मंगलवार, अप्रैल 07, 2020

बात जारी...

क्या औरतें कर सकती हैं मुस्लिम स्टेट का नेतृत्व?


बात जारी... ब्लॉग पर एक नयी श्रेणी, जिसके तहत उन किताबों/लेखों/साहित्य पर संवाद करेंगे, जिसका लेखन किसी समय में किया गया हो, लेकिन उठाये गये मुद्दे/प्रश्न अब भी प्रासंगिक हैं और उन पर समसामयिक संदर्भों में भी समझ विकसित करने की गुंजाइश है. पहली कड़ी में इसी शीर्षक से 1991 में अंग्रेज़ी में पुस्तिका रूप में छपे फ़ातिमा मर्निसी के लेख पर/के बहाने चर्चा.



फ़ातिमा मर्निसी की छोटी सी किताब 'CAN WE WOMEN HEAD A MUSLIM STATE' बहुत बड़े मुद्दे को बख़ूबी समेटते हुए औरतों के बुनियादी हक़ को लेकर एक इनसाइट देती है और फ़ेमिनिज़्म (ख़ासकर इस्लाम संदर्भ में) को समझने के लिए आपका कौतुक और बढ़ता है. अगर आप दुनिया के राजनीतिक संदर्भों से थोड़ा बहुत वास्ता रखते हैं तो समझ सकते हैं कि यह किताब 1991 के आसपास क्यों सामने आती है. पाकिस्तान में लंबी राजनीतिक अस्थिरता के बाद लोकतंत्र की एक तरह से बहाली हुई थी और बेनज़ीर भुट्टो चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनी थीं. यह 1980 के दशक के आख़िरी सालों में हो रहा था. दूसरी तरफ, 1993 में ख़ालिदा बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनने जा रही थीं और इससे पहले के कुछ सालों में वह बतौर नेता उभर रही थीं.

एक तरफ़, सिंगापुर जैसे ग़ैर मुस्लिम देश में जब हलीमा ​बिंती याकोब जैसी एक महिला राष्ट्रपति के पद पर आसीन होती है, तो ज़्यादा बवाल नहीं होता, लेकिन बांग्लादेश में शेख़ हसीना के शीर्ष पद पर बने रहने के कारण समय समय पर इस्लामी आलिमों का एक वर्ग औरतों के ख़िलाफ़ कोई न कोई राग छेड़ता रहता है. इस पूरे परिदृश्य को लेकर इस्लाम के पितृसत्तात्मक समाज के कुछ बड़े ख़य्यामों ने यह सवाल खड़ा किया कि औरतों के नेतृत्व को धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक़ क़बूल नहीं किया जा सकता. औरतों से यह हक़ छीनने के लिए जो बहस छेड़ी गयी थी, उसे एक आधार देने के लिए एक हदीस का सहारा लिया गया. यह हदीस इस तरह है :

"जो लोग अपने मुआमले एक औरत की निगरानी में या औरत के सुपुर्द करते हैं, वो संपन्नता को कभी नहीं समझेंगे."

यह हदीस वाक़िई एक बड़ा बयान है और धर्म के आधार पर इस हदीस की दलील पर औरतों को उनके हक़ से महरूम किया जा सकता है. लेकिन, बात उतनी नहीं होती, जितनी दिखायी या सुनायी देती है. इस हदीस की व्याख्या को समझने के लिए एक पूरा इतिहास और नज़रिया चाहिए ताकि सही कसौटी पर इसे तोलकर तय किया जा सके, कि यह कितनी बड़ी या संजीदा दलील हो सकती है.

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मज़हबी दलील के जवाब में मज़हबी दलीलें


फ़ातिमा की यह आलेखनुमा पुस्तिका इस हदीस का इतिहास टटोलती है, इस हदीस के लेखक और पैग़म्बर के अनुयायी अबू बक़्र के चरित्र और जीवन अनुभव से बने नज़रिये को परखती हैं, साथ ही, पैग़म्बर के ऐसे कई हवाले प्रस्तुत करती हैं, जो औरतों के हक़ में रहे हैं. शेख़ ग़ज़ाली की 1990 में तहलक़ा मचाने वाली किताब का ज़िक्र करते हुए पहली दलील तो फ़ातिमा यही देती हैं कि अगर किसी मुद्दे पर हदीस और क़ुरआन की व्याख्या में अंतर आता है, तो क़ुरआन को तरजीह दी जाये, यही क़ाइदा है क्योंकि यह इस्लाम की दिव्य पुस्तक है, इसके आगे कुछ नहीं.

कुल मिलाकर, यह पुस्तिका क़ुरआन के कई किस्सों और हवालों की चर्चा करते हुए इस हदीस की व्याख्या को समझने के दौरान पाठक को समृद्ध करती हुई इस तार्किक नतीजे पर पहुंचती है कि औरतों को नेतृत्व का हक़ है और इस्लाम में ऐसी कोई मनाही नहीं है कि औरतें शीर्ष राजनीतिक पदों पर न पहुंच सकें. लेकिन, फ़ातिमा इस चर्चा के साथ ही मुसलमान औरतों को चेतावनी देती हैं कि उन्हें इस्लाम की सही व्याख्याओं को समझना होगा, ताकि पितृसत्तात्मक सोच की व्याख्याएं उन्हें उनके बुनियादी अधिकारों से महरूम न कर दें. फ़ातिमा के शब्दों में :

"इन हालात में पुरुष अपनी इस्लामी विरासत से बेख़बर रहने का जोख़िम उठा सकते हैं, लेकिन हमारे पास यह महंगी सुविधा नहीं है."

उपसंहार में और मुद्दों पर बात की गुंजाइश..


एक और अहम पहलू फ़ातिमा इस आलेख में छेड़ते हुए महिलाओं से अपील करती हैं कि वो मोहम्मद साहब की जीवनी और उनके संदेश तो समझें ही, साथ ही उनकी पत्नियों की जीवनी और उनसे जुड़े इतिहास से भी गुज़रें ताकि इस्लाम में औरत को लेकर अंतर्निहित मूल भावना को सही सही समझ सकें. इसके लिए इस आलेख में फ़ातिमा ने मोहम्मद साहब की पत्नियों से जुड़े कुछ वाक़ये भी प्रस्तुत किए हैं और समझाया है कि इस्लाम और मोहम्मद साहब की नज़र में औरतों की जगह और मर्तबा इज़्ज़त का था, हिक़ारत का नहीं. इस बात को एक उदाहरण के उजाले में देखें :

पैग़म्बर मुहम्मद की परंपराओं व शिक्षाओं को शामिल करने वाली किताब 'सहीह मुस्लिम' में, मुहम्मद साहब के साथी रहे अबू हरैरा ने उल्लेख किया है कि "एक शख़्स मुहम्मद साहब के पास आकर बोला : 'तमाम लोगों में मेरे हाथों सबसे अच्छे सलूक़ का हक़दार कौन है?' मुहम्मद साहब ने कहा: 'तुम्हारी मां.' उसने फिर पूछा: उसके बाद? उन्होंने कहा: फिर तुम्हारी मां. फिर उसने पूछा: फिर कौन? उन्होंने कहा: फिर तुम्हारी मां. उसने फिर पूछा: फिर? तब मुहम्मद साहब ने कहा: इसके बाद तुम्हारे पिता." इस उदाहरण के ज़रीये कई विद्वान इस्लाम और क़ुरआन में महिलाओं के रुतबे और उनके तमाम अधिकारों की वक़ालत करते हैं.1

इस्लाम और फ़ेमिनिज़्म


यहां से चर्चा छिड़ती है कि इस्लाम में फ़ेमिनिज़्म के क्या मायने हैं. जिनके जवाबों से हम इस पहलू को समझेंगे, वो सवाल ये हैं : 1. क्या इस्लाम में औरतों की स्थिति अन्य धर्मों के बरक़्स ज़्यादा ख़राब है? 2. क्या 'इस्लामी फ़ेमिनिज़्म' कोई अलग और जायज़ मुहावरा है? 3. क्या इस्लाम में धार्मिक होना और फ़ेमिनिस्ट होना एक साथ संभव है? फ़ातिमा की किताब से इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों के ख़िलाफ एक बड़े ख़ेमे के डटे होने के संकेत साफ़ मिलते हैं और यहां से मुस्लिम स्टेट में महिलाओं के तमाम हुक़ूक की लड़ाई के अध्याय खुल जाते हैं.

Creative image of Fatima Mernissi. (Image : AWID)

सबसे पहले, तो ये समझना ज़रूरी है कि दुनिया में औरत और मर्द के बीच का संघर्ष प्रजातीय है यानी लैंगिक भेदभाव किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि पूरी मानव जाति की है. जब यह संघर्ष इस्लाम या इस्लामी देशों के संदर्भ से जुड़ता है तो धार्मिक आधार, संदर्भ और व्याख्याएं बदल जाती हैं. जैसे यदि इस संघर्ष को भारत के हिंदू समाज में देखा जाएगा तो महिलाओं की स्थिति के लिए हिंदू धर्म के संदर्भ, जातिगत आधार और धार्मिक व्याख्याएं सामने आएंगी. इसी तरह किसी भी एक ख़ास समुदाय में विमर्श के औज़ार बदल जाएंगे, लेकिन समस्या और उसकी मूल भावना में मानव अधिकार के तर्क तो वही रहेंगे.

ईरान बेस्ड फ़ेमिनिस्ट वैलेंटाइन मोगहादम के शब्दों में क़ुरआन एक खुली किताब है और इससे जो सबक़ मिलते हैं, उनके सार में अंतर्निहित है कि 'इस्लाम में दूसरे प्रमुख धर्मों की तुलना में पुरुष प्रभुत्व ज़्यादा या कम नहीं है. ख़ासकर, हिंदू धर्म और यहूदी व ईसाई जैसे दोनों अब्राहमी धर्मों में यही हालात हैं कि औरत को बीवी और मां के तौर पर ही मूर्त कर दिया गया है.' 2

इस उद्धरण से एक और साज़िशी सोच सामने आती है कि औरत को मां, बीवी जैसे जीवन आदर्शों में क़ैद कर दिया गया ताकि वह घर की चहारदीवारी में ज़िंदगी गुज़ार दे. मर्द के लिए पिता या पति जैसे आदर्श उसके पूरे जीवन चरित्र का एक हिस्सा भर हैं, पूरा जीवनादर्श नहीं. वह महत्वाकांक्षा, सफलता, वीरता, न्याय और नेतृत्व जैसे कई आदर्शों के जीवन के लिए मुक्त है. इसी का नतीजा है कि महिलाओं की शिक्षा, जागरूकता, सुरक्षा और समान अवसरों की स्वतंत्रता जैसे अधिकार सदियों के परदे या रूढ़िवादी सोच तले संघर्षरत हैं.

अपनी किताब 'वीमन एंड जेंडर इन इस्लाम' में लीला अहमद ने अरब इतिहास के प्राचीन समय से आधुनिक काल तक महिलाओं पर लैंगिकता पर केंद्रित विमर्श के बारे में संवाद किया है. उन्होंने ज़ोर दिया है कि इस्लाम में लैंगिक संदर्भ, अस्ल में, पुरुष की बनायी वैधानिक व्यवस्था के उत्पाद रहे हैं या पुरुष प्रधान समूहों के प्रभुत्व में रहे हैं. 'नैतिक इस्लाम' ऐसे हाथों में रहने के कारण न्याय, धर्मनिष्ठा और ईश्वर के समक्ष सबकी समानता जैसे संवाद हमेशा पिछड़े रहे हैं.3

क्या 'इस्लामी फ़ेमिनिज़्म' जायज़ मुहावरा है?


इस सवाल का जवाब है, नहीं. ऐसी किसी टर्म का इस्तेमाल उसी विमर्श का हिस्सा है जैसे आप 'इस्लामी आतंकवाद' या 'हिंदू आतंकवाद' जैसे शब्द ईजाद करते हैं. जैसे आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़कर प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, वैसे ही औरतों के हक़ की लड़ाई एक वैश्विक संवाद है, इसे धर्म विशेष में बांधने के अपने ख़तरे और सियासत है, जिसे समझना चाहिए. ऐसा करने से दुनिया की मुस्लिम महिलाओं और दुनिया की मुख्यधारा की महिलाओं के संवाद के बीच एक खाई बन जाती है.

