'युद्ध-यात्रा' विमर्श : हमारे युद्ध और युद्धों की हमारी यात्रा
(यह लेख 16 दिसंबर 2021 को न्यूज़18 हिंदी की वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था, जिसे भोपाल से प्रकाशित 'देशबंधु' ने भी संपादकीय पन्ने पर जगह दी थी. यह लेख धर्मवीर भारती कृत 'युद्ध यात्रा' की समालोचना के साथ ही विमर्श के बिंदु उठाता है.)
पाकिस्तान दुनिया का संभवत: पहला और इकलौता ऐसा देश था, जो एक धर्म के आग्रह या ज़िद के आधार पर बना, कमलेश्वर ने ‘कितने पाकिस्तान’ में इसकी गंभीर और ठोस विवेचना की थी. यह पश्चिमी पाकिस्तान से जुड़ा विमर्श था. पूर्वी पाकिस्तान में इस्लाम यानी धर्म के बरक्स बांग्ला यानी सभ्यता अधिक दृढ़ थी. जड़ों से जुड़कर जब विचार का पल्लवन होता है, तो क्रांति होती है और ऐसा ही एक मोड़ ठीक पचास साल पहले इतिहास में आया था.
“अपने भाषण में शेख मुजीब ने स्पष्ट कहा कि पाकिस्तान का हमारे लिए कोई विशेष अर्थ नहीं. वह भी अन्य विदेशी राष्ट्रों की तरह एक विदेशी राष्ट्र है. बांग्लादेश पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र है, जहां प्रजातांत्रिक पद्धति चलेगी और मज़हब के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा.”
यह दक्षिण एशिया में धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक क्षण था. 25 मार्च 1971 को पश्चिम पाकिस्तान के ऑपरेशन सर्चलाइट से एक युद्ध शुरू हुआ था, जिसे भारत-पाकिस्तान के बीच तीसरा युद्ध भी कहा जाता है, और मुक्ति संग्राम भी. उसी साल 16 दिसंबर को संग्राम की परिणति यह थी कि बांग्लादेश एक मुक्त राष्ट्र के तौर पर घोषित हुआ.
एक शिशु के जन्म के लिए नौ माह का गर्भ और असहनीय प्रसव पीड़ा होती है और जब एक राष्ट्र को जन्म लेना हो, तो यह पीड़ा पूरी मानवता एक विराट् स्तर पर महसूसती है. यहां अमानुषिकता के विरुद्ध मानवता का संघर्ष इतिहास रचता है. उस समय के अनेक सृजनधर्मियों ने चीन्हा था कि वह इतिहास का गर्भकाल था. धर्मवीर भारती ने न केवल उस काल को दर्ज करने का बीड़ा उठाया, बल्कि उनकी जिजीविषा और दृष्टि थी कि संग्राम को आंखों देखकर देश-दुनिया तक पहुंचाया जाये. उन्होंने निश्चय किया कि वह आंखों को कैमरा व शब्दों को स्क्रीन बना देंगे.
धर्मयुग के संपादक के रूप में ख्यातिलब्ध भारती ने युद्ध के मोर्चे पर जाकर, सैनिकों, मुक्तिवाहिनी के जवानों, सेना के आला अफसरों आदि के साथ संग्राम के अंतिम 10 से 15 दिन जिस तरह गुज़ारे, उसी का शब्द चित्र है ‘युद्ध यात्रा’. 1971 और 1972 में ये तमाम बातें धर्मयुग के पन्नों पर छपी थीं, जिन्हें नये सिरे से पुस्तकाकार 2020 में उस समय प्रकाशित किया गया, जब समूची मानवता एक वायरस जनित हालात के विरुद्ध युद्ध कर रही थी, भारत में बांग्लादेशियों की मौजूदगी और बेदखली को लेकर शासन व नागरिकों के बीच संघर्ष थे, भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव की स्थिति थी और भू-राजनीति बता रही थी कि चीन किस तरह बांग्लादेश को भारत के विरुद्ध इस्तेमाल कर सकता है. अघोषित युद्ध काल में बीते युद्ध की यात्रा के पन्नों से बिंधने पर कहीं मन में रह जाता है कि बाहरी युद्ध अलग है, भीतरी युद्ध बहुत अलग.
“भारतीय होने के नाते आज सारे संसार के समक्ष मैं सर ऊंचा करके पूछ सकता हूं कि है कोई ऐसा देश, जिसके जवानों ने बिना अपना कोई स्वार्थ आरोपित किये अपने बन्धु देश की मुक्ति के लिए उसकी धरती को अपना रक्तदान किया हो?”
भारती उस युद्ध की यात्रा में इस भाव को खोज सके, तत्कालीन मुक्तिवाहिनी के मुस्लिम और हिंदू जवान बन्धुत्व के भाव को जी सके, वे हज़ारों भारतीय सैनिक रक्तदानी हो सके, तो इसका एक बड़ा कारण यही था कि युद्ध केवल बाहरी स्तर पर लड़ा जा रहा था, भीतरी नहीं. हालांकि ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ के लेखक भारती इस युद्ध यात्रा में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अर्थशास्त्रीय समीकरणों और तत्कालीन विदेश नीति जैसे बिंदुओं पर न तो मुखर दिखते हैं और न ही इनके संकेत देने में दरियादिली दिखाते हैं. जहां आग और धुएं, लाशों और धमाकों के बीच भारती को ‘क़ायदे आज़म जिन्ना’ लिखा हुआ कोई बोर्ड दिखायी देता है; या जहां ‘मां काली की क़सम, बोलो नारा ए तक़बीर’ जैसा मिला-जुला नारा सुनायी देता है; और जहां-जहां भारतीय होने के नाते जंग के लड़ाकों की वीरगाथा वर्णित है, वहां ‘गुनाहों का देवता’ वाले भारती का रोमांसिज़्म अधिक नज़र आता है.
जॉर्ज बर्नार्ड शॉ पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के बीच युद्धों को जिस तरह एक प्रोफेशन और सोल्जर को एक प्रोफेशनल की तरह स्थापित कर चुके थे, उस दृष्टिकोण के सामने यह संग्राम कथा वाक़ई किसी रोमांचक फ़िल्म की पटकथा से कम नहीं दिखती. गुलेल से हेलीकॉप्टर ध्वस्त कर देने या एक हंसोड़-से ग्रामवासी का अपनी सेना के लिए दुश्मन सेना से मार खाकर भी संदेश ले आना-ले जाना, जैसे क़िस्से पटकथा में रोचकता बनाये चलते हैं. पुस्तक के रूप के बारे में हिंदी में ‘रिपोर्ट’ लिखा गया है और अंग्रेज़ी में ‘ट्रैवलॉग’. भूलवश या अनजाने हुआ हो, लेकिन सच है कि यह पुस्तक दोनों शैलियों का मिश्रण है. रिपोर्ताज के पैमाने पर इसमें कमियां निकलेंगी और केवल यात्रा वृत्तांत के पैमाने पर भी. मिश्रण के रूप में यह पुस्तक उदाहरण बन जाती है.
युद्धों के वृत्तांत या रिपोर्ताज पहले भी लिखे जाते रहे हैं. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के संदर्भ में शिवसागर मिश्र के ‘लड़ेंगे हज़ार साल’ को भुलाया नहीं जाना चाहिए. इसका शीर्षक ही मनुष्य की ‘युद्धवृत्ति’ और ‘युद्धनियति’ का सूचक है. रिपोर्ताज को तो युद्ध की ही उपज माना गया. रेणु ने दूसरे विश्वयुद्ध के संदर्भ में धर्मयुग में ही लिखा था : “गत महायुद्ध ने चिकित्सा के चीर-फाड़ विभाग को पेनसिलिन दिया और साहित्य के कथा विभाग को रिपोर्ताज.” ‘नेपाली क्रांति कथा’ के लेखक का यह वाक्य इतना दूरदर्शी था कि फिर साहित्य में रिपोर्ताज का पल्लवन कथा शैली में होता रहा और इसमें युद्ध जैसी स्थितियों की कहानी कहना श्रेयस्कर रहा.
जब हमारी खोज प्रेम की ही होती है, तो हम कहानी युद्ध की क्यों कहते हैं? क्या शांति का मार्ग युद्ध से बचकर संभव नहीं है? ऐसे अनेक शाश्वत प्रश्न खड़े हो जाते हैं, जब हम युद्ध की किसी भी कथा या यात्रा से रूबरू होते हैं. भारती भी इस यात्रा के अंतिम पन्नों तक आते-आते युद्ध के दृश्यों से हताहत अनुभव कर एक पूरे पन्ने में लिख पाते हैं कि युद्ध किसी भी लक्ष्य के लिए हो, कोई भी करे, रक्त गाथा निर्दोष बच्चों, विवश औरतों और सभ्यता की नींव को पुख़्ता करने वाले किसानों, शिल्पियों, कामगारों की छाती पर ही लिखी जाती है. भारती जहां लिखते हैं, “किसी ने यह क्यों नहीं लिखा कि परम घृणा भी कहीं हमें अपनी घृणा के लक्ष्य से बड़े रहस्यमय ढंग से जोड़ जाती है?” या जहां वह अमानुषिक प्रवृत्ति को समझने के लिए उस विचार प्रक्रिया के भीतर न पैठ पाने की बेचैनी दर्शाते हैं, वहां ‘अंधा युग’ के भारती के उन शब्दों के दर्शन होते हैं, जो आपको हाथ पकड़कर चिंतन तक ले जाते हैं.
युद्ध पर चिन्तन की आवश्यकता हमेशा रही है, हमेशा रहेगी. और यह वाक्य लिखते हुए वह कवि मन बहुत व्यथित होता है, जो ‘जंग तो ख़ुद ही मसअला है एक, जंग क्या मसअलों का हल देगी?’ कहने का हामी रहा है. यह सच है कि युद्ध होते रहेंगे लेकिन हमें इसे भी सच बनाना होगा कि हम युद्ध के विरुद्ध आदर्शों के लिए जीवट नहीं मरने देंगे. हम कहेंगे :
तू और करता रहेगा तरह-तरह की जंग
मैं वहशतों से सौ फ़ीसद निकल भी जाऊंगा
तू सरहदों को वतन मानता रहेगा दोस्त
इधर मैं प्यार में बेहद निकल भी जाऊंगा
शेख मुजीब ने भुट्टो के उस इसरार को ख़ारिज कर दिया था कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कुछ विशेष संबंध बने रहें ताकि पाकिस्तान की परिकल्पना और उसके आधार पर औचित्य का प्रश्न न खड़ा हो. यह प्रसंग भारती ने पाकिस्तान के प्रति घृणा से भरे एक भारतीय हृदय के साथ इस तरह लिखा कि मुजीब का इनकार एक सामूहिक घृणा हो या उसकी निजी विजय हो. यहां ‘कनुप्रिया’ सिरजने वाले भारती का कवि हृदय किस अवकाश पर चला गया? एक सृजनधर्मी मन और मानवीय मूल्यों के पैरोकार भाव को यहां क्यों लक़वा मार गया? बाहरी स्तर पर लड़ा जा रहा युद्ध भीतर कैसे घुसपैठ कर गया?
“कौन सा है वह उद्देश्य, लक्ष्य या धर्म, जिसके पीछे हम लड़ें? कौन सी है वह नैतिकता, जो हमें आज भी परस्पर लड़ने की आज्ञा दे सकती है?… क्यों नहीं समझता मनुष्य अपना स्वार्थ, जो सबका स्वार्थ हो?”
तब जबकि पश्चिम पाकिस्तान से बांग्लादेश की मुक्ति का संग्राम संपन्न हो चुका था, मन-हृदय मुक्त क्यों नहीं हुआ? ‘तूफ़ानों के बीच’ रिपोर्ताज में रांगेय राघव की तरह भारती ने उपरोक्त मानुषिक और प्राकृतिक प्रश्नों को तवज्जो क्यों नहीं दी? भारती की ‘युद्ध यात्रा’ इन अर्थों में महत्वपूर्ण है कि यह चिन्तन के लिए उकसाने और बहस के लिए आमंत्रित करने वाली कृति है.
यह मूल्यों का समय है भी या केवल विकास का ही है? हर समय के अपने सच होते हैं और अपने प्रश्न. समाज, कला या जीवन... बाज़ार आपके घर ही नहीं, आपके मन-मस्तिष्क, अवचेतन तक पैठ चुका, तब आप मूल्यों के प्रश्न खड़े करना ही चाहते हैं. सिनेमा क्या, अन्य अधिकतर क्षेत्रों की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी 'अवमूल्यन' स्थापित सत्य है. शिक्षा का बाज़ार बड़ा है. विमर्श जारी हैं, छिटपुट प्रयास भी. शिक्षा नीति में जब तक मूल्य के बजाय प्रणाली, सरकारी तथ्यों (कंटेंट) और उपकरणों को ही तरजीह मिलेगी, चिंताएं तो रहेंगी.
Satyakam Movie Still Credit youtube
"अब कोई कहता है कि देश विकसित हो रहा है, तो कहता है कि मशीनें इतनी आ गयीं.. हम पूछते हैं आदमी कितना अच्छा हुआ? कोई बताता नहीं, कैसे बताएगा क्योंकि आदमी तो अच्छा हुआ नहीं ना!"
एक साक्षात्कार में महादेवी वर्मा जी द्वारा जतायी गयी यह चिंता 35 साल बाद भी कितनी समीचीन है. अब सवाल यह है कि क्या शिक्षा तंत्र की कोई उपलब्धि नहीं रही? तुरंत मन में दर्शन, विज्ञान, गणित, तकनीक, कला आदि क्षेत्रों के कई महापुरुषों के नाम आ जाएंगे और दावा कि भारतीय शिक्षा ढांचे ने ही ये उत्पाद दिये. समझने की बात यह है कि एक लंबी उम्र में सुख और गौरव के कुछ क्षण तो होते ही हैं, मूल्यांकन एवं विमर्श समग्र पर होता है.
