बुधवार, अक्टूबर 11, 2017

नज़्म

भवेश दिलशाद की नज़्मों पर साहित्यिकों का संवाद


हाल में, एक चर्चित वॉट्सएप समूह "साहित्य की बात" पर भवेश दिलशाद की नज़्मों पर विमर्श का आयोजन किया गया। नज़्मों के साथ ही, विमर्श के दौरान प्राप्त हुईं चुनिंदा टिप्पणियां यहां प्रस्तुत हैं।


1 - वादा

ये नहीं है ख़बर ये इक अफ़वाह है
फिर भी होगा यही कि हवा देंगे सब।

चर्चे हो जाएंगे क़िस्से बन जाएंगे
लोग रह-रहके फिर इसको दुहराएंगे
होगी ये दास्तां देखना बाद में
सच समझ लेंगे सब धुंधली सी याद में
झूठ हो जाये सच ये दुआ देंगे सब।

झूठ है ये हमें आज विश्वास है
कल कहेगा कि ये सच्चा इतिहास है
हमने-तुमने पढ़ी हैं किताबें कई
हमको मालूम है ये हक़ीक़त बुरी
ये कि सच के निशां तक नहीं दिखते हैं
क्या कलाबाज़ हैं कैसे क्या लिखते हैं

अपने वक़्तों का सच हम संभालें चलो
मैं भी वादा करूं तुम भी वादा करो
तुम न छोड़ोगी लिखना कभी डायरी
मैं भी करता रहूंगा सही शायरी...

2 - एक औरत की मौत

तुम्हारे हाथों रोज़
मैं थोड़ा-थोड़ा मर रही हूं
पूरी तरह मर जाने का
इंतज़ार कर रही हूं.

इक रोज़ तुम्हारे हाथों
मैं पूरी तरह मर जाऊंगी.

हवस के लमहों में तुम
बदन के नशे में होकर गुम
अपनी जीभ से, मेरी
जांघों को जब चाट रहे होगे,
अपने दांत गड़ाकर, जब
मेरी छाती को काट रहे होगे
या जब ख़ाली होकर
चूर-चूर निढाल हो जाओगे,
मेरे ऊपर से गिरकर
बिस्तर पे इक तरफ सो जाओगे...

तकिये के नीचे से निकालकर
तुम्हारे सीने में उतार दूंगी
पूरी मर जाऊंगी जिस दिन
तुम्हें ख़ंजर से मार दूंगी.

नीम बेहोशी में अपनी
हैरानी की मौत मरोगे
तुम्हारे हाथों मर गयी मैं
तब सोचकर क्या करोगे?

3 - आवाज़

इस पथरीले शहर को याद है?

इक अरसा पहले की बात है
कुछ हसीन लोग आये थे
इस शहर की सरज़मीं पर
पेशे से वो लोग इंसान थे
और फ़ितरत से कुछ फ़नकार
अलक़िस्सा कुदरत का शाहकार थे
इस पथरीले शहर को याद है?

इस शहर में उन लोगों ने
पथरीली घाटियों, वादियों के बीच
पथरीले दरियाओं, सहराओं के बीच
बहुत और बहुत दिलचस्प बातें की थीं
बसर यहां कई शामें रातें की थीं
इस पथरीले शहर को याद है?

उन हसीन लोगों की आवाज़
आवाज़, जो टकरायी थी पत्थरों से
कुछ पत्थरों में ही हो गयी थी जज़्ब,
ग्रैविटेशनल फोर्स की वजह से
बचा-खुचा हिस्सा आवाज़ का
जा गिरा था कंकरों, धेलों पर
वो हसीन लोग तो कर गये कूच, मगर
इस शहर को अब भी याद है
वो आवाज़ और
उस आवाज़ के जो ज़रीये थे, वो अल्फ़ाज़...

इस पथरीले शहर में आजकल
सन्नाटों में गूंजती हैं आवाज़ें
बोलते हैं पत्थर
सुनते भी हैं पत्थर
बोलने-सुनने के दौरान लेकिन
आवाज़ में शिगाफ़ दिखते हैं
समाअत में पत्थर पड़े नज़र आते हैं
पत्थर सिफ़अत रखते हैं गूंज की
मगर मोहताज हैं अक़्ल के
पत्थर लड़ते नहीं, झगड़ते नहीं
सिर्फ़ दाद देते हैं, वाह करते हैं
किसी भी बात पर बहस में उलझते नहीं

क्यूंकि पत्थर आवाज़ को समझते नहीं
पत्थर सिर्फ़ बोलते हैं
और पत्थर सिर्फ़ सुनते हैं.

4 - औरत

माथे पे लिखी मेरी रुसवाई नहीं जाती...

जब भूख लगी तब मैं, या प्यास लगी जब तब
मैं हाथ लगी अक्सर, बस मांस लगी जब-तब
बाक़ी किसी लमहे में, मैं पायी नहीं जाती...

या पेट के नीचे मैं या पेट के ठीक ऊपर
हस्ती है मेरी इतनी मैं वो हूं जो हूं बाहर
मैं पूरी की पूरी तो अपनायी नहीं जाती...

लहंगा कभी चुनरी हूं, मुजरा कभी ठुमरी हूं
गीतों में या ग़ज़लों में, बस हुस्न सी उतरी हूं
क्यूं शब्द में मेरी सब सच्चाई नहीं जाती...

ज्ञानी है रिषी भी वो औतार वही अक्सर
है मर्द ही सूफ़ी भी, है मर्द ही पैगंबर
विश्वास के क़िस्सों में, मैं लायी नहीं जाती.

5 - उस दिन

ऐसा होता तो नहीं अक्सर
ऐसा होगा मगर एक दिन
हक ज़ुबान पर होगा यही सवाल-
आख़िर ऐसा हो कैसे गया?

उस दिन भी होगा यही यक़ीनन
वही, जो हुआ करता है अक्सर
पकड़ने-फाड़ने को ढूंढ़ेंगे हम
किसी और का ही गिरेबान.

भवेश दिलशाद

कुछ शब्दार्थ :

नीम बेहोशी - लगभग निश्चेतावस्था, शाहकार - सर्वोत्कृष्ट रचना, शिगाफ़ - दरार/क्रैक, समाअत - श्रवण शक्ति, सिफ़अत - गुणविशेष
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भवेश दिलशाद की नज़्मों पर व्यक्तव्य


साधारणतया किसी विषय पर लिखी गयी लयबद्ध , लम्बी कविता को नज़्म कहते हैं।नज़्म घटना एवं विवरण प्रधानकाव्य है।इसके अंतर्गत भावों को श्रृंखलाबद्ध प्रक्रिया से व्यक्त किया जाता है।यह गीत और ग़ज़ल की दरमियानी कड़ी है।नज़्म का आधार अनुभव है गीत की तरह केवल चेतना ,या ग़ज़ल की तरह भाव और कल्पना नही।वह ज़िन्दगी के हर पहलू को छूती है।इस प्रक्रिया में हर नई घटना से अनुभव प्राप्त करने का नाम ही "नज़्म " है। आधुनिक उर्दू नज़्म की शुरुआत इकबाल से मानी जाती है जिसे प्रगतिवादी नज़्मगो शायरों ने आगे बढ़ाया और आज के समय में भवेश दिलशाद जी जैसे शायर इसका बखूबी निर्वाह कर रहे है।

भवेश जी की नज़्में समय के साथ बहते हुए इसकी नब्ज़ पर कुशलता से हाथ रखती हैं। मुझे भी पहली बार इन नज़्मों को पढ़ने का मौक़ा मिला है लेकिन यक़ीनन आला दर्जे की नज़्में हैं ।ये नज़्में किसी भी उम्दा शायर की शाहकार से कम नही हैं। पहली नज़्म की वक़्त पर बड़ी पैनी नज़र है। आज क्या हो रहा है किस तरह इतिहास को बदला जा रहा है ,हक़ीक़त को दबाया जा रहा है यह किसी से छुपा हुआ नही है। आज जो कुछ लिखा जा रहा है कल उसे ही सच माना जायगा। बहुत बेहतरीन नज़्म।