A text page Excerpt from Fatima's book.
इस्लाम और महिलाओं जैसे केंद्रीय विषय पर मशहूर लेखक और फ़ेमिनिस्ट डॉक्टर फ़ातिमा सीदत का मानना है कि क़ुरआन के आधार पर नारीवाद किस तरह अस्तित्व रखता है, इसके बारे में बातचीत ज़रूरी है. 'फ़ेमिनिज़्म एंड इस्लामिक फ़ेमिनिज़्म' लेख में सीदत ने समझाया है कि 'इस्लामिक फ़ेमिनिज़्म' जैसे शब्द विन्यास मुस्लिम जगत को अलग-थलग कर सार्वभौमिक नारीवादी आंदोलनों और बाक़ी दुनिया से विलग कर देते हैं.4

तार्किकता के बावजूद यह टर्म अब भी इस्तेमाल की जा रही है, यहां तक कि विकिपीडिया पर 'इस्लामिक फ़ेमिनिज़्म' शीर्षक से एक पूरा विस्तृत पेज है. इसके अलावा महिलाओं के अधिकारों के विमर्श में ईस्ट और वेस्ट के साथ ही धार्मिक और सेक्युलर जैसे अंतर भी डाले गये हैं, लेकिन 'ऐसे विभाजनों को इस्लामी नारीवाद खारिज करता है. इस तरह की दरारों को उपनिवेशवाद ने सींचा और बाद में, इस्लामियों की कट्टर और विरोधी ताक़तों ने इनका राजनीतिकरण किया'.5

इस्लामी फ़ेमिनिज़्म के मुहावरे का एक और कारण मुस्लिम आबादी का ग़ैर मुस्लिम यानी पश्चिमी देशों में बसे होना है. पश्चिमी देशों की मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई की अपनी चुनौतियां हैं क्योंकि उनके अधिकारों को उनके धार्मिक परिदृश्य में समझने के नज़रिये और व्यवस्थाएं पश्चिमी देश अपनाते रहे हैं. ऐसे में 'पश्चिमी देशों में बहुसांस्कृतिक नीतियां अस्ल में, इस्लाम की पुरुषप्रधान संरचना पर आधारित हैं, इससे होता यह है कि नारी पर पुरुष के प्रभुत्व को थोपे जाने से महिलाएं अक्सर असुरक्षित हो जाती हैं और कभी कभी तो धर्म के नाम पर हिंसक बर्ताव की भी अनदेखी कर दी जाती है.' 6

धार्मिकता और फ़ेमिनिज़्म का सवाल


अस्मा बर्लास अपनी किताब 'बिलीविंग वीमन' में क़ुरआन की 'अनरीडिंग' की समझ की बात करते हुए कहती हैं कि अब तक क़ुरआन की व्याख्या पुरुषवादी रही है, जिसे भूलकर इस्लाम में लैंगिक समानता के आधारों को समझने की ज़रूरत है.7 इस्लाम में, अस्ल में, जब औरतें अपने अधिकारों की बात करती हैं, तो सबसे पहले उन्हें धर्म के अखाड़े में पहलवान की तरह उतरने की ज़रूरत होती है, जहां वह महिला विरोधी पहलवानों के गैंग को धूल चटा सकें. इसी कारण, फ़ेमिनिज़्म जब इस्लाम या इस्लामी देशों में पहुंचता है तो धर्म आधारित विमर्श के बग़ैर उसका गुज़ारा होता नहीं. फ़ातिमा मर्निसी ने भी इसी तरह धार्मिक दलीलों को धार्मिक दलीलों से ही काटकर औरतों के हक़ की राह मुनव्वर करने की कोशिश की.

इसका दूसरा पहलू ये है कि औरतें अगर अपने अधिकारों की बात करती हैं, तो एक बड़ा ख़ेमा है जो उन्हें अधार्मिक, धर्मविरोधी या धर्म के लिए ख़तरा तक क़रार दे देता है. इसका उदाहरण यह है कि मोहम्मद की पत्नियों की भूमिका पर ऐतिहासिक संदर्भों में चर्चा करने वाली फ़ातिमा की मशहूर किताब 'द वील एंड द मेल एलीट : ए फ़ेमिनिस्ट इंटरप्रिटेशन ऑफ इस्लाम' को मोरक्को, ईरान, अरब देशों और फ़ारस की खाड़ी इलाके में प्रतिबंधित कर दिया गया था.8

यह समस्या बड़ी है क्योंकि किसी भी रूढ़िवादी और परंपरागत समाज में खुली खिड़कियां कम होती हैं और ऐसे में कई शब्दों को उसके वास्तविक अर्थों में नहीं बल्कि भ्रामक अर्थों में समझा जाता है. जैसे सेक्युलर. न सिर्फ़ फ़ेमिनिज़्म बल्कि किसी भी विमर्श में हमेशा एक ख़ेमा सेक्युलर शब्द को धर्म विरोधी या अधार्मिक के अर्थ से ही जोड़ता है, यह भूलकर कि एक सेक्युलर राज्य का मतलब ही यही होता है कि वह धर्म की आज़ादी सुनिश्चित करता है.

'लैंगिकता के इस्लामी विमर्श जो संलग्न हैं, वो महिलाओं और ख़ासकर, उलझी हुई पहचानों से ग्रस्त मेरे जैसी महिलाओं, द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियों पर प्रतिक्रिया देने की कोशिश कर रहे हैं. वो महिलाएं जो अपने फ़ेमिनिज़्म का सामंजस्य अपने अक़ीदे के साथ चाहती हैं.'9

मूलत: ईरान से ताल्लुक रखने वाली कानून की विद्वान और मशहूर फ़ेमिनिस्ट लेखिका ज़ीबा मीर होसैनी का यह बयान न सिर्फ़ विचारणीय है बल्कि इस्लाम के विद्वानों के सामने एक बड़ी चुनौती है. इस्लाम में औरतों की स्थिति और उनके अधिकारों को लेकर एक ऐसा माहौल और आदर्श तय करने का समय लगातार बना हुआ है, जिसे धर्म का कोई अखाड़ा नकार न सके. और जब तक ऐसा नहीं होता, औरतों के हक़ की लड़ाई जारी रहना चाहिए. जब तक मर्दों के 'तक़्सीम चौराहे' दुनिया में रहें, तब तक औरतों की 'तहरीर चौक' का वजूद भी लाज़िम है.

संदर्भ सूची
1, 4. - 'इस्लामिक फ़ेमिनिज़्म' - विकिपीडिया लेख
2, 3, 7, 9. - द लाइब्ररी ऑफ कांग्रेस द्वारा प्रकाशित प्रिसिला आफ़ेनहार कृत 'वीमन इन इस्लामिक सोसायटी'
5, 6. - 2008 में मार्गट बादरान का गार्जियन पर लेख 'इस्लाम्स अदर हाफ' (Islam's Other Half)
8. - राकेल एविता सरस्वती का लेख Fatima Mernissi: Going Beyond The Veil To Fight Misogynist Interpretations Of Islam

शनिवार, अप्रैल 04, 2020

कार्यशाला

समीक्षा और आलोचना में अंतर


ब्लॉग पर यह एक प्रयास है, जिसके माध्यम से आपके साथ मैं भी समझूंगा और मेरे साथ आप भी कुछ समझ सके, तो बात बन जाएगी. साहित्य की दो स्थापित विधाओं के अंतर को पहले पूर्ववर्ती लेखकों के विचार,​ फिर थ्योरिटिकली और चार्ट रूप में और फिर उदाहरणार्थ लेखन के रूप में यहां प्रस्तुत करने की चेष्टा है. इस प्रयोग को हरी झंडी देंगे, तो आगे भी इसे जारी रखने का मन है. आइए, चर्चा शुरू करते हैं.

Drawing Hands, lithograph by Dutch artist M. C. Escher. (Image: Wikipedia)

वास्तव में, आलोचना और समीक्षा दोनों ही किसी कृति की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने वाले उपकरण हैं, लेकिन दोनों के औज़ार और मिज़ाज में कुछ अंतर हैं. एक तरफ, समीक्षा बहुत औपचारिक एवं कोमल उपकरण इस्तेमाल करती है, वहीं आलोचना अनौप​चारिक और कड़े. लेकिन, आलोचना का मकसद बेहतरी के रास्ते खोलना होता है इसलिए इसे 'साहित्य का मस्तिष्क' और 'सभ्य समाज में एक रिसोर्स' तक कहा गया है.

एक तरफ, समीक्षा में हृदय तत्व प्रधान होता है तो आलोचना में बुद्धि या तर्क तत्व. बहरहाल, इन दोनों विधाओं की उत्पत्ति और विकास कैसे हुआ? कौन से पड़ाव आये? इनके कितने प्रकार हैं? जैसे पहलुओं में न पड़ते हुए यहां दोनों के बीच अंतर पर चर्चा अभिप्रेय है. इस अंतर को समझनें में भी हम साहित्य और हिंदी जगत की स्थापनाओं अथवा प्रवृत्तियों को प्राथमिकता में रखेंगे. आइए, सर्वप्रथम दोनों विधाओं को विद्वानों के शब्दों में समझें. 

आलोचना

"साहित्य जीवन की व्याख्या है और आलोचना उस व्याख्या की व्याख्या." (अर्थात् आलोचना किसी कृति का वस्तुपरक विश्लेषण है.) - पंडित श्यामसुंदर दास

"आलोचना खोज सरीखा आनन्द है, निष्पत्ति के मूल्यांकन का. यह जीवन का आलोचनात्मक परीक्षण है. सर्वेक्षण कर निर्णय देना आलोचना की रोमांचक अन्तर्यात्रा का महत्वपूर्ण पक्ष है." - केआर श्रीनिवास (दि एडवेंचर ऑफ क्रिटिसिज़्म)

"आलोचना कला और साहित्य के क्षेत्र में निर्णय की स्थापना है." - रामेश्वरलाल खंडेलवाल, सुरेशचंद्र गुप्त (हिंदी आलोचना के आधार स्तंभ)

"आलोचना प्रच्छन्नता का उद्घाटन है." (अर्थात् किसी कृति के तत्वों में क्या अर्थ छुपे हैं, इसका प्रकाशन आलोचना करती है.) - नामवर सिंह

"साहित्य नवीन मानव मूल्यों की स्थापना कर एक शाश्वत सत्य की स्थापना में संलग्न होता है. आलोचना का उद्देश्य इस शाश्वत सत्य एवं मानव मूल्यों का अन्वेषण है.' - डॉ. सुरेश सिन्हा (हिंदी आलोचना का विकास)

समीक्षा (समालोचना शब्द को पर्यायवाची ही समझें)

"सत्य, शिव सुन्दर का समुचित अन्वेषण, उसका पृथक्करण तथा अभिव्यंजना ही सच्ची समालोचना है." - माधुरी, वर्ष सात, खंड 1

"समीक्षा का आदर्श रूप सामान्यत: कृति जनित वैयक्तिक भावोद्बोधक की प्रेरणास्वरूप समीक्षक की प्रतिक्रिया कृति का सम्यक अध्ययन और फिर समीक्षक की कृति पर अपना निर्णय माना जाता है." - रामशंकर शुक्ल रसाल (आलोचनादर्श)

"समालोचना से अभिप्राय कवि के काव्य के गुण-दोषों पर विचार करने तथा उसकी उत्कृष्टता और हीनता के निर्णय करने से है." - पद्मसिंह शर्मा (मतिराम ग्रंथावली)

 आलोचना एवं समीक्षा

"आलोचक काव्य के सर्वोत्तम गुण एवं वैशिष्ट्य के परिज्ञान के निमित्त अमूर्त रूप में विद्यमान काव्य तत्वों को अधिक परिश्रम से अनुसंधान करते हैं. (यह आलोचना का अर्थ समझा जाये.) किंतु इससे सरल मार्ग है मूर्त उदाहरणों में निहित गुणों एवं तत्वों का अनुसंधान और उसके आधार पर काव्य के गुण का आख्यान. (यह समीक्षा का अर्थ समझा जाये.)" - आरए स्कॉट जेम्स (द मेकिंग ऑफ लिटरेचर)
चार्ट रूप में आलोचना एवं समीक्षा के अंतर का सारांश.
इस पूरे ब्योरे के बाद अब संक्षेप में कहा जाये कि आलोचना एक विशेषज्ञ कर्म है, जबकि समीक्षा एक सुरुचिपूर्ण. संगीतज्ञ डेविड लीबमैन ने भी इस विषय में प्रकाश डालते हुए लिखा है कि आलोचना मुख्यत: दोषों पर ज़्यादा चर्चा करती है जबकि समीक्षा समझाने के उद्देश्य से किसी कृति के विषय व तत्वों की विस्तृत व्याख्या ही है, जिसमें दोषों की चर्चा अनावश्यक होती है. अस्ल में, यह मत एक तो पाश्चात्य दृष्टि बताता है और यह साहित्य नहीं, बल्कि अन्य कलाओं के लिए ज़्यादा मुफ़ीद नज़रिया है क्योंकि डेविड समीक्षा को तो एक तरह का प्रचार ही क़रार देते हैं और आलोचना को वह हथियार समझते हैं, जिससे कलाकार भयाक्रांत रहता है. जबकि भारतीय विचार कहता है कि कवि और आलोचक दोनों ही भावुक और लगभग बराबर प्रतिभासंपन्न होते हैं और एक दूसरे के पूरक.

