बुधवार, मार्च 29, 2017

एक फ़नक़ार

जो नहीं भूल पाया कई आंसू...


भोपाल में जिस दौर में हमारा बचपन गुज़र रहा था और नौजवानी बाहें फैला रही थी, उस दौर में भोपाल के अदबी गलियारों में नाम गूंजता था मरहूम जनाब इशरत क़ादरी साहब का। जवानी में उनसे कुछ मुलाक़ातें हुईं और मुलाक़ातें, जिन्हें यादों का उजाला कहते हैं। वही कुछ यादें हैं -


पुराने भोपाल में रहते थे क़ादरी साहब। मैं चूंकि हमीदिया कॉलेज का एल्युमिनाई हो गया था और मेरे पासआउट होने के बाद हमीदिया और एमएलबी कॉलेज की इमारतें आपस में बदल दी गयी थीं। तो, जहां पहले एमएलबी कॉलेज लगता था, वहां हमीदिया पहुंच गया, सो कॉलेज जाने का सिलसिला लगा ही रहता था। वहीं, कॉलेज से सटी एक गली में ध्यानसिंह तोमर राजा साहब का पुराना बड़ा मकान हुआ करता था और उसके सामने वाली गली में मेरा कभी जाना हुआ नहीं था।

एक रोज़ कॉलेज से लौटते वक़्त यूं ही दुपहिए का हैंडल मोड़ दिया कि देखूं तो इस गली में है क्या। देखता क्या हूं कि कुछ पुराने मकान के हिस्से हैं। बाहर खुले-खुले दालान या बरामदे कह लीजिए और जैसे तरतीब में बने अलग-अलग कमरानुमा मकान। किसी की आवाज़ सुनी जिसमें इशरत क़ादरी साहब का नाम लिया जा रहा था। एक बुज़ुर्ग एक कमरे से बाहर निकले और दो-तीन लोगों से मुख़ातिब हुए। मैं दुपहिए से एक चक्कर काटकर वापस आया तो वो लोग दुआ-सलाम करते हुए लौटते से लगे। मैंने फिर एक चक्कर काटकर उसी दरवाज़े के सामने दुपहिया रोक दिया।

एक अजनबी के तौर पर मिला जनाब क़ादरी साहब से। और यक़ीन मानिए कि कुछ ही लमहों बाद हम अजनबी नहीं थे। एक ठीक-ठाक तआरुफ़ के बाद कुछ बातें कीं और उनसे जल्द ही दोबारा मिलने आने का वादा कर मैं चला गया। मुतास्सिर हुआ मैं एक ऐसे शायर से मिलकर जिसका नाम सुना था और बड़े हासिल मुक़ाम शायर के तौर पर। लेकिन, मिलकर लगा कि घर के ही कोई बुज़ुर्ग हैं। पहली मुलाक़ात में ही मुझे गली के दूसरे तरफ बने उस घर के भी दर्शन करा दिये क़ादरी साहब ने जहां वो रहते थे। जिस जगह मुलाक़ात हुई थी, वह उनकी दिन भर की बैठक थी, एक छोटी सी लाइब्रेरी की शक़्ल लिये हुए वह जगह बहुत शांत और मुफ़ीद थी काम की बातें करने के लिए।

Ishrat Qadri

ख़ैर साहब अगली मुलाक़ात जल्द हुई और इस दफ़ा लगभग पूरा दिन हम बैठे रहे और दो-एक लोगों के बीच में दख़्ल देने के बावजूद हमने काफ़ी बातें की। सिलसिला ज़ाहिर है, ग़ज़ल से ही शुरू हुआ था। मैंने उनके कुछ नायाब शेर उनकी ज़ुबान से सुने और फिर जब उन्हें बताया कि ग़ज़ल कहने की कोशिश करता हूं तो उन्होंने हुक़्म दिया कि मैं सुनाउं कुछ। मैंने झिझक ज़ाहिर की तो कहने लगे, "बरख़ुरदार झिझकने की आदत शायर में होना नहीं चाहिए और फिर अकेले में क्या डर, ऐसे ही तो इल्म हासिल हुआ करता है"। कुछ हिम्मत बंधी और मैंने एक ग़ज़ल उनके हुक़्म पर अता की। बहुत दुआएं दीं उन्होंने मुझे और कहा "मुस्तक़बिल रोशन है और जिस तरह सीखने के सफ़र में हो, इसे हमेशा जारी रखना"।

शायरी के गुज़रे, मौजूदा और आइंदा कल को लेकर उनकी सोच व समझ बिल्कुल आसान और साफ़ थी। फ़रमाते थे कि "तरक़्क़ीपसंद तहरीक़ के ख़त्म होने के बावजूद अब भी उसकी जानिब शायरों का रुझान है और माशा अल्लाह मुस्तक़बिल रोशन होगा, बेहतर होगा, मुझे उम्मीद भी है और मेरी दुआ भी है"।

तरक़्क़ीपसंद तहरीक़ जिस दौर में अपने शबाब पर थी, उसी दौर में ही क़ादरी साहब की शायरी ने परवाज़ ली थी। 1926 की पैदाइश और 20 साल की उम्र से ही शायरी की उड़ान भरने वाले क़ादरी साहब बातों-बातों में 1948 के उस ऑल इंडिया मुशायरे की यादों में खो गये जिसमें उन्होंने पहली बार इतने बड़े स्तर पर क़लाम पढ़ा था। उस मुशायरे में साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे बावक़ार और कद्दावर शायर शरीक़ हुए थ। यहां तक कि उन्हें इस मुशायरे की तारीख़ तक याद थी, 18 फरवरी 1948। फिर गुफ़्तगू के दौरान मैंने पूछा कि आपकी ज़िन्दगी के सबसे यादगार पल कौन से रहे होंगे..। मेरा ख़याल था कि साहिर या मजरूह या ऐसे ही किसी नामवर शायर से मुतालिक़ वो किसी एनकाउंटर की बात करेंगे लेकिन जो उन्होंने कहा वो एक नया ही तजरुबा था।

फ़रमाने लगे "ज़िंदगी में कुछ वाक़ये ऐसे होते हैं जो आपके एहसासों में इस तरह घुल जाते हैं कि आपको ताउम्र अलग-अलग सत्हों पर ले जाते रहते हैं। ऐसा एक वाक़या तो वह था जब वालिद साहब से किसी ने झूठी शिकायत कर दी कि मैं शराब पीने लगा हूं। मुझ पर क्या गुज़री, तुम सोच भी नहीं सकते जब वालिद साहब मेरे पास आये बहुत देर तक रोते रहे। उनका रोना आज तक नहीं भुला सका मैं। वो आंसू अलग-अलग तासीर लेकर मेरे अंदर अब भी पिघलते रहते हैं"।

क़ादरी साहब चूंकि सिंचाई विभाग में नौकरी में रहे तो 1956-57 में हथाईखेड़ा में एक सर्वे के दौरान एक सांप के हमले से बाल-बाल बचे थे। यह घटना भी उनके यादगार लमहों में से थी। उन्होंने कहा था कि "मौत को इतने क़रीब देखने का ख़ौफ़ क्या होता है, मैं समझ पाया"। एक और दिलचस्प वाक़या उन्होंने यह बताया कि "तामोट में अपने साथियों के साथ कैंप था। वहां हमने शेर के बच्चों को छेड़ दिया था, बस यूं ही मज़े-मज़े में। अपने कैंप लौट आये और खाना-पीना व गुफ़्तगू चल रही थी। काफ़ी देर बाद हमारे कैंप में एक शेरनी आयी और उसने जिस तरह घूमकर और जिन आंखों से देखकर हमें ख़ौफ़ज़दा कर दिया था, वो भूलने की बात नहीं है। कुछ देर बाद वह चली गयी तो मुझे यही महसूस हुआ और होता रहा कि वह हमसे यही कहने आयी थी कि ख़बरदार..."।