औरतों लिखी गयी नज़्म "एक औरत की मौत" और "औरत " की बात की जाय तो बह्र की बंदिश में इतनी उम्दा नज़्म लिखना काफी दुश्वार होता है लेकिन भवेश जी ने न केवल उनका बखूबी निर्वाह किया है बल्कि भाव भी खूब उभर कर सामने आये हैं। एक एक मिसरा दाद देने के क़ाबिल है। औरत नज़्म में एक पुरुष होते हुए भी उन्होंने जिस तरह से औरतों की दुखती रग प् हाथ रखा है वो उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।उर्दू में एक बात बहुत दावे से कही जाती है कि एक अच्छा इंसान ही अच्छा शायर हो सकता है और इस कथ्य को ये नज़्मे पुख्ता करती हैं। 

बात "आवाज़ " की जाए तो पत्थर को बिम्ब बना कर आज हम जैसे मुर्दा लोगों को निशाने पर लिया गया है जो पत्थर बन गए हैं और पत्थर की खूबियां अपनाते हुए सही गलत उचित उनुचित का भेद भूल गए हैं विरोध भूल गए हैं बस दाद दिए जाते हैं ।पत्थर हम इसीलिए हैं कि पत्थर सिर्फ सुनते हैं उलझते नही हैं।

आज की नज़्मों के ज़रिए शायर ने समाज के हर पहलू को टटोला है उसे लफ़्ज़ों में पिरोया और फिर हमारे सामने पेश किया गया ताकि हम सभ्य कहे जाने वाले लोग खुद का आंकलन करें और निश्चित रूप से करेंगे इससे बढ़ कर एक शायर की अपने समाज के प्रति और क्या जिम्मेदारी हो सकती है।
- गज़ाला तबस्सुम, कोलकाता


हमेशा कहता हूँ, लिखते हुए जब हम अपने समय के साथ न्याय करते हैं तब भले अपनी बात कहते हैं पर वह होती है एक आवामी आवाज़। भवेश भइया की नज़र समय पर है और टिकी हुई है। नज़्मों में बहुत गहराई से आपने हमारी बातें कही हैं। यह आपका अकेले का अनुभव नहीं है। 

पहली नज़्म गहराई लिए बहुत राजनैतिक नज़्म है। इधर की सियासत ने ऐसा रंग बदला है कि इस बदले रंग को हम पहचान ही नहीं पा रहे। टुच्चे वादे जो देखने में बहुत विशाल लगते हैं जो कभी पूरे नहीं होने हैं को केंद्र बना कर पूरी सियासत कर दी गई। ज़ुमला मैन ने जुमलेवाज़ी कर के तख्त हासिल कर लिया यही अब हम दुआएँ कर रहे हैं कि या तो मेरे एकाउंट में 15 लाख रुपए आ जाएं (अच्छा है कि अभी तक बैंक में मेरा एकाउंट नहीं है नहीं तो मैं तो ऐसे ही 1500000₹ सोच सोच के मर जाता। हर्ट अटैक 💔आ जाता मुझे तो।)या यह सब झूठा सावित हो जाए। ऐसा हो जाए मानो एक बुरा सपना था यह सब।

आख़िरी पंक्ति भी देखिए कि तुम न छोड़ोगी लिखना कभी डायरी/ मैं भी करता रहूंगा सही शायरी/ डायरी मैं अच्छे दिनों की दोपहर की नींद का सपना मानता हूँ और सही शायरी को प्रतिरोध का साहित्य मानता हूँ। 

प्रेम कविता के रूप में देखें तब भी बात बहुत गहरी है।

तीसरी नज़्म भी पहली नज़्म को आगे बढाती पर अलग अंदाज की नज़्म है। यहाँ प्रेम के बिम्ब ज़रा जोरदार हैं लेकिन है सियासी नज़्म ही। आखिरी पंक्तियाँ देखिए कि पत्थर सिर्फ बोलते हैं/पत्थर सिर्फ सुनते हैं/ से हम की बात याद आ रही है। एक आदमी बोलता है रेडियो पर और शेष पत्थर सुनते हैं। 

आखिरी नज़्म गिरेबान पर आ कर समाप्त होती है। यह अनायास नहीं है; क्रोध, छोभ, दुख, विषाद इतना है कि हम हमेशा एक पंचिंग बैग ढूंढ रहे हैं। इस कदर छले गए हैं और उसका इतना फ्रस्टेशन है कि फ्रस्टेशन रिलीज करने के लिए कोई न कोई पंचिंग बैग चाहिए ही चाहिए। यह मानवीय गुण है और हमारे मस्तिष्क के गहरे में बैठा हुआ है। हम अपनी हार किसी के मत्थे मढ़ के ज़रा सुकून चाहते हैं। यही सुकून नहीं मिल रहा तो एक ग्रन्थि विकसित हो रही है जो फटने को आतुर है। यदि हमनें मूल प्रश्न का हल नहीं ढूंढा कि ऐसा कैसे हो गया? एक समाजविरोधी, जीवन विरोधी, प्रेम विरोधी मनुष्य ने पूरे परिदृश्य को कैसे छल गया और हम देखते रह गए। एक मसीहा हमेशा खुद को बहुत ग्लोरिफाइड तरीके से खुद को प्रस्तुत करता है। महिमामंडन की इस प्रक्रिया में वह अपना पूरा तंत्र झोंक देता है, तंत्र में शामिल लोग मुफ्त में क्यों साथ देंगे, बाद में बंदरबांट होता है। 

यह पूरी प्रक्रिया इतनी बोझिल और जटिल है कि घिन आ जाती है इससे। हम जानते सब हैं पर अक्सर आंखें मूंदे रहते हैं। 

ऐसा ही हो रहा है कि हम आंखें मूंदे हैं पर एक दिन आंखें खुलेंगी और जब हम एक दूसरे से पूछेंगे कि आख़िर ऐसा कैसे हो गया? तब हमें कुछ करने की ज़रूरत महसूस होगी। यदि हम यह सवाल खुद से पूछेंगे तब निश्चित ही गिरेवान पकड़ लेंगे। तब गिरेबान किसी और का नहीं, खुद का गिरेबान पकड़ेंगे-फड़ेंगे।
- शांडिल्य सौरभ, गया


भवेश जी की रचनाओं से गुजरने का सौभाग्य मिला। इस से पहले उनकी कुछ गज़लों से दो- चार हुआ था। अबकी रचनाओं में एक अजीब सी बेचैनी लगी। आक्रोश भरी बेचैनी , सब कुछ उलट पुलट कर के रख देने की बेचैनी, जो जैसा है उसे बगैर मुलम्मा चढ़ाए परोस देने की बेचैनी। 

इस बार उनके लिखे सच को वो कोई जामा नहीं पहना रहे हैं बल्कि पहले से कड़वे सच को नीम के काढ़े में डुबो कर पेश करने की ज़िद पाल ली है जैसे। इस बारी सच सहलाता नहीं है, किसी चाबुक किसी कोड़े सा सटाक से पड़ता है और आत्मा पर पड़ी बेशर्मी की खाल को खींच लेता है अपने वार से। औरत के दोनों वर्शन में आपके इस रौद्र रूप के दर्शन होते हैं । एक नए भवेश अपने कोकून से बाहर आते हैं। इन दो रचनाओं को इंटेंसिटी पाठक पर इस कदर हावी हो जाती है कि शेष कविताओं पर अव्वल तो ध्यान नहीं जाता और अगर जाता है तो कुछ कहने का मन नहीं होता। बिल्कुल वैसे ही जैसे घर में कोई बड़ा मसला हो जाये तो छोटे छोटे मसले खुद ब खुद चुप्पी धर लेते हैं।

भवेश जी को अनन्त शुभकामनाएं।
- संतोष तिवारी, खंडवा


भवेश जी समकालीनों में मेरे प्रिय शायरों में से एक है.. रेख्ता और कविता कोश गवाह है आपकी प्रतिबद्धता का..  सबसे ख़ास बात तो सहज आकर्षित कर जाती है पाठक को, वो है इनका दार्शनिक ह्रदय जो हर पंक्ति में इन्होने बड़े मनोयोग से उड़ेला है.. 