अंतत: इस कार्यशाला के लिए विशेष रूप से सद्य: प्रकाशित एक ही कृति की समीक्षा और आलोचना प्रस्तुत है.
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आलोचना

नवगीत की सीमाओं व समस्याओं को बेनक़ाब करता संग्रह


'और एक बार, जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो...' डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का यह गीत बेहद चर्चित और प्रशंसित रहा है. वह स्वयं इसका सरस पाठ करते हैं और सिर्फ़ पढ़ना ही नहीं, इस गीत को सुनना भी रससिक्त करता है. मूल बात यह है कि इस मुखड़े में कथ्य अपनी व्यंजना में कितना प्रभावी है. एक ही समय में ये दो पंक्तियां भौतिक दुख एवं अलौकिक आनंद का गठबंधन बख़ूबी करती हैं और प्रचलित कथन से उलट ये दो पंक्तियां गीत की एक नयी भूमि खोज लेती हैं. अब इससे इतर एक और मुखड़ा सामने आता है और मिश्र जी के बरसों पुराने गीत के बरसों बाद, देखें :

'नदी नदी में घूम रहे हैं / लिये मछेरे जाल
सांस नहीं ले सकीं मछरियां / दुबकी कीचड़ बीच मिंदरियां...' गीत का यह मुखड़ा एक स्वाभाविक स्थिति या घटना की रपट मात्र नहीं लगता? फ़र्ज़ कीजिए कि आप टीवी पर किसी रिपोर्टर को समाचार सुनाते हुए सुन व देख रहे हैं : 'मैं यहां फलां नदी के पास मौजूद हूं, जहां मछेरों ने अपने जाल डाल दिये हैं. इसका असर यह हुआ है कि मछलियां तड़पने लगी हैं और जलीय जीवों में अपने आप को बचाने के लिए खलबली मच गयी है.' यह अभिधा मात्र है और मेरी दृष्टि में कविता की अंतर्दृष्टि यह नहीं है. यहां से समकालीन गीति साहित्य अथवा नवगीत सवालों के घेरे में आ जाता है क्योंकि यह दृष्टांत किसी अपरिपक्व कवि नहीं, अपितु आचार्य भगवत दुबे जैसे वरिष्ठ रचनाकार के नवीनतम संग्रह से लिया गया है.

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गीत, नयी कविता या नवगीत, विधा कोई भी हो, वस्तुत: काव्य रचना तभी सार्थक है जब उसमें काव्य के कुछ सर्वमान्य तत्व न्यूनतम तो हों. अंतर्दृष्टि, संवेदना का अनछुआ धरातल या दुर्लभ होते हुए भी साधारणीकृत होने वाली अनुभूति/अभिव्यक्ति एवं नवनवोन्मेषशालिनी मेधा का सरस प्रकाशन, ये कुछ ऐसे मानक हैं, जिनके आधार पर किसी काव्य रचना को कसौटी पर कसा जाना चाहिए. पांच दशकों से काव्य यात्रा के मुसाफ़िर आचार्य दुबे जी का सद्य: प्रकाशित नवगीत संग्रह 'भूखे भील गये' पर इसलिए चर्चा की चेष्टा है क्योंकि इस बहाने से नवगीत के सामने जो समसामयिक चुनौतियां और प्रश्न उपस्थित हैं, उन पर विमर्श हो सके.

छायावाद तक गीत की प्रकृति व्यष्टिपरक रही, लेकिन विकास कालखंडों में जिसे नवगीत कहा गया, उसकी प्रकृति समष्टिपरक हुई, ऐसा विशेषज्ञ मानते हैं. प्रश्न यह है कि किसी रचना में हम कैसे समझें कि यह व्यष्टिपरक है या समष्टिपरक? मज़दूर, किसान, श्रमिक, आदिवासी या लोक से जुड़े ऐसे किसी शब्द की उपस्थिति मात्र ही क्या रचना को समष्टिपरक मानने का आधार हो जाती है? 'भूखे भील गये' के एक गीत का यह अंश देखें :

पीठ-पेट चिपकाये फिरते / ये गरीब वनवासी
श्रमिकों के चेहरों पर / छायी रहती सदा उदासी
पर्वत को भी धूल चटाते / जो सीने फ़ौलादी...

वास्तव में, जब तक कवि तीसरे व्यक्ति अथवा तमाशबीन की तरह किसी घटना को देखकर वर्णन करता है, तब कविता में इस तरह के अंशों की भरमार होती है. कवि ने अनुभूति के स्तर पर एकाकार नहीं किया, इसलिए यह कोरा अवलोकन मात्र है, बस इसलिए कि आप भाषा और मात्रा गणना आदि को समझ पाते हैं इसलिए आप इसे गेय पद में वर्णित कर पाते हैं, अन्यथा कथन में ऐसा कुछ नहीं, जो कोई भी व्यक्ति यानी अकवि न कह सके. कवि को एक व्याख्या में साक्षी मात्र ही कहा गया है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि कवि भौतिक जगत की घटना या दृश्य आदि का साक्षी होना नहीं है, बल्कि इन दृश्यों के बाद भाव या विचार या मनोभूमि पर जो यात्रा या घटना होती है, उसका साक्षी होना कवि होना है.

नवगीत के सामने पहली चुनौती इसी 'अकाव्य' प्रवृत्ति को माना जाये. 'भूखे भील गये' संग्रह में ऐसी अनेक रचनाएं हैं, जिन पर यह आरोप लगता है. इन्हें अभिधा प्रधान ऐसी रचनाएं भी कहा जा सकता है, जिनमें अंतर्दृष्टि एवं किसी भी स्तर पर नूतनता के अभाव स्पष्ट तौर पर चीन्हे जा सकते हैं और ये रचनाएं बजाय काव्य के, अवलोकन या अवलोकनोपरांत वर्णन मात्र ही होकर रह जाती हैं. यहां यह अहम है कि अभिधा में भी काव्य सृजन संभव है, लेकिन यह रस्सी पर चलने के समान है. ज़रा से असंतुलन से अभिधा की कविता अकविता हो जाती है.

इस संग्रह की रचनाओं से गुज़रने के बाद एक प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि क्या 'नवगीत' के पास नये विषयों या नये कथ्यों का भारी टोटा पैदा हो गया है? इस संग्रह में एक-दो स्थानों पर प्रथम दृष्ट्या ऐसा प्रतीत ज़रूर होता है कि किसी नये विषय का सूत्रपात हुआ, लेकिन इतनी उथली रचनाएं हैं कि ज़रा ठहरते ही भ्रम दूर हो जाता है. एक रचना के उदाहरण से समझें :

'व्याधिग्रस्त दिखते / गांवों से ज़्यादा आज शहर
शक्कर महंगी किन्तु / ख़ून में बढ़ने लगी शुगर...' इस गीत का विषय रोचक है कि शहर और गांव की जीवन शैली बदले पारिवेशिक संदर्भों में कितनी भिन्न है और इसके स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव हैं. यहां कवि ने शहरियों को आलसी जीवन जीने के कारण रोगों का शिकार होना पाया है, यहां तक तो ठीक है लेकिन इसके बाद कवि दावा करता है : 'जो मेहनतकश / उन्हें न कोई रोग सताते हैं.' यह अवैज्ञानिक दृष्टि से किया गया तुलनात्मक अध्ययन है. ग्रामीण या श्रमिक किसी रोग के शिकार नहीं हैं या होते, यह दावा इस पूरे गीत के विषय को दूषित करने के साथ ही एक नयी भूमि खोजने जा रही रचना के प्राण हर लेता है. यदि यह रचना मेहनत के बावजूद मेहनतकशों और उनके बच्चों के कुपोषण तक बात ले जाती और संसाधनों के असमान वितरण जैसे पहलुओं को रेखांकित कर पाती तो संभवत: यह एक श्रेष्ठ रचना की कीर्ति पा जाती.

इस संग्रह के बहाने से नवगीत के सामने खड़ी तीसरी समस्या उभरकर सामने आती है कि रचनाएं समस्यामूलक हैं यानी सिर्फ़ समस्या को ही केंद्र में रखती हैं. इस बात को आप उपरोक्त पहली चुनौती के एक और विस्तार के रूप में समझ सकते हैं. 'भूखे भील गये' संग्रह से कुछ अंश उदाहरणस्वरूप देखें :

1. सारस्वत मंचों ने कैसी ओढ़ी फूहड़ता / जहां चुटकुलेबाज़ बड़ी बेशर्मी से पढ़ता
2. कविता में युगबोध नहीं बस आडम्बर है झूठा / मौलिकता है लुप्त पिष्टपेषण मिलता है जूठा
3. राजा भोज आज के मंत्री दुखी श्रमिक हैं गंगू तेली / श्रमसेवी को झोपड़पट्टी जमाखोर की तनी हवेली
4. करती रही छलावा हमसे अर्थव्यवस्था पूंजीवादी / प्रतिभाओं का हुआ पलायन, बाट जोहते दादा-दादी
5. मम्मी डैडी बहुत व्यस्त हैं अधिक कमाने की मजबूरी / स्वर्णिम सपने पूरे करने हुई बुज़ुर्गों से भी दूरी...

क्या रचनाधर्मिता समस्या मात्र गिनाना ही है? या विद्रूपताओं पर कटाक्ष भर करना ही है? ये रचनाएं समस्याओं को समस्याओं के दृश्यों और समस्याओं के अवलोकन को ही प्रस्तुत करती हैं, बगैर किसी अनुभूति, संवेदना या कारण-हेतु-समाधान के. उपरोक्त उदाहरणों में नंबर 5 के बरक़्स नवगीत के चर्चित रचनाकार दादा माहेश्वर तिवारी के एक गीत का बंद देखें :

अमलतास गहराकर फूले / हवा नीमगाछों पर झूले,
चुप हैं गाँव, नगर, आदमी / हमको, तुमको, सबको भूले
हर तरफ़ घिरी-घिरी उदासी / आओ हम मिल-जुल कर छाँटें...

'मिल-जुल कर छाँटें', कहा सुना ही सही, लेकिन एक संबल तो है, एक समाधान मूलक चेतना तो है कि समस्याओं से जूझा कैसे जाये. समकाल के नवगीतों को चेतना होगा कि समस्या को ही बांचने की इस प्रवृत्ति से बचा जाये अन्यथा रचनाएं रचनाएं नहीं प्रतिक्रियाएं अथवा ब्योरा मात्र बनकर रह जाएंगी.

'भूखे भील गये' संग्रह को कुछ और प्रश्नों व आरोपों का उत्तर भी देना होगा. मसलन, इस संग्रह की 105 गीति रचनाओं में से अधिकतर का भाषा व शैली इतनी एक जैसी है कि पढ़ते-पढ़ते एक तिहाई रचनाओं के बाद लगने लगता है कि आप दोहराव ही पढ़ रहे हैं. ऐसा क्यों है? संग्रह का शीर्षक कितना मुनासिब है? एक गीत के अंश के तौर पर नहीं, पुस्तक के शीर्षक के तौर पर यह क्या अर्थ देता है? सर्वश्री देवेंद्र शर्मा इंद्र, मधुकर अष्ठाना, मयंक श्रीवास्तव एवं कुमार रवींद्र ने इस संग्रह पर जो सम्मतियां दी हैं, उनमें इतनी प्रशंसाएं हैं कि जैसे यह संग्रह पूर्णत: दोषमुक्त एवं कालजयी हो, ऐसा क्यों है?

