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ जैसी रचनाओं में प्रसाद का वार्णिक मुक्तछंद निराला के अनुकरण पर लिखा गया है, वक्तृत्वकला भी निराला से प्रेरित है।

निराला के भावतत्व को उनकी मेधा पूर्व निश्चित सीमाओं में बांधे रहती है। मेधा उनकी भावभक्ति से पराभूत नहीं होती। पूरी कविता में सुघर स्थापत्य का सौंदर्य - जिसके तीन श्रेष्ठ उदाहरण हैं – ‘तुलसीदास’, ‘सरोज-स्मृति’ और ‘राम की शक्ति-पूजा’।

शेक्सपियर के नाटकों की तरह एक है बाह्य संघर्ष, दूसरा मुख्य पात्र का आंतरिक संघर्ष। कला दोनों की अविच्छिन्न एकता प्रदर्शित करने में है। ‘तुलसीदास’ रीतिवादी श्रंगारपरक संस्कृति से संघर्ष करते हैं किंतु इस संस्कृति के अनुकूल संस्कार उनके अपने मन में हैं -

“बंध के बिना, कह, कहां प्रगति?
गतिहीन जीव को कहां सुरति?
रति-रहित कहां सुख? केवल क्षति-केवल क्षति!”

इस तर्क योजना से उन्हें मुक्त कराती है रत्नावली।

‘सरोज-स्मृति’ में ऐसी मुक्ति कवि के लिए संभव नहीं है। निराला के मन का द्वंद्व श्रंगार और वैराग्य को लेकर नहीं, जीवन संघर्ष की सफलता और असफलता को लेकर है -

“कन्ये मैं पिता निरर्थक था
कुछ भी तेरे हित न कर सका।“

बहुत सीधे-सादे ढंग से निराला ने अपने मन की ग्लानि व्यक्त की है। इस ग्लानि के आगे उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया हो, तो उसे मानसिक द्वंद्व की संज्ञा देना गलत होगा। निराला के मन में एक ओर तीव्र ग्लानि है, दूसरी ओर अपनी साहित्यिक सिद्धि में प्रबल विश्वास भी है। “मैं कवि हूं, पाया है प्रकाश” आदि कविता की आरंभिक पंक्तियों में उन्होंने यह विश्वास प्रकट किया है। ग्लानि और इस विश्वास में द्वंद्व है।

शोक-गीत हिंदी में तो कम ही लिखे गये हैं। यूरोपीय भाषाओं में ऐसा शायद ही कोई प्रभावशील गीत हो जिसे कवि-पिता ने अपनी पुत्री के निधन पर लिखा हो। मित्र या प्रियतमा पर लिखे हुए शोक-गीतों में कवियों ने प्राकृतिक सौंदर्य के चित्रण से, पौराणिक गाथाओं की वनदेवियों के अवतरण से अपनी अभिव्यंजना को अलंकृत किया है। निराला की इस रचना में इस तरह के अलंकरण का अभाव है। इसके विपरीत रूढ़िवादी समाज के चित्रण में निराला का एक विक्षुब्ध अट्टहास है, शेक्सपियर के महानाटकों में गंभीर भावाभिव्यक्ति के साथ हास्य और व्यंग्य के मिश्रण की तरह।

यूरोपीय गीतों की परंपरा है कि अन्त में कवि के दुख को हल्का दिखाकर आशा का संदेश सुना दिया जाये। ‘तुलसीदास’ को ज्ञान प्राप्त हो जाता है और आकाश में प्रभात किरण फूट पड़ती है। ‘राम की शक्तिपूजा’ में एक कमल का फूल चोरी जाने से विघ्न पड़ता है किन्तु राजीवलोचन राम कमल की जगह अपने नेत्र निकालकर रखने को होते हैं कि दुर्गा उनका हाथ पकड़ लेती हं। शक्ति पूजा सफल होती है, शक्ति राम में प्रवेश करती हैं। किंतु, पुत्री से वियुक्त पिता को न ‘तुलसीदास’ का ज्ञान धैर्य बंधा सकता है, न ‘राम की शक्ति पूजा’। निराला को अपना वह समस्त कवि जीवन व्यर्थ लगता है, जिसकी परिणति है सरोज का निधन।

निराला ने गतकर्म सरोज को अर्पित कर दिये, फिर नया कर्म आरंभ किया। उन्होंने ‘राम की शक्ति पूजा’ लिखी। ‘सरोज-स्मृति’ में निराला का आधा दुख सरोज की मृत्यु के कारण है, आधा उनके अपने संघर्षों के कारण। उन्होंने जो लिखा था -

“दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूं आज, जो नहीं कही!”