भवेश जी के लेखन की ambiguity से मैं बेहद प्रभावित हूँ..  ये बेहद सकारात्मक मायने में है, dubious किसी भी सूरत में नहीं.. मानव चेतना की व्याख्या सादृश्य होती है..  इनकी नज्में राजनीतिक भी और प्रेम की भी.. पाठक अपनी व्याख्या कर सकता है और ये दोनों ही प्रकार की या इनके सम्मिश्रित रूप की व्याख्याओं पर अंत तक खरी भी उतरती हैं.. 

अपने वक्तों का सच हम सम्भालें चलो
मैं भी वादा करूं तुम भी वादा करो
तुम न छोडोगी लिखना कभी डायरी
मैं भी करता रहूँगा सही शायरी

डायरी से एन फ्रेंक की डायरी की याद आती है.. जिसमें निजी और राजनीतिक दोनों परिदृश्य मिश्रित है..  सभी को अपने वक्त को सम्भाल कर चलना ही चाहिए, सब अपने युग के साक्षी रहे हैं और उनसे बेहतर इसे कोई और नहीं बयान कर सकता..

एक औरत की मौत नज्म में जो प्रतिरोध का स्वर उभरा है वो वाकई अलहदा है.. 

पूरी मर जाऊँगी जिस दिन
तुम्हें खंजर से मार दूँगी

स्त्री मन की सहनशक्ति पार कर जाती है और retaliate करती है तो उसका पैशन हतप्रभ करने वाला होता है..!!

पत्थर सिफ़अत रखते हैं गूंज की
मगर मोहताज हैं अक्ल के

औरत नज़्म में हकीकत बयां बडी ईमानदारी से की गयी है.. 
-मैं पूरी की पूरी तो अपनायी नहीं जाती
-क्यूं शब्द में मेरी सब सच्चाई नहीं जाती
-विश्वास के किस्सों में, मैं लायी नहीं जाती

आखिरी नज़्म बेमिसाल है.. 

पकड़ने फाड़ने को ढूंढेंगे हम
किसी और का ही गिरेबान

भवेश जी को हार्दिक शुभकामनाएँ..
- कोमल सोमरवाल, जयपुर


भवेश जी उन चंद लोगों में से हैं जिनका कई विधाओं में हस्तक्षेप है। भाषा पर नियन्त्रण भी हर रचना में सर्वोपरि हो जाता है।  वैसे तो नज़्में ग़ज़लें कविता सभी कठिन ही हैं। फिर भी एक पाठक होने के नाते प्रयास है कि जो समझ सकी वही कह सकूँ।

आज की नज़्में पढ़ने के बाद थे बखूबी समझ में आता है कि कोई भी रचना आपके दिल में कैसे उतर सकती है।
नज़्मों में जो बिंदू उठाए गए हैं उनमें मुख्यतः स्त्री और प्रेम है। किसी रचना का मूल में रस, लय, श्रवणीयता और विषय चयन उसका मुख्य भाग होता है। विषय चयन अनूठापन लिए हो न हो उसकी मौलिकता बरक़रार होनी चाहिए।  इसका जीवन्त उदाहरण आज की नज़्मों में मिलता है। 

पहली नज़्म वादा अशरीरी रिश्ते की उलझनों को उकेरती है। बुजुर्गों ने कहा भी है कि दो विषमलिंगी कभी भी मात्र मित्र नहीं रह सकते। कोई दाग आए न आए समाज उन्हें दाग़दार बना ही देता है। जबकि हक़ीक़त ऐसे रिश्तों की रूहानियत लिए होती है। जिनमें देश दुनिया के तमाम सच और अफसानों के बयानात हैं और है सच लिखने के खूबसूरत वादे। 

दूसरी नज़्म एक औरत की मौत.... एक बेहतरीन नज़्म हो सकती थी। हालाँकि ये पद्य की विधा है तो यहाँ  भावनाओं का संप्रेषण और भी छू सकता था। भवेश जी की रचनाओं पर आलोचकीय होने का मेरा कोई साहस नहीं है। फिर भी इस नज़्म ने छू लिया तो इस पर और भी उम्मीद करना मेरा हक़ है। 

तीसरी नज़्म आवाज़.... इस पथरीले शहर को याद है? हम अपने अपनों को ही याद नहीं रख पाते तमाम वादे किस्से कहानी रस्म रवायतें अब कहाँ मायने रखते हैं। सोशल साइट्स पर हर सुख दुःख में खूब हो हल्ला मचाया और हो गई कर्तव्यों की इतिश्री। सामने से किसी का दुःख बाँटने सुख साझा करने में तो हम बेहिस पत्थर ही हो गए हैं। उन्हें कुछ भी हो जाए हमें क्या की तर्ज पर भावहीन संवेदन हीन जीवन जिए जा रहे हैं एक दिन मर जाने की प्रतीक्षा में। क्योंकि इस पथरीले शहर को नहीं है याद कुछ भी सिवाय अपनी यन्त्रीकृत साँसों के। 

एक शायर होने के नाते साधारण से लगने वाले विषयों को भवेश जी ने बखूबी ढाला है। 
शिखा तिवारी


भवेश जी के लेखन में निरन्तर परिक्वता बनी हुई है, यह बहुत अच्छी बात है।  अपने समय के महत्वपूर्ण शायरों में भवेश जी का नाम शुमार है। शायर के पास कहने को बहुत कुछ है, परिष्कृत दृष्टिकोण है, ज़िंदगी से हासिल फ़लसफ़ा है। इन नज़्मों में ठोस हक़ीक़त है। उम्दा शिल्प तो है ही।

भवेश जी की मेहनत उन्हें बहुत आगे ले जायेगी। हाल फ़िलहाल ही रेख़्ता और कविता कोश पर भी भवेश जी की उम्दा रचनाएँ पढ़ने को मिली। अब एक ग़ज़ल संग्रह की उम्मीद तो हमें शायर बनती ही है, देखें कब पूरी होती है।
- अनिता मंडा, दिल्ली

आलेख

रोज़ ज़िंदा हो जाता है, रोज़ मर जाता है मंटो


लोकतंत्र के दर्शन पर उंगली नहीं उठायी जा सकती लेकिन भारत में व्यावहारिक व्यवस्था के जिस रूप को लोकतंत्र कहा जाता है (संभवतः दुनिया के हर बड़े लोकतांत्रिक देश में), वह एक धोखा है। लोकतंत्र का मूलभूत दर्शन ही है कि बहुमत का तंत्र। भारत की बात करें, तो हम देखते हैं कि यह झूठ है, फरेब है। बहुमत गरीबों, मध्यम वर्ग का है, किसानों, श्रमिकों का है लेकिन तंत्र गिने-चुने पूंजीपतियों के हाथ में है। दिखावे के लिए इस बहुमत के तथाकथित हित की नीतियां बनती हैं लेकिन उनसे फायदा अल्पमत के पक्ष को होता है। इस भूमिका के परिप्रेक्ष्य में आप मंटो के लेखन को इस व्यवस्था के विरोध का बीज निरूपित कर सकते हैं।


मंटो की आवाज़ उन लोगों के पक्ष में थी जो तिरस्कृत थे, बहिष्कृत थे और एक तरह से उस समय के भारत के बहुमत का प्रतिनिधित्व करते थे। मंटो ने अपने अफ़सानों में इस वर्ग की नंगी सच्चाइयों को उघाड़कर रख दिया था। सलमान रश्दी जब मंटो को "लो-लाइफ फिक्शन" का लेखक कहते हैं तो उसका अर्थ यही है कि मंटो भारत के जिस बहुमत का लेखक था, वह लोक एक बहुत मामूली जीवन जी रहा था। इसे गोर्की के दिये शब्द "पीपल ऑफ लोअर डेप्थ" से बेहतर समझा जाना चाहिए। "निचली गहराई" ज़्यादा व्यापक शब्द है और मंटो इस निचली गहराई को अपने अफ़सानों में एक गूढ़ एवं सार्थक तत्व बनाने का काम करता है।