अंतत: इस संग्रह से कुछ सकारात्मक ग्रहण करने की चेष्टा की जाये तो कहा जा सकता है कि 105 रचनाओं में से करीब एक दर्जन रचनाएं पठनीय हैं और किसी स्तर पर काव्य की श्रेणी में शुमार की जा सकती हैं. तमाम दोषों के बावजूद कुछ नये प्रतीक और कुछ नये विषयों को उठाने के प्रयास के लिए भी रचनाकार को साधुवाद दिया जाना चाहिए. फिर भी, जैसा मैंने पहले कहा कि यह संग्रह वर्तमान काव्य जगत में रचनाधर्मिता की चुनौतियों, सीमाओं एवं समस्याओं को उजागर ज़्यादा करता है. इस संग्रह की एक रचना का अंश है :

“देने गये द्वार पर सादर जिनको अक्षत पीले / लौटाये ब्यौहार उन्हीं ने हमें निपट ज़हरीले...” हो सकता है इस आलोचना के बाद दुबे जी मेरे लिए अपनी यही पंक्तियां दोहराना चाहें. आचार्य दुबे जी मेरे पिताश्री के मित्रवत एवं अग्रजवत रहे हैं, इसलिए व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए श्रद्धेय रहे हैं, किंतु कविता की कसौटी पर ही कविता का मूल्यांकन मुझे संगत लगता है, वरना जिस तरह इस संग्रह पर नामचीन वरिष्ठों ने गिन गिनकर 'ब्यौहार लौटाये' या बनाये हैं, मेरे लिए भी संभव था, परन्तु मुझे कवि का ताना मंज़ूर है, कविता का नहीं.
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समीक्षा

लोक एवं व्यवस्था के संदर्भों को चीन्हते नवगीत


काव्य संग्रह : भूखे भील गये; कवि : आचार्य भगवत दुबे; प्रकाशक : पाथेय प्रकाशन, जबलपुर


Image Source : Quartz

न्याय मांगने, गांव हमारे
जब तहसील गये
न्यायालय
खलिहान, खेत, घर,
गहने लील गये.
लंबा अरसा हुआ... गीत या छन्द कविता की ऐसी कोई महफ़िल इस गीत के पाठ के बगैर नहीं उठती, जिसमें आचार्य भगवत दुबे मौजूद हों. साल 2009 से तो मैं ख़ुद इस बात का साक्षी हूं, जब श्रद्धेय पिताश्री कमलकांत सक्सेना जी ने मासिक साहित्यिक पत्रिका 'साहित्य सागर' के तत्वावधान में भोपाल में 'नटवर गीत सम्मान' वितरण कार्यक्रम को 'राष्ट्रीय गीत उत्सव' का राष्ट्रव्यापी स्वरूप दिया था. तबसे अब तक करीब आधा दर्जन ऐसे आयोजनों में स्वयं दुबे जी से यह गीत सुनने का आनंद ले चुका हूं.

यह गीत वाक़ई दुबे जी की प्रतिनिधि गीत रचना बन चुका है और वह पूरे देश के काव्य जगत में इससे पहचाने जाते हैं. यह नियति है कि इस गीत की रचना के सालों बाद दुबे जी के नवगीतों का संग्रह प्रकाशित हुआ है 'भूखे भील गये'. यह शीर्षक इसी गीत की पंक्ति का एक अंश है, वह अंश भी पठनीय है :

कभी न छंट पाया जीवन से विपदा का कुहरा
राजनीति का इन्हें बनाया गया सदा मुहरा
दिल्ली, लोककला दिखलाने, भूखे भील गये.

हालांकि संग्रह का शीर्षक सिर्फ़ 'भूखे भील' होता तो ज़्यादा सार्थक रहता. फिर भी, ज़्यादा अहम बात यह है कि इस संग्रह में शामिल गीतों का सुर और तेवर क्या है? इन गीतों या नवगीतों को क्यों पढ़ना चाहिए और इन्हें किस दृष्टि से पढ़ा व समझा जाए? इस बारे में चर्चा करना उचित समझता हूं.

दुबे जी के सद्य: प्रकाशित काव्य संग्रह 'भूखे भील गये' में 105 नवगीत दर्ज हैं, जिनमें मुख्य रूप से लोक जीवन की झांकियां, बदलते पारिवारिक व सामाजिक ढांचे, प्रकृति के साथ खिलवाड़ को लेकर चिंता और स्मृतियों के चित्र प्रधान गीति रचनाएं विशेष हैं. प्रस्तुत संग्रह के इस चतुर्भुज को कुछ संकेतों के माध्यम से प्रकाशित करने की चेष्टा करता हूं.

'आचार्य जी के गीत लोक ​परिवेश से दूर नहीं हैं... गांव की पीड़ा की नब्ज़ का अहसास दुबे जी को भली भांति है.' संग्रह की पूर्व सम्मति में वरिष्ठ गीतकार श्री मयंक श्रीवास्तव के इस कथन के अलावा, लोक जीवन की झांकियों के संदर्भ तो आप इस संग्रह के शीर्षक और शीर्षक गीत से समझ ही सकते हैं. साथ ही, इस संग्रह में कई जगह आपको दमितों, श्रमिकों, मज़दूरों और ग्रामीणों के संदर्भ मिल जाएंगे. उदाहरण के तौर पर यह बंद देखें :

शोषणकारी क्रूर किया करते मनमानी हैं
अब इन दमितों ने मरने-मिटने की ठानी है
एक साथ मिलकर लूटेंगे, ये तहख़ानों को..

यानी सिर्फ़ दमित की पीड़ा ही नहीं, उस दमित वर्ग का बदला हुआ चेहरा भी यहां बेनक़ाब करने की चेष्टा इशारों में है, जो गीत काव्य में सर्वथा नयापन है. एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि दुबे जी की नज़र बदलाव को पकड़ने के लिए सतत स्फूर्त है. 80 बरस की उम्र के करीब पहुंचते हुए और पांच दशकों से ज़्यादा लंबी काव्य यात्रा कर चुकने वाले रचनाकार के लिए यह शायद स्वाभाविक भी होता है. यही कारण है कि परिवारों और सामाजिक रिश्तों, बुनावटों व व्यवस्थाओं में पिछली आधी सदी में जो आमूलचूल बदलाव आये, उन्हें दुबे जी ने अपने गीत काव्य में दर्ज किया है.

श्री कुमार रवींद्र ने अपनी सम्मति में इस संग्रह की रचनाओं को 'फिलवक़्त का हलफ़नामा' कहा है, जो विचारणीय है. यह भी अहम है कि बदलावों के विषय को दर्ज करने में दुबे जी ने चिंतन, विश्लेषण अथवा तर्कों के स्थान पर पीड़ा, संत्रास, प्रश्न एवं चिंता के उपालंभों का प्रयोग किया है.

इस संग्रह के सबसे सार्थक गीत मेरी दृष्टि में प्रकृति विषयक रचनाएं हैं और सबसे रोचक रचनाएं वे हैं, जिनमें स्मृतियों के झरोखे से जीवन का पुनरावलोकन है यानी नॉस्टैल्जिक पोएट्री. 'अग्नि, पवन, जल, व्योम, धरा के बिखरे सूत्र चुनें..' प्रकृति विषयक एक सशक्त रचना में दुबे जी ने इस ग़लती को ठीक से चीन्हा है कि पंचतत्वों के साथ मनुष्य ने किस कदर खिलवाड़ किया है. यही नहीं, इस संग्रह से गुज़रकर लगता है कि प्रकृति से जुड़े गीतों में कवि की लेखनी सर्वाधिक प्रभावशाली हो जाती है. एक बंद और देखें :

टीबी के रोगी सा सावन मुरझाया है
हांफ हांफकर मल्हार मेघों ने गाया है
सावन औ' भादों अब धूल में नहाते हैं..

ये सर्वथा नूतन उपमाएं और बिम्ब अनुभवी कवि की लेखनी की गुणवत्ता बयान करते हैं. इसी तरह, स्मृति के गीतों में ऋजुता, लोकभाषा का चाव और ग्रामीण परिवेश का मोहक चित्रण बरबस ही ध्यान आकर्षित करता है. इनके इतर, दुबे जी के गीतों की भाषा उन गीतों में कठोर और चौक चौराहों पर होने वाले बहस-मुबाहिसों वाली भाषा है, जिनमें राजनीति, व्यवस्था और सामाजिक विद्रूपताओं पर कटाक्ष जैसे विषय प्रकाशित हैं. 

प्रस्तुत संग्रह विविधवर्णी गीति कविताओं का गुलदस्ता है. एकाधिक गीतों में गीत या छन्द विमर्श भी शुमार है, तो एकाधिक गीतों में मिथकीय प्रतीकों के अवलंबन भी उल्लेखनीय हैं. इसके अलावा, समकालीन गीति साहित्य या नवगीत सृजन में जिन चिंताओं को रेखांकित किया जा रहा है, उसके दृष्टांत इस संग्रह में भी उपस्थित हैं. बहरहाल, करीब 50 पुस्तकों के रचनाकार दुबे जी अपने अनुभव और प्रदेय के कारण हमेशा श्रद्धा व श्लाघा के पात्र हैं और वह इसके बाद भी और बेहतरीन रचनाओं से हमें सराबोर करते रहें, इसी आशा एवं कामना के साथ शुभम.

मंगलवार, मार्च 31, 2020

ग़ज़ल

समकालीन ग़ज़लों के 11 बेहतरीन मतले


इस दौर के 85 शायरों की एक-एक ग़ज़ल को शामिल करता शेरी मजमूआ है 'समकालीन ग़ज़लकारों की बेहतरीन ग़ज़लें'. युवा शायर केपी अनमोल इस मजमूए के संकलक हैं, जो राजस्थान के किताबगंज प्रकाशन से शाया हुआ है. इसी संकलन में शुमार ग़ज़लों से चंद मतलों का इंतख़ाब.


इस संकलन में नाचीज़ की भी एक ग़ज़ल का शुमार है, जिसके लिए भाई अनमोल का शुक्रियादा करना लाज़िमी है. यह एक मोह रहता ही है कि अपना क़लाम हर कागज़ पर दर्ज हो जाए इसलिए इसे संजीदगी से न लें (यानी यहां नाचीज़ के मतलों के इंतख़ाब को रस्म अदायगी ही समझें). इस मजमूए पर विस्तार से बात तो शायद फिर कभी कर सकूं लेकिन यहां दो तीन ज़ावियों पर मुख़्तसर अपनी राय ज़रूर रखूंगा और फिर तमाम मुंतख़ब मतलों पर अपनी एक छोटी सी राय भी.

Book Cover of "Behtareen Ghazlein".
अव्वल तो ये कि भाई अनमोल की कोशिश को सौ में सौ नंबर देने के बावजूद इस संकलन की सीमाओं को दरकिनार मैं नहीं कर सका. शायर होने के साथ जैसे कोई समीक्षक या मद्दाह बन जाया करता है, वैसे ही मैं शुरू से नुक़्ताचीं या नक़्क़ाद यानी आलोचक ज़्यादा रहा हूं इसलिए फ़ितरतन वो नुक़्ते ज़्यादा देखता हूं, जो सुनने पढ़ने वाले को अपने लिए थोड़े सख़्त भी लग सकते हैं, लेकिन उनका मक़सद आगे और बेहतरी का ही होता है.

एक तो भाई अनमोल को 'ग़ज़लकारों' लफ़्ज़ की बनावट को समझना चाहिए. शायरों या क़लमकारों शब्द यहां ज़्यादा उचित होते क्योंकि ग़ज़लकार एक जबरन बनाया हुआ शब्द है, इसमें कोई मौलिकता या सार्थकता नहीं है. दूसरी बात, इस संकलन की भूमिका पढ़ने के बावजूद इस संकलन का मक़सद साफ़ नहीं होता कि क्यों इस किताब की ज़रूरत थी या पड़ी या क्यों यह किताब शाया की गयी. यह शायद मेरी हद्दे-अक़्ल भी हो सकती है. बहरहाल, कुछ ज़रूरी समकालीन शायरों के नाम इस संकलन में छूट जाने के बावजूद जितने नाम शुमार हुए हैं, उनमें से कई को ज़रूरी क़रार दिया जा सकता है और इसके लिए भाई अनमोल तारीफ़ के हक़दार हैं.