कमाल का दिन था वो। क्या ख़ूब और कितनी सारी बातें हुईं। क़ादरी साहब से मिलकर एक अपनापन सा लगता था। एक और मुलाक़ात हुई उनसे, उसी जगह। दूसरी के कुछ रोज़ बाद। इस मुलाक़ात में उन्होंने मुझे अपने परिवार के बारे में बताया। न जाने किस रौ में उनसे मैं माज़रत के साथ पूछ बैठा कि कभी इश्क़ हुआ उन्हें? तो, ज़रा सा मुस्कुराकर पूरी दास्तान मेरे सामने खोलकर रख दी।

फ़रमाया - "1948-49 में भोपाल में ही थीं अख़्तर साहिबा। घर के पास ही रहा करती थीं और दूर के रिश्ते में भी थीं। उस ज़माने में ख़त लिखे जाते थे तो हमने भी एक-दूसरे को बेशुमार ख़त लिखे। ख़तों के ज़रीये ही इश्क़ परवान चढ़ता रहा। लेकिन, उनकी शादी कहीं और हो गयी। उनके लिखे ख़त मैंने अब भी संभालकर रखे हैं। लेकिन बहुत अफ़सोस होता है अब कि शादी के बाद जब उन्होंने मुझे मेरे लिखे ख़त लौटाये तो तैश में आकर मैंने वो जला दिये। अब सोचता हूं काश, न जलाये होते"।

यह दास्तान सुनाते-सुनाते उनकी आवाज़ भारी हो गयी थी। मैंने फिर मुआफ़ी मांगी। तो मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले कोई बात नहीं। कोई अच्छी ग़ज़ल कही हो तो अर्ज़ करो। मैंने एक ग़ज़ल और अता कर दी। सुबहान अल्लाह कहकर मेरे सर पे हाथ फेरा और बहुत शाबाशी दी। एक-दो सुधार बताकर कहने लगे "इस उम्र में ये फ़िक्र और तमीज़ है, बहुत उम्मीद जगाते हो बेटा"। और मैं शुक्रिया भी न कह सकता था। यह पहली बार मेरे साथ हो रहा था कि इतने बड़े शायर से मुझे दाद तो ख़ैर ठीक है, लेकिन इतनी अंतरंगता और मुहब्बत मिल रही थी। उस मुलाक़ात में जाते-जाते कहने लगे कि अब तुम भी मुझे अपने बेटे की तरह लगने लगे हो। आते रहना।

इसके बाद एकाध छोटी सी मुलाक़ात और रही। फिर कुछ बीमार थे क़ादरी साहब, तो एक बार उनकी ख़ैर-ख़बर लेने भी गया था। फिर ज़िंदगी ने एक अलग सफ़र दे दिया और भोपाल छूट गया कुछ वक़्त के लिए मुझसे। कुछ बरस बाद लौटा तो पता चला कि क़ादरी साहब नहीं रहे, कुछ दो बरस पहले। क़ादरी साहब अचानक कभी भी चले आते हैं मरे पास अब भी। कभी ग़ज़लें सुनाते हैं, कभी कोई दास्तान, कभी अपने तजरुबात से ज़िंदगी का कोई सबक़। एक शायर नहीं एक मुक़म्मल फ़नक़ार की सी शख़्सियत की तरह याद आते हैं मोहतरम जनाब इशरत क़ादरी। उनके शेर जो मुझे बरसों से याद रहते हैं -

हाथ में जब तक कलम था तजरुबे लिखते रहे
हम ज़मीं पर आस्मां के मशवरे लिखते रहे।

हमीं हैं वो जिन्हें आती है ज़िंदगी की अदा
सुलग रहे हैं दिलो-जां दिमाग़ रौशन हैं।

टूटकर दोस्तों से मिलते रहो
जाने किस मोड़ पर बिछड़ जाएं।

मैं उनसे और वो मुझसे इसलिए टूटकर मिलते रहे क्योंकि शायद वक़्त ने लिख दिया था कि हम यूं ही किसी मोड़ पर अचानक बिछड़ जाएंगे। फिर भी, ज़िंदगी की अदा उन्हें आती थी और इस क़दर आती थी कि अपने तजरुबों और मशबरों से कुछ-कुछ मुझे भी सिखाकर गये हैं। शुक्रिया क़ादरी साहब।

मंगलवार, मार्च 28, 2017

नोट्स

कामायनी - विद्वानों की दृष्टि में - अंतिम भाग


निम्नलिखित विचार अथवा लेख के लेखक का नाम मुझे याद नहीं और जिन कागज़ों पर ये लिखे मिले हैं, उनमें भी दर्ज नहीं। लेकिन जहां तक मेरी याददाश्त काम करती, संभवतः शचीरानी गुर्टू लिखित हो सकते हैं क्योंकि तुलनात्मक अध्ययन पर एक अद्भुत शोध पुस्तक उन्होंने लिखी है। फिर भी, यह मेरा अनुमान ही है। लेकिन, ये नोट्स बहुत दिलचस्प भी हैं और काम के भी -


जयशंकर प्रसाद और जर्मनी के महान साहित्यकार गेटे में वास्तव में काफी समानता है। दोनों के ग्रंथों के अनुशीलन से यह तथ्य तार्किक प्रतीत होता हैकामायनी से पहले इन दोनों ही महान कलाकारों की शुरुआती रचनाओं पर बात करें तो ऐसा लगता है कि जैसे प्रसाद के आंसू गेटे के ग्रंथ The sorrows of werther में भी बहुत गहरा संबंध है। गेटे और प्रसाद के विचित्र जीवन में जो करुण अनुभूतियां हुईं, जो आघात लगे और जो वेदनाएं तथा निराशाएं इकट्ठी हुईं वही दोनों ने इन कृतियों के माध्यम से अभिव्यक्त कीं।

...बेशक अंतर है, लेकिन तत्वों और अनुभूति के स्तर पर दोनों के सुर मेल खाते हैं। जैसे गेटे के फॉस्ट और प्रसाद की कामायनी को लेकर तालमेल दिखता है।

...हां तो, बात करते हैं फॉस्ट और कामायनी पर। असल में प्रसाद और गेटे की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने मानव जीवन के तकरीबन हर पहलू को छुआ। और यह हुआ प्रमुख रूप से, कामायनी और फॉस्ट में। चित्रों में जैसे स्थूलता दिखायी दे और रेखाएं व बिंदु सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होते जाएं। एक अद्भुत विचार और विश्व दृष्टि जैसे अभिीाूत कर दे।

...गेटे ने फॉस्ट में रहस्य को बखूबी अभिव्यक्त किया है, खासकर वह दृश्य जिसमें नायिका मारग्रेट से फॉस्ट कहता है कि उसे ईश्वर की सत्ता हर कण, हर क्षण में दिखती है। उसके अनुभव को नकारा नहीं जा सकता। 

...कविता केवल विचारों, विचारधाराओं या दर्शन की जटिल अर्थ प्रतीतियों का ही नाम नहीं है, वह सौंदर्य को भी साधती है और मत को भी, वह भावना को भी पोसती है और अभिमत को भी। अब यदि सौंदर्य की बात करें तो फिर प्रसाद को गेटे के साथ खड़ा करना ठीक नहीं क्योंकि गेटे के रचनाकर्म में सौंदर्य प्रमुख नहीं है जबकि रोमांसिज़्म के पोषक रहे प्रसाद इससे अधिक मोहित रहे हैं। इस दृष्टि से अंग्रेज़ी साहित्य के एक महान लेखक व कवि थॉमस हार्डी से प्रसाद का तालमेल समझा जा सकता है। प्रसाद जब प्राकृतिक सौंदर्य को देखते हैं तो वैचित्रृय उत्पन्न होता है -

अंतरिक्ष विशाल में है मिल रही
चंद्रमा पीयूष वर्षा कर रहा
दृष्टि पथ में सृष्टि है आलोकमय
विश्व-वैभव से धरा यह धन्य है।

हार्डी का प्रकृति चित्रण एक सूक्ष्म और अनुभवजन्य जगत से परिचय कराता है। जैसे -

The sky was clear - remarkably clear - and the twinkling of all the stars seemed to be but throbs of one body, timed by a common pulse.