मंटो पर आरोप लगे कि सभ्य समाज की या शालीन कही जाने वाली नारियों की उपेक्षा करते हुए उसने वेश्याओं या उन नारियों को अपने अफ़सानों के केंद्र में रखा जो बलात्कार जैसे घिनौने कृत्यों से पीड़ित हैं। या उन्हें, जो समाज के खिलाफ जाकर एक आज़ादाना रवैया अख़्तियार करती हैं और मर्यादाओं को तोड़ती हैं, यानी आवारा औरतें। यह आरोप छह बार कोर्ट तक पहुंचा भी लेकिन मंटो को कभी दोषी नहीं पाया गया क्योंकि कहीं न कहीं समाज के अवचेतन में इतना तो तय था कि पीड़ित के हक की बात करना उचित है। यह कथ्य एक इन्क़िलाब का सूचक था, जो मंटो के अफ़सानों में आवाज़ पा रहा था। अफ़सोस कि शायद इन्हीं अवधारणाओं को पोसने वाला प्रगतिशील आंदोलन भी तब मंटो को समझ नहीं सका और प्रगतिशील लेखक संघ और मंटो एक-दूसरे के आमने-सामने नज़र आये।

SAADAT HASSAN MANTO. Source - Google (Edited version)

मंटो ने कुछेक मौकों पर प्रगतिशील उर्दू लेखक संघ की खिंचाई भी की। वास्तव में, मंटो व्यक्तिवादी ज़्यादा था और अपने अनुभव के सत्य पर विश्वास करने वाला लेखक, इसलिए उसे अहमवादी भी करार दिया गया। उसके तमाम लेखन में आप विचार या ख़याली करामात के स्थान पर अनुभव की सच्चाइयां पाएंगे। उसके क़िरदार वास्तविक हैं। उसके अफ़सानों में लेखक अपने क़िरदारों से अलग नहीं है। लेखक अपना किसी किस्म का भाव-विचारातिरेक थोपने की कोशिश नहीं कर रहा है। यह लेखन प्रेमचंद के कुछ अफ़सानों के मेयार की याद दिलाता है, जहां लेखक अपने क़िरदार की पीड़ा को महसूस करता है, उससे गुज़रता है और उस पूरे वातावरण को अपने भीतर सोखकर जो आंसू रोता है, जो ख़ून उगलता है, वही अलफ़ाज़ की शक्ल में हम पढ़ते हैं।

अनुभव की इसी लेखकीय यात्रा को मद्देनज़र रखते हुए राजेंद्र यादव, मंटो को बीसवीं सदी का सबसे प्रामाणिक लेखक तक करार देते हैं। राजेंद्र बाबू के शब्दों में मंटो की प्रासंगिकता हर सदी में, हर समय में रहेगी। वह मंटो को साहित्य में स्त्री विमर्श का पहला सूत्र भी निरूपित करते हैं। इस तथ्य में एक कमाल का पेंच यह भी है कि मंटो ही हिन्दुस्तानी साहित्य में संभवतः इकलौता लेखक है जिसने बिना कोई उपन्यास लिखे, सिर्फ कुछ कहानियों के बूते ही स्त्री विमर्श और कई स्तरों पर संवाद एवं विमर्श का माहौल रच दिया। यह बड़ी घटना इसलिए है क्योंकि तब तक ऐसा नहीं हुआ था कि बिना उपन्यास लिखे कोई लेखक बड़ा कथाकार घोषित हो जाये।

मंटो के "कम शब्दों" से लेकर "ज़्यादा पन्नों" वाले अफ़सानों तक एक और विषय कई बार मंटो का केंद्र बिंदु दिखता है और वह है - विभाजन या जिसे सांप्रदायिक चेतना की भावभूमि कहा जा सकता है। 1912 में जन्मा मंटो, 1947 में हुए विभाजन जनित दंगे, क्या इतना ही तारतम्य है मंटो के लेखक के इस केंद्र बिंदु का? मंटो की पूर्वपीठिका में दंगे हैं, बचपन में, नौजवानी में फ़साद हैं और 47 में तो हैं ही। 1893 में गुजरात के सौराष्ट्र में हिंदू-मुस्लिम दंगों का उल्लेख मिलता है जिसमें अस्सी लोग मारे गये थे। यह मंटो की पूर्वपीठिका है। 1929 में "पठानी दंगे" हालांकि शुरुआत में मज़दूर यूनियन के दंगे थे, लेकिन बाद में इनमें सांप्रदायिकता का रंग घुल ही गया। इस फ़साद में 106 लोगों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है और यह नौजवान मंटो की आंखों के सामने हो रहा था। मंटो ने खुद भी लिखा है कि पहली बंबई यात्रा के दौरान यानी 1936 से 41 के बीच वह दो बार हिन्दू-मुस्लिम दंगों का साक्षी रहा। तो, यह सांप्रदायिकता मंटो के जीवन के समानांतर चलती हुई मंटो के लेखन में कहीं "प्रस्थान बिंदु" तो कहीं "ठहराव बिंदु" के रूप में नज़र आती है। एक स्थायी भाव के तौर पर, यह मंटो ही नहीं, बल्कि उनके कई समकालीन लेखकों के रचनाकर्म में समानांतर अविरल धारा के रूप में विद्यमान है।

कुल जमा 42 साल 8 महीने की उम्र जीने वाले, इस कम वक़्त में से कुल 19 बरस लेखन को देने वाले मंटो ने भरपूर ज़िंदगी जी थी। ढेर सारे तजरुबात और सच्चाइयों को देखा था। कुछ शौक पाले थे, कुछ ऐब और कुछ बेढंगे ढब। हल्के-गाढ़े, जलते-बुझते तमाम रंगों से लबरेज़ था मंटो के ज़हनो-दिल का प्याला। इन्हीं रंगों से तस्वीरें बनाता रहा, कैनवास को रंगता रहा मंटो। एक ऐसे मुसव्विर का अंत उतना ही दिलचस्प था, जितना उसका सफ़र। जब लाहौर में 1955 में मंटो आख़िरी सांस ले रहा था, उसकी लिखी फिल्म "मिर्ज़ा ग़ालिब" मुंबई के सिनेमा हॉल में हाउसफुल चल रही थी।

मंटो रोज़ ज़िंदा होता है, रोज़ मर जाता है। कभी मुक्तिबोध की कविता में मंटो का अफ़साना नज़र आता है, कभी मंटो के लफ़्ज़ों के आईने में फ़ैज़ की नज़्म नज़र आने लगती है। कभी शराब के सुर्ख़ प्याले में मंटो की लाल आंखें दिखती हैं, तो कभी सिगरेट के धुएं में मंटो का ग्रे चेहरा बन जाता है। मंटो एक ऐसा लमहा है जो हर रोज़ अब तक गुज़रता है और तब तक गुज़रता रहेगा, जब तक वक़्त मुंजमिद न हो जाएगा। मुहब्बत मंटो, इन्क़िलाब मंटो, ज़िंदाबाद मंटो।

सिनेमा

न्यूटन : वैज्ञानिक नियमों का जीवन दर्शन और कंट्रास्ट


अमित मसूरकर निर्देशित फिल्म न्यूटन पर केंद्रित भवेश दिलशाद लिखित समीक्षात्मक आलेख। इस आलेख को सिनेमा केंद्रित वेबसाइट "फिल्मीकस्बा" एवं साहित्यिक ब्लॉग "रचना प्रवेश" पर प्रकाशित किया गया। आलेख के कुछ महत्वपूर्ण अंश। संबंधित लिंक्स पर जाकर आप पूरा आलेख पढ़ सकते हैं।


यह समय सिनेमा का उद्देश्य निर्धारित करने की कोशिश का समय है। जब न्यूटन जैसी कोई फिल्म आती है तो निश्चित ही हम कह सकते हैं कि एक वर्ग है, जो सिनेमा के माध्यम और उसकी उपादेयता को लेकर न केवल चिंतित है बल्कि उसके बड़े लक्ष्य को लेकर प्रयासरत भी है।...