यही कसौटी हिन्दी सिनेमा के लिए भी है. तक़रीबन 100 साल की उम्र वाले हिन्दी सिनेमा में मूल्यपरक तस्वीरें कितनी बनीं या उनका हिस्सा कितना रहा? हिन्दी सिनेमा में कुछ ही सही, यक़ीनन सार्थक श्रेणी के चित्र बने हैं. इधर बाज़ार, मूल्यहीनता और सस्ते मनोरंजन की ज़बरदस्त गिरफ़्त में रहने के आरोप हमेशा इस उद्योग पर रहे हैं. महात्मा गांधी की तीखी प्रतिक्रिया के कारण भी संभवत: यही थे. जब बोलती फ़िल्मों की शुरूआत को एक दशक भी पूरा नहीं हुआ था, तब गांधी ने सिनेमा को सामाजिक बुराई कहकर सिरे से ख़ारिज कर दिया था. तब कुछ जागरूक फ़िल्मकार सिनेमा के पक्ष में खड़े हुए थे.
"सिनेमा एक कला है, अभिव्यक्ति का एक माध्यम है इसीलिए कुछ (या अधिकांश) फ़िल्मों के आपत्तिजनक होने के कारण इसकी निंदा करना उचित नहीं है. आख़िरकार, किताबों की निंदा इसलिए नहीं की जा सकती कि उनमें पोर्नोग्राफी के ग्रंथ भी शामिल हैं."
ख़्वाजा अहमद अब्बास ने खुली चिट्ठी में गांधी जी से सिनेमा के प्रति उदारवादी रवैया अपनाने की गुज़ारिश करते हुए पुरज़ोर तर्क देकर सिनेमा की संभावनाएं बतायी थीं. इस चिट्ठी में अब्बास ने कुछ अमेरिकी और भारतीय फ़िल्मों का उल्लेख कर दावा किया था कि 'ये कठोरतम नैतिक मानदंडों के लिहाज़ से भी अद्वितीय फ़िल्में' रहीं. मूल्यों के मानदंडों पर अगर सिनेमा को याद कीजिए तो वी. शांताराम, अब्बास और बिमल रॉय जैसे फ़िल्मकारों के कई चित्र सामने रील की तरह चलने लगते हैं.
एक स्त्री के स्वयं के उद्धार की कहानी (सामाजिक मुद्दों को छूते हुए) के रूप में 'आदमी' रही हो या एक बूढ़े से ब्याह दिये जाने के बाद एक किशोरी का रूढ़ि विरोध दर्शाने वाली 'दुनिया न माने' हो, जाति व्यवस्था की सामाजिक रूढ़ि को चुनौती देती 'अछूत कन्या' हो या ईमानदारी के मूल्य को स्थापित करने वाली 'परख' हो... शुरूआती दौर से ही सिनेमा निर्माण का एक बड़ा वर्ग व्यवसाय को तरजीह भले दे रहा था, लेकिन उपर्युक्त फ़िल्मों ने एक समानांतर धारा बनाने का बीड़ा उठाया था, जिसका कारवां किसी रेस में शामिल हुए बग़ैर अपनी गति से चलता रहा. कभी बहकते, कभी दहकते तो कभी महकते हुए.
गांधी के नाम ख़्वाजा अहमद अब्बास का पत्र. Credit Google
शैक्षिक मूल्यों को स्थापित करने वाली फ़िल्में बेशक और बननी चाहिए थीं लेकिन बाज़ार की दौड़ में मुनाफ़े के चक्र हावी रहा. जिससे सर्जरी की संभावना थी, सिनेमा के उस माध्यम को केवल एनिस्थीसिया बनाकर छोड़ दिया गया.
शिक्षा और सिनेमा विषय आधारित लेख में जयप्रकाश चौकसे जी लिखते हैं, "असली चिंता की बात यह है कि हमारी शिक्षा भी अमेरिकन प्रणाली से प्रेरित है.. अब शिक्षा अच्छा मनुष्य नहीं, सफल आदमी रच रही है". प्रकारान्तर से महादेवी को दोहराते इस सूत्र से समझना चाहिए कि शिक्षा ही नहीं, विकास की भारत की अवधारणा ही पश्चिम से प्रेरित है. अच्छे मनुष्य बनाम सफल आदमी का रूपक यही है कि भारत में कलात्मक या उपयोगी नहीं, 'कमाऊ' सिनेमा रचा जा रहा है. विडंबना क्या है? 'अच्छा' व्यवस्था में 'कमाऊ' नहीं है.
शिक्षा संबंधी सिनेमा विषय पर लेखों को खोजें तो ढेर सारी फ़िल्मों के नाम मिलते हैं, शांताराम निर्मित फ़िल्म 'बूंद जो बन गयी मोती', सत्येन बोस निर्देशित 'जागृति', भालेराव पेढारकर की फ़िल्म 'वंदे मातरम आश्रम' से लेकर प्रकाश झा निर्मित 'आरक्षण' जैसी फ़िल्मों की चर्चा चौकसे जी करते हैं. अन्य लेखों में इम्तिहान, ब्लैक, तारे ज़मीन पर, थ्री इडियट्स, मुन्नाभाई एमबीबीएस, निल बटे सन्नाटा जैसी फ़िल्मों तक का उल्लेख मिलता है, जो बेशक सार्थक फ़िल्में हैं.
महत्वपूर्ण यह समझना है कि शिक्षा जगत से जुड़े संदर्भ, पात्र या विषय कई फ़िल्मों में रहे हैं, हो सकते हैं, लेकिन शैक्षिक मूल्यों की थीम किन फ़िल्मों की रही है. शैक्षिक मूल्यों के लिए उस सिनेमा की ओर देखना होगा, जो श्रेष्ठ मनुष्य-श्रेष्ठ समाज की कल्पना/विचारभूमि पर खड़ा हो. ऐसी शिक्षा जो युद्धभूमि में आकर परीक्षा दे सके और ऐसा सिनेमा जो 'युद्धकाल' में शिक्षित होने के लिए प्रेरणा बन सके.
'सत्यकाम', नारायण सान्याल के उपन्यास पर ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित यह फ़िल्म शैक्षिक मूल्य के लिहाज़ से अव्वल दर्जे की कही जानी चाहिए. यह उस विचार को केंद्र में रखती है, जहां से कोई सत्यजीवी पैदा हो सकता है. इसी संबंध में, वी. शांताराम की कालजयी फ़िल्म 'दो आंखें बारह हाथ' को याद किया जाना चाहिए. कहानी भले एक क़ानूनी प्रयोग की हो, इसकी मूल भावना में विचार और संदेश निहित हैं. कैसे एक जेलर कुछ अमानुषों को मनुष्य बनाता है, इस तरह के शिक्षा मूल्यों की खोज निरंतर करनी होगी, शोध के ज़रीये उसका विषय विस्तार भी.
मुझे याद है बचपन में, साल में एक बार फ़िल्म दिखाने के लिए स्कूल की तरफ़ से टॉकीज़ ले जाया जाता था. तब जो फ़िल्में दिखायी जाती थीं, वो तथाकथित बाल फ़िल्में होती थीं. बालकों को मनोरंजन सुलभ हो और कोई संदेश मिल जाये, इसका भी ध्यान फ़िल्म चयन के समय स्कूल रखता था. इस पूरे अभ्यास में शैक्षिक मूल्य का कोई ध्येय सिद्ध हुआ हो! मुझे ख़याल नहीं. यह ख़याल करना तो होगा क्योंकि अब तो टीवी, वीडियो, ओटीटी, ऑनलाइन कंटेंट से जुड़े शिक्षा ढांचे में फ़िल्म और अधिक प्रासंगिक है.
शिक्षा पर विमर्श, सिनेमा पर विमर्श समय के साथ विकसित हुए हैं, तो बाज़ार से छुटकारे की ओर क़दम उठाने होंगे. 'विकास के राजनीतिक नारे' से इतर बेहतर मनुष्य के विमर्श पर ऊर्जा लगानी होगी. बेहतरी के लिए मूल्य चुकाने होंगे. फिर बक़ौल महादेवी, "राजनीति शक्ति चाहती है, त्याग नहीं. कर्तव्य से जो मिलता है वह महत्व का है."
ऐसे तो लूडो एक indoor खेल रहा, लेकिन इस 'तकनीकिया' दौर में कहीं भी खेलिए, क्या indoor, क्या outdoor! आप किसी साहित्य सम्मेलन में खुद को outsider पा रहे हैं, तो वहीं खुद को एक जज़ीरा बनाकर अपनी हथेली से ही आप outreach हो सकते हैं! मंज़र देखिए कि आप हथेली पर अपने दोस्तों के साथ लूडो खेल रहे हैं और ध्यान ही नहीं है कि आपकी आंखों के सामने साहित्य का लूडो कैसे खेला जाता है!
Dices Image Credit : gotpoem via google search
देखिए, चौकोर बिसात वाले लूडो में चार ख़ेमे होते हैं : लाल, पीला, हरा, नीला (इसे झंडों वाली विचारधाराओं का प्रतीक न समझें, ख़ामख़ा कसरत होगी). चारों ख़ेमों में चार-चार गोटियां होती हैं. हर ख़ेमे की गोटियां अपनी चाल अलग चलते हुए अपने वर्ग के मोहरों को सपोर्ट भी करती चलती हैं और दुश्मन ख़ेमों के वर्गों को पीटती हुई भी (इसे मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष की परिकल्पना न समझें तो मामला सुलझा रहेगा). सबके अपने रास्ते हैं, जो आपस में कहीं टकरा भी जाते हैं और अपने-अपने रास्तों से सबकी अपनी-अपनी मुक्ति (सांप्रदायिक दुनिया का रूपक न समझें, तो चैन मिलेगा) भी है.
इतना global खेल है, तो साहित्य इससे अछूता क्यों रहे? साहित्य के लूडो की अपनी बिसात है, अपने ख़ेमे हैं, अपने वर्ग और वर्ग संघर्ष. बड़ा दिलचस्प खेल नज़र आता है. कौन सा लाल है, कौन सा पीला...? ख़ैर, बताये क़ाएदे के मुताबिक़ साहित्य के लूडो की कथा का श्रीगणेश करते हैं, बोलिए : ॐ इदमान्नं, इमा आपः इदमज्यं, इदं हविः, ॐ यजमान, ॐ पुरोहित, ॐ राजा, ॐ कविः...
'पट्टेदार' से बिस्मिल्लाह करते हैं. साहित्य के लूडो में इस ख़ेमे का आकर्षण वैसा ही है, जैसे बच्चे लूडो खेलते वक्त 'मेरी लाल, नहीं मेरी लाल गोटी' करते हैं. यहां पहला वर्ग शैक्षणिक सिस्टम का है. जैसे कुलवाद है कि अगर आप रीडर, लेक्चरर, प्रोफेसर हैं (इंग्लिश विभाग के हिंदी या उर्दू साहित्यकार की औक़ात बढ़ जाती है) तो साहित्यकार होंगे ही. यूनिवर्सिटी के संचालक या कुलपति हो गये तो महान साहित्यकार होना पड़ता है.
दूसरा वर्ग बाइज़्ज़त मठाधीश है. यहां वो विशिष्ट आबादी होती है, जो प्रकाशन, प्रचार, पहुंच, पुरस्कार और मूल्यांकन जैसे तमाम घोड़ों की लगाम अपने हाथ में रखती है. कोई बड़ा-सा साहित्यिक क़िला इनकी बपौती होता है. इन्हें अक्सर 'दादा' जैसे संबोधनों से पुकारा जाता है, लेकिन ये अंडरवर्ल्ड के 'भाई' जैसे होते हैं. तीसरा वर्ग अकादमी वालों का होता है. यहां साहित्यकार का सरकारी पालन पोषण तो होता ही है, बग़ैर इनके नवाज़े कोई भी साहित्यिक मुश्किल से बड़ा हो पाता है.
इस ख़ेमे की चौथी गोटी साहित्यिक पत्रिकाएं या किताबें छापती है. छोटी-मोटी संस्थाएं बना लेती है. ये ज़्यादातर 'स्वयंभू' श्रेणी होती है. वैसे यह शब्द कइयों को अपनी आग़ोश में लेता है. साहित्य के लूडो में पट्टेदार ख़ेमा ज़्यादातर group game खेलता है और जीत सुनिश्चित रखता है, कैसे? सिर्फ़ समझना पड़ता है क्योंकि यह बताने वाले को पाप लगता है. बोलिए : ॐ अंगीकरण, शुद्धिकरण, राष्ट्रीकरण, ॐ मुष्टीकरण, तुष्टिकरण, पुष्टिकरण...
अगर कविता या कहानी की किताब album ज़्यादा नज़र आये या फिर सोने चांदी के बेलबूटे हों, तो समझिए बात 'मालदार' ख़ेमे की है. इस ख़ेमे के साहित्यकारों को हर उस शख़्स ने महान बताया होता है, जिसके autograph के लिए आप मन्नतें करते हैं. इस ख़ेमे के पहले वर्ग में स्वाभाविक तौर पर व्यापारी, उद्योगपति, फाइव स्टार अस्पताल या इंस्टीट्यूट चलाने वाले सभी पुण्य प्रतापी समाजसेवी शामिल होते हैं.
दूसरा वर्ग अफ़सरों का होता है. ख़ास वो होते हैं, जिनके रिटायर होने में लंबा वक़्त हो. ये जिस दिन साहित्य का सफ़र शुरू करते हैं, उसके अगले दिन साहित्यिक सम्मेलनों की अध्यक्षता बाहैसियत वरिष्ठ साहित्यकार करते पाये जाते हैं. प्रकारान्तर से इस वर्ग में प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर, इंजीनियर, सीए जैसे कुशल नामदार भी जुड़ते हैं. नेता वर्ग में रेंज और वैरायटी होती है. गांव-कस्बे में सरपंच से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्रियों तक इस गोटी का विस्तार है. इनके भव्य 'साहित्य' के साथ 'मीन काम्फ' ओह सॉरी यानी 'मेरी कहानी' bestseller और चर्चित जैसे मार्केटिंग शब्द जुड़े होते हैं.