यानी हार्डी का प्रकृति के प्रति आकर्षण बौद्धिकता से भी सराबोर है जबकि प्रसाद की प्रकृति के प्रति दृष्टि सम्मान व्यक्त करती हुई और चेतना का खुलासा करने वाली है।

दोस्तों, कामायनी पर विद्वानों के अभिमतों के इस सिलसिले को अभी यहीं समाप्त करते हैं। भविष्य में कभी फिर कुछ साझा करने योग्य प्राप्त करूंगा तो अवश्य करूंगा। साहित्य के किसी और विषय पर नोट्स लेकर जल्द ही हाज़िर होने के वादे के साथ।

सोमवार, मार्च 27, 2017

ग़ज़ल

तुम क्यूं ग़ज़ल कहो, मैं क्यूं ग़ज़ल कहूं..?


25 मार्च 2017 को ग़ज़लों के एक संकलन को मंज़रे-आम पर शाया किये जाने का जलसा हुआ जिसमें देश के कई कोनों से नये ग़ज़लगो शायर शामिल हुए। यह किताब चूंकि उन ढाई दर्जन शायरों की कुछ ग़ज़लों को पेश करती है जो ग़ज़ल की दुनिया में आमद दर्ज करा रहे हैं इसलिए इस मौके पर मेहमाने-ख़ुसूसी के तौर पर मैंने शायरी की दुनिया में कदम रखने वालों के लिए ग़ज़ल पर तक़रीर पेश की। उसी बयान के हिस्से -


- हिन्दी ग़ज़ल जैसी कोई चीज़ होती है, इस बात से मैं मुत्तफ़िक़ नहीं हूं। ग़ज़ल को भाषा के आधार पर या किसी ऐसे ही किसी और आधार पर बांटने का अर्थ सांप्रदायिकता बढ़ावा देना है और शायर या एक फ़नकार होने के नाते मैं तो इसका समर्थक नहीं हूं। ग़ज़ल कई भाषाओं में कही जा रही है, मराठी, गुजराती लेकिन यहां ग़ज़ल के विधान को बदलने या उसमें फेरबदल करने या अपनी सुविधानुसार उसका नामकरण करने की कोई चेष्टा नहीं है जबकि हिन्दी में तथाकथित लोग ऐसा करने की कोशिश में निरंतर लगे हुए हैं। नयी पौध के शायरों को गंभीरता से इस बारे में सोचना चाहिए।

- दूसरी बात - जो नये कवि ग़ज़ल सृजन के लिए उत्साह या रुझान दिखा रहे हैं, उनमें एक प्रवृत्ति साफ तौर पर बड़े पैमाने पर दिख रही है कि वे रदीफ़, काफ़िये बहर वगैरह की तकनीकी जानकारी जुटाकर उस खांचे में कुछ शब्द फिट कर देने को ग़ज़ल मान रहे हैं। ऐसा नहीं होता है। ये तकनीकी जानाकरी एक क्वालिफिकेशन है जो आपको शायरी या कविता को ग़ज़ल की शक्ल में कहना बताती है। कविता या शायरी की तमीज़ और तहज़ीब और प्रतिभा समझने की और महसूस करने की बात है इसका कोई फिक्स खांचा या पैटर्न नहीं है। तो, सतर्क रहें और औसत लेखन की बाढ़ में खुद को न झोंकें और उस इल्ज़ाम से बचने की कोशिश करें कि जिन लोगों के कारण खराब शायरी की मिसालें पेश की जाती हैं उनमें आपका नाम न हो। वैसे भी, वाते साहब इसकी तस्दीक़ करते हैं ग़ज़ल के बारे में कुछ बातें तो सीखी जाती हैं लेकिन सीखकर ग़ज़ल नहीं कही जाती।

- तीसरी बात यह है कि - आजकल के शायरों पर इल्ज़ाम लग रहा है कि वे कही हुई बातें या मफ़हूम नक़ल कर रहे हैं या दोहरा रहे हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि या तो हमने ज़्यादा अध्ययन नहीं किया है या फिर हम किसी से बहुत अधिक प्रभावित हैं और हमारी मौलिक सोच-समझ या तो है ही नहीं या किसी के साये में है। कारण जो भी हो, इससे बचना होगा। ऐसे इल्ज़ाम एक शायर के लिए तो खतरा हैं ही, शायरी के सामने खतरा यह पैदा करते हैं कि शायरी में कोई इज़ाफ़त नहीं होती। दूसरे जो शायर हक़दार हैं जिस मुक़ाम के, कई बार उनका हक़ कम हक़दार या बेदख़ली के काबिल शायर चुरा और हथिया लेते हैं। मैं जो कहना चाह रहा हूं एक उदाहरण से समझाता हूं। कैफ़ी आज़मी साहब का शेर देखें 

जिस तरह हंस रहा हूं मैं पी पी के गर्म अश्क़
यूं दूसरा हंसे तो कलेजा निकल पड़े।

अब इसी बात को अपने अंदाज़ में जॉन एलिया कहते हैं

जो गुज़ारी न जा सकी हमसे
हमने वो ज़िंदगी गुज़ारी है।

कैफ़ी साहब का शेर भरपूर है और कलेजा निकल पड़े जैसा मुहावरा कहन को पुख़्ता ढंग से संप्रेषित भी करता है और बात को संवेदना के एक स्तर से जोड़ देता है। जॉन साहब का शेर इसी मफ़हूम को अधिक सरलता से संप्रेषित करता है। संवेदना तो है ही और बात में एक तहदारी इस कारण भी आ रही है कि कोई सामान्य प्रतीक या बिम्ब योजना नहीं है इसलिए पाठक अपनी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करते हुए एक भावना से जुड़ सकता है। अब देखिए आजकल के एक शायर का शेर -

ऐसे हालात भी जिये हमने
और कोई जिये तो मर जाये।

अब आप खुद ही विचार करें कि यह शेर दोहराव और नकल का इल्ज़ाम लगाने लायक है कि नहीं। मेरे विचार से है। ख़याल का टकराना एक बात है लेकिन जिस मफ़हूम पर कई बार कई शेर कहे जा चुके हैं, उसे उठाना और फिर पहले कहे जा चुके शेरों से हल्का शेर कहना किसी तरह भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। मैं यही कहना चाह रहा हूं कि पुराने मफ़हूम पर नयी बात पैदा करना पड़ेगी या फिर नये और बेहतर ढंग से कहने की चुनौती का सामना करना होगा वरना इल्ज़ाम ही लगेंगे।

- आख़िरी बात - शायरी का जदीद होना जैसे एक पहलू है, वैसे ही उसमें नज़ाक़त और मुहब्बत का होना दूसरा पहलू है। किसी को नकारने में या किसी के प्रति आसक्त होकर उसके पैरोकार बनने में ध्यान और उर्जा को नष्ट करने से बचें और शायरी के साथ दिली मुहब्बत का रिश्ता क़ायम करने वाले शायर बनें। कई पत्र पत्रिकाएं, ख़ास तौर से ग़ज़ल को लेकर बहुत सी भ्रामक जानकारियां भी परोसने में लगे हैं, इसके प्रति सतर्क रहना भी ज़रूरी है। एक उदाहरण के साथ बात करूं तो ग़ज़ल पर एक कुछ चर्चित पत्रिका है दरवेश भारती जी के संपादन में निकल रही ग़ज़ल के बहाने। पिछले दिनों उसके हवाले से तग़ज़्ज़ुल लफ़्ज़ को ग़लत ढंग से परिभाषित किया गया। तग़ज़्ज़ुल किसे कहते हैं, इस बारे में एक ग़लत राइटअप प्रस्तुत हुआ। तग़ज़्ज़ुल की व्याख्या ग़लत अर्थों में कर दी गयी। 