वह दुख की कथा सरोज के जन्म से पूर्व शुरू हुई थी और सरोज की मृत्यु के बाद तक चलती रही। उसी की एक कड़ी है ‘राम की शक्ति पूजा’।

आत्मग्लानि का स्वर यहां भी है – “धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध”। निराला के राम तुलसी के राम से भिन्न और भवभूति के राम के निकट हैं – “धिक् माम् अध्यत्मः”, भवभूति के राम कहते हैं। आत्मग्लानि का स्वर तो है लेकिन संघर्ष मानो और भी तीव्र हो उठा है।

राम पराजित हैं। राम के मन में ग्लानि है किंतु राम के एक मन और है जो पराजित होना नहीं जानता -

“वह रहा एक मन और राम का जो न थका...”

‘राम की शक्तिपूजा’ से पहले निराला ने अपने इस दूसरे मन को न पहचाना था। ‘तुलसीदास’ का एक ही मन है, जो पुराने संस्कारों पर मुग्ध होता है, उनसे लड़ता है। ‘सरोज-स्मृति’ के निराला का एक ही मन है जो गर्व करता है कि ज्योतिस्तरणा के चरणों में रहकर उसने प्रकाश देखा है, स्वयं को निरर्थक पिता होने के लिए धिक्कारता है और अंत में अपने गतकर्मों से क्नया का तर्पण करता है। किंतु ‘राम की शक्ति पूजा’ में राम के दो मन हैं। संघर्ष और तीव्र हो गया है। वेदना की किरणों ने वज्रकठोर अन्तर को बीच से तोड़कर उस के दो हिस्से कर दिये हैं। अबसे निराला का मन ग्लानि, पराजय और विक्षेप के नाटक देखेगा जो दूसरे मन को आंदोलित करेंगे किंतु – “वह रहा एक मन और राम का जो न थका” - वह अथक, अपराजेय, अविचलित मन इस ग्लानि, पराजय और विक्षेप के सम्मुख सदा उठा रहेगा - साक्षीरूप दृष्टा के समान।

‘तुलसीदास’ और ‘सरोज-स्मृति’ का छंद मूलतः एक है -

“बंध के बिना, कह, कहां प्रगति?
गति हीन जीव की कहां सुरति?”
या
“देखता रहा मैं खड़ा अपल
वह शरक्षेप, वह रण-कौशल.”

‘राम की शक्तिपूजा’ में निराला जो स्वर सुनते हैं, वह इस लघु संयत छंद की सीमाएं तोड़ देता है। उसी के अनुरूप ज्योति के पत्र पर लिखे हुए चित्र हैं: राम, रावण, अंगद, विभीषण आदि के चित्र। इन चित्रों की पृष्ठभूमि में इतना गहन अंधकार है कि फलक की ज्योति सब ढंक गयी है। राम रावण का यह अपराजेय समर लिखा तो गया है ज्योति के पत्र पर किंतु अक्षर सब अमावस के अंधेरे के हैं। अंधकार उगलता हुआ आकाश, सिंह के समान गरजता सागर, रावण का अदृश्य खलखल अट्टहास - ये बिंब हैं जिनमें ‘सरोज- स्मृति’ की वेदना परिवर्तित और घनीभूत हो गयी है। ‘राम की शक्तिपूजा’ में निराला की आंखें भीतर एक नये लोक में खुल गयी हैं, जहां संसार के छायाचित्र ही दिखायी देते हैं। वह अपनी फैंटेसी की दुनिया में पहुंच गये हैं जहां संसार का दुख दर्द निचुड़कर सूक्ष्म सघन बिंबों के रूप में दिखायी देता है।

‘राम की शक्तिपूजा’ में दो कविताओं का सारतत्व है: ‘तुलसीदास’ और ‘सरोज- स्मृति’ और इनके अलावा उसमें नयी सामग्री है: एक पराजित मन और दूसरी, अपराजित मन के अस्तित्व की सघन अनुभूति।

मिल्टन और दांते के महाकाव्यों में जो गरिमा नरक के वर्णन में है, वह स्वर्ग के चित्रण में नहीं, निराला के इस महाकाव्यात्मक खंड में जो गरिमा राम की ग्लानि, उनकी पराजय, महावीर के अंतरिक्ष-अभियान के चित्रण में है, वह पूजा के चित्रण में नहीं। निराला साधक हैं, पूजक नहीं। रणभूमि में शत्रु से जूझते हुए ही साधना संभव है।

‘राम की शक्तिपूजा’ से, 1936 में निराला काव्य साधना का पहला चरण समाप्त होता है। ‘नये पत्ते’ की रचनाओं से 1946 में दूसरा चरण और शेष रचनाएं 1961 तक तीसरे चरण की हैं। निराला के समकालीन और उत्तरकालीन कवियों में विचारधारा की जैसी अस्थिरता, भावबोध की जैसी चंचलता दिखायी देती है, वैसी निराला में नहीं है। पहले चरण में उदात्तता, ओजपूर्ण एवं अलंकृत, दूसरे में संघर्ष प्रधान, विषादमय, उल्लासपूर्ण रचनाएं व ग़ज़लें और तीसरे चरण में मृत्यु एवं विक्षोभ की रचनाएं विशेष हैं।

(नोट: ये नोट्स हिंदी के विख्यात आलोचकों की पुस्तकों एवं लेखों के अंशरूप हैं।)