लूडो की पहुंच देखिए! वैसे खेल है तो एक गोटी तो अखाड़े की होना ही चाहिए. मालदार ख़ेमे में बाबा, स्वामी, पीर, हज़रत टाइप शब्दों से पुकारे जाने वाले दिव्य साहित्यकार लूडो को ग़ज़ब आध्यात्मिकता से सराबोर करते हैं. इनका संदेश यही होता है 'न कोई गोटी पिटती है, न कोई पीटती है, गीता उठाकर देखिए, हर कविता पहले से लिक्खी है!' बोलिए : ॐ डॉलर, ॐ रूबल, ॐ पाउंड, ॐ साउंड, ॐ साउंड, ॐ साउंड...
कालजयी, award winning, चमत्कारी और स्थापितों की दुनिया के साथ संघर्ष की दुनिया भी है, तभी तो खेल रोमांचक है. 'दावेदार' ख़ेमे में पहला दावा पत्रकार पेश करते हैं. क़लमजीवी होते हैं, तो पैरेलल साहित्य जगत खड़ा करने का शौक़ इन्हें होता है. साहित्य को मंच देना कर्तव्य होता है, तो चुपके-से ख़ुद भी चढ़ जाते हैं. ये सूचनात्मक और खोजी साहित्य के हामी होते हैं पर साहित्यकार होने का नुस्ख़ा कभी-कभी ही खोज पाते हैं.
दूसरी कलाओं से जुड़े नामों की अपनी एक गोटी है. ख़ास तौर से फ़िल्मी दुनिया में 'दो मिनट की शोहरत का तामझाम' रखने वाले साहित्य की दुनिया में अमिट छाप छोड़ने के लिए कोई भी जोड़-तोड़ करने से नहीं चूकते. संघर्ष तो उनका भी कम नहीं जो लोहे-लकड़ी पर सफ़ेद चादर चढ़े मंचों से काग़ज़, क़लम, दवात वाले मंचों पर दलील पेश करते हैं. चूहे-बिल्ली वाला खेल ये है कि श्रोता वाली गोटी के पास पाठक, तो पाठकों वाली गोटी के पास श्रोता न पहुंचे, यह अंतर्युद्ध चलता है.
संघर्ष करने वाली एक गोटी असंगठित क्षेत्र की है. ये अचानक कहीं से भी प्रकट हो जाते हैं और कहते हैं कि साहित्य के लूडो में हम भी पांसा फेंकेंगे. दावेदार अस्ल में, एक तरफ लूडो के रोमांच को नये मोड़ देते हैं, तो दूसरी तरफ़, कमोबेश safe point या गोटी डबल करने की जुगत में दिखते हैं. बोलिए : ॐ गुटनिरपेक्ष, सत्तासापेक्ष जोड़-तोड़, ॐ छल-छन्द, ॐ मिथ्या, ॐ होड़महोड़...
अब जो बचा हुआ ख़ेमा है, उसके नाम के साथ 'दार' प्रत्यय जुड़ता नहीं है क्योंकि फ़ितरतन ये सब कुछ disown करने वाले होते हैं. बेशक, पहली गोटी का नाम नैसर्गिक उर्फ़ क़ुदरती है. ये जन्म घुट्टी में ही पद्य या गद्य पिये होते हैं. इन्हें तारीफ़ें तो हर जगह भरपूर मिलती हैं, लेकिन और कुछ के लिए मुक़द्दर भरोसे होते हैं.
इस ख़ेमे का दूसरा और तीसरा वर्ग बाक़ी ख़ेमों से बनता है. जिन्हें अपने ही आगे न आने दें, वो... और जो अपने वर्ग में अपवाद हों, वो इस ख़ेमे में विनम्र भाव से रहते हैं. चौथी गोटी सूफ़ी, संत और फ़कीर टाइप नामों से जानी जाती है. भव्यता, दिव्यता, भौतिकता से परे इस गोटी के खुलने की नौबत ही बहुत कम आ पाती है. इस ख़ेमे में दो प्रमुख लक्षण हैं : अव्वल तो यह दुनियावी ढंग से 'कुशल' व 'practical' नहीं होता. दूसरा, साहित्यकार को ज़िंदा रहने के लिए कुछ काम करना ही होता है, तो यह ख़ेमा सोये किसी के भी साथ, इसका ख़्वाब और सुब्ह साहित्य ही होता है.
इस ख़ेमे का कोई नाम या रंग नहीं है, फिर भी आप चाहें तो जानदार, बेदार या हक़दार जैसा नाम सोच सकते हैं. राज़ यही है कि यह ख़ेमा खेल में रहते हुए भी खेल के मोह में नहीं रहता. या तो यह ध्यानमग्न रहता है या फिर खरा-खरा बोलने में क़तई हिचकता नहीं. बाज़ी जो भी हो, इसकी मुक्ति तय होती है. बोलिए : ॐ धरती, धरती, धरती, व्योम, व्योम, व्योम, व्योम... हरिः ॐ तत्सत, हरिः ॐ तत्सत।।
लूडो का मूल नियम है कि अलौकिक, प्रतिस्पर्धी या निर्मोही, किसी भी अखाड़े की कोई भी गोटी हो, खुलती तभी है जब पांसे में 'छह' आये. विडंबना यह है कि अब तो निल बटे सन्नाटे भी लूडो के माहिर हैं. 'तकनीक' और 'बाज़ीगरी' से अक्सर नियमों की धज्जियां ऐसे उड़ती हैं कि 'game-over' हो जाता है. ख़ेमों की नफ़रत और ताक़त की सियासत का खेल ऐसा हो जाता है कि इस लूडो में साहित्य ही 'outsider' नज़र आता है.
(यह व्यंग्य देवास से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका अर्बाबे-क़लम में 2021 में प्रकाशित हुआ था.)
यह लेख आम बजट 2021 के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया था, जो भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्रों देशबंधु और सुबह सवेरे के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था. इस लेख से एक विमर्श पैदा हुआ. उसी 3 फरवरी को एक फेसबुक लाइव पर इसे लेकर चर्चा भी हुई थी, वह भी आप यहां नीचे दी गयी तस्वीर पर क्लिक करके पॉलिटिकल पांडे के फ़ेसबुक पेज पर देख सकते हैं.
मुक्तिबोध साहित्यिकों के साथ आपसी चर्चाओं में अक्सर कहा करते थे 'तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर?' तब इसे दोस्ताना मिज़ाज में एक कवि का गंभीर प्रश्न समझा जाता था. अब? कवियों की सियासत एक अलग बात है, लेकिन सियासी उल्लू सीधा करने के लिए 'कविता' को टूल बनाना एक अलग प्रोपैगैंडा है. 1 फरवरी 2021 को भारतीय संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी ने बजट भाषण का आगाज़ रबींद्रनाथ ठाकुर की कविता से किया. लेकिन ख़बर के पीछे गूंज इस सवाल के जवाब में छुपी है कि रबींद्रनाथ की ही कविता क्यों चुनी गयी?
यह सवाल अटपटा न लगे इसलिए ज़रा अपनी याददाश्त पर ज़ोर डालिए. निर्मला जी के पिछले दो बजट भाषणों के टेप मिल जाएंगे, सुनिए. पहले भी निर्मला जी भाषण में काव्य पंक्तियां बख़ूबी पिरोती रही हैं. बजट भाषणों में तक़रीबन आधा दर्जन बार कविताएं कोट कर चुकीं निर्मला जी पहले कभी 'रबींद्रनाथ टागोर' से शब्द उधार लेने नहीं गयी थीं. और पहले जिनसे, जो शब्द उधार ले रही थीं, तब क्या उनकी ज़रूरत नहीं थी?
इस बार बजट भाषण में रबींद्रनाथ की कविता आना बहुत स्वाभाविक था ही. आपने ग़ौर से देखा हो तो भाजपा को पिछले कुछ महीनों से रबींद्रनाथ इस क़दर याद आ रहे हैं कि कहीं नाथूराम गोडसे की याद का रिकॉर्ड न टूट जाये! यहां तक कि निर्मला जी के रबींद्र काव्य संदेश पाठ के दौरान लग रहा था जैसे गुरुदेव स्वयं किसी छद्म छवि में वहां विराजमान हों! सोशल मीडिया पर आप इस छवि के बारे में 'भेस धरे टैगोर का...' जैसे सुसंस्कृत काव्य भी पा सकते हैं. तो, यह कहना क्या ज़रूरी है कि किस विश्व भारती, किस विश्वरूप और किस निजविश्व के मुहावरे किस तरह गढ़े जा रहे हैं...
चर्चा यह समीचीन है कि लोक की एक साइकी होती है, जिसे बनाया भी जाता है और जिसमें घर भी किया जाता है. 'राम-राम' जपने से पाप धुलें या नहीं, लेकिन यह भ्रम ज़रूर पैदा किया जा सकता है कि जाप करने वाला साधु ही है. इसे मनोविज्ञान में आप मॉब साइकोलॉजी और इनसेप्शन जैसे सिद्धांतों से समझते हैं और समाज के राजनीति शास्त्र में हिटलरी सिद्धांतों से. इसी सैद्धांतिक ज़मीन से आधार को बल देने के लिए कई किस्म के बयान दिये जाते रहे हैं. वित्तीय मामलों में जब कविता का आश्रय लिया जाये, तो सजग पाठक को कान खड़े रखना चाहिए क्योंकि लक्ष्मी और सरस्वती का समवेत स्वर स्वाभाविक नहीं होता.
निर्मला जी के पिछले बजट भाषण भी समय, पार्टी की निजी ज़रूरत और छवि निर्माण के अनुरूप ही काव्योक्तियां चुनते रहे हैं. आपको याद करने या तलाशने का कष्ट न हो इसलिए यहीं देखिए :
हमारा वतन फले-फूले शालीमार बाग़-सा हमारा वतन डल झील में खिले कंवल-सा नौजवानों के गर्म लहू जैसा मेरा वतन, तेरा वतन, हमारा वतन दुनिया का सबसे प्यारा वतन
यह काव्यांश दीनानाथ नदीम से निर्मला जी ने उधार लिये थे. 2019 में केंद्र सरकार ने कश्मीर को छोटा-सा केंद्रशासित प्रदेश बना दिया था. ऐसा करने के लिए हज़ारों वर्दीधारी कश्मीर में तैनात किये गये थे. यही नहीं, तबसे वहां संचार और सूचनाओं पर जो नियंत्रण किया गया, सो अब तक लगातार बहाल नहीं हुआ. उन पूरे संदर्भों को ध्यान में रखते हुए आप समझिए कि 2020 में निर्मला जी ने कश्मीरी कवि के शब्द क्यों चुने थे!
नदीम साहब 20वीं सदी के रिवायती कवि थे. साहित्य अकादमी से सम्मानित नदीम साहब 1988 में इंतक़ाल फ़रमा गये थे. पंडितों को खदेड़े जाने, आतंकवाद पनपने और उसके बाद की अस्थिर व अत्याचारी फ़िज़ा 1990 के आसपास से कश्मीर की पहचान बनती जाती है. तो नदीम साहब उस कश्मीर के थे ही नहीं, जिसे हम आज जानते हैं. फिर 2020 में उस कश्मीर की कविता को किसी भाषण में लाना, जिसे 40-50 बरस पहले किसी कवि ने किसी ख़ुशगवार पल में कलमबंद किया हो, क्या मायने रखता है?
यह एक आत्मरति है. समकालीन कश्मीरी काव्य उठाकर देखिए, न आंख से ख़ून निकल पड़े तो आप पत्थर. लेकिन पत्थरों की हक़ीक़त में कंवल की याद या तो सब्ज़बाग़ होती है या दुख. आत्मगौरव और इतिहास का सिर्फ़ वो रुख़ दिखाने का टूल होता है, जो आपकी नज़र के अनुकूल है. इसी 'अनुकूल' को निर्मला जी के भाषणों में बार-बार आवाज़ मिलती रही है.
यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है हवा की ओट भी लेकर चराग़ जलता है
दीनानाथ कौल नदीम का नाम लेकर उनकी कविता कोट करने वाली निर्मला जी ने 2019 में जब बजट भाषण में यह शेर पढ़ा था, तब शायर का नाम नहीं बताया था. बदायूं में पैदा हुए, हल्दवानी में पढ़े और अलीगढ़ में पढ़ते-पढ़ाते रिटायर हो गये मंज़ूर हाशमी का नाम भाषण में नहीं आया था. यक़ीनन भाषण में यह नाम 'अनुकूल' वाली फ़िलॉसफ़ी के दायरे में नहीं था.
पिछले दोनों भाषणों में निर्मला जी तमिल साहित्य को भी कोट करती रही हैं. 'निर्मला उवाच' में प्राचीन कवि थिरूवल्लूवर का प्रसंग भी बहुत रोचक और सामयिक है. प्राचीन तमिल दार्शनिक और कवि के ग्रंथ थिरूकुरल से इन अंशों को कोट करते हुए निर्मला जी ने एक आदर्श देश की कल्पना बताई थी :
'पिन्नी इन्मय, सेल्वम, विलइवु, इन्बम, एमम... यानी देश को बीमारियों से मुक्त रहना चाहिए, संपन्न होना चाहिए, कृषि में उन्नति, सुख व आनंद, और सुरक्षा समुचित होना चाहिए.'