अपने मिट्टी से घर बनाकर भी
लोग बरसात भूल जाते हैं

काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शर्म तुमको मगर नहीं आती

इन शेरों को कोट करते हुए यह साबित किया गया कि ऐसे शेरों में माना जाता है कि तग़ज़्ज़ुल है। मैं यहां कहना चाहता हूं कि ऐसी भ्रामक जानकारियों के प्रति सतर्क रहें और किसी सही जानकार से बातों को समझें। जो लोग तथाकथित हिन्दी ग़ज़ल का शोर मचा रहे हैं, सब तो नहीं, लेकिन कुछ लोग अपने विश्वासों या पूर्वाग्रहों के अनुसार इस तरह की गलत व्याख्याएं और बातें पेश कर रहे हैं। यह खतरनाक भी है और निंदनीय भी। ऐसा नहीं होना चाहिए।

कुछ और बातें भी हैं।

- क्या वर्तमान और नये कवि जो ग़ज़ल में आ रहे हैं, वे अपना कोई ख़ास अंदाज़, तेवर या मुहावरा बना पा रहे हैं?

- कुछ अच्छा नहीं लिखा जा रहा, ऐसा नहीं है लेकिन अभी भी बहुत संभावनाएं और चुनौतियां हमारे सामने हैं, बहुत अपेक्षाओं पर हमें खरा उतरना है, क्या इसके लिए हमारी तैयारी है?

- एक शायर होने के नाते ख़ेमेबाज़ी, गुटबाज़ी और जुमलेबाज़ी को आप बढ़ावा देते हैं या वाक़ई शायरी के सच्चे तरफ़दार होकर एक बेहतर सृजन के पैरोकार बनते हैं, यह आपको ही तय करना है।

रविवार, मार्च 26, 2017

यादें

हमनाम मुहब्बत के सफ़र पर दो ख़ुश्बुएं


मुहब्बत / क़ौसे कुज़ह की तरह / क़ायनात के एक किनारे से / दूसरे किनारे तक तनी हुई है / और इसके दोनों सिरे / दर्द के अथाह समन्दर में डूबे हुए हैं। यह शायराना एहसास और फ़ल्सफ़ा है मीना जी की ज़ाती शख़्सियत का। अब्र-बहार ने / फूल का चेहरा / अपने बनफ़्शी हाथ में लेकर / इस तरह चूमा / फूल के सारे दुख / ख़ुश्बू बनकर बह निकले हैं... इस नज़्म का उन्वान परवीन ने प्यार मुक़र्रर किया।

क़ौसे कुज़ह या इन्द्रधनुष का पहला सिरा दर्द के अथाह समन्दर में डूबा है और दूसरा सिरा भी यानी आह से उपजी होगी वाह। जैसे दोनों सिरे, दो तड़पती आत्माओं के मायने में ही जानिए। फूल के सारे दुखों का ख़ुश्बू बनकर बह निकलना, प्यार की गहराई और सच्चाई को रूह से महसूस करने से तअल्लुक़ रखता है। सतरंगी महराब कहीं यही ख़ुश्बू तो नहीं ! ये सतरंगी ख़ुश्बू, दूख से उपजा एक सुक़ून, एक नशा तो नहीं जो अपने सिरों पर आकर फिर अपने ज़ाती मुक़ाम को हासिल करती है और दर्द का अथाह समन्दर कहलाने लगती है। ये तो एक तलाश है और तलाश कब किस पगडंडी पर ले चले, क्या कहूं? फिर भी चलते हैं -

Meena Kumari source - google

गुलज़ार साहब ने कहा - "मीनाजी चली गयीं... लगता है, दुआ में थीं। दुआ ख़त्म हुई, आमीन कहा, उठीं और चली गयीं"। मगर चली कहां गयीं? इसका इल्म गुलज़ार साहब को नहीं शायद दिलशाद को हुआ। मीना जी कहती थीं, कहती क्या थीं, कुछ तलाशती थीं, और अपनी तलाश के इन्हीं तानों-बानों में घुटती रहती थीं - क्यूं इक अजनबी सदा पे नाज़ / रूह का हर तार झनझनाता है। इसी अजनबी सदा का पीछा करती हुई शायद चली गयीं। एक गुमनाम रास्ते का निशां / लमहा-लमहा किसे बुलाता है। लगता है ये गुमनाम रास्ते का निशां उन्हीं के लिए था और शोहरत के बाद के एक सफ़र पर उनसे चलने का इसरार किया करता था। मीना जी इस निशां से बतियाती रहीं, सवाल-जवाब करती रहीं और इस सफ़र को टालती रहीं क्योंकि शायद दुआ में थीं, लेकिन आख़िकार दुआ ख़त्म हुई। गौरतलब ये है कि मीना जी बतौर शायर गुमनाम रहीं और गुलज़ार साहब को अपने क़लाम का मुहाफ़िज़ न बना गयी होतीं तो कई क़िरदारों में सांस लेने के बावजूद उनके इस एक पहलू का न होना खटकता रहता। अपने एहसास को समेटने और खुद से मुख़ातिब होने के लिए ही वो इस गुमनाम सफ़र पर चल पड़ीं। मुमक़िन है ये क़लाम उनके सफ़र के सितारे हों।

एक वीरान सी ख़मोशी में / कोई साया सा सरसराता है। सोचने लगता हूं कि कौन है जो सिर्फ़ साये की शक़्ल ही इख़्तियार करना चाहता है? कबीर के क़लाम को आबिदा की आवाज़ में पेश करते हुए गुलज़ार साहब कहते हैं - "सूफ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बड़े ख़ूबसूरत रूप लेता है। कबीर के यहां ये ख़याल कुछ और करवटें लेता है, एक बेतक़ल्लुफ़ी है मौत से जो ज़िन्दगी से कहीं भी नहीं..." मीना जी के शायर के यहां मौत का जो तसव्वुर है, उसके लिए बेतक़ल्लुफ़ी सी है लेकिन मौत से वो लिहाज़ बरत लेती हैं। ज़िन्दगी तो ख़ैर उनसे ही तक़ल्लुफ़ से पेश आती रही। मीना जी कहती हैं -

एक मर्क़ज़ की तलाश एक भटकती ख़ुश्बू
कभी मंज़िल कभी तम्हीदे-सफ़र हुई जाती है।
और
बस एक एहसास की ख़ामोशी है गूंजती है
बस एक तक़मील का अंधेरा है जल रहा है।

मंज़िल या सफ़र के आमुख के रूप में मौत का ख़याल सीधा है लेकिन मर्क़ज़ की तलाश व भटकती ख़ुश्बू के बहलावे लेकर मीनाजी मौत के लिए लिहाज़ बरत गयीं। एहसास की ख़ामोशी और तक़मील का अंधेरा, तसव्वुर के लिए इस क़दर बेतक़ल्लुफ़ी मीना जी की ज़ात का हिस्सा ही था। फिर ख़ामोशी का गूंजना और उनका अपने ख़यालों से गुफ़्तगू करने का अंदाज़ इस मिसरे की जान है। एक ख़याल और मीना जी के यहां गूंजता है - 

उफ़क़ के पार जो देखी है रोशनी तुमने
वो रोशनी है ख़ुदा जाने कि अंधेरा है।

मीना जी की शायरी के दूसरे पहलुओं की तरफ़ नज़र करें। याद है? पाक़ीज़ा की साहिब जान और वो जुमला - आपके पैर देखे, बहुत हसीन हैं। ज़मीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे। और नज़र के सामने रखा है मीना जी का ये शेर -