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कई कोणों से न्यूटन को देखे जाने की ज़रूरत महसूस होती है। सबसे पहले, इसके कथ्य की रेंज को समझना होगा। न्यूटन अपने कथ्य में एकबारगी सपाट दिखती है क्योंकि इसमें कोई चौंकाने वाला दृश्य विधान नहीं है, क्योंकि इसमें पटकथा के लिहाज़ से कोई सनसनीख़ेज़ पेंच नहीं हे और क्योंकि इसका व्यंग्य बहुत सरलता से संप्रेषित होता भी है। फिर भी, इसके कथ्य की रेंज इतनी है कि हम इसे विश्व स्तर का सिनेमा कह सकते हैं।...
न्यूटन का सिने शिल्प उसके कथ्य की गंभीरता या यूं कहें कि कथ्य के मिज़ाज के अनुकूल है। और यही उसकी सार्थकता है। यह ओढ़ा हुआ शिल्प नहीं है या जबरन लादा गया नहीं है। स्वाभाविकता एवं सादगी में ही सौंदर्य की परिभाषा तलाशने के प्रति एक बड़े दर्शक वर्ग को आंदोलित करने वाला कदम कहा जाना चाहिए इसे।....
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इस फिल्म को लेकर एक बहस यह भी है कि यह एक ईरानी फिल्म से प्रेरित है लेकिन चूंकि उस ईरानी फिल्म के निर्देशक खुद इस बात का खंडन करते हुए कह चुके हैं कि न्यूटन एक अलग और सार्थक फिल्म है, तो मान लिया जाना चाहिए कि इस बहस में पड़ने का औचित्य नहीं है।...

सोमवार, अगस्त 21, 2017

समीक्षा

विमर्श नहीं, विचार देतीं कविताएं


समीक्षा - भवेश दिलशाद
कृति - दुर्दिनों की बारिश में
कवि - मणिमोहन मेहता
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इस कृति से पहले मणिमोहन जी के कवि से परिचय सोशल मीडिया के ज़रीये रहा है और गाहेबगाहे उनकी रचनाएं पढ़ता रहा हूं। उनके द्वारा किये गये अनुवाद भी कई स्थानों पर पढ़ने को मिलते रहते हैं। पिछले दिनों सतत साहित्यिक समूह धागा पर उनके द्वारा अनूदित कविताएं भी चर्चाधीन रही थीं लेकिन उस दिन मैं वहां दुर्भाग्यवश उपस्थित नहीं हो सका। उनके अनुवाद से मुताल्लिक कुछ बातें मैं मेहता जी से करना चाहता था, लेकिन ख़ैर फिर कभी सही। यहां इस काव्य संग्रह पर कुछ बातें संक्षेप में करने की चेष्टा करता हूं इस पुनर्निवेदन के साथ कि कविता की इस विधा में मेरा कोई ख़ास दख़ल नहीं है इसलिए बहुत से कथनों को मात्र मेरी जिज्ञासा ही समझा जाये न कि कोई दावा या बयान।

"दुर्दिनों की बारिश में" एक ऐसा कविता संग्रह है जिसकी अधिकतर कविताएं पठनीय हैं और इन अधिकतर में से अधिकतर पाठक को प्रभावित करने की सामर्थ्य भी रखती हैं। ये कविताएं पढ़कर शायद कई पाठकों को महसूस हो सकता है कि यह उनके जीवन की ही वह कोई बात है जो किसी हमाहमी या उथलपुथल में कहने से, सोचने से या महसूस करने से छूट गयी थी। इस स्तर पर ये कविताएं बहुत कामयाब नज़र आयीं मुझे कि संग्रह की लगभग सभी रचनाएं लगभग हर शब्द तक संप्रेषित होती हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि इनमें विचारों या भावों की गहनता न हो या किसी किस्म का सतही साहित्य हो, बल्कि इसका अर्थ यह है कि यह मंझे हुए रचनाकार की रचनाएं हैं जो अनुभवों की गूढ़ता को शब्दों के सारल्य में संप्रेषित कर सकता है।

अपनी कलम का भी / रखना पूरा ध्यान / कोई पूरी विनम्रता के साथ / बदल सकता है उसे / चाकू तलवार या खंजर में... "अपने बच्चों के लिए" शीर्षक कविता में कवि ने स्वयं यह चेतावनी दी है कि कलम को कलम का ही हक़ अदा करना चाहिए। यह पूरा संग्रह पढ़ते हुए कवि की भाषा को एक लेकर अनुभव होता है कि यह अधिकांश स्थानों पर परिष्कृत और एक शिष्ट व्यक्ति की ही भाषा है जिसमें क्रोध, प्रतिरोध, दुख, क्लेश और आर्तनाद सब कुछ व्यक्त हो पा रहा है। इन मनोभावों या विचारों को व्यक्त करने के लिए कवि ने हिंसक भाषा का प्रयोग न के बराबर ही किया है। यह भाषा के स्तर पर कवि की निजता का बोध कराता है। 

डंपिंग ग्राउंड, शिक्षक से, ज्ञानी, शरणार्थी शिविर, नवरात्रि, इतवार और तानाशाह, शायद, प्रेम कविताएं, एक लय... इस संग्रह से ये कुछ शीर्षक मैंने चुने हैं और इन्हें पढ़ने का आग्रह मैं हर पाठक से करना चाहूंगा। ये कविताएं आप हमेशा अपने साथ रख सकते हैं। ये कविताएं इस संग्रह से मेरी पसंदीदा भी हैं। कुछ बातें हैं जो मन में आती हैं इस संग्रह से गुज़रते हुए...

क्या वाकई समकालीन कविता के लिए विमर्श आमंत्रित करने वाला होना आवश्यक है? इस संग्रह की अधिकांश कविताएं पाठक को भाव या विचार स्तर पर आंदोलित करने का गुण रखती हैं बजाय इसके कोई विमर्श छेड़ें, कम से कम कोई नया विमर्श छेड़ने में तो इन कविताओं की कोई रुचि नहीं है।

आजकल की कविताओं के बारे में यह भी एक मान्यता हो चली है या धारणा बन गयी है कि विषय के अनुकूल भाषा का चयन किया जाये। प्रतिरोध या व्यंग्य की भाषा आजकल की कविताओं में बेहद उग्र या हिंसक नज़र आती है लेकिन इस संग्रह में जैसा मैंने पहले उल्लेख किया, ऐसा नहीं है।

इस संग्रह की तमाम कविताएं छंद मुक्त होने के बावजूद लयमुक्त नहीं हैं। ये एक सरस एवं गुनगुनाते हुए कवि की रचनाएं हैं जिनमें कवि अपनी लय तलाश पाता दिखता है और वह लय पाठक के साथ भी तादात्म्य स्थापित करती है। बात यह है कि छंद मुक्त होने के बावजूद कविता की एक लय हो सकती है तो होना चाहिए भी कि नहीं? यह कविता का गुण है या केवल एक लक्षण विशेष मात्र?