समय पर ध्यान दें, 1 फरवरी 2020 के भाषण में यह कोट था. वैश्विक महामारी का पहला केस भारत में आ चुका था. उसके बाद तो... मौजूदा और हालिया स्थितियों के मद्देनज़र भी आप इस सिद्धांत के पैमाने पर देश की उन्नति के लिए सरकार को आंक सकते हैं. बहरहाल, यह सूत्र बताने के बाद तुरंत निर्मला जी ने इस तरह के दावे भी कर दिये थे कि 'महामहिम प्रधानमंत्री जी' के नेतृत्व में देश ने यह चरम आदर्श पा लिया और हाथी निकलने के बाद जो पूंछ रह गयी है, वो तो चुटकी बजाने की बात है. इसके बाद, समझदार गूगल सर्च इस तरह की खबरें बता रही थी कि निर्मला जी ने अपने भाषण में महामहिम का नाम कितनी बार लिया.
कालिदास ने कहा था : 'जैसे सूरज पानी से वाष्प लेता है और फिर वर्षा के तौर पर लौटाता है, वही धर्म राजा का है.' टैक्स के संदर्भ में इसे भी निर्मला जी ने कोट किया था. यहां कुछ विचार बिंदु हैं, जिन्हें छोड़िएगा मत. कालजयी और लोक काव्य के रचयिता कालिदास राजकवि भी थे, यह भूलना नहीं चाहिए. दूसरे, राजतंत्र के आदर्श को लोकतंत्र में क्या 'जस का तस' अंगीकार किया जाना चाहिए? तीसरे, जनता की दृष्टि राज्य के लिए जो हो, लेकिन जब आप स्वयं की तुलना राजा से कर रहे होते हैं, तो लोकतंत्र में विश्वास कितना रह जाता है?
'राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट...' साइकी को समझना होगा. सजग श्रोता, ख़बरदार पाठक और जागरूक नागरिक की तरह सुनना, पढ़ना और बोलना होगा. यह सवाल करते रहना होगा कि 'इस लोकतंत्र में तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर?'
एशियन एज के लिए ईस्टर्न एज, मिड-डे के लिए न्यूज़ डे और मुंबई मिरर के लिए सिटी मिरर जैसे नामों का इस्तेमाल तो तकनीकी बात है पर जिग्ना वोरा के रोल के लिए 'जागृति पाठक' नाम चुनना, नामों के प्रति लेखकीय समझ और आग्रह दिखाता है. यह कितना सार्थक और रूपक गढ़ता हुआ नाम है. अस्ल किरदारों के लुक की बात हो या फिर फैक्ट्स और फिक्शन का तालमेल बिठाना, कॉेसेप्ट और कहानी के लेखन में बारीक़ विवरण हमेशा कारगर साबित होते हैं. कलात्मक सार्थकता, विमर्शों की प्रधानता, विषय को साहस के साथ उठाने और अपने क्राफ़्ट की बुनाई के साथ ही यह चित्र किन समस्याओं और चिंताओं के लिहाज़ से विमर्श में आता है?
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पत्रकारिता पर हमले होना कोई नयी बात नहीं है. यह होता रहा है. सत्ताओं को निर्भीक एवं ईमानदार पत्रकारिता हमेशा ख़तरा लगती रही है. युद्ध हो, आपातकाल या सत्ता के वर्चस्व को बचाये रखने की चुनौतीपूर्ण स्थिति. पत्रकारों पर हमले हों या पत्रकारिता के मूल्यों के संकट, युद्धग्रस्त इलाकों से लेकर भारत तक चर्चा बनी हुई है. लोकतंत्र की स्थापना के बड़े उद्देश्यों में एक यह था कि 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' सुनिश्चित करवायी जा सके. भारतीय लोकतंत्र राज्य के 75 सालों बाद क्या स्थिति है? तीन तरह की तस्वीरें हैं. एक सत्ता द्वारा निर्भीक पत्रकारिता का दमन, दो मुख्यधारा की पत्रकारिता का सत्ता का पक्षधर हो जाना (यह एक प्रकार की घात ही है) और तीन, पेशेवर बाध्यताओं के चलते पत्रकारों का मोहरा बन जाना.
'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के आदर्श का उल्लंघन होने पर पहली स्थिति का विरोध किया जाना उचित है. दूसरी स्थिति चाटुकारिता और अवसरवाद की है, जिसकी निंदा ही की जा सकती है और तीसरी पेचीदा है. ऐसा कभी पत्रकार पर दबाव के कारण होता है, कभी पत्रकार की अनभिज्ञता तो कभी महत्वाकांक्षा के कारण भी. इस पक्ष को एक कसी हुई पटकथा और एक आत्मकथात्मक आख्यान के माध्यम से एक वेब सीरीज़ का विषय बनाया गया है, जो 2023 में चर्चित और प्रासंगिक भी रही है.
अंडरवर्ल्ड के साथ मुंबई (महाराष्ट्र) पुलिस के रिश्तों/साठ-गांठ को लेकर क़िस्से, थ्योरीज़ और अफ़वाहें कम नहीं रहीं. इस संबंध में किसी ने जड़ तक जाकर पड़ताल की और बड़े ख़ुलासे किये तो वह थे, खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे, जिनकी हत्या 2011 में कर दी गयी थी. कहते हैं जे. डे ने उस 'डार्क अलायन्स' का पर्दाफ़ाश कर दिया था, जिसे छुपाने के लिए पूरा 'सिस्टम' हर वक़्त मुस्तैद रहता था. एक तरफ जे. डे क्राइम रिपोर्टिंग के मेयार को उठा रहे थे, नये बेंचमार्क बना रहे थे, तो दूसरी तरफ़ 'मीडिया' में तब्दील हो रहा 'जर्नलिज़्म' ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव की अंधी दौड़ में तमाम नैतिकताओं को बेचने के लिए उतावला हो रहा था. इसी बीच, उस दौर में कई टकराव और थे. संगठित अपराध, अख़बारों और पुलिसिंग के इसी समय को क़रीने से दर्ज करती हुई वेब सीरीज़ है, स्कूप.
21वीं सदी के दूसरे दशक से सोशल मीडिया भारत में ज़ोर पकड़ने लगा था, स्मार्ट फ़ोन की सेल भी; 2010 में क़रीब 5.70 लाख पर्यटक कश्मीर पहुंचे जबकि 2011 में! तब तक बीते 22 सालों में ऐसा किसी बरस नहीं हुआ था कि 10 लाख से ज़्यादा टूरिस्ट कश्मीर गये हों; 2008 के आतंकी हमले में दाऊद इब्राहीम और उसके गिरोह की तरह-तरह की भूमिका को लेकर थ्योरीज़ चल रही थीं; छोटा राजन गैंग और डी-कंपनी के बीच टकराव बना हुआ था. संगठित अपराध सिस्टम के ख़िलाफ़ चुनौती बन चुका था; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण पत्रकारिता के नये मायने स्थापित हो रहे थे और प्रिंट मीडिया के नये संकट भी.
क़रीब एक युग पहले के मीडियाई दौर से एक महत्वपूर्ण कहानी लेकर आती है हंसल मेहता निर्देशित 'स्कूप'. जब तथ्यपरक से ज़्यादा ख़बर का सनसनीख़ेज़ होना ट्रेंड बना था, जब तथ्यों की खोजबीन व पड़ताल नहीं, अहम थी खलबली पैदा कर देने वाली ख़बर पेश कर देने की हड़बड़ी. जब मैनेजमेंट के दबाव में पत्रकार अपनी भूमिका भूल रहे थे. 'स्कूप' में पत्रकारिता को लेकर स्पष्ट मत है - "एक कहे कि बारिश हो रही है और दूसरा कहे कि नहीं, तो मेरा काम दोनों को कोट कर देना भर नहीं है. मेरा काम है कि मैं कमबख़्त खिड़की खोलूं और देखकर बता दूं कि फ़ैक्ट क्या है." यह कहा इसलिए गया क्योंकि कथानक इसकी उलट स्थितियों से बुना जा रहा है.
'स्कूप' में लेखक और निर्देशक का माउथपीस कैरैक्टर है मूल्यों पर अड़ा हुआ एक संपादक. अधपकी ख़बरों को ख़ारिज करता हुआ. लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और उसके कर्णधारों के पतन पर आंसू बहाता हुआ. मुख्य पात्र है इस संपादक की टीम में एक महिला क्राइम रिपोर्टर. 'एक्सक्लूसिव' की रेस में ख़ुद को स्थापित करने की होड़ में. पुलिस और अपराध जगत में अपने सूत्रों को साधती हुई. कुछ मूल्य बचाती हुई पर पत्रकारिता के सिद्धांतों के बजाय शोहरत चुनती हुई. दुनिया उसकी इस तेज़ रफ़्तार कामयाबी को उसके चरित्र के साथ किस तरह बांच रही है, यह नज़रअंदाज़ करती हुई. कई किरदारों की भरपूर कहानी कहती 'स्कूप' के इस केंद्रीय पात्र का नाम है जागृति पाठक.
क्या-क्या बयान करती है 'स्कूप'?
'बिहाइंड बार्स इन भायखला : माय डेज़ इन प्रिज़न' किताब में पूर्व पत्रकार जिग्ना वोरा ने जिस तरह आपबीती बयान की, उसी पर आधारित 'स्कूप' वास्तव में, जागृति के सफ़र की कहानी है. खोजी पत्रकार जयदेब सेन उर्फ़ दादा (जे. डे का सिनेमाई किरदार) की हत्या के षडयंत्र में जागृति को आरोपी बनाया जाता है और उसे कई महीने जेल में रहना पड़ता है. फिर तमाम तकलीफ़ों के बाद वह कोर्ट से राहत पाती है. यह चित्र स्त्री विमर्श के कुछ पहलू भी छेड़ता है.
आदमियों के समझे जाने वाले काम में तेज़ी से नाम के साथ दुनियादार रवैये से पूंजी भी जोड़ रही, अपने पति से तलाक़ ले रही, अपने बच्चे और मां, नाना-नानी आदि को पाल-संभाल रही, एक गुपचुप एक्स्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर कर रही, अपराधियों व पुलिस अफ़सरों के बीच से अपना काम निकलवा रही और प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में न जाने कितने लोगों को अपना 'राइवल' बना रही जागृति को जेल जाने पर 'क्या पाया क्या खोया' के साथ ही यह अहसास भी होता है कि उसने 'क्या सही किया क्या ग़लत'. हमदर्द के नाम पर उसके साथ उसके परिवार के अलावा सिर्फ़ एक आदमी, उसका संपादक. और उसके ख़िलाफ़? वो अपराधी, जिनके एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के लिए वह मरी जा रही थी; वो पुलिस अफ़सर, जो उसके ज़रिये अपना एजेंडा सेट करवाते रहे थे; और वो मीडिया, जो उसे कल तक हाथो-हाथ ले रहा था.
क्या है इस विमर्श की फ़िल्मी परंपरा?
माइकल क्वेस्टा निर्देशित 2014 की फ़िल्म 'किल द मेसेंजर' की थीम से प्रभावित दिखती 'स्कूप' को देखते हुए अनेक फ़िल्मों के दृश्य या संदर्भ यादों में कौंधने लगते हैं. मसलन, जेल में किसी मासूम को क़दम-क़दम पर किस तरह प्रताड़नाएं झेलना पड़ती हैं, भंडारकर ने अपनी फ़िल्म 'जेल' में दिखाने की कोशिश की थी. 'स्कूप' में नयापन यह है कि यह महिलाओं की जेल के वो दृश्य लेकर आती है, जो पहले न के बराबर देखे गये (श्रीराम राघवन निर्देशित 'एक हसीना थी' भी याद कीजिए). अस्ल में, 'स्कूप' के कई तत्व पिछली कई फ़िल्मों या चित्रों की याद तो दिलाते हैं लेकिन अपने विचार, विस्तार, प्रभाव या गढ़न में नयापन भी रखते हैं.
'किल द मेसेंजर' की तरह यह सिनेमा भी बड़ा प्रश्न उठाता है कि मीडिया को किस तरह 'यूज़' किया जाता है. बिली विल्डर निर्देशित 'ऐस इन द होल' का विषय भी यही है. किस तरह मीडिया रिपोर्टिंग को तोड़-मरोड़कर रैटिंग के चक्कर में 'न्यूज़' को कॉर्पोरेटिया प्रोडक्ट बनाता है और कैसे सच से परे नैरैटिव रचने का खेल खेला जाता है, विल्डर इसे बख़ूबी दिखा पाये हैं. 'स्कूप' का एक संवाद है - "हम सस्ती हेडलाइन्स के लिए मौत को भी बेचते हैं. पाठकों को हम उपभोक्ता बना चुके हैं... पहले होता था कि पत्रकारिता अच्छी हो तो उसका विवादास्पद होना तय था, अब उल्टा है. विवादास्पद हो तभी अच्छी पत्रकारिता है."
दि इनसाइडर और एब्सेन्स ऑफ़ मलाइस जैसी क्राइम रिपोर्टिंग आधारित हॉलीवुड फ़िल्मों के बहुत मामूली प्रभाव भी 'स्कूप' में नज़र आते हैं. रैटिंग और नैरैटिव के खेल के प्रति समझ पैदा करने में रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म रण ने भी एक स्तर पर कोशिश की थी. एक और क्राइम रिपोर्टर की संस्मरणों पर आधारित टीवी शो 'टोक्यो वाइस' 2022 में आया पर भारत में उतना चर्चित नहीं रहा. यह शो जापान के 'यकूज़ा' (संगठित अपराधियों) की सिस्टम के साथ मिलीभगत का पर्दाफ़ाश करने की भयानक कहानी अनूठे ढंग से बुनता है.