आबलापा कोई इस दश्त में आया होगा
वरना आंधी में दीया किसने जलाया होगा।

आंधी में दीया जलाने के लिए हौसला और सब्र चाहिए। कोई आबलापा था, कमाल कर गया। यक़ीनन ये छालों में धड़कते हुए पैर बहुत हसीन रहे हैं। ख़ूब रास आयी मीना जी को यह आबलापाई। उनकी इसी आबलापाई का एक मुक़ाम और क़ाबिले-ग़ौर है - बहती हुई नदिया घुलते हुए किनारे / कोई तो पार उतरे कोई तो पार गुज़रे। ख़्वाहिश भी जैसे एक ज़िद सी है। ज़िद भी यूं कि मासूमियत की इस इंतिहा पर फ़िदा हो जाइए लेकिन हुआ वही जो होता है। ऐसी ख़्वाहिशें पूरी होती दिखती तो ज़रूर हैं लेकिन -

न हाथ थाम सके न पकड़ सके दामन
बड़े क़रीब से उठकर चला गया कोई।

रुपहले पर्दे पर मीना जी के जिये हुए क़िरदार हों या फिर उनके शायराना एहसास और उड़ानें, मैं अक्सर यही देखता हूं कि - पलाश के साये में बैठी मीना / घोलती है रेशम के रंग। फिर इसके बाद खो-सा जाता हूं इन्हीं रेशमी रंगों में। मीना जी एक भरपूर ज़िन्दगी की सूरत और एक मुसाफ़िरे-मुहब्बत की सीरत में नज़्म हो जाया करती है, मुस्कुराना चाहती है तो शेर कहती है - आंखों की कसम दी आंसू को / गालों पे हरदम यूं न ढलक। और कभी उदासी की प्यासी नमी के लिए एक शेर यूं भी कहती हैं - सोचा था ख़ुश्बुओं में से सांसें बसाएंगे / चीखा लहू कि देखना क़ौसे-कुज़ह न हो। आख़िर कतराते-कतराते धनक बन ही गयीं मीना जी। दोनों सिरे दर्द के अथाह समन्दर में डूबे रहे, ऐसी एक सतरंगी ख़ुश्बू।

यक़ायक़ मीना जी का वो दूसरा सिरा पहले सिरे में तब्दील होता है और इस बार इस सतरंगी ख़ुश्बू का उन्वान पढ़ता हूं परवीन शाक़िर। उसी नाम की मुहब्बत के सफ़र पर चल पड़ी एक और ख़ुश्बू। इस दफ़ा सात रंगों की तरतीब तो वही है लेकिन हर रंग की छटा उस महराब से मुख़्तलिफ़। परवीन कहती हैं -

अक़्से-ख़ुश्बू हूं बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाउं तो मुझको न समेटे कोई।

एक आज़ाद परवाज़। एक शिग़ुफ़्ता बयान। उस शाइस्ता क़लाम की रोशनी किसी पहलू की तरह - रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें रुलाये क्यूं। अपने वजूद का एहसास कराने की ज़िद और किसी क़ीमत पर अपने दामन पर किसी और की मीनाक़ारी का बोझ न उठाने के इरादे का इसरार-सा।

Parveen Shakir source - google

परवीन भी नहीं हैं। एक शेर है -

जुनंपसंद है दिल और तुझ तक आने में
बदन को नाव लहू को चनाब कर देगा।

किसी सफ़र की तलाश में थीं। उम्र तो बस तलाश के सफ़र में गुज़ार दी। अपने उस सफ़र पर जाने से पहले मेर लिए अपने एहसास के कई सदबर्ग बतौर इस सफ़र की निशानी छोड़ गयीं। और कहती भी तो हैं - कल के सफ़र में आज की ग़र्दे-सफ़र न जाये। निशानी नहीं कहतीं। कहती हैं ग़र्दे-सफ़र। ठीक ही तो है, सफ़र में धूल मुसाफ़िरों या काफ़िलों की मर्ज़ी से जो नहीं उड़ती। निशानी तो फिर भी हमारे इख़्तियारों की बात है। आख़िर तलाश किसकी थी? कौन से सफ़र पर चली गयीं परवीन..? बड़ी मुद्दत से तनहा थे मेरे दुख / ख़ुदाया मेरे आंसू रो गया कौन। परवीन के आंसू रो गया था कोई, उसी को तलाशने गयी हैं। जिसके आंसू परवीन रो गयी हैं, वो भी परवीन को तलाशता होगा।

परवीन उससे मिली तो थीं - उसके ही बाज़ुओं में और उसको ही सोचते रहे / जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी। जब मिलीं तो जान नहीं पायीं, वही है। उसी को सोचती रहीं। जब रूह के जालों से निजात मिली, वो नहीं था। ये इल्म हुआ परवीन को - बदन मेरा छुआ था उसने लेकिन / गया है रूह को आबाद करके। अब तो सफ़र की पूरी तम्हीद तैयार थी। राह नहीं मिलती थी। सो, तलाश के सफ़र में रहीं और फिर तलाश ख़त्म हुई। एकबारगी बेहोश हो गयीं, कुछ देर में पलट कर देखा, इस सफ़र के पड़ावों पर मुस्कुरा दीं और आंखें मूंदकर चल दीं।

अब अक्सर मिला करती हैं मुझसे। कहा करती हैं मुझे सरापा ग़ज़ल कर दो और किसी किसी गुलाबी नज़्म का लिबास ओढ़ा दो। कहता हूं, नज़्म बुनने के लिए अभी बहुत सा रेशम, बहुत सा सन्दल चाहिए मुझे। कुछ सब्र करो। मगर इसरार करती रहती हैं और इसी तरह की बातों में ख़त्म हो जाता है हमारी मुलाक़ात का वक़्त। कभी अलविदा नहीं कहतीं, मीना जी की तरह ही कहती हैं, फिर मिलेंगे। इन मुलाक़ातों के बारे में सोचता हूं, परवीन का ही शेर है -

उसके वस्ल की साअत हमपे आयी तो जाना
किस घड़ी को कहते हैं ख़्वाब में बसर होना।

नोट्स

कामायनी - विद्वानों की दृष्टि में - भाग तीन


आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी

कामायनी का कथानक या वस्तु विन्यास सरल किन्तु मार्मिक है। ...कामाययनी का वस्तु निर्माण पश्चिमी ट्रेजडी और पूर्वी आनन्द कल्पना के योग से समन्वित होने के कारण समीक्षकों के समक्ष थोड़ी सी कठिनाई उपस्थित करता है। वस्तु विन्यास की द1ष्टि से कामायनी को दुखान्त रचना मान लेने में काई आपत्ति नहीं। उपसंहार के आनन्दात्मक दृश्यों को हम संधियों के परे काव्य की दार्शनिक और आलंकारिक पूर्ति मानकर संतोष कर लेते हैं। कामायनी चरित्र प्रधान रचना नहीं है, जो चरित्र हैं भी, उनमें स्वभावगत विशेषताओं का अधिक निरूपण नहीं हुआ है। वास्तव में, कामायनी के चरित्र जीवन की दार्शनिक इकाइयों के प्रतिनिधि हैं।

महाकाव्यतत्व - जायसी में रूपक और वास्तविक भाव-योजना समान वैशिष्ट्य रखते हैं, शुक्ल जी इसे समासोक्ति पद्धति कहा है। कबीर की पद्धति अन्योथ्कत की है। तीसरी पद्धति प्रकृति काव्य पद्धति है। प्रसादजी की कामायनी की रचना प्राकृतिक भावभूमि पर ही की गयी है यद्यपि उसमें एक दार्शनिक तथ्य निर्देश भी हुआ है। प्रसाद जी भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के अध्येता और अनुयायी हैं। त्रिपुरदाह के रूप में त्रिगुणात्मिका सृष्टि के छन्द का परिहार और उसका सामंजस्य दिखाया है। अतः कामायनी की मूल कल्पना उदात्त है और उक्त उदात्त कल्पना का व्यक्तिकरण भी सफलतापूर्वक किया गया है। प्रसाद की काव्य शैली में नवीनता और उनके भाषा प्रयोगों में पर्याप्त व्यंजकता और काव्यानुरूपता है।
- "कामायनी के मूल्यांकन के कुछ बिन्दु" शीर्षक लेख से अंश

