शनिवार, जनवरी 13, 2018

समालोचना

हिंदी लेखिकाओं की आत्मकथाएं : अध्ययन-विश्लेषण


हिंदी साहित्य में पिछले कुछ समय से स्त्री विमर्श जब-तब सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि बनता रहा है। महिलाओं के (विशेषकर गद्य) लेखन में कई पहलुओं से पड़ताल की जाती है। आयातित विधा मानी गयी आत्मकथा के क्षेत्र में भी लेखिकाओं ने ज़बरदस्त पहचान बनायी है। इन पर संवाद कम हुए, विवाद अधिक। बहरहाल, लेखिकाओं की आत्मकथाओं के हवाले से कुछ ज़रूरी पहलुओं को इस लेख में टटोलते हैं।


इन आत्मकथाओं का समाज से संबंध

किसी भी इतिवृत्तात्मक लेखन की आलोचना के पहले चरण में रस्मन उसके सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक सरोकारों की पड़ताल की ही जाती है। लेखिकाओं की आत्मकथाओं की विवेचना भी इसी सिरे से शुरू करना समीचीन है क्योंकि महिलाओं का लेखन इस संबंध में एक भिन्न दृष्टि तो रेखांकित करता ही है। शशि देशपांडे का कथन है -

“मैं महिलाओ के विषय में और उनके नज़रिये से क्यूँ न लिखूं? इस तरह लिखने के लिए हमें हमेशा से छोटा महसूस कराया गया, हमारी आलोचना की गयी, पर अब नहीं...”

वास्तव में ऐसा हुआ है। अमृता प्रीतम के आत्मकथात्मक लेखन की बेबाकी के कारण ही उन्हें समाज निकाले का दर्द भोगना पड़ा। कमला दास को अपनी आत्मकथा के बाद बनी परिस्थितियों के कारण यह तक कहना पड़ा कि ‘माय स्टोरी’ काल्पनिक कहानी है। भारत की लगभग हर भाषा की लेखिका को अपने लेखन पर आरोपों, आपत्तियों, प्रश्नों अथवा विरोधों के दंश झेलने ही पड़े हैं। यह इस देश की नियति ही है कि यहां अपमान हर कलाकार ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति के हिस्से में आता है। प्रकारान्तर से, हमारी संस्कृति अपमान करने की स्वतंत्रता को संरक्षण देती है।

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नारी अपने पूरे इतिहास के प्रति सचेत होकर, अतीत की तमाम व्यथाओं एवं विसंगतियों को लेकर, काग़ज़-कलम के साथ उपस्थित होती है। लैंगिक असमानता, आर्थिक विवशता, कानूनी भेदभाव और परिवार से लेकर समाज व देश-दुनिया के स्तर तक उसकी दोयम दर्जे की स्थिति, आदि एक महिला लेखक के अवचेतन तथा चेतन को उद्वेलित करती है। स्वाभाविक रूप से, वह संपूर्ण नारी जाति की पीड़ा को घनीभूत करते हुए अपनी पीड़ा में एकांतिक नहीं रह जाती। अफ़सोस तो यह है कि महिलाओं की इस सामाजिक स्थिति में बदलाव सदियों से नहीं हुआ है या बदलाव की गति बेहद धीमी है। इस स्थिति को ‘काग़ज़ी है पैरहन’ में इस्मत चुगताई बेबाकी से बयान करती हैं -

“औरत की खेत-खलिहान और मवेशियों की तरह हिफाजत होती थी, है। मालिक और मल्कियत के लिए अलग-अलग उसूले-जिन्दगी बन गये। मर्द पालनहार पति और ख़ुदाए-मज़ाजी। औरत के फरायज़ मर्द की ख़िदमत... उसके बाद वही अंजाम होता जो बूढ़े नाकारा मवेशियों का होता है।“

इसी तरह का बयान महादेवी वर्मा ने ‘श्रंखला की कड़ियां’ में दर्ज करते हुए लिखा है कि पशु-पक्षियों की तरह मर्दो द्वारा औरत पाली जाती है जो उसके अधिकार की वस्तु ही मात्र रह जाती है। ‘ख़ुदा की वापसी’ में नासिरा शर्मा लिखती हैं -