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रमेश शर्मा निर्देशित और सराही गयी फ़िल्म 'न्यू दिल्ली टाइम्स' (1986 में प्रदर्शित) पहली हिंदी फ़िल्म थी, जिसने सियासत और जुर्म की मिलीभगत और उसमें मीडिया को इस्तेमाल किये जाने का षडयंत्र हिंदी दर्शकों को संभवत: पहली बार दिखाया था. जिस तरह इस फ़िल्म के मुख्य पात्र पत्रकार विकास पांडे को समझ आता है (किल द मेसेंजर में गैरी को कुछ अलग ढंग और मोड़ पर) कि अनजाने ही सिस्टम ने उसको अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर लिया, उसी तरह स्कूप में भी जागृति पाठक को यह बात तो समझ में आती ही है, यह पछतावा भी उसे होता है कि एक पत्रकार की तो नहीं लेकिन उसने पत्रकारिता की हत्या ज़रूर की. वास्तव में, पत्रकारिता उस असहज लेकिन समाजोपयोगी सच को सामने लाने का नाम है, जिस पर परदे या मुलम्मे चढ़ाये जा रहे हों. होता यह है कि सच इकहरा नहीं होता इसलिए जाने-अनजाने पक्षधरता ही उभरकर आती है और नैरैटिव रचने वाली पॉलिटिक्स यहीं अपने पैर जमा लेती है.
'स्कूप' में जागृति के ख़िलाफ़ ही मीडिया एकजुट होकर कथित 'मसालेदार' ख़बरें बेचता है और उसकी चारित्रिक हत्या पर उतारू हो जाता है. 'मीडिया ट्रायल' संबंधी इस तरह के संकेत 'किल द मेसेंजर' में भी हैं. ये दोनों ही चलचित्र सुरक्षा एजेंसियों की अंतर्राष्ट्रीय अपराध जगत के साथ मिलीभगत के विषय को प्रमुखता से उठाते हैं. समाज और सिस्टम के निगेटिव्स से भरे दोनों ही चित्रों में पॉज़िटिव है, कठिन समय में परिवार का साथ बने रहना. कुछ हद तक अवास्तविक भी लगता है लेकिन एक उम्मीद देना ज़रूरी भी है. एक इत्तेफ़ाक और भी. उस समय क्लिंटन और मोनिका लेवेंस्की सेक्स कांड के चलते गैरी वेब के महत्वपूर्ण ख़ुलासे विमर्शों और जनता के बीच पुरज़ोर ढंग से नहीं पहुंच सके. इधर, अन्ना हज़ारे के आंदोलन की आंधी के दौर में जे. डे की हत्या और जिग्ना के जेल जाने की घटनाएं चर्चा में टिक ही नहीं सकीं.
इस फ़िल्म के निर्माण के तकनीकी पक्ष पर भी विस्तार से चर्चा की आवश्यकता है. संक्षेप में, निर्देशक हंसल मेहता, जागृति का पात्र निभाने वाली करिश्मा तन्ना और संपादक इमरान के किरदार में ज़ीशान अय्यूब के साथ अन्य अनेक अभिनेता तारीफ़ के हक़दार हैं. संवादों के लिए करन व्यास, पटकथा के लिए अरुण सिंह चौधरी और एडिटर अमितेश मुखर्जी को भी सराहा जाना चाहिए. हालांकि जिग्ना की किताब से कुछ अहम वाक्यों/विवरणों को संवादों व पटकथा में और शामिल किये जाने की गुंजाइश बनी रही. मृणमयी और मिरत का उत्कृष्ट अडेप्टेशन यक़ीनन हंसल के प्रभावी निर्देशन के लिए बेहद उपयोगी साबित हुआ. कलात्मक सार्थकता, विमर्शों की प्रधानता, विषय को साहस के साथ उठाने और अपने क्राफ़्ट की बुनाई के लिए इस तस्वीर की याद आती रहेगी. यह वेब सीरीज़ तब तब भी याद आएगी जब पत्रकारिता पर हमले होंगे या पत्रकारिता अपने स्वार्थों के लिए अपने मूलभूत चरित्र से समझौता करती दिखायी देगी.
"ट्रंप की सनक और पूंजीवाद का नतीजा है अमेरिका में महामारी का विकराल रूप"
कोरोना वायरसजनित वैश्विक महामारी की चपेट में आयी दुनिया का उपरिकेंद्र बनकर उभरा है अमेरिका. विश्व के सबसे संपन्न, शक्तिशाली और पूंजीवाद के अगुवा इस देश में स्वास्थ्य रक्षा, नेतृत्व की कमज़ोरियां और पूंजीवादी मूल्यों की न सिर्फ़ पोल खुली है, बल्कि दुनिया का कथित सबसे शक्तिशाली मनुष्य मज़ाक बनकर रह गया है. मशहूर और वयोवृद्ध विचारक एवं लेखक, जिन्हें करीब 15 साल पहले सबसे महान लोक बुद्धिजीवी माना गया था, नो'म चॉम्स्की ने इस पूरे परिदृश्य पर विस्तार से बातचीत की है. हिन्दी के पाठकों को इन गंभीर विचारों एवं मुद्दों पर विमर्श से रूबरू होना चाहिए इसलिए वार्ता के महत्वपूर्ण अंश भवेश दिलशाद के शब्दों में...
Cover Pages of Books Written by Naom Chomsky.
नो'म चॉम्स्की : संक्षिप्त परिचय
दुनिया के नामचीन राजनीतिक असंतुष्ट, भाषाविद् और लेखक. अमेरिका की एरिज़ॉना यूनिवर्सिटी में भाषाशास्त्र विभाग के मानद प्राध्यापक और मैसैचुसेट्स तकनीकी इंस्टिट्यूट में 50 सालों तक शिक्षण देने के बाद अवकाशप्राप्त प्राध्यापक. फ़ेल्ड स्टेट्स, इंटरवेन्शन्स, मेकिंग द फ़्यूचर, रेक्विएम फ़ॉर दि अमेरिका ड्रीम जैसी अनेक पुस्तकों के लेखक.
एमी गुडमैन : प्रोफेसर चॉम्स्की से बातचीत की शुरूआत, 2020 में होने जा रहे चुनावों के संदर्भ से शुरू करते हुए जानते हैं कि वो कैसे देख रहे हैं कि नवंबर में क्या होने जा रहा है.
नो'म चॉम्स्की : अगर ट्रंप दोबारा चुने जाते हैं, तो यह एक वर्णनातीत त्रासदी ही होगी. इसका मतलब यह है कि पिछले चार सालों से अमेरिकी आबादी समेत पूरी दुनिया जो बेहद विनाशकारी नीतियां झेलने पर मजबूर है, वही ढर्रा जारी रहेगा. संभवत: और तेज़ हो जाएगा. इसका मतलब, स्वास्थ्य के क्षेत्र में और ख़राब दौर होगा. इसका मतलब, पर्यावरण के लिए ख़तरा होगा और जिसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा, न्यूक्लियर युद्ध के ख़तरे का वह मुद्दा बेहद गंभीर और अवर्णनीय है.
अब मान लीजिए कि बिडेन चुनाव जीतते हैं तो मुझे लगता है कि ओबामा के कार्यकाल जैसा दौर आएगा, यानी कुछ बहुत कमाल नहीं होगा, लेकिन कम से कम संपूर्ण विनाशकारी भी नहीं होगा. बदलाव लाने के लिए संगठित लोक के पास व्यवस्था पर दबाव बनाने के लिए मौके होंगे.
चिंतन का रुख़ सैंडर्स ने बदला
ऐसा कहा जा रहा है कि सैंडर्स का चुनाव अभियान नाकाम हो गया. मुझे लगता है यह कहना भूल है. मुझे लगता है कि यह असाधारण रूप से सफल रहा क्योंकि सैंडर्स के अभियान ने वाद विवाद और परिचर्चा का रुख़ बदल दिया. जो मुद्दे करीब दो साल पहले तक सोचे भी नहीं जा रहे थे, वो अब विमर्श के बीचों—बीच हैं. जो स्थापित व्यवस्था है, उसकी नज़रों में सैंडर्स का सबसे बड़ा गुनाह यह नहीं कि उन्होंने किन नीतियों का प्रस्ताव रखा, बल्कि ये कि उनके विमर्श से नयी प्रेरणा मिली, और वो आंदोलन, जो भीतर ही कहीं पनप रहे थे, ऊर्जावान आंदोलन में बदलते गये. अस्ल में, ऐसे आंदोलन सतत दबाव बनाये रखते हैं, इसे आप आंदोलनात्मक सक्रियतावाद कह सकते हैं.
सबके लिए स्वास्थ्य सुरक्षा या मुफ़्त उच्च शिक्षा, सैंडर्स के कार्यक्रम के अन्य बड़े मुद्दे रहे. तथाकथित मुख्यधारा के नज़रिये से इसे वामपंथ कहा जा रहा है और अमेरिकियों के लिए अतिवाद या उग्र सुधारवाद कहकर इसकी आलोचना की जा रही है. लेकिन, ज़रा विचार कीजिए. किस बात को अतिवादी कहा जा रहा है? कि हम उन देशों के बराबर उठ सकें, जिनसे हमारी तुलना होती है. उन तमाम देशों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा किसी न किसी रूप में है. उनमें से कई देश मुफ़्त उच्च शिक्षा देते हैं - फिनलैंड, जर्मनी जैसे देश तो राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. यही नहीं, हमारे दक्षिण में तुलनात्मक ग़रीब देश मेक्सिको तक उच्च गुणवत्ता की उच्च शिक्षा मुफ़्त देता है. तो, बाक़ी दुनिया के मानकों तक उठने को अमेरिकियों के लिए अतिवाद कहा जा रहा है. यह हैरतअंगेज़ टिप्पणी है. मैं कहता हूं, कि यह अमेरिका के किसी जानी दुश्मन द्वारा की जाने वाली आलोचना है.
इस पूरे परिदृश्य का वामपंथ यह है, जो आपको बताता है कि हमारे पास वास्तव में गंभीर समस्याएं हैं. सिर्फ़ ट्रंप ही नहीं. बल्कि उन्होंने स्थितियां और खराब कर दी हैं. मसलन, मैंने वेंटिलेटर संकट के बारे में पहले भी समझाया है. यह समझना चाहिए कि विषम स्थितियों से निपटना सरकार का काम है लेकिन इन स्थितियों में सरकार को बेअसर करने वाले पूंजीवादी तर्क पर व्यवस्था आधारित है, जिसके कारण समस्याएं बेहद गहरा गयी हैं. ट्रंप की अपेक्षा ये समस्याएं काफी गहरी हैं. हमें, इन तथ्यों का सामना करना पड़ेगा. कुछ करते हैं. मुझे ठीक याद नहीं, लेकिन शायद आपने जनवरी में इस बारे में 'क़यामत के दिन' थीम पर रिपोर्टिंग की थी. है ना?
एमी गुडमैन : जी हां.
नो'म चॉम्स्की : देखिए हुआ क्या. ट्रंप के कार्यकाल के दौरान 'डूम्स डे घड़ी' में मिनट का कांटा आधी रात के पास तक खिसका. समापन अपने अंतिम चरण की स्थिति में दिखा. इस जनवरी में इसमें और इज़ाफ़ा हुआ. विश्लेषणों ने मिनट के बाद सेकंड्स की तरफ रुख किया: आधी रात से सिर्फ़ 100 सेकंड दूर, और यह सब ट्रंप का कमाल है!
और तो और, आदमख़ोर साबित हो चुकी रिपब्लिकन पार्टी तो अब एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर काबिलियत तक खो चुकी है. बेहयाई की इन्तहा ये है कि इसमें कोई ग़ैरत तक नहीं बची है. यह सब देखना वाक़िई ताज्जुब की बात है. ट्रंप ने खुद के आसपास चाटुकारों का ऐसा घेरा बना लिया है, जो सिर्फ़ उनकी कही बात को जपते रहते हैं. लोकतंत्र पर इससे बड़ा वास्तविक हमला क्या होगा, बल्कि मानवता के अस्तित्व पर हमला? यह सब देखना आश्चर्यजनक है...
आंदोलन लगातार जारी रहें, तो कामयाब होते हैं
हालिया कुछ घटनाक्रमों में आंदोलनकारियों ने सत्ता पर दबाव बनाया और इन लोगों पर साख बचाने का संकट देखा गया. हमने कुछ विचारणीय उदाहरण देखे. उदाहरण के लिए ग्रीन न्यू डील. मानवता की उत्तरजीविता (सर्वाइवल) के लिए ग्रीन न्यू डील के कुछ प्रारूप ज़रूरी हैं. दो साल पहले तक, इसे सिरे से ख़ारिज किया जाता था और, अब यह सामान्य एजेंडा का हिस्सा है. क्यों? आंदोलन की लगातार सक्रियता. ख़ास तौर से नौजवानों के समूह सनराइज़ आंदोलन की भूमिका महत्वपूर्ण रही, जो कांग्रेशनल दफ़्तरों तक पहुंच बना सके. इन्हें एलेग्ज़ेंड्रिया ओकैज़ियो-कॉरटेज़ जैसी विधायी हस्तियों का सहयोग मिला, जो सैंडर्स प्रेरित लहर से प्रभावित थे - यह सैंडर्स की एक और बड़ी कामयाबी रही. मैसैचुसेट्स के सीनेटर एड मर्की ने भी सहयोग किया. अब यह डील विधायी एजेंडे का हिस्सा है. अब अगला क़दम होना चाहिए कि इसे किसी व्यवहार्य रूप में बल मिले, और इसके लिए सार्थक विचार हैं भी. बहराहल, इस तरह से बदलाव मुमकिन है.
Green New Deal Movement. (Image : Green Economy Coalition)
बिडेन राष्ट्रपति बनते हैं तो, भले ही बेहद दयालु प्रशासन न हो, लेकिन कम से कम दबाव बनाने की गुंजाइश होगी. और यह बहुत महत्वपूर्ण है. समाज में संस्थागत बदलावों के संदर्भ में कामगार लोगों की कोशिशों को लेकर अध्ययन करने वाले मार्के के श्रम इतिहासकार एरिक लूमिस ने एक दिलचस्प बिंदु प्रस्तुत किया था; ये कोशिशें तब कामयाब हुईं, जब प्रशासन दयालु था और तब नहीं, जब नहीं था. यह बड़ा मुद्दा है - यह बहुत बड़ा अंतर है मनोरोगी (सोसिओपैथ) ट्रंप और बिडेन के बीच, जिन पर आप येन केन प्रकारेण दबाव बना सकते हैं. वास्तव में, मानव इतिहास में यह चुनाव सबसे महत्वपूर्ण होने जा रहा है. ट्रंप के और चार साल, और हम भारी संकट में होंगे.