डॉ वचनदेव कुमार

कामायनी में वह सहज संप्रेषणशीलता नहीं मिलती जो रामचरितमानस में विद्यमान है। मानस और कामायनी का स्वरूप प्रबंधात्मक है और दोनों का प्रबंधत्व महाकाव्य पद्धति का है। ...मानस का रस भक्ति रस है जिसे परंपरानिष्ठ शास्त्रियों ने रस नहीं माना है। कामायनी का रस आनन्द रस है, जिसकी चर्चा अभिनवगुप्त ने अभिनव भारती में की है। किन्तु प्रसाद के पूर्व किसी ने प्रबंध के रस के रूप में इसकी प्रतिष्ठा नहीं की।

दोनों के कथानक प्रधानतया इतिहास पर आश्रित हैं इसलिए वस्तु और विस्तार के दृष्टिकोण से साम्य-वैषम्य के अनेक बिन्दु हैं। ...दोनों रचनाओं में जीवन के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति हुई है। वह दृष्टिकोण या दर्शन पर्याप्त प्रेरणास्पद है लेकिन मानस का विराट फलक जितना बड़ा है उतना कामायनी का नहीं। कामायनी में शैव दर्शन का आधार है किन्तु उस शैव दर्शन की परिसीमा उनकी प्रत्यभिज्ञा नाम की शाखा है। अतः दर्शन के स्तर पर भी मानस में जितने मतवादों का समाहरण हुआ है उतने का कामायनी में नहीं।

दोनों ग्रंथों में एक विशेष प्रकार की पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग मिलता है। दोनों में शब्दों के अर्थों का विवेचन दार्शनिक संदर्भों में ही संभव है किन्तु कामायनी में कुछ मनोवैज्ञानिक शब्दों का प्रयोग भी मिलता है। दोनों में अलंकारों, प्रतीकों और बिम्बों का प्रचुर प्रयोग हुआ है। तुलसी अलंकारवादी नहीं थे फिर भी मानस में सभी अलंकार समाविष्ट हो गये हैं। कामायनी में भी सालंकार शैली मिलती है। ...मानस की भाषा शैली में ऐसा बहुत कुछ है जो कामायनी में नहीं है। मानस की भाषा मुख्यतः जनवादी है जबकि कामायनी की अभिजातवादी। मानस में उच्चकोटि की साहित्यिकता के बावजूद भाषा के संप्रेषण की वह व्यापकता है जिसका कामायनी में अभाव रहा है।
- "रामचरित मानस और कामायनी" शीर्षक लेख से अंश

गजानन माधव मुक्तिबोध

कामायनी इस अर्थ में कथा काव्य नहीं है जिसमें साकेत है। कामायनी की कथा केवल एक फैंटेसी है। जिस प्रकार एक फैंटेसी में मन की निगूढ़ वृत्तियों का, अनुभूत जीवन-समस्याओं का, इच्छित विश्वासों और इच्छित जीवन स्थितियों का प्रक्षेप होता है, उसी प्रकार कामायनी में हुआ है। ...फैंटेसी के प्रयोग में, कई प्रकार की सुविधाएं होती हैं। एक तो यह कि जिये और भोगे गये जीवन की वास्तविकता के बौद्धिक या सारभूत निष्कर्षों को जीवन ज्ञान को, कल्पना के रंगों में प्रस्तुत किया जा सकता है।

...प्रसाद जी ने अतीत की भावुक गौरव-छायाओं से ग्रस्त, वेदोपनिषदिक आर्ष वातावरण से अनुप्राणित समाजादर्श से प्रेरित होकर, अपनी विश्व दृष्टि तैयार की। यह विश्व दृष्टि कामायनी में प्रकट हुई। संक्षेप में, कामायनीकार अपने युग से न केवल प्रभावित था, वरन अपनी युग समस्याओं के प्रति उसने बहुत आवेग और विश्वास के साथ प्रतिक्रियाएं कीं।

...जिन प्रसाद जी ने अपने नाटकों और कहानियों में कर्म क्षेत्र के अत्यंत भव्य, वीर तथा संकल्पनिष्ठ चरित्रों को खड़ा किया, आत्मगरिमामय व्यक्तित्वों को उभारा, वे ही प्रसाद जी कामायनी में आकर मनु जैसे अक्षमताग्रस्त चरित्रों को न केवल सहानुभति प्रदान करते हैं वरन उसके उद्धार को, पुनः कर्मक्षेत्र की अग्नि-परीक्षाओं द्वारा उपस्थित न कर मात्र वायवीय दार्शनिक, मानसिक धरातल पर ही प्रस्तुत करते हैं। ...वस्तुतः कहानी कृत्रिम रूप से बढ़ायी जाती है, सिर्फ इसलिए कि उसमें प्रसादजी के दर्शन का प्रदर्शन हो, यह बात अलग है कि उनका रहस्य सर्ग उत्तम है।
- "कामायनी: एक पुनर्विचार" पुस्तक से कुछ अंश

क्रमशः

शनिवार, मार्च 25, 2017

रिपोर्ताज

सोशल मीडिया ने एक घबराहट तो पैदा की है


पिछले दिनों भोपाल में पत्रकारिता के क्षेत्र में एक सम्मान समारोह व परिचर्चा का भव्य आयोजन हुआ। चर्चित पत्रकार रहे श्री भुवन भूषण देवलिया की स्मृति में आयोजित इस पुरस्कार समारोह व परिचर्चा में भोपाल और मध्य प्रदेश के दर्जनों पत्रकारों ने उपस्थिति दर्ज करायी और पत्रकार कालोनी में स्थित सप्रे संग्रहालय का सभागार लगभग पूरा भर गया। भुवन भूषण देवलिया राज्य स्तरीय पुरस्कार इस साल इंदौर के युवा पत्रकार श्री अर्जुन रिछारिया को वेब पत्रकारिता क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियों के आधार पर प्रदान किया गया। यह पुरस्कार समिति को बधाई देने का उपक्रम है क्योंकि युवाओं की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें प्रोत्साहित करने का जो निर्णय लिया गया, वह स्वागत योग्य है।

मेरे लिए व्यक्तिगत तौर पर उपलब्धि है अर्जुन को पुरस्कृत किया जाना क्योंकि अर्जुन ने अपनी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में मेरे साथ कार्य किया है और तबसे हम दोंनों घनिष्ठ मित्र रहे हैं या वह मेरे अनुजवत रहा है। अर्जुन को बधाई देते हुए कार्यक्रम के दूसरे पहलू पर विमर्श किया जाना अभीष्ट है।

समारोह का दूसरा पहलू था परिचर्चा जिसका विषय "सोशल मीडिया : अवसर और चुनौतियां" रखा गया था। इस विषय पर विमर्श करने के लिए मंच पर उपस्थित थे श्री राजेश बादल और श्री प्रदीप कृष्णात्रे। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मप्र सरकार में कुछ ही समय पहले मंत्री बने श्री विश्वास सारंग। जैसा कि राजनीतिकों के साथ अक्सर होता है, श्री सारंग भी देर से आये और तब तक लगभग विमर्श का आधा हिस्सा संपन्न हो चुका था। श्री सारंग ने अपनी बात एक राजनीतिक दृष्टिकोण से रखते हुए यह सिद्ध करने की कोशिश की कि सोशल मीडिया कभी-कभी हदें पार कर जाता है, नैतिकता की सीमाएं लांघ जाता है, जनभावनाओं को आहत कर जाता है और कभी-कभी बेलगाम हो जाता है। इस तक़रीर के बाद श्री सारंग यह कहने से भी नहीं चूके कि इस पर सोशल ऑडिट करने की ज़रूरत है। लगाम लगाने के उपाय ढूंढ़ने होंगे। कुछ नियम कानून बनाने होंगे। कुछ अंकुश लगाने का प्रबंध करना होगा। आदि आदि।