“एक तरफ कयामत के दिन मुरदों की पहचान मां के नाम से होगी, बाप के वंशवृक्ष से नहीं, फिर उसी औरत को आखिर प्रताड़ित कौन कर रहा है - सियासत, समाज, अज्ञानता।“

ज़ोया हसन कहती हैं कि मुसलमान औरतों की स्थिति को सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को नज़रअंदाज़ करते हुए समझना असंभव है। लेकिन यह क्या केवल मुसलमान औरतों के संबंध में कथन है? भारत के हर समाज, हर संप्रदाय की औरतों के साथ यह बात लागू होती है। बल्कि, दुनिया भर की औरतों की आबादी के बहुत बड़े हिस्से पर यह बात लागू होती है। विश्व स्तर की मान्य एवं विजेता खिलाड़ी सेरेना विलियम्स तक महिलाओं के प्रति आर्थिक असमानता के मुद्दे पर अपनी पीड़ा व्यक्त कर चुकी हैं।

समाज के हर मोर्चे पर, हर इकाई में औरत जब संघर्ष कर रही है और सदियों से घुट ही रही है तो जब वह अपनी कहानी कहती है तो स्वाभाविक रूप से समाज के ठेकेदारों को अपना सिंहासन डोलता दिखता है और इसी डर के मारे वे अपनी सत्ता की पूरी सामर्थ्य के साथ विरोध पर उतर आते हैं। 2010 में हिंदी लेखिकाओं के लेखन को लेकर विभूति राय की एक टिप्पणी चर्चा में रही थी जिसमें उन्होंने महिलाओं के लेखन में देह विमर्श को तरजीह दिये जाने के विषय पर लेखिकाओं को छिनाल कह डाला था। मैत्रेयी पुष्पा जी ने इस पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा था -

“इसमें क्या संकीर्ण है कि अगर औरतें अपनी ज़िंदगी अपने मुताबिक़ जीना चाहती हैं, घर से बाहर निकलना चाहती हैं, आपसे बर्दाश्त नहीं होता तो हम क्या करें, पर आप क्या गाली देंगे। ...हम महिलाओं के सम्मान के लिए बड़ी लंबी लड़ाई लड़कर यहां पहुंचे हैं, लेकिन इस तरह के पुरुष हमें गालियां देते हैं, एक पत्थर मारते हैं और सब पर कीचड़ फैला देते हैं।“

बाद में, राय ने स्पष्टीकरण देते हुए एक तरह से माफ़ी मांग ली थी लेकिन ऐसा एक नहीं कई बार हुआ है। पुरुषों ने स्त्री देह पर बेबाकी से लेखन किया है। जब-तब यह देह खोली गयी है और इस पर विमर्श हुआ है लेकिन स्त्री स्वयं इस देह की बात करती है तो पुरुषों की दुनिया में उसका विरोध होता है। यही समाज की विडंबना है। वास्तविकता यही है कि एक स्त्री का कलाकार या लेखक होना ही पुरुष को किसी चुनौती या खतरे का-सा आभास देता है। लेखिकाओं की आत्मकथाओं की संख्या कम होने के विषय में मैनेजर पांडे ने कहा था “स्त्रियों की आत्मकथाएँ तो इसलिए नहीं है कि उन्हें हमारे सामाजिक ढाँचे में सच बोलने की स्वतंत्रता नहीं है”। डॉ. महेश संतोषी की एक कविता की ये पंक्तियां पुरुष समाज के खोखलेपन को बारीकी से उजागर करती हैं -

आदमी के आदिम दुराचरण का सबसे सनातन दर्पण है
औरत में पवित्रता की खोज
इसीलिए इतिहास के हर युग में
वह रचता रहा सतीत्व पर ऋचाएँ, मंत्र, श्लोक।
जानवरों के साथ-साथ एक दिन
आदमी की जायदाद बन गई औरत
फिर जायदाद जैसी ही देखी गयी
परोसी गयी, भोगी गयी औरत!
आदमी का जंगल राज-हर संस्कृति, सभ्यता,
व्यवस्था को नकारता रहा।
जिस दिन अस्मत ईजाद हुई थी
उस दिन आधी मर गयी थी
दुनिया की हर औरत!