एक तरफ, जहां ग़ज़लकार लफ़्ज़ से मैं मुत्तफ़िक़ नहीं हूं, वहीं समकालीन लफ़्ज़ के लिए इस किताब को तैयार करने वाली टीम को मुबारकबाद देना चाहता हूं. ये ठीक हुआ कि इस लफ़्ज़ की जगह हिंदी/उर्दू या नये लफ़्ज़ का इंतख़ाब नहीं किया गया. ऐसा होता तो संकलन बेहद सीमित सोच के टैग से ग्रस्त हो जाता. बहरहाल, अब आपके और बेहतरीन मतलों के बीच से हटता हूं, लेकिन बीच-बीच में बना रहता हूं.

सितारे हार चुकी थी सभी जुआरी रात
बस एक चांद बचा था सो वो भी हारी रात.
- भवेश दिलशाद

हादसा कौन सा हुआ पहले
रात आयी कि दिन ढला पहले.
- ऐन इरफ़ान
(इस मजमूए का शायद सबसे असरदार मतला मुझे यही लगा. एक बहुत बारीक़ पार्टिशन के दो पहलुओं से ख़ूबसूरत शेर निकालने पर शायर को भरपूर दाद बेसाख़्ता देना पड़ती है.)

कैसे आहें भर रहे थे एकदम चुप हो गये
वास्ता तेरा दिया तो सारे ग़म चुप हो गये.
- आसिफ़ अमान सैफ़ी

जो नंगे पांव कांटों पर मचलना सीख जाते हैं
वो अपने दौर से आगे निकलना सीख जाते हैं.
- अशोक वर्मा
(जदीद शायरी में ऐसे शेर कम नहीं हैं, फिर भी यह मतला एक ख़ास अदा और हुनर की बानगी के तौर पर रचाव पैदा करता है.)

न कोई शाख़ भी इतनी घनी है
कि जितनी छांव तुमने मांग ली है.
- हेमंत शर्मा मोहन

ये पत्तियों पे जो शबनम का हार रक्खा है
न जाने किसने गले से उतार रक्खा है.
- केपी अनमोल

ये धूप गिरी है जो मेरे लॉन में आ कर
ले जाएगी जल्दी ही इसे शाम उठा कर.
- स्वप्निल तिवारी
(अनमोल और स्वप्निल दोनों के मतलों की ज़ुबान किस क़दर नाज़ुक है और यह नाज़ुकी है भी कितनी एक जैसी. बहरहाल, अनमोल का मतला रवायती होने के बावजूद रस से सराबोर है तो स्वप्निल का मतला संपन्न और संतुष्ट वर्ग की सत्ही चिंता को ख़ूबसूरती से बयान कर रहा है.)

मेरी चाहत है कि इक दिन मुझे हैरान करे
मैं उसे भूल गया हूं ये दिल ऐलान करे.
- तरकश प्रदीप

ये कहकर ले गये बच्चे पिता की जान किस्तों में
खरीदेंगे नयी दुनिया इन्हीं आसान किस्तों में.
- प्रबुद्ध सौरभ

जाने वाले कब लौटे हैं क्यों करते हैं वादे लोग
नासमझी में मर जाते हैं हम-से सीधे सादे लोग.
- श्रद्धा जैन
(इस मजमूए में शायराएं गिनी चुनी ही शामिल हुई हैं और जहां तक बात मतलों के इंतख़ाब की रही है, तो श्रद्धा का यह मतला इसलिए नहीं चुना गया कि किसी शायरा का मतला भी चुनना था, बल्कि इसलिए कि यह मतला ख़ुद इसरार करता है कि मुझे चुनो. मीर या नज़ीर से होते हुए कहन का जो अंदाज़ इब्ने-इंशा और हबीब जालिब के यहां भी दिखता रहा, उस अंदाज़ की ये फ्रेज़िंग बरबस ध्यान खींचती है और शेर का मफ़हूम फिर क़ायल कर ही लेता है.)

आख़िरश, एक हुस्न-ए-मतला भी...

बताओ कैसे कहां तुमने कल गुज़ारी रात
उठायी सूद पे या क़र्ज़ पर उतारी रात.
- भवेश दिलशाद

सोमवार, मार्च 30, 2020

कला

मृत्यु सत्य है, लेकिन अंतिम?


नेल्सन मंडेला के जीवित रहते उनकी मौत को दर्शाने वाले एक चित्र पर बड़ा विवाद हुआ था. कला के अपने तर्क थे और लोक के अपने. इस पूरी स्थिति से उपजा एक संक्षिप्त आलेख.


Mandela's painting by Damaso. (Image : The Guardian)

प्राचीन काल से अब तक हमारे पास जीवन का जितना साहित्य और इतिहास है, उतना ही मृत्यु का. समय-समय पर कला की विविध विधाओं ने मृत्यु को अपने ढंग से परिभाषित किया है. कविता, चित्रकारी, संगीत, रंगमंच और लगभग हर विधा के कलाकारों ने यह विषय छुआ है. एक तथ्य यह भी है कि कला हो या विज्ञान, दोनों ही मृत्यु को सत्य मानते तो हैं, लेकिन अंतिम नहीं. क्योंकि, कला उसके बाद की कल्पना कर सकती है और विज्ञान अब तक यह साबित नहीं कर सका है कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं होता. यानी देह तो कुछ ही समय में अपनी सभी गतियों से मुक्त हो जाती है, लेकिन क्या मन या प्राण या चेतना (या अन्य कई नाम) भी नष्ट हो जाते हैं? यदि हां, तो कैसे और नहीं तो क्यों? इस उलझन में विज्ञान भी अब तक उलझा है क्योंकि बायोलॉजिकली हर प्राणी की मृत्यु निश्चित है, लेकिन हाइड्रा यहां भी एक अपवाद है. बायोलॉजी भी इसे अमर कहने के लिए अब तक बाध्य है. कुल मिलाकर, सत्य तो माना जा सकता है, लेकिन अंतिम नहीं. अब तक.

कला और विज्ञान के अलावा, मृत्यु को लेकर धर्म का हस्तक्षेप भी हमेशा से रहा है. लगभग हर धर्म में मृत्यु का विश्लेषण, विश्वास व मत के आधार पर किया गया है और, इससे संबंधित सभी नीतियां व विधियां भी बतायी गयी हैं. धर्म और कला के कुछ धड़े हमेशा से मृत्यु को अंतिम न मानते हुए पुनर्जन्म और मृत्योपरांत जीवन की व्याख्या करते रहे हैं. यहां से विज्ञान की मुश्किलें और बढ़ी हैं. चेतना के अस्तित्व के अलावा, चेतना की उत्पत्ति और प्रकृति को लेकर भी विज्ञान के पास पर्याप्त या सर्वमान्य तर्क नहीं हैं. इसी भ्रम की स्थिति के कारण हज़ारों साल के मानव इतिहास में मृत्यु अब तक सहज स्वीकार की वस्तु नहीं बन सकी है. नये समय के चर्चित चिंतक ओशो ने मृत्यु को उत्सव का क्षण तक कहा, फिर भी मनुष्य अपने विश्वासों, अंधविश्वासों और अविश्वासों के कारण मृत्यु को अंतिम एवं जीवन के परम सत्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सका है.

विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं में मृत्यु को लेकर अनेक प्रकार की रीतियां एवं मन:स्थिति देखी जाती है. भय, दुख, चिंता, पीड़ा जैसे मनोविकार और अपशकुन, सामाजिक खेद व कर्मकांड जैसे चलन मृत्यु से जुड़े हैं. दुनिया के हर कोने में मृत्यु की कामना या कल्पना उस व्यक्ति के लिए की जाती है, जिससे दुर्भावना, वैमनस्य या शत्रुता जुड़ी हो. यह एक सार्वभौमिक भावबोध है इसलिए कोई यदि किसी अपने के लिए मृत्यु की कल्पना करता है तो उसे सहज नहीं लिया जाता.

जिस बात पर चर्चा करना है, उसके लिए इतनी भूमिका तो ज़रूरी थी ही. आजकल अफ्रीका में ज़्यादातर लोग एक चित्रकार पर नाराज़ हैं क्योंकि उसने अपने चित्र के माध्यम से अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान नेता नेल्सन मंडेला की मृत्यु का दृश्य उकेरा है. कई लोग चित्रकार की आलोचना करने में लग गये हैं, वहीं चित्रकार का अपना नज़रिया है. कुछ दिनों पहले बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया था कि अफ्रीका में मंडेला की मृत्यु को किसी अभिशाप से कम नहीं समझा जाएगा. अफ्रीकी इस सच को स्वीकार करने में सहज नहीं हैं कि मंडेला मृत्यु की ओर हैं और वह खुद को मंडेला के बगैर अनाथ महसूस करेंगे. रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि प्रार्थनाएं जारी हैं और अफ्रीकी सार्वजनिक तौर पर यह बात करने से कतरा रहे हैं कि मंडेला वाकई मरने वाले हैं. यह उनके लिए दु:स्वप्न है.

चित्रकार यिउल दामासो ने इसी रिपोर्ट के तथ्यों से आहत होकर अफ्रीका के लोगों को अपने चित्र के ज़रिये समझाने की कोशिश की है कि मंडेला एक महान मनुष्य हैं, लेकिन मनुष्य ही हैं... इसलिए एक दिन अफ्रीका और दुनिया को उनकी मौत का दृश्य देखने के लिए खुद को तैयार और मज़बूत करना चाहिए. इस चित्र में मंडेला का पोस्टमार्टम होते दिखाया गया है, साथ ही, मंडेला को अर्धनग्न चित्रित किया गया है. इस कारण भी इस चित्र को अशोभनीय करार दिया जा रहा है. वास्तव में, यह चित्र 17वीं सदी के कलाकार रैम्ब्रैंट वैन रीन के एक प्रसिद्ध चित्र 'दि एनाटमी लेसन ऑफ डॉक्टर निकोलस टल्प' की तर्ज़ पर उकेरा गया है और इस चित्र में दिखने वाले शव के स्थान पर मंडेला को दर्शाया गया है.

चित्रकला में नग्नता हमेशा से ही कलाकारों को आकर्षित करती रही है. विंची, माइकलेंजेलो से लेकर एमएफ हुसैन और तैयब मेहता तक चित्रकारों ने नग्नता को परिभाषित किया है. विक्टोरियन व क्लासिकल दौर की पेंटिंग में सौंदर्य बोध या वासना चित्रण के लिए नग्नता का प्रयोग किया जाता रहा. फिर समाज की कड़वी सच्चाइयों के लिए दुनिया भर के चित्रकारों ने इसे दर्शाना शुरू किया. धार्मिक और परंपरागत जीवन शैली को चित्रित करने के लिए ​भी चित्रकारों ने नग्नता को कैनवास पर उतारा. सब-सहारन अफ्रीका और तीसरी दुनिया के कई देशों के आदिवासियों के नग्न चित्रों को एक समय में काफ़ी कीमत मिली. सभ्य समाज ने आदि समाज की नग्नता को कभी मात्र मनोरंजन समझा तो कभी यथार्थ बोध. धीरे धीरे चित्रकला में नग्नता बहस का विषय बनी और कलाकारों ने इसे अभिव्यक्ति की शैली के तौर पर कलाकार की स्वतंत्रता कहा.

वास्तव में, एक अत्यंत सूक्ष्म लकीर है, जिसके एक तरफ नग्नता कला है और दूसरी तरफ, अश्लीलता. जिन कलाकारों ने इस सूक्ष्मता को समझा, उन्होंने नग्नता की वक़ालत तो कर दी लेकिन इससे उन्हें भी बहाने और तर्क मिल गये, जिन्हें वास्तव में कला से कोई लेना देना नहीं था, बल्कि सिर्फ़ सस्ती ख्याति और व्यवसाय से सरोकार था.

ख़ैर, दामासो के इस चित्र में नग्नता के नाम पर उंगली उठाना कला के दृष्टिकोण से जायज़ नहीं है. हां, यदि लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं, तो कलाकार की आलोचना की जा सकती है, लेकिन फिर एक नयी बहस का सूत्रपात होता है कि इस आलोचना से कलाकार की भावना भी तो आहत होती है. यदि लोग कलाकार की भावना नहीं समझ सकते तो कलाकार के लिए कितना ज़रूरी है कि वह लोगों की भावना को समझे. इस मुद्दे पर एक तर्क यह भी है कि यदि कला लोकमंगल के लिए नहीं है तो उसका औचित्य क्या है. तर्क-वितर्क और वाद-विवाद कितना भी हो, फिर भी प्रश्न शायद बना रहेगा कि कला के लिए साध्य क्या है, लोक या सत्य. चूंकि पूर्ण सत्य निश्चित तौर पर अब तक अबूझ है इसलिए यह प्रश्न भी बड़ा है कि लोक का सत्य यदि भ्रम है, तो कलाकार को सही अर्थों और दिशा का अनुसंधान करने का अधिकार है या नहीं. यदि विज्ञान इस खोज के लिए स्वतंत्र है तो कला के लिए सीमाएं और अनुशासन क्यों और कहां तक?