चूंकि मणिमोहन भाई अनुवाद कर्म में बेहद सक्रिय रहे हैं और लगातार इसलिए भी उन्होंने विश्व साहित्य का अध्ययन किया है। संभवतः इसी कारण से इस संग्रह को पढ़ते हुए मेरी एक जिज्ञासा रही कि मैं उनकी विश्व दृष्टि को समझ सकूं या उसे कहीं इस संग्रह में रेखांकित कर सकूं लेकिन दो पाठ में मुझे यह हासिल नहीं हुई। इसके लिए मैं इस पुस्तक का एक पाठ कम से कम और करूंगा। फिर भी नहीं समझा तो प्रश्न लेकर उपस्थित हो जाउंगा। फिलहाल, मणि भाई को बधाई और शुभकामनाएं।

समीक्षा

बड़े वितान की कविता है यह

समीक्षा - भवेश दिलशाद

कृति - कांधों लदे तुमुल कोलाहल

कवि - श्री यतींद्रनाथ राही

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दो कथन प्रचलित हैं। पहला, उम्र परिपक्वता की निशानी होती है और साधना का प्रतीक। दूसरी, कि उम्र के साथ कलाकार चुक जाता है और उसके पास कहने के लिए कुछ शेष या सार्थक बचता नहीं है। श्री राही जी के सद्यः प्रकाशित गीत संग्रह "कांधों लदे तुमुल कोलाहल" से गुज़रने के बाद पाठक को महसूस होता है कि उनके संदर्भ में पहला कथन कोटेबल है। 90 बरस की उम्र पार कर चुके राही जी के गीत छंद, शिल्प और व्याकरण की कसौटी पर एक ओर परिपक्व हैं तो दूरी ओर, कथ्य एवं नवप्रयोगों के मामले में उल्लेखनीय भी हैं।

राही जी की कविताई वास्तव में अनुकरणीय रही है। इस संग्रह से पूर्व करीब आधा दर्जन गीत संग्रह और कुल एक दर्जन कृतियां साहित्य जगत को सौंप चुके राही जी को मैं उन रचनाकारों की सूची में रखता हूं जो अपने जीवन में अपने साहित्यिक प्रदेय के उचित मूल्यांकन की बाट जोह रहे हैं। कुछ मंचों से भी कह चुका हूं और इस संदर्भ में यहां भी कहना चाहता हूं कि आलोचना निष्पक्ष नहीं हो रही है, अपने धर्म का पालन नहीं कर रही है। अन्यथा राही जी जैसे श्रेष्ठ कवियों को उचित प्रतिसाद अवश्य मिल चुका होता। वैसे भी गीत या छन्द के सामने सही आलोचना का संकट कई दशकों से रहा है। गीतकारों के एक वर्ग को इस दिशा में सशक्त हस्तक्षेप करना ही होगा और रचना व रचनाकार के उचित मूल्यांकन हेतु युद्धस्तर पर समवेत होना होगा तभी इस संकट से निजात पायी जा सकेगी।

विवेच्य संग्रह का आस्वादन करते हुए एक सुधी पाठक के मन में जो कुछ घट सकता है, उसे बयान करने की कोशिश करूं तो कहना चाहूंगा कि इस संग्रह के गीत अपने कथ्य से सबसे पहले पाठक को कहीं जोड़ते हैं, कहीं अचंभित करते हैं तो कहीं उद्वेलित भी। साहित्य की भाषा में इस बात को ऐसे कहूं कि राही जी के इन गीतों में विमर्श उठाने, संवाद स्थापित करने और संवेदना को झकझोरने की शक्तियां हैं। तीनों स्तरों पर राही जी की कविता समकालीन काव्य की धरोहर मानी जाना चाहिए।

दूसरी बात, मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि बिम्ब और प्रतीक को लेकर जितनी नवीन योजनाएं राही जी के गीतों में दृष्टिगोचर होती हैं, उतनी वर्तमान के कई बड़े व चर्चित नवगीतकारों के यहां तक नहीं हैं। इस संग्रह के गीतों में एक विशेषता यह भी है कि इनमें कुछ आह्वान गीत पूरे प्रभाव के साथ मौजूद हैं। वास्तव में, आह्वान गीतों की अपनी एक परंपरा हिंदी काव्य में रही है जो पिछले कुछ दशकों से निस्तेज सी हो चुकी है। राही जी के कुछ गीत इस परंपरा के श्रेष्ठ उत्तराधिकारी के रूप में सिर उठाये खड़े होते हैं। राही जी के गीतों का वितान बड़ा है जिसमें परंपरागत गीत भी हैं, श्रंगार गीत भी। आध्यात्मिक गीत भी हैं और सामाजिक गीत भी। विडंबनाओं के गीत भी भी हैं और परिवार के गीत भी। मौसमों, उत्सवों के गीत भी हैं तो वंचितों के अधिकारों के गीत भी। कुल मिलाकर मैं राही जी को संपूर्ण कवि कह सकता हूं और उनकी रचना प्रक्रिया को प्रणम्य घोषित कर सकता हूं। इस कृति को पाठकों व साहित्य जगत से उचित व सम्यक प्रतिसाद मिले, यही शुभकामना है।

शनिवार, अगस्त 19, 2017

आलेख

विभाजन केंद्रित साहित्य में “मलबे का मालिक”


विभाजन पर केंद्रित कथा साहित्य को अध्ययन की सुविधा के अनुसार दो श्रेणियों में दो प्रकार से बांटा जा सकता है। पहली, कहानी और उपन्यास और दूसरी भारतीय तथा पाकिस्तानी।


हिंदोस्तान के सीने पर एक लक़ीर खींची गयी थी और बंटवारे के बाद एक ज़मीन दो हिस्सों में बंट गयी थी। इसके इतिहास से वाक़फ़ियत ज़रूरी है। इस विभाजन की त्रासदी के बीज तकरीबन तीन-चार सौ साल पहले डाले गये थे जो इतिहास के जानकार समझते हैं। फिर कुछ अंग्रेज़ इतिहासकारों की दूषित मानसिकता ने इन बीजों को संरक्षण ही नहीं बल्कि ऐसा विकास दिया कि अंजाम में उगी एक ऐसी विभीषिका, जो शायद दुनिया में धर्मजनित सबसे बड़ी त्रासदियों में शुमार है। बहरहाल, यहां त्रासदी की आंच पर पके साहित्य का मुआयना करना अभीष्ट है।

पहली बात तो यह है कि लगभग हर भाषा में साहित्य का प्रारंभ काव्य से ही हुआ है। संस्कृत परंपरा से जुड़ा हिंदी काव्य इस त्रासदी के समय तक अपने पैरों पर मज़बूती से खड़ा हो चुका था। बावजूद इसके, हिंदी कविता में इतनी बड़ी त्रासदी की पीड़ा, दर्द या उससे जुड़े पहलुओं पर बहुत कम और कम महत्वपूर्ण रचनाएं सामने आती हैं। कुछ फुटकर रचनाओं को छोड़कर। इसी समय में, काव्य से अलग कथा साहित्य ने इस विषय को अपना दिल दिया और जिगर का लहू भी। विभाजन पर केंद्रित कथा साहित्य को अध्ययन की सुविधा के अनुसार दो श्रेणियों में दो प्रकार से बांटा जा सकता है। पहली, कहानी और उपन्यास और दूसरी भारतीय तथा पाकिस्तानी। ऐतिहासिक घटनाओं में अक्सर जुगराफिया सच भी जुड़ा होता है इसलिए इस विषय में आप देखेंगे कि हिन्दी में ऐसा कथा साहित्य अपेक्षाकृत बहुत कम है, बनिस्बत उर्दू, पंजाबी और बांग्ला के। जुगराफिया के मुताबिक पंजाब और बंगाल ने विभाजन का दर्द प्रत्यक्ष रूप से झेला इसलिए स्वाभाविक रूप से इन भाषाओं में यह साहित्य अधिक मुखर है। दूसरी ओर, पंजाब, बंगाल के साथ ही कश्मीर में भी उर्दू का दायरा अच्छा-ख़ासा था इसलिए उर्दू में यह साहित्य प्रमुखता से रचा गया। दूसरी बात यह है कि बांग्ला में भी ऐसा साहित्य पंजाबी या उर्दू की तुलना में कम है और इसका कारण सामाजिक या सांस्कृतिक स्थिति को माना जा सकता है। तथ्यों के अनुसार भारत के बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान या कालांतर में बांग्लादेश कहे जाने वाले हिस्से में बांग्ला भाषा और संस्कृति दो संप्रदायों के बीच लगातार एक सेतु रही। तथापि, वहां स्थिति उतनी विकट या भयावह नहीं हुई जितनी उत्तर भारत के उपरोक्त हिस्सों में दिखती है।