इन आत्मकथाओं ने पुरुष समाज की पूरी व्यवस्था को कठघरे में कहीं न कहीं खड़ा किया है और अपनी पीड़ा की गहरी सच्चाइयों को खुलकर सामने रखा है, इसीलिए ये आत्मकथाएं साहित्य के पुरुष सामंती सोच द्वारा उपेक्षित रही हैं अथवा इनका समुचित मूल्यांकन अब तक प्रतीक्षित है। लेखिकाओं की आत्मकथाएं समाज से सीधे जुड़ी हैं, कई स्तरों पर समाज की कुरूपता को रूपायित करती हैं और समाज को गहरे प्रभावित करती हैं इसलिए इन्हें समाज का स्त्री इतिहास तक माना जा सकता है। स्वाभाविक रूप से इनमें कहीं कुछ विसंगतियां भी हैं, कमियां भी लेकिन यह तो हर कलाकार की कलाकृति में पाया जाने वाला पहलू है।

इन आत्मकथाओं की मनोवैज्ञानिक अंतर्वस्तु

एक त्रासदी, एक कठोर कारावास या एक कठिन समय तक किसी व्यक्ति के मन पर गहरा असर छोड़ जाता है। सदियों की पीड़ा भेगती हुई स्त्री जब अपनी पीड़ा के उफान पर आती है तो वह नदी की बाढ़ से भी अधिक रौद्र होती हुई हर सीमा तोड़कर बहना चाहती है। ऐसे में, कोई लक्ष्मण रेखा या मर्यादा का तर्क सिरे से खारिज कर दिया जाना चाहिए। साहित्य में जब एक महिला आत्मकथा का सृजन करती है तो क्या यही माना जाएगा कि वह इस तरह के आवेग को ही प्राथमिकता देती है? या ऐसी पक्षधरता ही उचित है?

इसे ‘माय स्टोरी’ शीर्षक से आत्मकथा लिखने वाली कवयित्री कमला दास के शब्दों में ठीक से समझा जा सकता है -

“जो कुछ भी हम लिखते हैं, उसमें एक रचनात्मकता होती है। कहाँ वास्तिवकता आती है और कहाँ कल्पनाशीलता, इससे आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए। यह देखना चाहिए कि वो चीज़ हमें छू रही है या नहीं, हमें प्रेरणा मिल रही है या यह हमें हिला रही है या नहीं। बाकी सब बातें बेमानी हैं।“

मन की बात या मन का विज्ञान समझ पाना बहुत दूभर कार्य है। फिर भी, इसके बीज जन्म के तुरंत बाद से मिली परवरिश एवं परिवेश पर एक स्तर पर आश्रित होते हैं। लैंगिक भेदभाव हमारा समाज हर स्त्री को जन्म के साथ ही दे बैठता है। फिर तमाम तरह की असमानताओं एवं सीमाओं का उद्घाटन होता जाता है। एक स्त्री का मन परिपक्व होते-होते पूरी स्त्री जाति के मन का संघनित मन बन जाये, तो आश्चर्य नहीं है। ऐसे ही मन लेखन या कला की ओर प्रवृत्त होते हैं, यह भी माना जा सकता है। इस तथ्य को प्रणय कृष्ण इस तरह व्यक्त करते हैं -

“अच्छी आत्मकथा आपकी ‘निजता’ से वाद-संवाद करती है, आपको ‘आप’ से मिलाती है, आपके ‘आत्मनिर्वासन’ को भंग करती है, आपकी अपनी कहानी में घुलमिल जाती है।“

लेखिकाओं की आत्मकथाओं में देह एवं संबंधों के विमर्श को फ्रायड के दमित इच्छाओं के सिद्धांत के अनुरूप भी समझा जा सकता है, और ऐसा गलत भी नहीं है। फिर भी, एक स्तर पर ऐसा लगता है कि यह सीधे समाज के पाखंड को चुनौती देने के मकसद से उठाया जाना वाला विद्रोही तेवर है। यह एक लंबी यातना से मुक्त होने की प्रबल इच्छा का परिचायक भी है। भले ही, इससे समाज के कुछ नियम या ढांचे टूटते हैं, लेकिन पूरे होशो-हवास के साथ एक लेखिका जब इस सत्य का उद्घाटन करती है तो वास्तव में, वह विभिन्न स्तरों पर अपनी स्वतंत्रता हासिल करने की छटपटाहट को ही व्यक्त करती हुई प्रतीत होती है। अवंतिका शुक्ल लिखती हैं -