एमी गुडमैन : संयुक्त राज्य अमेरिका, दुनिया का सबसे अमीर देश, कैसे वैश्विक महामारी का केंद्र बन गया?
नो'म चॉम्स्की : कई देशों ने कई तरह से क़दम उठाये, किसी ने अधिक सफलतापूर्वक तो किसी ने कम. इस लिस्ट में जो सबसे नीचे के पायदान पर रहे, उनमें हम हैं. बड़े देशों में संयुक्त राज्य इकलौता है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन को आंकड़े तक मुहैया नहीं करवा सका क्योंकि यहां अकर्मण्यता है.
'स्वास्थ्य सुरक्षा सिस्टम के साथ खिलवाड़'
इसका एक बैकग्राउंड है. यहां का लज्जाजनक और घोटालेबाज़ स्वास्थ्य सुरक्षा सिस्टम, जो सामान्य से ज़रा भी अलग किसी परिस्थिति के लिए तैयार नहीं है. यानी यह किसी काम का है ही नहीं. यह वॉशिंग्टन के कुछ अजीब से गुंडों बदमाशों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया है, जिन्होंने इसे बद से बदतर करने की हर मुमकिन करतूत की है. ट्रंप ने अपने पिछले चार साल के कार्यकाल में व्यवस्थित ढंग से, सरकार के स्वास्थ्य संबंधी हर पहलू को कमज़ोर किया है. पेंटागन (अमेरिकी रक्षा विभाग का मुख्यालय) बढ़ रहा है, दीवारों के निर्माण बढ़ रहे हैं लेकिन स्वास्थ्य जैसा हर वो पहलू, जो सामान्य आबादी के लाभ से जुड़ा है, उसका स्तर नीचे गिर रहा है.
उदाहरण के तौर पर, अक्टूबर में ट्रंप ने एक संयुक्त राज्य प्रोजेक्ट को पूरी तरह रद्द कर दिया, कहा गया था - यह प्रोजेक्ट चीन समेत तीसरी दुनिया में काम कर रहा था और जिनमें महामारी की आशंका है, ऐसे वायरसों को चिह्नित करने की कोशिश कर रहा था. हक़ीक़त तो यह है कि इस तरह के अंदाज़े तबसे लग रहे थे - जबसे 2003 में सार्स महामारी फैली थी.
अब अगर हम चाहते हैं कि नयी महामारियों से बचें, जो इससे भी ज़्यादा गंभीर हो सकती हैं क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा तो पंख फैला ही रहा है, हमें जड़ को देखना होगा. और, लगातार उस पर विचार करना होगा. वैश्विक महामारियों की आशंका वैज्ञानिकों ने सालों से जता दी थी. सार्स काफी गंभीर था. हालांकि, उस पर किसी तरह काबू पाया गया था और वैक्सीन के विकास के काम की शुरूआत थी, लेकिन यह काम कभी जांच के स्तर पर नहीं पहुंचा. उस वक्त भी यह तय था कि कुछ और होने वाला है, कई महामारियां आने वाली हैं.
नवउदारवाद से ग्रस्त हैं सरकारें
लेकिन इतना जान लेना ही काफी नहीं है. किसी को इस दिशा में कारगर क़दम भी उठाने चाहिए. किसे? बेशक़, दवा कंपनियों को स्वाभाविक तौर पर इस दिशा में काम करना चाहिए था लेकिन उन्होंने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ली. इन कंपनियों के पास एक पूंजीवादी तर्क है : बाज़ार को समझो और एक आशंकित या मनगढ़ंत त्रासदी के लिए तैयारी में कोई लाभ नहीं है. इसलिए इन कंपनियों का रुझान ऐसे टीकों या दवाओं की तरफ रहा ही नहीं.
(Image : GadoCartoons)
यहां से, सरकार की एक और ज़िम्मेदारी बनती है, लेकिन सरकार दख़ल नहीं दे सकती. उम्र का तकाज़ा है कि मुझे याद है कि कैसे सरकार की एक पहल और फंडेड प्रोजेक्ट की मदद से पोलियो के आतंक के ख़िलाफ लड़ाई में आख़िरकार सल्क वैक्सीन तक बात पहुंची, जिसे मुफ़्त रखा गया, कोई इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी अधिकार नहीं. डॉ. जॉनस सल्क ने कहा था कि इसे धूप की तरह मुफ़्त होना चाहिए. तो ऐसे पोलिया का आतंक ख़त्म हुआ, चेचक और दूसरे कहर भी ख़त्म हुए. लेकिन आधुनिक समय में सरकारें नवउदारवाद के रोग से ग्रस्त हैं. क्या आपको रॉनाल्ड रीगन की वह हंसी और वह छोटा सा सूत्र याद है कि कैसे सरकार समस्या है, हल नहीं.
इस समय न्यूयॉर्क और दूसरी जगहों पर डॉक्टर और नर्स यह दुखद फ़ैसला लेने पर मजबूर हैं कि किसे मरने दिया जाये - यह कोई सुखद फ़ैसला नहीं है - ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके पास ज़रूरी उपकरण नहीं हैं. ख़ास तौर से, वेंटिलेटरों की तो भारी कमी है. ओबामा प्रशासन ने हालांकि, इस स्थिति की तैयारी के लिए कोशिशें की थीं. कैसे कोशिश नाकाम हुई और त्रासदी की भूमिका रची गयी. उन्होंने एक छोटी कंपनी से संपर्क किया था, जो अच्छी क्वालिटी के कम कीमत के वेंटिलेटर बना रही थी. फिर यह हुआ कि फैंसी, महंगे वेंटिलेटर बनाने वाली एक बड़ी कंपनी कोविडियन ने उसे ख़रीद लिया. माना जा सकता है कि बड़ी कंपनी किसी तरह की प्रतिस्पर्धा नहीं चाहती थी. कुछ ही समय में, यह कंपनी सरकार के पास गयी और कहा कि कम दाम के वेंटिलेेटरों के प्रोजेक्ट का समझौता ख़त्म किया जाये. कारण था कि इसमें ख़ास मुनाफ़ा नहीं है इसलिए ऐसे वेंटिलेटर नहीं बनेंगे.
यही हाल अस्पतालों का है. नवउदारवादी कार्यक्रमों के तहत इन अस्पतालों को होना तो सक्षम चाहिए लेकिन वास्तव में, मुझ सहित कई लोग गवाही दे सकती हैं कि सबसे अच्छे अस्पताल भी मरीज़ को दुख ही देते हैं. इसकी वजह निजी क्षेत्र के हाथों में स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली का लाभ आधारित होना है.
'पूंजीवाद की हिमायत ले डूबेगी'
तो हमारे पास पूंजीवादी तर्कों का एक पूरा गुच्छा है, जो जानलेवा है लेकिन इस पर नियंत्रण हो सकता था, लेकिन, यह अनियंत्रित भी है, सिर्फ़ नवउदारवादी कार्यक्रमों के तहत. जिसका कहना यह है कि निजी क्षेत्र अगर नाकाम भी साबित हो तो भी सरकार दख़ल नहीं दे सकती. तुर्रा यह है कि संयुक्त राज्य में यह सब जैसे आम हो गया है - वॉशिंग्टन में दीर्घाकार समस्याओं को उपजा रही एक दुष्क्रियाशील सरकार का सनक भरा शो हमें देखना पड़ रहा है. ट्रंप के पूर कार्यकाल के दौरान, बल्कि उसके पहले से भी वैश्विक महामारी को लेकर आशंकाएं थीं, लेकिन ट्रंप का जवाब तैयारी की कोई ज़रूरत न होना था. आश्चर्य तो यह है कि वैश्विक महामारी के सच में आ जाने के बाद भी यही जवाब रहा.
जब स्थिति गंभीर हो चुकी थी, तब 10 फरवरी को ट्रंप ने आने वाले साल का बजट जारी किया. एक नज़र इस पर डालें. रोग निवारण केंद्र यानी सीडीसी सहित स्वास्थ्य संबंधी अन्य सरकारी संस्थानों के बजट में कटौती का सिलसिला जारी रखा गया. और किसकी फंडिंग बढ़ाई गई? जीवाश्म ईंधन निर्माता कंपनियों की सब्सिडी लगातार बढ़ायी गयी. मेरा मतलब है कि यह देश, शायद नहीं बल्कि सच में, सोसिओपैथ चला रहे हैं.
नतीजतन, हमने बढ़ती जा रही वैश्विक महामारी से लड़ने की तैयारी तो की नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए और ख़तरे बढ़ाने के क़दम उठाये. संयुक्त राज्य, ट्रंप के प्रशासन में रसातल की दौड़ में आगे निकलने की कोशिशें कर रहा है. मुझे बताने की ज़रूरत नहीं कि कोरोना वायरस से ज़्यादा बड़ा ख़तरा यह है. संयुक्त राज्य में हम किसी तरह यानी भारी कीमत चुकाकर इससे उबरेंगे. लेकिन, ध्रुवीय बर्फ की चादर जो पिघल रही है, उसके अंजाम हम समझ सकते हैं कि कैसे काले समुद्रों का स्तर बढ़ेगा. वॉर्मिंग भी बर्फ़ पिघलाने में मददगार है. विनाश के कारणों में यह एक होगा, अगर हमने कुछ ठोस नहीं किया तो.
यह कोई गुप्त बात नहीं रही. एकदम ताज़ा उदाहरण के तौर पर अमेरिका के सबसे बड़े बैंक जेपी मॉर्गन चेज़ की उस चेतावनी का दो हफ़्ते पहले ही लीक होना है जिसमें कहा गया, 'मानवता के ज़िंदा बने रहने' पर संकट है अगर हमने मौजूदा चाल चलन जारी रखा. ख़ुद जीवाश्म ईंधन उद्योगों के लिए फंडिंग कर रहे बैंक का कहना था कि हम मानवता के अस्तित्व को ख़तरे में डाल रहे हैं. ट्रंप प्रशासन में जिसने भी अपनी आंखें खुली रखी हैं, वो इन बातों को लेकर भली भांति जागरूक है. इस स्थिति के लिए शब्द खोज पाना वाक़िई मुश्किल है.
'ट्रंप हैं हर आपदा के लिए ज़िम्मेदार'
मेरा मतलब है कि यह सब सुविधाजनक हो गया है. ट्रंप अपनी अयोग्यता और नाकामी का दोष मढ़ने के लिए कोई बलि का बकरा ढूंढ़ने के लिए बेक़रार रहते हैं. ताज़ा उदाहरण है विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन पर दोषारोपण. यानी ज़िम्मेदार कोई और ही है. लेकिन तथ्य साफ़ हैं. चीन ने पिछले साल दिसंबर में फ़ौरी तौर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन को सूचना दी थी कि निमोनिया जैसी किसी अज्ञात बीमारी के मरीज़ मिले. 7 जनवरी को चीन ने डब्ल्यूएचओ व दुनिया के वैज्ञानिक समुदाय के सामने ख़ुलासा किया कि चीनी वैज्ञानिकों ने पाया है कि इस बीमारी का स्रोत सार्स वायरस से मिलता जुलता कोरोना वायरस जैसा था. वो दुनिया को सूचना दे रहे थे.
अमेरिकी इंटेलिजेंस इस बारे में जागरूक था. जनवरी और फरवरी में इंटेलिजेंस ने कोशिश की कि व्हाइट हाउस में कोई ध्यान दे कि एक महामारी दस्तक दे रही है लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था. ट्रंप गोल्फ खेलने या शायद अपनी टीवी रेटिंग चेक करने में मसरूफ़ थे. हमें यह भी पता चला कि प्रशासन के नज़दीकी और उच्च पदस्थ अधिकारी पीटर नैवारो ने जनवरी के आख़िरी दिनों में व्हाइट हाउस को सख़्ती से आगाह करते हुए लिखा था कि यह वाक़िई बड़ा ख़तरा है. लेकिन, तब भी कान पर जूं नहीं रेंगी.
एमी गुडमैन : ...क्या आप इन शुरूआती चेतावनियों के बारे में बात करेंगे और कैसे पीपीई यानी सुरक्षात्मक निजी उपकरण और टेस्टिंग महत्वपूर्ण है?
नो'म चॉम्स्की : बजट प्रस्ताव बहुत चौंकाने वाले हैं. 10 फरवरी को जब महामारी फैल चुकी थी, ट्रंप ने सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी घटकों के बजट में कटौती जारी रखी. अस्ल में, एक चालाकी भरी नीति है, मुझे नहीं पता सुनियोजित है या पूर्वाभास आधारित, लेकिन एक पैटर्न है. एक बयान दिया जाता है, अगले दिन उसका उलट बयान आता है और फिर कुछ और ही बयान, यह सच में चालाकी है. यह ट्रंप की निर्दोष बने रहने की चाल है. जो भी होगा, वह कहेंगे कि हमने कह दिया था. आप बेतरतीब तीर चलाये जा रहे हैं, जिनमें से कुछ निशाने पर अपने आप लग भी सकते हैं. और तकनीक यह है कि ट्रंप जो कहते हैं उसकी प्रतिध्वनि जाप के तौर पर फॉक्स और अन्य कुछ चैनल सुनाते रहते हैं. उनका कहना यही होता है कि जो हुआ, सही हुआ, 'देखिए, हमारे राष्ट्रपति कितने ग़ज़ब के हैं, अब तक के सबसे महान राष्ट्रपति, जिन्होंने पहले ही ऐसा होना भांप लिया था, सबूत के तौर पर यह बयान देखिए'.
'सच बोलने का कॉंसेप्ट खो जाएगा?'