इधर, श्री राजेश बादल ने एक गंभीर नोट से बात शुरू की लेकिन वह भी सोशल मीडिया के ख़िलाफ़ ज़्यादा नज़र आये। उनकी दृष्टि में भी सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफॉर्म नज़र आया जो अनियंत्रित है और जिस पर नियंत्रण होना शायद इस समय की सबसे बड़ी समस्या है जिसे पहली प्राथमिकता में हल करना चाहिए। वास्तव में, श्री बादल और श्री सारंग दोनों की चिंता कुछ दिन पहले हुई जेएनयू की घटनाओं को लेकर थी जिस पर सोशल मीडिया अधिक वाचाल हो उठा था और एक तरह से सत्ता के खिलाफ़ खड़ा हो गया था। और ऐसी ही कुछ अन्य घटनाओं को लेकर भी जहां सत्ता के विरोध के स्वर उठते हैं।

बताता चलूं कि श्री बादल राज्यसभा टीवी चैनल में एक प्रमुख पद पर हैं। पहले भी वह लंबे समय तक दूरदर्शन के लिए विभिन्न पदों पर रह चुके हैं। और श्री सारंग ने वक्तव्य में कह ही दिया कि उनकी शुरुआती राजनीति के कुछ कार्यक्रमों को श्री बादल ने ही कवर किया था तो दोनों के एक सुर में बात करने के पीछे का राज़ आप समझ सकते हैं।

इन दोंनों सम्माननीयों के अलावा जो वक्ता थे, श्री प्रदीप कृष्णात्रे, वह अपने वक्तव्य में लगभग विपरीत स्वरों में बात करते दिखे। उनकी दृष्टि में सोशल मीडिया कोई हानिकारक प्लेटफॉर्म नहीं है बल्कि देश के हर नागरिक के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार मुहैया कराने वाला एक मंच है। इन वक्तव्यों के बाद हुई परिचर्चा में दो-एक सवालों के जवाब में भी श्री प्रदीप कृष्णात्रे ने यह स्पष्ट किया कि जेएनयू में हुई हालिया घटनाओं पर सोशल मीडिया में जो भी संवाद या विमर्श हुआ, वह इतना बड़ा मुद्दा नहीं है जिसके कारण सोशल मीडिया पर किसी तरह के प्रतिबंध की बात उठायी जाये।

तीनों वक्तव्यों के बाद मेरे मन में सवाल था लेकिन मंच को जल्दी थी सभा भंग करने की तो जो सवाल-जवाब सत्र 15 मिनट का होना था, वह 5 मिनट में दो-एक सवालों के बाद ही समाप्त कर दिया गया।

लेकिन विचार व प्रश्न यहां उपस्थित है -

तुम्हारे पास है डायस तुम्हारे पास है माइक
तुम्हारा शोर ज़्यादा है जो मेरा हो नहीं सकता।

श्री विजय वाते का यह शेर पूरी व्यवस्था और आम आदमी की आवाज़ के संकट को सीधे संप्रेषित करता है। सोशल मीडिया ने कुछ न किया हो, मगर इतना तो किया है कि आम आदमी, जिसकी आवाज़ दिल्ली तो दूर किसी राजधानी के कान तक नहीं पहुंचती, अपनी बात कह सकता है, अपना रोना रो सकता है, अपना मत रख सकता है। सत्ता और पत्रकारों की चिंता क्या यह है कि अगर आम आदमी बोलने लगा तो हम क्या करेंगे? क्या इसलिए सत्ता और सत्ता के पैरोकार कुछ पत्रकार सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या लगाम लगाने की वक़ालत कर रहे हैं कि आम आदमी की आवाज़ कुचल दिया जाये? क्या यह अपनी सत्ता के दंभ और व्यवस्था को अपने हाथ में बचाये रखने के लिए बौखलाहट नहीं है?

और अंतिम प्रश्न - क्या मतदाता 5 साल में एक बार अपना मत देकर सरकार चुनेगा और 5 साल तक खामोश बैठा रहेगा? एक बार मतदान के बाद अगर सोशल मीडिया उसे यह सहूलत दे रहा है कि वह चुने हुए जनप्रतिनिधियों के हर काम पर अपना मत प्रकट कर सके, तो क्या यह सत्ता को नागवार गुज़रना चाहिए? क्या सोशल मीडिया अभिव्यक्ति को जन सामान्य का मत स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए?

शुक्रवार, मार्च 24, 2017

यादें

दर्द की सिगरेट.. इल्हाम का धुआं.. अदब की राख..


1919 में जन्मीं 20वीं सदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण लेखकों में शुमार या शायद सर्वाधिक महत्वपूर्ण लेखक अमृता प्रीतम 2005 में दुनिया को सूना कर गयी थीं, तब उनके लिए एक यादनुमा लेख लिखा था। मामूली संशोधनों के बाद वही लेख...


पाकिस्तान के एक अंग्रेज़ी अख़बार ने अमृता प्रीतम के अदबी क़द के हवाले से स्वीडन की नोबेल प्राइज़ कमेटी को उनकी तरफ़ तवज्जो देने की बात कही। हिन्दुस्तान में भी इस तरह की बात किसी ने उठायी हो। दुनिया के लिए दुनिया का अदब मुहैया कराने वालों में अमृता प्रीतम का नाम यक़ीनन लिया जा सकता है। जब दुनिया भर का दर्द, एक बड़े कैनवास पर रूह की सत्हों को साथ लेकर दर्ज किया जाता है तो देश, भाषा और विधा के बन्धनों को तोड़ देता है और दिल-दिमाग़ में उतर जाने का तकाज़ा करता है। एक हद इल्म की और एक हद इश्क़ की अगर मुक़र्रर की जा सकती है तो मानता हूं कि एक हद किसी मुल्क़ की तय हो सकती है। सारी धरती, सारा आसमां और इसके परे का सारा कुछ किसी का हो जाये तो फिर? जो पूरी दुनिया से मुहब्बत कर बैठे, उसे दुनिया यह कहकर नहीं नज़रअंदाज़ कर सकती कि वह फ़लाने मुल्क़ की मिट्टी की उपज है। बात सिर्फ़ मिट्टी की है, मिट्टी की मिट्टी से मुहब्बत की है। मिट्टी की तासीर है रचना और मिट्टी से मुहब्बत के मायने हैं रचना के लिए रचना। अगर मुहब्बत मिट्टी ही कर रही है तो रचने वाला रचने वाले के लिए ही रचने की तमन्ना कर रहा है। यही तमन्ना, यही तड़प रचने वाले की एक अमिट छाप बनती है यानी मिट्टी की एक न मिटने वाली छाप। ऐसी ही किसी छाप का नाम तसव्वुर में आता है तो अमृता प्रीतम की तस्वीर उभरती है।

Amrita Pritam source - google

जिस साल के माथे पर चिताएं सुलग रही थीं, बारूद हवा में घुली हुई थी और ज़िन्दा-जावेद लोग ख़ाक़ के एक ढेर से ज़्यादा कुछ नहीं थे, उस साल एक ऐसे मासूम ने इस ज़मीन पर अपनी आंखें खोलीं जो दर्द की सिगरेट की तरह सुलगा सकने का माद्दा रखता था। इस सिगरेट से उठने वाले धुएं को इल्हाम का वक़ार देने की ताक़त उसमें थी और इसी सिगरेट की राख को अदब से झाड़कर अपनी पहचान बनाने का हुनर उसमें था। उसने साबित किया कि इश्क़ का मस्लक़ हर दौर में अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित कर सकता है। मासूम इश्क़ के धागों में गूंथी गयी अमृता प्रीतम की रूह एक दीये की तरह दुनिया को रोशन करती रही मगर दीये की तरह ही उसकी अंदरूनी सत्हों का रंग अंधेरा ही राह। यह इस सच का सबूत है कि अंधेरे पीने की हिम्मत रखने वालों के नसीब में ही उजाले की नेमतें बांटने के फ़र्ज़ लिखे होते हैं। साहिर से मुहब्बत करने वाली अमृता और इमरोज़ को चाहने वाली अमृता दो नहीं एक है, लेकिन एक के दोनों क़िरदार पाकीज़ा हैं। ख़ैर, यहां उनके अदब से रूबरू होते हैं।