“इन लेखिकाओं के पास पुरुषों की आत्मकथाओं के समान किसी बड़ी परंपरा के निर्माण का दंभ नहीं है, बल्कि एक चेतनायुक्त व्यक्तित्व की पीर है, जो अपनी बीमारी के कारण को समझ रहा है और इलाज कर रहा है पर उसका इलाज दुनिया द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया है। ...इन आत्मकथाओं पर कई बार आरोप लगे कि इन्होंने स्त्री की मुक्ति सिर्फ देह के माध्यम से ही खोजी। बाकी मुद्दों से वे कटी रहीं। पर ऐसा नहीं है, इन लेखिकाओं ने जातिवाद, सांप्रदायिकता, अशिक्षा जैसे मुद्दों पर व्यवस्थित चर्चा की है। पर यौनिकता भी एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।“

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ज़्यॉ पॉल सार्त्र के अस्तित्ववाद के सिद्धांत का स्त्री लेखन पर एक गहरा प्रभाव दिखता है। एक बेचैनी, एक उष्मा और एक बेखैफ़ मौज इन आत्मकथाओं में पूरी सार्थकता के साथ दर्शनीय है। हिंदी साहित्य में बच्चन की आत्मकथा को श्रेष्ठ माना गया है। इसके बाद विष्णु प्रभाकर की तीन खंडों में आयी आत्मकथा चर्चित रही है। लेकिन लेखिकाओं की आत्मकथाओं को एक वर्ग विशेष की व्सतु निरूपित करने वाली आलोचना ने न्याय नहीं किया है। इससे दो बातें एकदम साफ हैं - पहली, कि हिंदी पट्टी का साहित्य जगत भारत में दूसरी भाषाओं के साहित्य जगत से बहुत पिछड़ा हुआ है और दूसरी यह कि, वह जो पुराना जुमला है कि औरत के मन को समझ पाना ब्रह्मा के बस में भी नहीं है, वह इस प्रकरण में इस अर्थ में सामने आता है कि जब एक स्त्री मन अपना सच खोलकर रखता है तो पुरुष का पूरा अस्तित्व शर्म, भय एवं ग्लानिबोध से भर उठता है और वह आंखें मिलाने की हिम्मत तक जुटा नहीं पाता।

लेखिकाओं की आत्मकथाएं कम क्यों

भारत में पहली आत्मकथा बनारसीदास जैन कृत ‘अर्द्धकथा’ मानी जाती है जिसका समय 17वीं सदी के मध्य का है। किसी महिला द्वारा हिंदी में पहली आत्मकथा का स्पष्ट रूप से कोई जिक्र नहीं है लेकिन 19वीं सदी से आत्मकथात्मक लेखन की ओर महिलाएं प्रवृत्त हुईं। इसकी पूर्वपीठिका में हम मान सकते हैं कि बुद्ध काल की थेरियों, मीरा, आंडाल आदि का लेखन भी आत्मकथात्मक ही था, हालांकि वह इस विधा के सांचे में तराशा हुआ नहीं था। इस लेखन की आधार भाव-संपदा चूंकि भोगा हुआ यथार्थ ही रहा है इसलिए यह दावा किया जा सकता है।

बीसवीं सदी में, लेखिकाओं की कुछ महत्वपूर्ण आत्मकथाएं आती हैं। इनसे पहले महादेवी वर्मा का जिक्र ज़रूरी है। वास्तव में महादेवी जी ने आत्मकथा के नाम से कोई कृति नहीं सौंपी लेकिन उनका लेखन संस्मरणों एवं निजी अनुभवों की बहुलता के कारण एक आत्मकथा के रूप में समझा जा सकता है। इसके बाद करीब एक दर्जन महत्वपूर्ण आत्मकथाएं गिनायी जा सकती हैं। वास्तव में, जब लेखिका खास तौर से गद्य साहित्य सृजन की सूत्रपात करती है तब उसके केंद्र में स्वयं को ही रखती है। ऐसा अधिकांश मौकों पर होता है। इसलिए यहां से एक सूत्र निकलता है - अमूमन एक लेखिका का संपूर्ण साहित्य उसकी कथा का ही असंयोजित रूप होता है। अंततः वह पाती है कि इसके अतिरिक्त उसके पास अपनी कथा में बहुत कम ही शेष रह गया है।