इस विषय पर महत्वपूर्ण उपन्यासकारों में: भीष्म साहनी, कमलेश्वर, यशपाल, डॉ राही मासूम रज़ा, कृष्ण बलदेव वैद, कुर्रतुल ऐन हैदर, मुमताज़ मुफ़्ती, नासिम हिजाज़ी, अब्दुल्ला हुसैन, खुशवंत सिंह, अमृता प्रीतम, सुनील गंगोपाध्ययाय, चमन नहाल आदि की रचनाएं दृष्टव्य हैं। उपन्यासों को छोड़ अगर कथा साहित्य पर आलेख को केंद्रित करूं तो कुछ नाम ज़रूर लेना चाहूंगा जिन्होंने इस प्रसंग को कथा साहित्य में विमर्श का मुख्य बिंदु बना दिया। मंटो की खोल दो जैसी और कहानियां, इस्मत चुग़ताई की गर्म हवा व अन्य कहानियां, अमृता प्रीतम, यशपाल, भीष्म साहनी, बदीउज्जमा, गुलज़ार आदि की कहानियों के बीच दो लेखकों महीप सिंह और मोहन राकेश लिखित दो कहानियां क्रमशः “पानी और पुल” और “मलबे का मालिक” एक अलग स्थान रखती हैं।

Book - Mohan Rakesh. Source : Google
वास्तव में कथा साहित्य और उपन्यास में समस्याओं के स्तर पर या चित्रांकन के स्तर पर एक साम्य है। विभाजन के समय जो कुछ हुआ, अपराध और दृश्य के दायरे में, वह सब कुछ समान ही है लेकिन आकार के कारण उपन्यासों में विवरणात्मक शैली दिखायी देती है और कभी-कभी, कहीं-कहीं ऐसा भी लगता है जैसे उपन्यासकार इतिहास लिखने के दबाव में लेखन कर रहा है। कहानियों में ऐसा दबाव कम महसूस होता है। आकार में लघुता के कारण ऐतिहासिकता का विवरण संक्षिप्त हो जाता है और कथावस्तु या भावभूमि पर लेखक फोकस रखता है। पानी और पुल तथा मलबे का मालिक समान समस्या भूमि पर रची गयी दो कहानियां उस समय प्रकाश में आयीं तो इनमें नज़रिये के स्तर पर वैभिन्य दिखायी दिया। सुभाष चंद्र यादव लिखते हैं – “नयी दृष्टियों के कारण कहानियां अनेक आयामी हो जाती हैं और लगने लगता है कि “पानी और पुल” में मूल समस्या विरह न होकर इन्सानों का पारस्परिक शाश्वत प्रेम है और “मलबे का मालिक” में रक्खे पहलवान का बदनुमा अभिशप्त जीवन। समस्या को नये कोण से देखने के कारण व्यंजनाएं बदल गयी हैं।“

श्री यादव से सहमत होते हुए एक स्तर पर मेरी दृष्टि उनसे अलग भी है। “मलबे का मालिक” कथा में वास्तव में सभी पात्र प्रतीकात्मक दिखायी देते हैं। ग़नी को हम अभिशप्त अतीत या गुज़रा हुआ ज़माना मान सकते हैं, वहीं रक्खे पहलवान कलंकित वर्तमान व्यवस्था का प्रतीक है। गनी जब पहलवान से मिलकर जाता है तो मोहन राकेश लिखते हैं कि “सट्टे के गुर और सेहत के नुस्ख़े बताने वाला पहलवान आज वैष्णो देवी के दर्शन की यात्रा का क़िस्सा सुना रहा था”। यह पहलवान के पश्चाताप बोध को प्रकट करने की चेष्टा है। होता भी है कि जब अतीत वर्तमान को कलंकित कहने सामने आ जाता है तो एक ग्लानि होती है। वहीं ग़नी का एक छोटा सा वाक्य और महत्वपूर्ण है – “अच्छा रक्खे पहलवान, याद रखना...” यह वाक्य अधिकांश पाठक पाठ में मामूली मानकर नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। लेकिन, कितने अर्थों की व्यंजना है इन दो शब्दों में - याद रखना... जब हम पात्रों को प्रतीक रूप में महसूस कर पाते हैं तो सहसा ही ये दो शब्द गूंज बन जाते हैं। याद रखना मामूली बात नहीं है। इसका उदाहरण यह है कि आज भी हम विभाजन का दर्द महसूस करते हैं और उसके इतिहास व साहित्य को पढ़कर दिल ही दिल में भींग जाते हैं क्योंकि हमने याद रखा है... इसीलिए तो विभाजन की त्रासदी के करीब 70 बरस बाद भवेश दिलशाद का कलम यह शेर उकेरता है -

मैं अटारी से जिसे देख के रोया शब भर
चांद उसने वही लाहौर से देखा होगा।

मोहन राकेश ने इस कथा की रचना में कुशलता दिखायी है और संवादों व कुछ ब्मिबात्मक विवरणों से इतिहास को और इतिहास के परिणाम को उकेरा है। इस कथा में, इतिहास के वर्णन का दबाव शायद इसलिए भी नहीं दिखायी देता है क्योंकि यह कथा विभाजन के करीब डेढ़ दशक बाद आयी और तब तक विभिन्न माध्यमों से हम उस समय को भली-भांति जान ही चुके थे। दृष्टव्य है कि बदीउज्जमा की कथा अंतिम इच्छा इससे पहले प्रकाशित हुई थी और इसलिए इस कहानी पर कुछ आलोचकों ने यह आरोप भी लगाया था कि लेखक ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य उपस्थित करने में काफी स्याही खर्च की है। जबकि हम समझ सकते हैं कि किसी भी घटना या माध्यम का क्रमिक विकास होता है और शुरुआती स्तर वह सब कुछ ठहरकर या विस्तार से कहने की चेष्टा करता ही है ताकि पाठकों के लिए सुग्राही हो सके। मोहन राकेश आदि को परवर्ती रचनाकार होने के कारण इस मामले में लाभ मिला ही है। विभाजन के विषय पर कथाकारों ने साहित्य सृजन की पूर्वपीठिका तैयार कर दी थी, उसी का परिणाम है कि बाद के रचनाकारों को कथा लेखन में मौलिक प्रयोग करने, बिम्बों व प्रतीकों के सहारे बात करने और विषय को आगामी परिणामों के स्तरों से जोड़ने की सहूलतें तो मिलीं ही।

कहानी “मलबे का मालिक” का सबसे बड़ा प्रतीक है कुत्ता जो कहानी के अंत में नमूदार होता है। पहले भी यह कहानी पढ़कर सोचा करता था कि मोहन राकेश ने इस कुत्ते को किस अर्थ में लिया होगा? अब तक सोचता हूं और मेरा विचार है कि मोहन राकेश जैसे ही पहलवान का ग्लानि भाव दर्शाते हैं, वैसे ही यह कुत्ता कहानी में प्रवेश करता है, यानी संभवतः मोहन राकेश किसी वफ़ादार और रक्षक व्यवस्था के आशावाद से इस कहानी को समाप्त करना चाहते रहे होंगे। यह अलग बात है कि अब यह कुत्ता अपनी वफ़ादारी में फेल हो चुका और हराम की जायी, एक मौक़ापरस्त व आवारा ताकत का प्रतीक बन बैठा है। संभवतः इस कथा के तमाम पात्रों के प्रतीक और भी निकाले जा सकते हैं क्योंकि यह पाठक के अंतर्पाठ पर भी आश्रित होता है। फिर भी, मैंने अपनी दृष्टि को समय सापेक्ष रखते हुए और लेखक की अंतर्वृत्तियों को समझने की चेष्टा करते हुए यथासंभव तार्किक रखने का प्रयास किया है।