(यह लेख साल 2010 में एक अख़बार के संपादकीय पेज के लिए उस समय के मुद्दे पर केंद्रित एक त्वरित टिप्पणी के तौर पर लिखा गया था, जो किसी कारणवश अप्रकाशित ही रहा.)

शनिवार, मार्च 28, 2020

एक ग़ज़ल

फ़ैज़ : ख़्वाब और उम्मीद के बीच एक उदासी!


क्या ज़िंदगी के एक दौर में फ़ैज़ की शायरी निराशा और हताशा की तर्जुमानी हो गयी थी? बरसों से शायरी के आशिक़ यही कह और समझ रहे हैं कि फ़ैज़ इन्क़िलाब, उम्मीद और हौसले का शायर था इसलिए यह सवाल और अहम हो जाता है. परतें खुलेंगी तो सवाल यह भी उठेगा कि जोश और जज़्बे का एक शायर कितना और क्यों मायूस हो जाता है.


Faiz Ahmed Faiz. (Image Source : Poetry4Ever.Com)

“ज़ालिम के ख़िलाफ बग़ावत किया जाना लाज़िमी है. सही और ग़लत की इस जंग में, ख़ामोशी न सिर्फ़ बेईमानी और ख़ुद मरकज़ी (स्व-केंद्रित) नज़रिया है बल्कि नमकहरामी भी है... इन्क़िलाब किसी लिफ़ाफ़े में नहीं आता है.”

फ़ैज़ का नाम आते ही न सिर्फ़ ये तक़रीर बल्कि ऐसे बेशुमार मिसरे और नज़्मों के बेहिसाब बोल याद आते हैं, जो साबित करते हैं कि फ़ैज़ अपने वक़्त में लोगों के दिलों में एक लौ जगा रहा था. ज़ालिमों यानी ज़ुल्म की हर तरह की सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहा था और सबको समझा रहा था कि 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे...'

ज़ुल्म की सियह और डरावनी रात में सच, हक़ और इंसाफ़ की सुब्ह 'हम देखेंगे', ऐसी उम्मीद देने वाले शायरों में एक नाम था फ़ैज़. लेकिन एक पूरी ग़ज़ल मुक़द्दमा दायर करती है कि फ़ैज़ एक दौर में नाउम्मीदी की गिरफ़्त में रहे. यही नहीं बल्कि इस मुक़द्दमे में मुल्ज़िम के खिलाफ़ गवाहों की भी कमी नहीं.

हर सम्त परेशान तेरी आमद के क़रीने
धोके दिये क्या क्या हमें बादे-सहरी ने.

जिस सुब्ह के ख़्वाब देखे-दिखाये थे, उसके नख़रे हैं कि ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहे. वो सुब्ह आकर भी नहीं आती, हर बार तरह तरह के धोके दिया करती है. अस्ल में, यह बेहतरीन ग़ज़ल 1965 में शाया हुए मजमूए दस्ते-तहे-संग में शामिल है. इस वक़्त तक फ़ैज़ करीब 54 साल की उम्र के थे और कई तरह की उथल पुथल से गुज़र चुके थे. इस वक़्त के आसपास के कुछ वाक़िआत के ज़िक्र से पहले एक शेर में दर्ज एक और एहसास यूं है :

हर मंज़िले-ग़ुर्बत पे गुमां होता है घर का
बहलाया है हर गाम बहुत दर-ब-दरी ने.

अब ये शेर न सिर्फ़ शायर या अवाम का कलाम समझा जाये बल्कि इसे उसी सुब्ह की तरफ़ से इक़बालिया बयान भी समझा जाना चाहिए. वो सुब्ह ख़ुद भी भटक रही है? दर-ब-दर होती सुब्ह भी तो हक़दार की तलाश में है और उसे सिर्फ़ मक्कार, झूठे या अदाकार मिल रहे हैं इसलिए किसी न किसी बहाने से वह हर बार चली जाती है. यही ज़ाविया फ़ैज़ ने कभी यूं दर्ज किया था :

तुम आये हो न शबे-इन्तिज़ार गुज़री है
तलाश में है सहर बार-बार गुज़री है.

1958 में पाकिस्तान में पहली बार सेना ने तख़्ता पलट किया था और जनरल अयूब ख़ान ने तानाशाही का दौर शुरू किया था. पाकिस्तान टाइम्स को कुर्क कर दिया गया था, जिसके एडिटर फ़ैज़ हुआ करते थे. उसके बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी और दूसरे मानवाधिकारों को कुचलने का सिलसिला शुरू हुआ. एक केस में किसी तरह फंसाकर फ़ैज़ को जेल में डाल दिया गया था. यहां तक की कहानी तो फ़ैज़ के शायर के लिए बड़ी कारगर साबित हुई. ज़िन्दानामां और दस्ते सबा जैसे यादगार मजमूए फ़ैज़ के जेल के दिनों की शायरी है, जो शोहरत और इज़्ज़त पा चुकी है.

दूसरी तरफ, ख़तरा या ख़ौफ़नाक मंज़र ये था कि अख़बार, साहित्य और एक पूरा सिस्टम बतौर एंटीथीसिस तैयार हो चुका था, जो तानाशाही का पैरोकार बन चुका था. ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के बजाय ज़ालिम के सुर में सुर मिलाने वाला एक सिस्टम. पाकिस्तान में उन दिनों पत्रकारिता के ज़वाल को लेकर फ़ैज़ ने ख़ुद कहा था :

“एक तो ये कारोबार हो चुका है, दूसरे ये लोग डर चुके हैं और तीसरे इस पेशे में जो फ़ख़्र का जो एहसास था, वो अब खो चुका है.”

क़लम के किरदार की इस गिरावट को अगर आप सिर्फ़ उस एक समय की बात समझ रहे हैं तो आप न इतिहास से वाक़िफ़ हैं और न ही वर्तमान से. तानाशाह सबसे पहले आवाज़ और क़लम को ही अपनी कठपुतली बनाने की कोशिश किया करते हैं. बहरहाल, यहां से ग़ज़ल के अगले दो शेरों की ज़मीन तैयार होती है :

थे बज़्म में सब दूदे-सरे-बज़्म से शादां
बेकार जलाया हमें रौशन नज़री ने.
मयख़ाने में आजिज़ हुए आज़ुर्दा-दिली से
मस्जिद का न रक्खा हमें आशुफ़्ता-सरी ने.

ये निराशा, हताशा और माथाफोड़ मजबूरी का एहसास बहुत मानवीय है. कोमल सपनों और कठोर हक़ीक़तों के बीच भावुक योद्धाओं के साथ हुआ करता है कि किसी लमहे या दौर में उन्हें घोर निराशा घेर लिया करती है. 'राम की शक्तिपूजा' में निराला ने राम के निराश मन को बेहद कारीगरी के साथ उकेरा था. वही, बीटल्स के भंग हो जाने के बाद जॉन लैनन ने अपने एक गीत में कहा कि अब वो 'ड्रीमर' नहीं रहा.

दस्ते-तहे-संग में यही ग़ज़ल नहीं बल्कि और भी कलाम है, जो फ़ैज़ की वैचारिक मनोदशा और मानवीय टूटन के एहसासात की गवाही दर्ज कराता है. देखिए : दर्दे-शबे-हिज्राँ की जज़ा क्यों नहीं देते / खूने-दिले-वोशी का सिला क्यों नहीं देते... तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी तेरे जाँ-निसार चले गए / तेरी रह में करते थे सर तलब सरे-रहगुज़ार चले गए... कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी / सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी... इसके अलावा मजमूए की पहली ग़ज़ल है 'जमेगी कैसे बिसाते यारां', इसकी रदीफ़ है 'बुझ गये हैं'. एक उदासी और टूटन इस रदीफ़ से किस कदर बयां होती है, जब मिसरा आता है 'किरण कोई आरज़ू की लाओ कि सब दरो-बाम बुझ गये हैं'.

तो क्या यह कहना मुनासिब है कि शायरी के इस दौर में फ़ैज़ पूरी तरह से नाउम्मीदी के शिकार हो चुके थे? अगर इस सवाल का जवाब 'हां' है भी, तब भी यह कहना मुनासिब नहीं है कि अब तक फ़ैज़ की एक झूठी तस्वीर गढ़ी गयी है और उन्हें इन्क़िलाब और हौसले का शायर क़रार दिया जाता रहा. इसे एक दौर और शायर का एक दर्दमंद व जज़्बाती तेवर कहना ही वाजिब है, जहां जोश का एक शायर यहां तक टूट गया है कि कहता है : कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामाते-ज़नाना / कब हश्र मुअय्यन है तुझको तो ख़बर होगी.

बावजूद इसके, ऐसा नहीं है कि फ़ैज़ ने अपनी फ़िक़्र और वैचारिक ज़मीन छोड़ दी हो क्योंकि ऐसा होना ऐन मुमकिन नहीं दिखता. ख़ुद फ़ैज़ ने ही फ़रमाया था : 'मैं ऐसे किसी फ़नकार, मुसव्विर या मौसीक़ीकार को नहीं जानता जिसकी कोई विचारधारा या अपने वक़्त को लेकर कोई साफ रवैया/सोच न हो.' फ़ैज़ ने साफ़ तौर पर माना था कि जब शायर अपनी ज़ात के साथ एकाकार हो जाता है, तभी बेहतरीन शायरी कर पाता है. तो फिर इस दौर के बारे में किस तरह सोचा जाये? यह मायूसी और उदासी फ़ैज़ के शायर के तेवर का कौन सा पहलू बयान करती है?

“विचारधारा के लेंस से शायर दुनिया को देखता है. मेरी भी अपनी एक विचारधारा है... लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता है कि शायर को हर वक़्त अपनी विचारधारा की राजनीति के बारे में ही बात करना चाहिए.” फ़ैज़ की ये तक़रीर बहुत वाजिब है और शायर बतौर इन्सान कई रंग अपनी ज़िंदगी में महसूस करता है और जीता है इसलिए हर लम्हा एक ही रंग में रंगा हो, यह इंसाफ़ की बात नहीं है. जिसके बहाने से बात यहां तक आ गयी है, उस ग़ज़ल का मक़्ता यूं है :

ये जामा-ए-सदचाक बदल लेने में क्या था
मोहलत ही न दी फ़ैज़ कभी बख़्या-गरी ने.

एक कामयाब और बेहतरीन अंदाज़ के शेर के साथ ग़ज़ल मुकम्मल होती है. अपनी मायूसी का ख़ुलासा भी यहां कर देती है कि पूरी ज़िंदगी विचार और सोच को देने में गुज़र गयी इसलिए ज़ख़्म या हादसों की इस ज़िंदगी को तब्दील करने के बारे में सोचने का ख़याल तक न आया. ये मक़्ता क़ौल है कि फ़ैज़ के जोश और इख़्लास के तेवर मुर्दा या जाली नहीं थे. सिवाय इसके, फ़ैज़ के इस मक़्ते में जीवन का पूरा फ़ल्सफ़ा है, जो संस्कृत के उस श्लोक की झलक देता है कि 'आत्मा शरीर रूपी लिबास बदलती है' और मीर के उस बयान की परछाईं भी दिखाता है कि 'दैर में बैठा कश्का खेंचा कबका तर्क इस्लाम किया'.

बात का एक पहलू ये भी है कि अचानक इसी वक़्त ऐसा क्यों हुआ कि फ़ैज़ ने इस रंग की शायरी की? तो ऐसा है नहीं. अचानक नहीं हुआ. इसकी भी एक भूमिका तैयार थी. 1947 में जब बंटवारा हुआ तब फ़ैज़ ने 'सुब्हे-आज़ादी' नज़्म में साफ़ कहा था कि 'यह दाग़-दाग़ उजाला, यह शब गज़ीदा सहर / वो इंतज़ार था जिसका यह वो सहर तो नहीं...' यही विडंबनाएं समय के साथ जब और बढ़ती चली गयीं तो शायर का मन भी और रंजीदा होता चला गया, बिल्कुल माना जा सकता है. लेकिन यह मन हार गया हो, ऐसा नहीं है. फ़ैज़ के आख़िरी सालों यानी 1978 में जो मजमूआ शाया हुआ 'शामे-शह्‍रे-याराँ', उसमें एक ग़ज़ल का शेर यूं है :

रवाँ है नब्ज़े-दौराँ, गार्दिशों में आसमाँ सारे
जो तुम कहते हो सब कुछ हो चुका, ऐसे नहीं होता.