कथा के केंद्र बिंदु के रूप में नारी रही है। अर्थात कथा के केंद्र बिंदु की आत्मकथा लिखना यूं भी बेमानी है। आत्मकथा तो किसी पात्र की हो सकती है, लगभग हर कथा के केंद्र की कैसे! जैसा कि ऑस्कर वाइल्ड कहते हैं -
"A man's face is his autobiography. A woman's face is her work of fiction."

फिर भी, नॉन फिक्शन लेखिकाओं अथवा महिला कवियों के संदर्भ में गुंजाइश बनी रहती है।

इतर कारणों में सामाजिक बंधन, दबाव एवं पराधीनता के साथ ही आर्थिक स्वतंत्रता का अभाव महिलाओं की आत्मकथाएं कम होने के कारण हैं। एक मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि ज़रूरी नहीं कि हर महिला लेखक आत्मकथा लिखने का जोखिम उठाने का साहस जुटा पाये। क्योंकि आत्मकथा निष्पक्ष रूप से स्वयं के छुपे हुए सत्यों का प्रकाशन करना है। महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ ने जिस स्तर पर इस अनावरण धर्म को स्थापित किया, बाद के रचनाकारों के लिए आत्मकथा लिखने की मूल प्रेरणा या प्रयोजन यही रहा। संभवतः इसलिए कमला दास ने आत्मकथा को “स्ट्रिपटीज़ एक्ट” माना और फिर उनके बाद प्रभा खेतान जैसी अन्य लेखिकाओं ने भी।

कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा के प्रकाशन के बाद अब यह सवाल मुंह बाये खड़ा है कि दलित महिलाओं की आत्मकथाओं का अभाव क्यों है? दलित विमर्श पहले ही साहित्य में बड़ा महत्वपूर्ण है और इसके साथ स्त्री विमर्श का संयोजन कर दिया जाना एक अलग ही दुनिया की खोज साबित हो सकता है। मराठी की लेखिका उर्मिला पंवार का आत्मकथ्य देखें -

“मैं इस दुनिया मे अपनी जाति, प्रजाति और स्त्रीत्व का अभिशाप लेकर जन्मी थी। एक स्त्री होने के दर्द, विशेषतः एक दलित स्त्री होने की पीड़ा तथा सामाजिक भेदभाव को उजागर करने की मेरी इच्छा ने ही मुझे लेखक बना दिया।“

दलित साहित्य में आत्मकथाओं के अभाव पर गंगा सहाय मीणा का लेख पठनीय है। मीणा आत्मकथा को पूंजीवादी समाज की प्रवृत्ति निरूपित करते हैं। इसके साथ ही, वह एक सूत्र देते हैं कि आदिवासी संस्कृति सामूहिकता को पोसती है, निजता को नहीं। सामूहिकता के संस्कारों में आप आंदोलन एवं सहभागिता का प्रकाशन करते हैं, न कि आत्मकथा का। शायद यह विवेचन जॉन बर्जर के उस कथन की एक और करवट है जिसमें उन्होंने कहा था - Autobiography begins with a sense of being alone. It is an orphan form. मीणा का तर्क और तमाम पहलू विचारणीय हैं और किसी स्तर पर इनसे सहमत होने का मन भी होता है लेकिन जैसा अभी कहा कि दलित महिलाओं की आत्मकथाओं से संभवतः एक अनछुए यथार्थ विश्व का खुलासा हो सकता है जो साहित्य की खोज भी माना जा सकता है इसलिए निजी मत से, इस लेखन को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, न कि तर्कों की दीवार खड़ी करना चाहिए। एक और इच्छा जागती है कि पिछड़े मुस्लिम वर्ग की किसी महिला की बेबाक आत्मकथा भी प्रकाश में आये तो शायद हम दर्द की एक और अथाह गहराई को समझ सकें और अपनी सभ्यता, संस्कृति एवं इतिहास की कलुषता को जान सकें। दर्द से रूबरू होने की यह तमन्ना अपने आप में सुधार के अवसरों जैसी लगती है।