यह लगातार झूठ बोलने की भी एक तकनीक है. लेकिन, मेहनती फैक्ट चेकरों की टीम सब कुछ जोड़-घटाने में बराबर मुब्तिला है. मुझे लगता है कि डेटा निकाला गया है कि ट्रंप अब तक 20 हज़ार के आसपास झूठ बोल चुके हैं. और वह सिर्फ़ अपनी हंसी हंस रहे हैं. यह कमाल है. आप लगातार झूठ बोलते जाइए, क्या होगा? सच बोलने का कॉंसेप्ट ही लुप्त हो जाएगा.
एमी गुडमैन : ...आप फॉक्स न्यूज़ सुनते हैं - यह सिर्फ़ एक चैनल नहीं बल्कि ट्रंप के कुछ ख़ास लोगों का समूह है. शायद ये उनके वरिष्ठ सलाहकार रहे हैं. क्या आप ट्रंप को ज़िम्मेदार मानते हैं? क्या आप कहेंगे कि उनके हाथ ख़ून से रंगे हैं?
नो'म चॉम्स्की : इसमें सवाल कैसा! ट्रंप के बेतुके बयानों के गूंजने के चेम्बर के तौर पर फॉक्स न्यूज़ काम कर रहा है. रिपोर्टिंग की टोन देखिए. कोई भी होशमंद और तार्किक व्यक्ति कह सकता है कि 'यह बहुत उलझा हुआ और अनिश्चित दिख रहा है', लेकिन ये लोग पूरे विश्वास से कहते हैं कि सब सही है. इन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि 'प्रिय नेताजी' ने कहा क्या, बस इन्हें उसे बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करना है. शॉन हैनिटी जैसे पत्रकार कह सकते हैं 'दुनिया के इतिहास में यही सबसे बड़ा क़दम है'. लेकिन, अगले दिन ट्रंप का फोन फॉक्स के दफ़्तर में पहुंचेगा और फिर वो जो कहेंगे, वही इन सबके लिए 'आज का सुविचार' हो जाएगा. मर्डोक (मीडिया मुगल कहे जाने वाले रुपर्ट मर्डोक) और ट्रंप मिलकर देश और दुनिया के विनाश की कोशिशों की तरफ़ बढ़ रहे हैं, हमें भूलना नहीं चाहिए कि यह लगातार और पास आता जा रहा वृहत्तर ख़तरा है कि ट्रंप विनाश के रास्ते पर तेज़ रफ़्तार हैं.
'उत्तर से दक्षिण तक जारी है सनक'
ट्रंप को साथ भी हासिल है. दक्षिण की तरफ़, एक और सनकी हस्ती है यानी जेयर बोलसोनारो, जिसने ट्रंप के साथ इस मुक़ाबले में हिस्सा ले रखा है कि इस ग्रह पर सबसे बड़ा अपराधी कौन है. बोलसोनारो ब्राज़ीलियों से कह रहा है कि 'यह कुछ नहीं है. सिर्फ सर्दी है. ब्राज़ीलियों को वायरस का ख़तरा नहीं है, हम उनके लिए इम्यून हैं'. जबकि स्वास्थ्य मंत्री, गर्वनर और दूसरे अधिकारी इसे तरजीह न देकर बता रहे हैं कि 'यह वास्तव में गंभीर है'. ब्राज़ील में हालात डरावने हो रहे हैं. रियो स्थित दयनीय झुग्गी बस्ती में सरकार लोगों के लिए कुछ नहीं करती इसलिए दूसरे लोगों ने समझदारी वाले कुछ प्रतिबंधों की दिशा में कोशिशें शुरू की हैं. किसने? अपराधियों के गैंगों ने! जी हां, जो जनता पर अत्याचार करते रहे हैं, वही स्वास्थ्य के मालनक समझा रहे हैं. देसी आबादी एक तरह से जातिसंहार की कगार पर है, लेकिन बोलसोनारो के माथे पर शिक़न तक नहीं है. दूसरी तरफ, इस पूरे त्रासद घटनाक्रम के बीच वैज्ञानिक शोध चेतावनी दे रहे हैं कि 15 सालों में एमेज़ॉन कार्बन अवशोषक से कार्बन उत्सर्जक बनने जा रहा है. यह ब्राज़ील ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रलयंकर है.
Amazon Forests fire. (Image : FairObserver)
तो उत्तर में एक प्रकांड साम्राज्य है, जो सोसिओपैथ के हाथों में रहकर देश और दुनिया का हर संभव नुक़सान करने पर तुला है और दूसरी तरफ़, दक्षिण का एक प्रकांड साम्राज्य है जो अपने ढंग से यही काम कर रहा है. मैं यह सब नज़दीक से समझ पा रहा हूं क्योंकि मेरी पत्नी वैलेरिया ब्राज़ीली हैं और ब्राज़ील के बारे में मुझे अपडेट रखती हैं. और यह सब देखना एक सदमे जैसा है.
लेकिन, उधर दूसरे कुछ देशों ने समझदारी से क़दम उठाये. चीन से ख़बरों के आते ही चीन के नज़दीकी देशों ताईवान, दक्षिण कोरिया ओर सिंगापुर आदि ने प्रभावी ढंग से बर्ताव किया. कुछ ने तो इस संकट पर पूरा नियंत्रण दिखाया. समय पर और व्यापक लॉकडाउन जैसे क़दमों से न्यूज़ीलैंड ने तो कोरोना वायरस को तक़रीबन पूरी तरह कुचल दिया. इधर, पूरा यूरोप इस आपदा से थर्रा गया लेकिन बेहतर ढंग से संगठित कुछ देशों ने ठीक तरह से काम किया. अमेरिकियों के लिए ट्रंप के उन्मत्त प्रलाप के साथ जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल के शालीन, तथ्यात्मक और नागरिकों को जागरूक करने वाले बयानों की तुलना करना उपयोगी हो सकता है.
एमी गुडमैन : नो'म आप एरिज़ॉना के टक्सन स्थित अपने घर में ही सोशल डिस्टेंसिंग के साथ रह रहे हैं क्योंकि हम सब इस वैश्विक महामारी के दौर में सचेत हैं कि यह सामुदायिक रूप से न फैले, ऐसे में आपको उम्मीद कैसे मिलती है?
नो'म चॉम्स्की : ऐसा है कि मैं एक सख़्त परहेज़ वाला नियम अपनाता हूं क्योंकि मेरी पत्नी वैलेरिया पूरा ख़याल रखती हैं और मैं उनके आदेश का पालन करता हूं. तो हम दोनों आइसोलेशन में हैं. अब मुझे उम्मीद कहां से मिलती है, तो दुनिया में कुछ समूहों के काम और ऊर्जा से. कुछ ऐसे घटनाक्रम हैं, जो वास्तव में, प्रेरणादायी हैं. मिसाल के तौर पर ख़तरनाक हालात में लगातार दिन रात जूझ रहे डॉक्टरों और नर्सों की बात कीजिए, जो ख़ासकर अमेरिका में, बुनियादी ज़रूरतों के अभाव में इस तरह के दर्दनाक फ़ैसले लेने पर मजबूर हैं कि कल किसे मारा जाएगा. फिर भी, वो अपना काम कर रहे हैं. ऐसे लोकप्रिय कामों के अलावा प्रगतिशील अंतर्राष्ट्र बनाने वाले क़दम भी सकारात्मक संकेत हैं.
लेकिन, जब आप ताज़ा इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो ऐसे वक़्त दिखते हैं जब निराशा और हताशा ही थी. 30 के दशक के अंत और 40 के दशक की शुरूआत के समय, यानी मेरे बचपन क समय ऐसा लगता था कि नाज़ीवाद की महामारी निष्ठुर है, एक के बाद एक जीत उसके ही खाते में है. ऐसा लगता था कि इसे रोका नहीं जा सकता. मानव इतिहास में यह सबसे डरावना अध्याय था. ख़ैर, उस वक्त मुझे नहीं पता था कि अमेरिकी रणनीतिकार यह सोच रहे थे कि विश्वयुद्ध के बाद दुनिया अमेरिका नियंत्रित और जर्मन नियंत्रित दो हिस्सों में बंट जाएगी, जिसमें यूरेशिया शामिल होगा. यह भयानक आइडिया था.
बहरहाल, तब भी नागरिक अधिकार आंदोलन, युवा स्वतंत्रता सेनानी जैसे कुछ गंभीर लोग अलाबामा जाकर अश्वेत किसानों को जागरूक कर रहे थे कि भले ही कितना ख़तरा हो, उनकी जान ही क्यों न चली जाये, लेकिन वो अपना वोट ज़रूर दें. यह मिसाल थी कि मनुष्य क्या कर सकते हैं और क्या कर चुके हैं. और आज भी हमें ऐसे कई संकेत मिलते हैं और यही उम्मीद के आधार हैं.
(डेमोक्रेसी नाउ चैनल ने चॉम्स्की के साथ यह लंबी वार्ता की, जो सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हो रही है. चॉम्स्की के इस विमर्श और चिंतन को केवल ट्रंप या अमेरिका के संबंध में नहीं, बल्कि पूंजीवादी सोच वाले तमाम देशों और नेताओं के प्रतीक के तौर पर समझना चाहिए, जो आपको दुनिया के कई हिस्सों में दिखायी दे सकते हैं, यदि आप अपनी आंखें खुली रखें.)
कोरोना संकट
: पूंजीवाद के 'धंधे' का समय और वैश्वीकरण पर प्रश्नचिह्न
आपदा के समय ग़रीबों के लिए सरकारें चंदे मांगा करती हैं, मध्यम वर्ग सहानुभूतिवश चंदे देता है जबकि पूंजीवादी वर्ग सरकारों की मिलीभगत से मुनाफ़े की रणनीतियों में मुब्तिला रहता है. पूंजीवाद के प्रभाव में लोकतंत्र के पीछे एक परजीवी व्यवस्था बनती है, जो पहले ग़रीब, फिर मध्यम वर्ग का ख़ून चूसकर ख़ुद को पोसती है. डैमेज कोलैटरल ही क्यों होता है, बायलैटरल क्यों नहीं? नोवेल कोरोना वायरस (Novel Corona Virus) वैश्विक आपदा के समय पूंजीवाद एक आपदा के रूप में उभर रहा है.
रोम जलने
की आपदा के समय नीरो को अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए लाख कोशिशें करना पड़ी थीं.
अस्ल में, आपदाएं शासकों के लिए बेहद खतरनाक समय साबित होती रही हैं. 'शासकों' शब्द
पर ग़ौर किया जाना चाहिए. यदि लोकतंत्र की इस सदी में आप वाक़ई नेता होते, तो हालात
शायद कुछ और होते, लेकिन लोकतंत्र के लबादे के पीछे जो सच है, वह शासन की मानसिकता
ही है और सत्ता और पूंजीवाद एक-दूसरे के पूरक हैं.
वर्तमान आपदा
इस मुद्दे को आगे ले जाती है: पूंजीवाद आधारित वैश्वीकरण जैविक रूप से इस समय में निराधार
साबित हो रहा है, जबकि लोक स्वास्थ्य की आधारभूत संरचना को लेकर कोई पुख्ता अंतर्राष्ट्रीय
नीति है ही नहीं. साथ ही, विचारणीय यह है कि क्या ऐसी कोई संरचना तब तक संभव नहीं है,
जब तक फार्मा उद्योग और गैर लाभकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच के संघर्ष को जन आंदोलन
का रूप नहीं मिलता!1
वास्तविक
आपदा तो पूंजीवाद है
जन आंदोलनों
का अभाव तो चिंता का विषय है ही, बड़ी चिंता यह है कि लोक तक यह सच विश्वसनीय ढंग से
पहुंचा ही नहीं है कि कोई महामारी, कोई तूफान, कोई भूकंप आदि वास्तविक आपदाएं नहीं
हैं, बल्कि इस दुनिया की सबसे बड़ी आपदा पूंजीवादी व्यवस्था है, जो मनुष्य निर्मित
एवं पोषित है. 2007 में प्रकाशित किताब द शॉक डॉक्टरिन में लेखिका नाओमी क्लीन ने
'डिज़ास्टर कैपिटलिज़्म' का मतलब 'प्राकृतिक हो या मानवनिर्मित, हर आपदा के बाद ज़्यादा
से ज़्यादा निजी स्वार्थों और मुनाफ़े संचित करने की राजनीतिक प्रवृत्ति' के रूप में
समझाया था. 'शॉक डॉक्टरिन' का अर्थ उस राजनीतिक रणनीति से है, जो बड़े पैमाने के संकट
का इस्तेमाल ऐसी नीतियां थोपने में करती है जिससे संभ्रांतों का फायदा और बाकी सब का
घाटा होता है यानी व्यवस्थित ढंग से असमानता की खाई गहरी होती है.
पठनीय ताज़ा
साक्षात्कार में नाओमी ने साफ कहा कि इस दौर में 'डिज़ास्टर कैपिटलिज़्म' दिखने की
शुरूआत हो चुकी है. कोविड 19 के संदर्भ में, डॉनाल्ड ट्रंप ने उद्योगों को राहत के
लिए 700 अरब डॉलर का स्टिम्यूलस पैकेज* प्रस्तावित कर दिया है.2 सिर्फ़ अमेरिका ही
नहीं बल्कि दुनिया के तमाम पूंजीवाद देशों में इस तरह की घोषणाएं सामने आ रही हैं.
गार्जियन की एक रिपोर्ट की मानें तो अर्थव्यवस्थाओं के नाम पर यूरोपीय देशों ने राहत
पैकेज के तौर पर सम्मिलित रूप से 1.6 ट्रिलियन यूरो की राशि की घोषणा मार्च यानी यूरोप
में कोविड 19 के शुरूआती संकट के दौर तक ही कर दी थी. इनमें से ज़्यादातर रकम उद्योगों
के खाते में ही जाएगी.