“जेल में रहने के बावजूद उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी थी. उनकी शायरी डार्क नहीं है, निराशा से भरी हुई नहीं है... इसमें नाटकीय भावुकता नहीं है.” अदाकार, थिएटर कलाकार और दास्तानगो दानिश हुसैन की बात समग्रता में मान ली जाना चाहिए क्योंकि इससे पहले भी शायरी के क़द्रदानों और नुक़्ताचीनों ने फ़ैज़ को इस इल्ज़ाम से बरी किया है कि उनकी शायरी 'निराशावादी' रही. और आख़िरश, मेरी नज़र में फिर वही बात है कि कमोबेश फ़नकारों की ज़िंदगी में तरह तरह के दौर आया करते हैं. हर दौर को शिद्दत के साथ जीना फ़नकार के वजूद का सरमाया है और समझना यह भी चाहिए 'निराशावाद' कोई इल्ज़ाम नहीं है बल्कि शायरी में एक किस्म का रस और कॉंटेंट है.

Beyond The Review

PARASITE: एशियाई संकटों और साहित्य परंपरा की फिल्म


होना तो हमें परस्पर आश्रित था (मानें न मानें हैं ही) लेकिन हम परजीवी बन जाते हैं, तो कई तरह की समस्याएं खड़ी होती हैं. दूसरी तरफ, परजीवी बन जाने के कारणों में भी कई समस्याएं हैं. बॉंग जून हू निर्देशित 2019 की कोरियाई फिल्म पैरासाइट ने ऑस्कर समेत कई पुरस्कार समारोहों में झंडे गाड़ दिये हैं इसलिए चर्चा में है. इसके इतर यह फिल्म इतने पुरस्कार न भी जीतती, तो भी यह उन चुनिंदा और कालजयी फिल्मों में शुमार होती, जिनमें समय का एक बड़ा सच कला के जीवंत सांचों में शाहकार बन जाता है.


Movie Poster of Parasite. (Image Source : LWLies.com)

अगर आपसे कहा जाये कि फिल्म अमीर-ग़रीब के बीच के अर्थात वर्ग संघर्ष पर आधारित है, तो यह ज़्यादा संक्षेप हो जाता है और आप कहानी की आत्मा तक नहीं पहुंचेंगे. कुछ यूं समझें -

"यह फिल्म एक ग़रीब परिवार और एक अमीर परिवार की कहानी है. ग़रीब परिवार के सदस्य पहले रोज़ी रोटी और फिर लालच के चलते अमीर परिवार के यहां नौकरी हासिल करते हैं, बग़ैर ये बताये कि चारों ही एक परिवार हैं. ये जानते हुए भी कि कभी इन अमीरों की दौलत उन्हें हासिल नहीं हो सकती, ये उस दौलत से खरीदे गये साज़ो-सामान के ज़रिये अय्याशी की हसरतें पूरी करते हैं. उधर, अमीर परिवार का जीवन इन गरीबों के बग़ैर चल नहीं सकता, लेकिन इनकी ग़रीबी से एक चिढ़ भी बनी हुई है. बहरहाल, ग़रीब परिवार की जान पर तब बन आती है जब ख़ुलासा होता है कि इस बंगले में एक गुप्त तहख़ाना है, जिससे उनके पूर्ववर्ती नौकरों यानी एक और ग़रीब परिवार की कहानी के राज़ छुपे हैं. फिल्म तनाव से इस क़दर जूझती है कि एक के बाद एक चार क़त्ल होते हैं और पहले ग़रीब परिवार का मुखिया यानी एक क़ातिल हमेशा के लिए अपने परिवार से जुदा और दुनिया के लिए ग़ायब हो जाता है."

इस फिल्म की जो समीक्षाएं पश्चिम में हुई हैं, उनमें इसे 'ट्रैजिकॉमिक' कहा गया है. किसी ने इसे शेक्सपियरियन क्लाइमेक्स ज़्यादा माना है बजाय हिचकॉकियन क्लाइमेक्स के. दूसरी समीक्षाओं में 'लेयर्ड' शब्द का बहुधा प्रयोग है, जो यह साबित करता है फिल्म में कई परतें हैं. उधर, ख़ुद फिल्म निर्देशक जून हू ने कई तरह से अपनी इस चर्चित फिल्म की कहानी और विचार को लेकर चर्चाएं करते हुए इस फिल्म को 'स्टेयरवे मूवी' यानी 'सीढ़ियों के ज़रिये' कहानी कहती फिल्म माना है. कोरिया के पहाड़ीनुमा शहर के वातावरण में ग़रीब परिवार की रिहाइश जहां सड़क के नीचे एक बेसमेंट में है, वहीं अमीर परिवार पहाड़ीनुमा शहर की ऊंचाई पर बसे इलाके में स्थित बंगले में रहता है. पुलों, सड़कों के बीच कई सीढ़ियां हैं. बेसमेंट और सड़क के बीच कई सीढ़ियां हैं. और उस बंगले से तहख़ाने में उतरती कई सीढ़ियां हैं. ये वर्गों और वर्ग संघर्ष का रूपक फिल्म में कलात्मक तरीक़े से गढ़ती हैं. लेकिन ऐसा क्यों है? क्या सिर्फ़ ऐसा ही है? पश्चिमी फिल्म रिव्यू और फिल्म निर्देशक हू के इस रूपक के अलावा हम इस फिल्म पर कोई बात नहीं कर सकते? बेशक़ कर सकते हैं अगर हम अपनी ज़ाती समझ का इस्तेमाल करें.

एशिया की समस्याएं और संघर्ष

अमेरिका, यूरोप यानी पश्चिम पुरस्कार, यश, धन और बड़े अवसर देते हैं इसलिए उनका कहा सुनने की रिवायत रही है. होता भी है कि किसी आंचलिक फिल्म का फिल्मकार अपनी फिल्म की किसी सत्ह की तुलना पश्चिमी समाज या परिस्थितियों की किसी सत्ह के साथ कर यह जताता है कि उसने कामयाब मेटाफर रचा है. लेकिन, बात निज संसार की समझ की है. एशिया के गिने-चुने मुल्क़ों को अगर छोड़ दिया जाये, तो ज़्यादातर या तो प्रगतिशील हैं या फिर तथाकथित 'थर्ड वर्ल्ड'. फिर इस 'थर्ड वर्ल्ड' में थर्ड क्लास की कितनी परतें हैं, इसका अंदाज़ा तक पश्चिम के बस की बात नहीं.

Movie Still of Parasite. (Image Source : CinemaBlend.Com)

एशिया के कई देशों की मूलभूत समस्या यह रही है कि वे लंबे समय तक ग़ुलामी के शिकार रहे हैं. औपनिवेशिक साम्राज्यों की लूट के शिकार होने के बाद इन अधिकतर देशों की दूसरी समस्या यह रही है कि आर्थिक विकास की दौड़ में इनकी रफ़्तार और इनकी सफलता को उन पैमानों पर आंका जाता है, जो इनके हैं ही नहीं, न इनके हिसाब से उचित लगते हैं. कहीं लोकतंत्र की बहाली के लिए जंग जारी है, कहीं मानवाधिकारों के लिए तो कहीं अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए. सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जैसे तमाम मोर्चे अधिकतर एशियाई देशों में समस्याओं के भी पर्याय हैं.

दक्षिण कोरिया की बात करें तो दूसरे विश्व युद्ध के अंत में जापान ने जब समर्पण किया, उसके बाद कोरिया की स्वाधीनता की राह बनी. इसके बाद अपने आंतरिक संघर्षों से कोरिया जूझा और दोफाड़ हुआ. उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच तनाव के साथ ही, विश्व स्तर पर अपने विकास के लिए एक संघर्ष करते दक्षिण कोरिया में लोकतंत्र के लिए लंबी बहस छिड़ी तो 'कड़ी सेंसरशिप' के कारण अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए भी कलाकारों ने संघर्ष किया. दक्षिण कोरियाई सिनेमा का ये करीब 70 साला सफर देखा जाये तो इनके मूल स्वरों में कोरिया में जापानियों का दौर, कोरियाई युद्ध और आंतरिक संघर्ष के मुद्दे साफ उभरते दिखायी देते रहे हैं. बेसिरपैर की सेंसरशिप ख़त्म होने के बाद 90 के दशक के बाद दक्षिण कोरियाई सिनेमा में एक पुनर्जागरण काल देखा जाता है.

जून हू निर्देशित ताज़ा फिल्म पैरासाइट कोरियाई सिनेमा के इसी दौर की एक श्रेष्ठ कलात्मक कृति है. अपनी कहानी, पटकथा, संवाद, संगीत और छायांकन के माध्यम से यह फिल्म अनेक प्रकार के आंतरिक संघर्षों और वैश्विक चिंताओं को ज़ाहिर करती है.

अमीरी-ग़रीबी की खाई का नैरेटिव

इस मुद्दे पर फिल्म बनाना, कहानी लिखना या नाटक खेलना अपने आप में चुनौतीपूर्ण भी है और जोखिम भरा भी. अस्ल में, हम आम जनजीवन में जो दृश्य हर जगह पसरे हुए देखते हैं, उन्हें संपूर्ण सार्थकता, चौंकाते संदर्भों, आकर्षक कल्पनाशीलता और अनेक स्तरों का समायोजन कर एक जस्टिफाइड संदेश के साथ किसी कलाकृति में उतारना बेहद मुश्किल काम है. यह काम बेहद संजीदगी से पैरासाइट कर दिखाती है.

एक-एक पाई के लिए रोज़ाना संघर्ष करते एक युवक को एक संपन्न परिवार के आलीशान बंगले में जाकर एक टीनेजर लड़की का पढ़ाने का मौका मिलता है. वह उस संपन्नता की चकाचौंध के मोहपाश में बंधता है और एक-एक कर उस युवक की बहन और मां-बाप उस परिवार में विभिन्न नौकरों के तौर पर आ जाते हैं. संपन्न परिवार को यह भनक तक नहीं कि ये चारों एक ही परिवार के सदस्य हैं. इतनी कहानी से आप लालच का मनोविज्ञान तो साफ़ समझ सकते हैं, लेकिन एक बारीक़ नज़र रखें तो दक्षिण कोरिया ही नहीं बल्कि एशिया के कई देशों की एक साझा समस्या को भी भांप सकेंगे.

Movie Still of Parasite. (Image Source : NationalReview.Com)

बेरोज़गारी की समस्या बेहद भयावह और रोज़गार के वातावरण, भुगतान और परिस्थितियों को लेकर भी कई तरह के संकट हैं. दक्षिण कोरिया के युवाओं या मिलेनियल्स के बीच ऐसी समस्याओं को लेकर एक शब्द बेहद प्रचलित है, 'हेल चोज़ुन' या 'हेल कोरिया'. रोज़गार संबंधी समस्याओं को लेकर एक पूरा जहन्नुम है. ऐसे जहन्नुम में अगर एक मामूली से झूठ से कुछ वक़्त की राहत मिलती है, तो इसे समाज का नैतिक पतन कहना कहां तक उचित है? यह अक्षम राजनीति से उपजी सामाजिक स्थिति की विकृति क्यों न मानी जाये?

इस फिल्म में सामाजिक-आर्थिक मोर्चे पर जो दूसरा संकट उभारा गया है, वह भी एशिया के कई देशों का हाले-हालिया है. अमीरी और ग़रीबी के बीच बेहद चौड़ी खाई. ग़रीबी इतनी कि एक परिवार सड़क के नीचे उस बेसमेंट में रह रहा है, जिसके रोशनदान में शराबी पेशाब कर रहे हैं और बारिश होती है तो वह बेसमेंट इस तरह भर जाता है कि फिर इस परिवार को अपना आशियाना नये सिरे से बसाने की जद्दोजहद करनी पड़े. उधर, अमीरी इतनी कि एक परिवार को अपने ही भीमकाय बंगले के गुप्त ठिकानों का पता नहीं और उन्हें अपने ग़रीब नौकरों की मौजूदगी में एक बदबू परेशान करती है.