लेखिकाओं की आत्मकथाएं - दृष्टिकोण

जैसा कि शुरुआत से ज़िक्र किया जाता रहा है कि महिलाओं की आत्मकथाओं के प्रति साहित्य जगत का दृष्टिाकेण पक्षपाती रहा है। पुरुषों के वर्चस्व वाले साहित्य जगत ने इस सृजन के मूल्यांकन में कभी सामंती, कभी ब्राह्मणवादी, कभी सत्ता-शक्तिवादी तो कभी धर्म-संस्कृतिवादी रवैया अपनाते हुए इनके महत्व को खारिज करने का ही काम किया है। लेकिन, नकारे जाने के इस उपक्रम अथवा प्रायोजित एकपक्षीय षडयंत्र के बरक्स कुछ स्वर प्रबलता से इनके पक्ष में भी उठे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि महिलाओं द्वारा लिखी गयी आत्मकथाओं को सभी महिलाओं ने खुले दिल से सराहा या स्वीकार किया हो। महिला आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो इन तक पहुंच ही नहीं पाया है और जो पहुंचा है, उनमें से भी एक बड़े वर्ग ने इसको तवज्जो नहीं दी है। ये महिलाएं पुरुष के समाज की परतंत्र महिलाएं हैं या कुलीनता और संस्कारों की पीपरी बजाने वाली संस्कृति की अनुचर। वह संस्कृति जो सारे आदर्श, मर्यादाएं, आचार संहिताएं एवं सांचे महिलाओं के लिए गढ़ती है। पिंजरे के पंछी की यानी हालत ऐसी हो गयी है कि वह यह भूल चुका है कि उड़ान उसका अधिकार है और स्वभाव भी।

अब एक पहलू है शिल्प। महिलाओं के आत्मकथा साहित्य की भाषा महिलाओं के पक्ष की भाषा है। यह भाषा महिलाओं की देह को सामंती या ठकुरसुहाती की भाषा से अलग ढंग से विवेचित करती है। इस भाषा में पीड़ा का आधार है। इस भाषा में नारी की पीड़ा के प्रति सहानुभूति और सम्मान की दृष्टि मिलती है जो पुरुषों के लेखन में अपवाद स्वरूप पायी जाती है। राही मासूम रज़ा जैसे श्रेष्ठ लेखक तक ‘आधा गांव’ में नारी के प्रति बरती जाने वाली भाषा के प्रति न्याय नहीं कर सके। दूसरी ओर, गुलशेर शानी का ‘काला जल’ नारी के प्रति बरती जाने वाली भाषा के साथ संवेदनशील होने का प्रमाण है। अरविंद जैन अपनी किताब ‘औरत होने की सज़ा’ में लिखते हैं -

“काला जल’ की स्त्री ‘आधा गांव’ पहुंचते ही, एक यौन रूपक में बदल दी जाती है। स्त्री और देह के प्रति ऐसी रीतिकालीन, अपमानजनक भाषा-परिभाषा सचमुच शर्मनाक है। साहित्य के आधुनिक युग में भी नारी के उपभोग्या रूप का रस ले-लेकर, कब तक चित्रण-वर्णन करते रहेंगे?”

महिलाओं की आत्मकथाओं का स्वरूप राजनैतिक कम है और आत्मकेंद्रित अधिक। परंतु इस आत्मानुभूति में एक पूरी प्रजाति की एकात्मता के दर्शन अवश्य निहित हैं। ये आत्मकथाएं एक स्तर पर, ‘पर्सनल इज़ पॉलिटिकल’ की बेहतरीन मिसालें हैं। ये कृतियां एक समाज नहीं बल्कि विश्व की महिलाओं के मन की पड़ताल करने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ हैं। इनका उचित एवं सम्यक दृष्टि से मूल्यांकन किया जाना चाहिए केवल साहित्य के निकष पर, न कि किसी दृष्टि विशेष से संबद्ध होकर।