अस्ल में, श्रेष्ठ साहित्य में हमेशा तहदारी होती है फिर चाहे वह कथा हो या काव्य। “मलबे का मालिक” और विभाजन से जुड़ी अन्य बेहतरीन कहानियों ने समय के साथ कई परतों को खोला है। फिर आने वाले समय का पाठ ऐसे साहित्य की और परतें खंगालता रहेगा। विभाजन केंद्रित साहित्य, खासकर गद्य में, मेरा प्रिय विषय रहा है। और उपरोक्त नामों व शीर्षकों में से ज़्यादातर मैंने पढ़े हैं। फिर नाटकों का भी एक पहलू है जिसमें असग़र वजाहत लिखित "जिस लाहौर नहीं वेख्या.." हमेशा ज़हन में रहने वाला है। गुलज़ार की कुछ नज़्में, अमृता की नज़्में विभाजन का दर्द और विडंबना लेकर पाठक के दिल से टकराती हैं तो दिल में हफ़्तों सीलन बनी रहती है। इस पूरे परिदृश्य में, मैं कह सकता हूं कि “मलबे का मालिक” मेरी नज़र में तब भी ख़ास थी और अब भी है। तब जब पढ़ी थी, करीब 15 बरस पहले, उन दिनों रंगमंच में सक्रियता पूरे जोश के साथ थी और कुछ साथियों के साथ मिलकर इस कहानी के नाट्य रूपांतरण की योजना बनायी थी, रीडिंग सेशन्स भी हुए थे लेकिन कुछ योग ऐसे बने कि हो न सका। एक बार जीवन में फिर यह कोशिश ज़रूर करना चाहूंगा। हालांकि विभाजन से जुड़े कथा व उपन्यास साहित्य पर कुछ चर्चित संकलन जैसे “सिक्का बदल गया” आदि पूर्व में प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन फिर भी एक संभावना इस क्षेत्र में भी बनी हुई है। मालिक ने चाहा तो... इस दिशा में भी प्रयास करने का मन रहा है। फ़िलवक़्त क़िस्सा हुआ तमाम, बेहतरीन क़िस्सों की यादों को सलाम।

सोमवार, अप्रैल 17, 2017

आलेख

फिर सवालों के घेरे में - राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार


भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र "सुबह सेवेरे" के 16 अप्रेल 2017 के संस्करण में "अपनी साख गंवाते राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार" शीर्षक से प्रकाशित भवेश दिलशाद लिखित आलेख


एक बार फिर यह विमर्श जन्म रहा है कि क्या राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपना औचित्य, अपनी गुणवत्ता और अपनी निष्पक्षता सिद्ध कर पा रहे हैं? 2016 में रची गयीं फिल्मों के संदर्भ में पिछले दिनों घोषित किये गये राष्ट्रीय पुरस्कारों में कुछ विसंगतियां नज़र आने पर इस संवाद ने फिर मुखरता पायी है। इन विसंगतियों में सबसे प्रमुख है, अक्षय कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए पुरस्कार दिया जाना।

अक्षय कुमार प्रशंसनीय अभिनेता के रूप में दर्शकों के चहेते हैं। लेकिन, एक दर्शक किसी फिल्म या कलाकार को स्वीकार करता है, उसे प्रेम देता है तो क्या यह माना जा सकता है कि यह आधार ही पुरस्कार के लिए एकमात्र या सबसे महत्वपूर्ण पैमाना है? विचार तो किया ही जाना चाहिए। स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आप मनोरंजन करने वालों को पुरस्कृत कर रहे हैं या कला की किसी विशिष्ट उपलब्धि को। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का इतिहास देखें तो आप पाएंगे कि यह कला के प्रति समर्पित रहे कलाकारों और कृतियों को केंद्र में रखता रहा है। प्रतिष्ठित कलाकारों ने माना है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की स्थापना का उद्देश्य यही रहा है कि उन फिल्मों को सम्मान दिया जाये जिनमें प्रासंगिकता, मौलिकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, तकनीकी श्रेष्ठता, कलात्मक सौंदर्य की गुणवत्ता जैसे तत्व सफलतापूर्वक उभरकर आते हों।

Published in Subah Savere
पिछले कुछ समय में ऐसा दिखने लगा है कि राष्ट्रीय पुरस्कार भी व्यावसायिक सिनेमा की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इस वर्ष अक्षय कुमार को उक्त पुरस्कार दिये जाने को लेकर कहा जा रहा है कि यह राष्ट्रीय नहीं राष्ट्रवादी फिल्म पुरस्कार जैसा है। अक्षय ने पिछले कुछ समय में जो कदम उठाये हैं, उन सबके मद्देनज़र माना जा रहा है कि वह सत्ता की गुडलिस्ट में हैं। साथ में, तर्क यह भी है कि इस वर्ष फिल्ममेकर प्रियदर्शन राष्ट्रीय पुरस्कारों की निर्णायक समिति के प्रमुख रहे हैं। अक्षय को इस पुरस्कार का मिलना कई प्रश्न उठाता है जिनमें से कई तार्किक भी हैं और इन्हीं कारणों से पक्षपात का आरोप एक स्तर पर जायज़ भी है।

पहले भी ऐसा होता रहा है जब राष्ट्रीय पुरस्कार सवालों के घेरे में आये। सैफ अली खान, अजय देवगन और संजय लीला भंसाली को औसत या हल्के दर्जे का कलाकार नहीं कहा जा सकता लेकिन जिन फिल्मों के लिए इन्हें पुरस्कृत किया गया, उनके संदर्भ में उनकी प्रतिभा उस स्तर की रही, जिसके लिए उन्हें पुरस्कार दिये गये? विचारणीय यह है।

इन विसंगतियों का कारण क्या है? राष्ट्रीय पुरस्कारों की नियमावली में कई बार स्पष्ट उल्लेख होता है कि निर्णायक मंडल के निर्णय को अंतिम माना जाएगा और उन पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं होगा। लेकिन, क्या इस लिखित नियम का पालन ईमानदारी से हो पाता है? दूसरी बात, निर्णायक मंडल का चयन सरकार का एक मंत्रालय ही करता है तो क्या पिछला नियम प्रभावित नहीं होता? वास्तव में, यह एक भूलभुलैया है जिसमें शब्दजाल ऐसा बिछा है जो आपको हर बार उलझा या भटका देता है।

राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए तय किये जाने वाले निर्णायकों की भूमिका को प्रतिष्ठित एवं सम्मानित फिल्माकर अडूर गोपालकृष्णन ने 2016 के दिसंबर माह में कठघरे में खड़ा किया था। गोपालकृष्णन ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को लिखे एक पत्र में कहा था कि निर्णायक मंडल का चयन किस योग्यता के आधार पर होता है, इसे सबके सामने रखा जाये ताकि पारदर्शिता आ सके। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा था कि कम योग्य लोग ज़्यादा योग्य कलाकारों को जांचें, यह उपयुक्त नहीं है। उन्होंने 2015 के पुरस्कार चयन को लेकर निराशा जतायी थी और कहा था कि इस तरह के चयन से राष्ट्रीय पुरस्कार अपनी गरिमा और औचित्य खो देते हैं। यही नहीं, उन्होंने इसे कला के लिए समर्पित और श्रेष्ठ कलाकारों का नुकसान व अपमान बताया था।

गजेंद्र चौहान को एफटीआईआई में नियुक्त करने वाली व्यवस्था ने शायद इस समय के महान फिल्मकारों में शुमार गोपालकृष्णन के इस पत्र को भी नज़रअंदाज़ कर दिया, इस बार के चयन से ऐसा ही प्रतीत होता है। अयोग्यों या कम प्रतिभाशालियों को बढ़ावा देकर, उन्हें प्रशस्ति देकर कोई व्यवस्था यदि इस मुग़ालते में है कि वह फल-फूल सकती है तो उसे पुरानी कहावत याद रखना चाहिए कि मूर्ख की मित्रता से बेहतर होती है बुद्धिमान की शत्रुता। साख खोते जा रहे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए नये सिरे से नीति एवं पारदर्शी प्रणाली बनाया जाना समय की मांग है।