पूंजीवाद
और सरकारें एक दूसरे की पूरक हैं. 2005 का कैटरीना तूफान रहा हो या 2001 का ट्रेड टावर
हमला, बड़े संकटों के बाद हुआ यही कि बड़े कारोबार पहले से ज़्यादा मज़बूत स्थिति में
देखे गये और संकटों की मार आम लोगों के हिस्से में आयी. नॉवेल कोरोना वायरस के संकट
के समय पूंजीवादी ताकतों और आम लोगों की स्थिति देखने के लिए कुछ बिंदुओं पर ग़ौर करें
:
पूंजीवादी
ताक़तों का खेल
1. विकसित
देशों में स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए सरकारें निजी स्वास्थ्य क्षेत्र से कई तरह
के साधन किराये पर ले रही हैं. यूरोप के एक देश में बिस्तर किराये पर लेने के लिए सरकार
24 लाख यूरो प्रतिदिन तक खर्च कर रही है.
2. संकट से
मची अफ़रातफ़री के बीच लोग ज़रूरी सामान की खरीदारी ज़्यादा कर रहे हैं ताकि अगले कुछ
समय के लिए उनके पास भंडारण हो. इसके चलते, क्रिसमस की तुलना में सुपरमार्केट की बिक्री
33 फीसदी तक बढ़ी है और कई जगह चीज़ों के दाम भी बढ़ा दिये गये हैं.
3. फार्मा
कंपनियों के लिए तो जैसे यह मुनाफ़े का स्वर्णिम समय बन गया है. ट्रंप ने लगातार मलेरिया
की एक दवा की जो वक़ालत की, उसके चलते वो फार्मा कंपनियां भी इस दवा का उत्पादन कर
रही हैं, जो पहले नहीं करती थीं.3
4. ट्रंप
और ट्रंप से जुड़े लोगों के उन फार्मा कंपनियों में निवेश सामने आ रहे हैं, जो प्रचारित
मलेरिया ड्रग का उत्पादन करती रही हैं. चुनाव संबंधी कई आरोपों में दोषी पाये जाने
के बाद जेल में बंद ट्रंप के पूर्व 'फिक्सर' कहे जाने वाले वकील माइकल कोहेन ने एक
स्विस कंपनी नोवार्टिस के साथ कई मिलियन डॉलर की डील की है, जो दुनिया में प्रचारित
मलेरिया ड्रग Hydroxychloroquine की सबसे बड़ी उत्पादक है.4
आम लोगों
के हालात
1. अंतर्राष्ट्रीय
श्रम संगठन की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड 19 वैश्विक महामारी के चलते हुए
लॉकडाउन के कारण दुनिया भर में 2.7 अरब वर्कर्स प्रभावित होंगे. इसी रिपोर्ट के मुताबिक
भारत में 40 करोड़ कामगार गरीबी की गर्त में जा सकते हैं.5
2. विश्व
स्वास्थ्य संगठन ने कोविड 19 के इलाज के लिए खोजी गयी जिस दवा के प्रयोग को लेकर सिफारिश
की थी, उसके बारे में फ्रांस के चिकित्सा विशेषज्ञों ने कहा कि इस दवाई का प्रयोग अफ्रीकी
देशों में किया जाये, जिसे संगठन समेत कई संस्थाओं ने नस्लवादी सोच करार दिया.6
3. निम्न
आय समूह वाले 23 अफ्रीकी देशों में पहले ही विषाणुजनित रोग चेचक या खसरा महामारी के
रूप में फैला हुआ है, जिसके लिए टीकाकरण अभियान ज़ोरों पर है. लेकिन कोविड 19 के संकट
के चलते कई स्वास्थ्य सेवाएं टाल दी गई हैं, जिससे तक़रीबन 8 करोड़ बच्चों को समय पर
टीके नहीं लग सकेंगे. यानी ये देश दो विषाणुओं का खतरा एक साथ झेलने पर मजबूर हैं.7
4. अमेरिका
में अश्वेतों पर कोविड 19 का खतरा ज़्यादा है. क्यों? अश्वेत अमेरिकी पहले ही स्वास्थ्य
समस्याओं से ज़्यादा ग्रस्त हैं, स्वास्थ्य सेवाएं इन्हें कम मिलती हैं और इनकी बड़ी
आबादी अस्थिर रोज़गार में मुब्तिला है.8
5. पिछड़े
और भारत जैसे विकासशील देशों में मास्क, सैनिटाइज़र, टेस्ट किट्स, चिकित्सा उपकरणों,
राशन जैसी ज़रूरी चीज़ों की कालाबाज़ारी या स्टॉक खत्म होने जैसी समस्याएं खबरों में
हफ्तों से बनी हुई हैं. साथ ही, कोरोना वायरस संकट से निपटने के लिए मरीज़ों को कई
तरह की अप्रामाणिक दवाएं दी जा रही हैं, जिनके दुष्परिणाम समय के साथ सामने आएंगे.
कोलैटरल डैमेज
का विरोध
मौजूदा आपदा
और पूंजीवाद के संबंध में मार्क्सिस्ट डॉट कॉम के लेख में कहा गया है कि पूंजीवाद अपनी
संरचना में ही एक विनाशकारी, लाभ संचालित और निर्दयी व्यवस्था है. यह किसी और ढंग से
बर्ताव नहीं कर सकती. बड़े कारोबार त्रासदी से मुनाफ़े निकालते हैं क्योंकि पूंजीवादी
व्यवस्था में लोच नहीं, ज़िद है. अगर व्यापार की दुनिया यह तय करे कि मुनाफ़े से पहले
मानवता को तरजीह दी जाएगी, तो वह ढह जाएगी. ऐसे में, किसी आपदा के समय में सरकार के
लिए पूंजीवाद के बेहतर विकल्पों को चुनना संभव नहीं होता.
सरकारें और
पूंजीवादी व्यवस्था अस्ल में, 'कोलैटरल डैमेज' के सूत्र में अपने अत्याचारों को छुपाने
की कोशिश करता है. किसी त्रासदी में निम्न या वंचित वर्ग के अधिकारों के सवाल जब खड़े
होते हैं तो सिस्टम कुदरती कहर के नाम पर दबाने का एक षड्यंत्र रचता है. इस मानसिकता
और साज़िशी सोच पर प्रश्नचिह्न खड़े करने का समय है और अब यह आवाज़ उठायी जाना चाहिए
कि अगर होगा तो 'बायलैटरल डैमेज', अन्यथा एक वर्ग को बलि का बकरा बनाने नहीं दिया जाएगा.
पूंजीवाद
बनाम समाजवाद
'कोरोना वायरस
: नवउदारवादी भूमण्डलीकरण के दौर की महामारी' शीर्षक लेख से आह्वान पत्रिका में छपे
लेख में कहा गया है कि कोरोना महामारी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि विज्ञान की
चमत्कारिक तरक़्क़ी के बावजूद पूंजीवाद आज समाज की बीमारियों को दूर करने की बजाय नयी
बीमारियों के फैलने की ज़मीन पैदा कर रहा है. ऐसी महामारियों से निपटने के लिए भी पूंजीवाद
को नष्ट करके समाजवादी समाज का निर्माण आज मनुष्यता की ज़रूरत बन गया है.
वैश्विक महामारी
के संदर्भ में, वास्तव में समाजवादी हर बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सामंजस्य की त्वरित
आवश्यकता पर दूसरों का ध्यान ज़रूर ले जाते हैं लेकिन समस्या यह है कि नयी नस्ल विकास
के वामपंथी सिद्धांत और राजनीतिक विमर्श में 'समाजवाद' के विचार की तरफ आये, बजाय इसकी
चिंता करने के प्रगतिशील आंदोलनों को लेकर एक किस्म का अहंमात्रवाद दिखायी देता है.9
पूंजीवाद के बरक़्स समाजवादी व्यवस्था की ज़रूरत की पुरज़ोर वक़ालत 'प्लैनेट ऑफ स्लम्स' और 'सिटी ऑफ क्वार्ट्ज़' जैसी किताबों के लेखक मार्क डेविस ने अपने लेख में की है. मार्क के अनुसार समाजवाद को अगले कदम उठाते हुए स्वास्थ्य सुरक्षा और फार्मा उद्योग को लक्ष्य करते हुए, आर्थिक शक्तियों के लोकतंत्रीकरण और सामाजिक स्वामित्व की वक़ालत करने की बात कही है.10
'समाजवाद'
के मानवीय मूल्यों की ताज़ा कहानी11
एक ट्रांसअटलांटिक क्रूज़ जहाज़ एमएस ब्रेमार 682 यात्रियों को लेकर यूके से कूच करता है. रास्ते में जांच में पता चलता है कि इस जहाज़ पर सवाल पांच यात्री कोरोना वायरस से संक्रमित हैं और कुछ दर्जन अन्य यात्रियों और क्रू सदस्यों में फ्लू जैसे लक्षण हैं. अब होता ये है कि कैरेबियाई रास्त में आ रहे कई बंदरगाहों पर इस जहाज़ को रुकने नहीं दिया जाता और झिड़क दिया जाता है. ब्रितानी सरकार अमेरिका से मदद मांगती है कि ब्रेमार को एक उपयुक्त बंदरगाह दिया जाये. अमेरिका की प्रतिक्रिया एक अज्ञात डर से जूझ रही वाकपटु नेतृत्व की प्रतिक्रिया साबित होती है और समस्या को 'चीनी वायरस' कहकर अमेरिका पल्ला झाड़ लेता है. ब्रितानी सरकार क्यूबा से भी साथ में मदद मांग चुकी होती है और क्यूबा हाथ बढ़ाता है. मानवीय संकटों के समय में पहले भी कई देशों की मदद कर चुका क्यूबा इस जहाज़ को शरण देता है. क्यूबा में जब कोविड 19 के कुल 10 केस होते हैं, ऐसे में यह देश मानवीय आधार पर विलायती मरीज़ों को पनाह ही नहीं, बल्कि इलाज देता है.
Cuba Map. (Image Source : MapHill.Com)
लोकतांत्रिक समाजवादी व्यवस्थाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी, बहुदलीय चुनाव और कार्यक्षेत्र में लोकतांत्रिक मूल्यों आदि को तरजीह दी जाती है, लेकिन अब क्यूबा की स्थिति समाजवादी व्यवस्था के अनुरूप नहीं रह गयी है. यहां की व्यवस्था एकछत्र और निरंकुशता के इल्ज़ाम झेल रही है, लेकिन इतिहास और समाजशास्त्र के जानकारों की मानें तो यहां समाजवाद के कुछ बचे-खुचे निशान कभी कभार दिख जाते हैं. इस वैश्विक महामारी के समय में कुछ मिसालें दिख रही हैं. मसलन, क्यूबा के मेडिकल सिस्टम पर समाजवादी छाप है, जो सभी के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी देता है. दुनिया के 171 देशों में प्रति हज़ार व्यक्ति कितने डॉक्टर हैं; इस सूची में क्यूबा 8 डॉक्टरों के आंकड़े के साथ पहले नंबर पर है. जबकि 2.6 डॉक्टरों के साथ अमेरिका, 1.8 डॉक्टरों के साथ चीन और 4.1 डॉक्टरों के आंकड़े के साथ इटली जैसे देश क्यूबा जैसे गरीब देश से काफी पीछे हैं और कोरोना वायरस के संकट से बुरी तरह हिल चुके हैं. इससे पहले भी समय समय पर क्यूबा ने बचे-खुचे समाजवादी मूल्यों की बानगी प्रस्तुत की है. 2010 के भूकंप के समय हैती, 2014 में इबोला वायरस के समय अफ्रीका और हाल में कोविड 19 आपदा के समय इटली तक में भी क्यूबा ने अपने विशेषज्ञ डॉक्टरों की फोर्स को मदद के लिए भेजा. मानवीय मूल्य क्यूबा के इतिहास में रहे हैं, जो किसी पूंजीवादी देश में सिर्फ़ सपने ही लगेंगे. वैश्विक संकट की घड़ी में क्यूबा तो समाजवादी मूल्यों का उदाहरण नहीं बनता, लेकिन यहां की कुछ घटनाओं से साबित ज़रूर होता है कि समाजवादी व्यवस्था में ही मानवीयता के आदर्श की संभावना ज़्यादा है.
संकट के बाद
की दुनिया
एक वायरस
या यूं कहें कि कुदरत के लिए और कुदरत के द्वारा सामने आये कुदरत के इस 'एंटी वायरस'
ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं की कमज़ोरियों को पूरी तरह उजागर कर दिया है. वैश्वीकरण
के औचित्य पर सवाल खड़ा कर दिया है और आने वाले ख़तरों के लिए हमारी तैयारियों की पोल
खोलकर रख दी है. यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर मैरियाना मैज़्ज़कैटो
का मानना है कि इस वैश्विक महामारी के बाद पूंजीवादी समाज की तमाम खामियां सामने आएंगी
इसलिए दुनिया भर में आर्थिक ढांचों पर नयी रोशनी पड़ेगी. साथ ही, अस्थिर अर्थव्यवस्था
और असंगठित कामगारों के अधिकारों की तरफ देखने के नज़रिये में भी बदलाव आएगा.12
'वर्तमान
संकट के समय में यह सच होता दिख रहा है कि हम एक-दूसरे के साथ उससे भी ज़्यादा अंतर्संबंधित
हो गये हैं, जितने जुड़ाव का विश्वास हमारी क्रूर आर्थिक व्यवस्था को था.'- नाओमी क्लीन,
लेखक
अंतत: इस
सकारात्मकता के लिए दुआ की जानी चाहिए और उम्मीद की जाना चाहिए कि समाजवादी और प्रगतिशील
विचार के समूह एकजुट होकर किसी ऐसे बदलाव की दिशा में प्रवृत्त होंगे, जो जन आंदोलनों
की नींव पर प्रकृति और मानवता के हित में एक व्यवस्था खड़ी करने का पक्षधर है.