यह तो पटकथा की बात है, फिल्म के तक़रीबन हर फ्रेम में फिल्मकार ने सामाजिक आर्थिक संकट के नैरेटिव को ख़ासी तवज्जो दी है, ग़ालिबन फिल्म इसी स्तंभ पर टिकी है. अलबत्ता, फिल्म दूसरे कुछ और ज़रूरी पहलुओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं करती.

सीढ़ियां ऊपर से ज़्यादा नीचे की तरफ़!


Creative of Parasite. (Image : Medium.com)
दक्षिण कोरिया हो या एशिया के और कथित प्रगतिशील/पिछड़े मुल्क़, हर दीये तले अंधेरा कुछ ज़्यादा ही है. निर्माण के नाम पर वर्टिकल तरक़्क़ी के अंधेपन में हम यह देख भी नहीं पा रहे कि ज़मीन से आसमान की तरफ़ हम कम जा रहे हैं, ज़मीन से पाताल की तरफ़ ज़्यादा गिर रहे हैं. पैरासाइट अपनी परतों में विकास के दो भयानक नतीजों 'प्रॉपर्टी बाज़ार का कपट' और 'लोन शार्क्स की क्रूरता' के डरावने दृश्य देती है.

जो परिवार बंगले में झूठ से घुस आया है, उससे पहले घर में एक हाउसकीपर सालों से थी. उस औरत ने अपने पति को खूंखार साहूकारों से बचाने के लिए बंगले के गुप्त तहख़ाने में सालों से छुपा रखा. संपन्न परिवार जब छुट्टियों पर गया है, तब नौकर परिवार के सामने यह औरत आती है और कहती है कि उसे इतनी जल्दबाज़ी में नौकरी से निकाला गया कि वह अपनी एक ज़रूरी चीज़ लेना ही भूल गयी. जब यह औरत इस बंगले में दाख़िल होकर तहख़ाने में अपने पति से मिलती है, तब उसका राज़फ़ाश होता है और नाटकीय ढंग से उस औरत के सामने भी यह राज़फ़ाश होता है कि चारों नौकर एक ही परिवार हैं, जो झूठ बोलकर इस घर में अय्याशी कर रहे हैं.

इसके अलावा बाद में इसी बंगले में चार क़त्ल होते हैं. मनहूस घोषित हो जाने के बाद भी इस घर को अनजान विदेशियों को बेच दिया जाना दर्शाया गया है. इन तमाम प्रसंगों को लेकर फिल्मकार एक मतलबी दुनिया का चित्र रचता है. ऐसी दुनिया, जहां हर कोई दूसरों का खून चूसकर अपनी तरक़्क़ी का हामी है. झूठ, लालच, हवस, नफ़रत और मौक़ापरस्ती जैसे हथियार हैं, जो वैश्वीकरण के बाज़ार में विकास का सिक्का चला रहे हैं. पैरासाइट का फिल्मकार इस पूरी व्यवस्था के लिए भी सीढ़ियों का अनूठा रूपक बांध गया है, क्योंकि ज़्यादातर दृश्यों में सीढ़ियां उतर रही हैं, चढ़ती हुई बहुत कम हैं.

क्लाइमेक्स दर्शन है या एक और समस्या?

जून हू निर्देशित पैरासाइट का अंत चर्चा का विषय बन गया है. किसी के लिए अबूझ, किसी के लिए दार्शनिक तो किसी के लिए एक और समस्या का इशारा. इसे थोड़ा समझना ज़रूरी है.

हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि तहख़ाने में बंद कर दिया गया आदमी छूटता है और उस नौकर परिवार की हत्या पर उतारू हो जाता है. पहले लड़के को मारता है और फिर लड़की पर जानलेवा हमला करता है. फिर वह परिवार उस आदमी को मारता है और मरने, मारने और बचाने के शोरगुल के बीच अमीर परिवार का मुखिया जब नाक बंद कर ग़रीबी की उसी बदबू का आभास कराता है तो नौकर परिवार का मुखिया उसे भी मार डालता है. लेकिन ऐसा हुआ क्यों?

ये ख़ून ख़राबा फिल्मकार की मनावैज्ञानिक पकड़ दर्शाता है. ग़रीबी, दुत्कार, धिक्कार, गालियां और दुख ही दुख जब जीवन भर सहा जाता है तो एक दबाव के बाद वह हिंसा में ही व्यक्त होता है... फिर वह बदले के रूप में हो, अपराध के रूप में या घिनौने कृत्यों के रूप में. क़त्ले-आम के इन दृश्यों पर किसी तरह फिल्म ख़त्म हो सकती थी. लेकिन यह एकस्तरीय या लीनियर अंत कहलाता और फिल्म साफ तौर पर ट्रैजडी कहलाती.

ऐसा न करते हुए फिल्मकार इसके बाद कुछ दृश्य जोड़ता है. नौकर परिवार का मुखिया ग़ायब है. बेटी मर चुकी है. जानलेवा हमले के बेटा ब्रेन इंजरी का इलाज करवाने के बाद ठीक होता है और इसी बीच इस बेटे और मां पर जालसाज़ी का मुक़द्दमा भी चलता है. ठीक होने के बाद बेटा अपने पिता की तलाश करता है, जिसका किसी को कुछ पता नहीं. तहख़ाने से बंगले के एक बल्ब का कनेक्शन है. उस बल्ब को स्काउट कोडिंग में जलता-बुझता देख लड़का समझ जाता है कि उसके बाप ने ख़ुद को बंगले के उसी तहख़ाने में बंद किया हुआ है. वह अपने पिता से मन ही मन कहता है कि एक दिन वह बेहद अमीर होकर यह बंगला खरीदेगा और अपने पिता को मुक्त कराएगा.

कुछ समीक्षकों का मत है कि नौकर पिता ने हत्या के जुर्म में ख़ुद को जेल की सज़ा दे दी है. ये भी कहा जा रहा है कि यह आजीवन कारावास है क्योंकि उसके बेटे के पास कभी इतनी दौलत नहीं होगी. समस्या यह है कि दक्षिण कोरिया (तक़रीबन पूरे एशिया) में आर्थिक विषमताएं इस तरह की हैं कि जो ग़रीब पैदा होगा, वह ग़रीब ही मरेगा. चमत्कार लाखों में एक हो तो हो. वहीं, कोई कह रहा है कि इस फिल्म के सीक्वल में वह बेटा किसी किस्म के जीवट या करिश्मे से इस बंगले तक पहुंचेगा और अपने पिता को छुड़ाएगा. लेकिन, विचारणीय है कि अपने अपराध बोध से दबा और अपने मामूली लालचों का वीभत्स अंजाम देख चुका लड़का क्या अब किसी अनैतिक या जोखिम भरे रास्ते का रुख कर सकेगा?

Parasite Director Bong Joon Ho with Cast. (Image Source : Metro.Co.UK)


भारतीय और एशियाई साहित्य की परंपरा

पैरासाइट के अंत को आशावाद के तौर पर भी समझा जा सकता है कि 'वो सुब्ह कभी तो आएगी'. दक्षिण कोरिया हो या भारत या एशिया का कोई अन्य देश, वास्तव में जहां बुनियादी मुद्दों पर संघर्ष हैं, वहां इस तरह का आशावाद बेमानी नहीं है. घुप अंधेरे और लंबी काली रात में सुब्ह की कल्पना भी शायद ताक़त दिया करती है. अपने पिता को काली कोठरी से आज़ाद करवाने की बेटे की इच्छा यथार्थ के धरातल पर दिवास्वप्न मात्र हो, लेकिन एक आशा का संचार करती है.

वास्तव में, पैरासाइट कोई अनोखी फिल्म नहीं है बल्कि पूर्ववर्ती कुछ एशियाई फिल्मों का नवीनतम संस्करण कही जानी चाहिए. चेतन आनंद निर्देशित नीचा नगर को याद करना चाहिए. थीम की सत्ह पर ये दोनों फिल्में काफ़ी समान दिखती हैं लेकिन पैरासाइट बेशक़ 60-70 बरस आगे का सिनेमा मालूम होता है. हयातुल्लाह अंसारी की कहानी 'नीचा नगर' रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की की कहानी 'लोअर डेप्थ्स' पर आधारित थी अर्थात 20वीं सदी के मध्य में रूस भी कमोबेश इसी तरह के सामाजिक आर्थिक संकट से जूझ रहा था. या 2017 की फिल्म 'बियॉण्ड द क्लाउड्स' का पहला शॉट, जिसमें स्कायस्क्रेपर्स के बीच बने एक पुल पर दौड़ती महंगी गाड़ियों को दर्शाते हुए कैमरा नीचे उतरता है और पुल के नीचे बेतहाशा ग़रीबी की इबारत बिछी हुई है. तो, जिसे जून हू 'स्टेयरवे मूवी' कह रहे हैं, वह कोई हालिया पैदा हुआ विचार नहीं बल्कि एशियाई साहित्य की एक परंपरा का नया चरण है और इससे यह नहीं समझना चाहिए कि पैरासाइट में कुछ भी मौलिक नहीं है.

मौलिकता के बावजूद फिल्मांकन और साहित्य के नज़रिये से पैरासाइट आपको कई तरह की रचनाएं याद बरबस दिलाती चलती है. किसी स्तर पर साहिर की वो नज़्म 'रहने को घर नहीं है सारा जहां हमारा', तो किसी जगह फ़ैज़ की नज़्म 'हम देखेंगे', तो कहीं ईरानी काव्य की कुछ झलकियां और कहीं रूसी साहित्य के किसी शाहकार का अक़्स आपके ज़ेह्न में उतर सकता है. अलावा इनके, वियतनाम, बर्मा, फलीस्तीन और चीन से आती रही ग़रीबी, आंदोलनों, दमन और अभिव्यक्ति की आज़ादी की मांग संबंधी ख़बरों के साथ ही कुछ चित्र भी पैरासाइट में घुले-मिले लगते हैं, लेकिन पहली नज़र में नज़र आना मुश्क़िल है.

आख़िर में बात पैरासाइट के अंत की, तो जिसे पश्चिमी समीक्षक 'ट्रैजिकॉमिक' या 'हिचकॉकियन' जैसे नये शब्दों में समझाने का जतन कर रहे हैं, उसके लिए हिंदी साहित्य में सुखांत, दुखांत के साथ ही प्रसादांत के सिद्धांत के रूप में बेहतर व्याख्या पहले से है. इस फिल्म के क्लाइमेक्स को हमें प्रसादांत समझना चाहिए. वैसे इस फिल्म की विषय वस्तु के हिसाब से इसका ज़ॉनर तय करने में भी समीक्षक उत्सुक दिख रहे हैं. डार्क कॉमेडी, कॉमेडी थ्रिलर, सोशल सटायर आदि शब्दों में इस फिल्म को समझाने की कवायद हो रही है, लेकिन यह सिर्फ़ समीक्षकों का काम है, इससे फिल्म देखने और उसका आनंद लेने में कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

अंतत: हमें इस फिल्म के बहाने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनावैज्ञानिक समस्याओं पर विचार करना चाहिए. एशिया के पूरे परिदृश्य को समझते हुए इत्तिहाद क़ायम कर किसी हल के लिए साझा कोशिश करना चाहिए. और समझना चाहिए कि इस ब्रह्मांड में हर कण एक दूसरे से संबद्ध है और अन्योन्याश्रित संबंध के कारण ही सृष्टि की रचना हुई है. ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में हमें पूरी दुनिया को ग्लोबल मार्केट के तौर पर कथित 'विकसित' करना है या पूरी दुनिया को एक घर की तरह समझने के संस्कार आगे बढ़ाने हैं. लोकतंत्र, आज़ादी, विकास जैसे तमाम जुमलों के पीछे जो हक़ीक़त है, उसे बेहतर करने के लिए कोई कलाकृति किस स्तर पर आपको आंदोलित कर सकती है, इसका अंदाज़ा किसे है? इसलिए हर श्रेष्ठ कलाकृति से रूबरू होना ही चाहिए.

(यह समीक्षात्मक आलेख न्यूज़ 18 हिंदी के लिए लिखा गया था, जो 17 फरवरी 2020 को वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था. hindi.news18.com से साभार यह आलेख यहां अविकल प्रस्तुत किया जा रहा है.)