रसीदी टिकट में अमृता ने लिखा है कि "वारिस शाह की बेल को दिल का पानी दिया था, दिल का भी, आंसुओं का भी", यह जुमला उनकी पूरी अदबी विरासत का जैसे सूत्र वाक्य है। कुछ जुमले और हैं जिनमें मुझे अमृता के रचना संसार की रूह दिखती है। ये जुमले उन्होंने एक नज़्म में दजै किये हैं। नज़्म का उन्वान है "अमृता प्रीतम" - 

एक दर्द था / जो सिगरेट की तरह / मैंने चुपचाप पिया है
सिर्फ़ कुछ नज़्में हैं / जो सिगरेट से मैंने / राख की तरह झाड़ी हैं

सिगरेट को अगर किसी रूप में समेटा या सहेजा जा सकता है तो वह राख का रूप है। धुआं सिगरेट तक रहता है लेकिन उसकी महक सदियां भी महका सकती है। ज़मीनी बात है दर्द, कैसा दर्द? किसका दर्द? कितना और किसके लिए दर्द को सिगरेट की तरह पीना पड़ा? सिलसिलेवार सारे सवालों के जवाब अमृता के अदब के साये में देखते हैं।

ऐसा दर्द जिसकी न कोई शुरुआत है, न कोई इख़्तिमाम। गोया कि - न था कुछ तो दर्द था, कुछ न होता तो दर्द होता... दर्द भी वो जिसमें इश्क़ सांस लेता है और इल्हाम बुलंद होता है। ऐसा दर्द जो आदमी को नेक इंसान बनाता है। एक अरसे में अपना वजूद उस दिल और जान के वजूद के साथ इस तरह जोड़ देता है कि अद्वैतवाद और गुद्ध का दुखवाद सच्चा ही नहीं, अच्छा लगने लगता है।

उसका दर्द जो न कभी जन्मा है न कभी मरा है। जिसका वज्द बिंदु भी है और अनंत भी। दर्द उसका जिसका धर्म, कर्म, मर्म सिवाय मुहब्बत के कुछ नहीं। दर्द उसका जो कभी नहीं था, जो अब भी नहीं है और शायद कभी होगा भी नहीं, बावजूद इसके जो हमेशा से कहीं है, अब भी कहीं है और हमेशा कहीं होगा। हर हाल में जिसको तलाशना हैख् उसका दर्द और उसको तलाशने का रास्ता इश्क़ की तमाम गलियों की सैर कराता है। गोया कि - जब कभी कोई दिल दरबदर हो गया / हुस्न से इश्क़ तक का सफ़र हो गया।

इतना दर्द, जिसका ओर-छोर नहीं, इतना जो कई सौ सदियों में समा न सके और एक दिल में समा जाये। इतना दर्द जितना एक सृजन के लिए चाहिए और उस सृजन को मिटा देने के वक़्त चाहिए। दर्द इतना जितना, हीर, सोहनी और शकुंतला के हिस्से में आया और इतना जो उनके हिस्से में आ नहीं पाया। दर्द इतना कि दुनिया को रोशनी मिले, बलन्दी मिले, तरक़्क़ी मिले और एजाज़ मिले। दर्द इतना, जितना हो सके।

सबसे पहले दर्द के लिए, फिर अपने लिए और फिर सबके लिए। दर्द उसके लिए भी जिसके लिए सब कुछ है। उसके लिए भी जिसके लिए कुछ नहीं। उसके लिए जिसके लिए दर्द का वजूद है और उसके लिए भी जिसका वजूद ही दर्द के लिए है। दर्द पूरी क़ायनात के लिए, हर फूल, हर नूर, हर सच, तमाम ख़ुश्बुओं और सभी आने-जाने वालों के लिए। हर उस भावना, संवेदना और कल्पना के लिए जो दुनिया को ख़ूबसूरत करना चाहती है।

ऐसे, इसके, इतने और इसके लिए दर्द को अमृता ने एक सिगरेट की तरह पिया, चुपचाप। अमृता की कहानियों, उपन्यासों और कविताओं में भारतीयता के मूल्यों का लिबास पहने विश्व दृष्टि से सराबोर यह दर्द एक कैनवास पर सबसे बड़ा सच दर्ज कराता है कि अपने एहसासों के दायरों में सिमटना ख़ुदगर्ज़ी ही नहीं गुनाह है। अपने घावों से दूसरों को मरहम देना सीखना होगा। अमृता के क़िस्सों और नज़्मों में दरिया का सा असर होता है। और यहीं से मैं सूत्र वाक्य को छूना शुरू करता हूं -

अज आखां वारिस शाह नूं / कित्तो क़ब्रां विच्चो बोल

मुमक़िन नहीं कि पांचों दरियाओं का रंग लाल और पंजाब का सारा जिस्म नीला पड़ जाये और ऐसे वक़्त में अमृता की यह आवाज़ वारिस शाह तक न पहुंचे। बेशक़ पहुंची और वारिस शाह का पैग़ाम भी उन्हें मिला इसलिए तो सारी फ़ज़ा में इश्क़ के रंग भरने के लिए वो बतौर हल एक तक़रीर अपनी नज़्म "सोख़्ता" में देती हैं -

सो इस तरह जिस भी / सोख़्ते पर जितने भी हर्फ़ हैं / वह असली इबारत के उल्टे हैं... और फिर धीरे-धीरे अमृता महसूस करती हैं कि वारिस शाह का पैग़ाम उन तक नहीं आया बल्कि उनकी तड़पती आवाज़ सुनकर ख़ुद वारिस ही चले आये हैं और इस दौर में वारिस शाह का नाम अमृता हो गया है -

कि पत्थरों के नगर में / जो वारिस की आग थी
यह मेरी आग भी / उसी की जांनशीन है
आग, आग की वारिस

अमृता ने वारिस शाह की बेल को दिल का पानी दिया था और रूह से दिया था इसलिए वारिस शाह अमृता बनने के लिए मजबूर हो गये। यह कोई मनोवृत्ति या विसंगति नहीं बल्कि आध्यात्मिक उत्कर्ष है। "अहं ब्रह्मास्मि" वाली स्थिति है। इस बुलन्दी पर पहुंचना आसान नहीं है। इसके लिए ऐसा, इसका, इतना और इसके लिए दर्द को एक सिगरेट की तरह चुपचाप पीना पड़ता है। अपनी जाति, धर्म, देश से उठकर पूरी क़ायनात को अपनी सोच का हिस्सा बनाना होता है। अमृता की एक और नज़्म है - "ऐश-ट्रे", शुरुआत यूं है -

इल्हाम के धुएं से लेकर / सिगरेट की राख तक
उम्र का सूरज का ढले / माथे की सोच बले
एक फेफड़ा गले / एक वीयतनाम जले

कभी-कभी सोचता हूं कि इस दौर में सियासत, नफ़रत, अलगाव और भेद भाव इतना क्यूं है कि शक़ होता है, अगर कबीर और ग़ालिब बीसवीं सदी में का हिस्सा होते तो क्या उन्हें साहित्य के सबसे बड़े सम्मान नोबेल प्राइज़ से नवाज़ा जाता?