महिलाओं की आत्मकथाओं को देह मुक्ति विमर्श का ब्योरा ही करार देने वाले कतिपय लेखकों ने विस्फोट, उन्मुक्तता और स्वतंत्रता की ललक को भली.भांति नहीं समझा। एक ज्वालामुखी के गर्भ में झुलसने की नियति को युगों से एक श्राप की तरह पीने वाली स्त्री के मन में कितना लावा कितनी तीव्रता के साथ स्फोट को आतुर होगा? सदियों से पिंजरबद्ध एक पक्षी के पंखों में कितना आसमान होगा? इस स्वतंत्रता एवं उन्मुक्तता की इच्छा को कम आंकना, सीमा मानना या इसे मर्यादाओं का उल्लंघन कह देना कतई समीचीन नहीं है। इस सिलसिले में कहने को बहुत कुछ और है और कहा भी जाना चाहिए लेकिन फ़िलहाल कमला दास की अनूदित कविता की कुछ पंक्तियों के साथ अपनी बात एक और क्षितिज की दिशा संकेत रूप में मोड़ देना चाहता हूं -

जब कभी निराशा की नौका,
तुम्हें ठेल कर अंधेरे कगारों तक ले जाती है.
तो उन कगारों पर तैनात पहरेदार,
पहले तो तुम्हें निर्वसन होने का आदेश देते हैं.
तुम कपड़े उतार देते हो,
तो वो कहते हैं, अपना मांस भी उघाड़ो.
और तुम त्वचा के साथ अपना मांस भी उघाड़ देते हो,
फिर वो कहते हैं कि हड्डियाँ तक उघाड़ दो,
और तब तुम अपना मांस नोच नोच फेंकने लगते हो,
जब तक कि हड्डियाँ पूरी तरह से नंगी नहीं हो जातीं.
उन्माद के इस देश का तो एक मात्र नियम है उन्मुक्तता,
और वो उन्मुक्त हो,
न केवल तुम्हारा शरीर,
बल्कि आत्मा तक कुतर कुतर खा डालते हैं.
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हिंदी साहित्य में लेखिकाओं की कुछ महत्वपूर्ण आत्मकथाएं
  • चंद्रकिरन सौनरेक्सा - पिंजड़े की मैना
  • प्रभा खेतान - अन्या से अनन्या
  • मैत्रेयी पुष्पा - गुड़िया भीतर गुड़िया
  • रमणिका गुप्ता - हादसे
  • मन्नू भंडारी - एक सच ये भी 
  • कौशल्या बैसंत्री - दोहरा अभिशाप
  • सुशीला राय - एक अनपढ़ आत्मकथा
  • कुसुम अंसल -  जो कहा नहीं गया
  • कृष्णा अग्निहोत्री - लगता नहीं है दिल मेरा
  • पद्मा सचदेव - बूँद बावड़ी
  • अजीत कौर - खाना बदोश
  • शीला झुनझुनवाला - कुछ कही : कुछ अनकही
अन्य भाषाओं में भारतीय महिलाओं की कुछ महत्वपूर्ण आत्मकथाएं
  • कमला दास - माय स्टोरी
  • रसीदी टिकट - अमृता प्रीतम
  • शौक़त कैफ़ी - यादों की रहगुज़र
  • कानन देवी - शोबारे आमी नोमी
  • दुर्गा खोटे . मी दुर्गा खोटे
  • शांता आप्टे - ज़ाउ मी सिनेमात
  • सुधा कौल - द टाइगर लेडीज़ : ए मेमॉइर ऑफ कश्मीर
  • लीला नायडू - लीला : ए पैचवर्क लाइफ
  • इस्मत चुगताई - काग़ज़ी है पैरहन

मंगलवार, दिसंबर 12, 2017

चिट्ठी

दिल दे चुके हैं आपको, और क्या दें दिलीप साहब..?


सालगिरह के मौक़े पर लिविंग लीजेंड फ़नक़ार दिलीप कुमार के नाम एक दीवाने का ख़त


दिलीप साहब,
आदाब, सादर चरण स्पर्श

कहां से छेड़ूं फ़साना, कहां तमाम करूं... आपको ख़त लिखने बैठा हूं तो यही पसोपेश है। आपको याद होगा कि एक मशहूर इंटरव्यू में आपने यह शेर बतौर अपनी गायकी का सबूत अदा किया था। जबसे आपकी आवाज़ में तरन्नुम में सुना है ये शेर, कई जगह कोट करता रहा हूं। कुछ तो इस शेर की ख़ूबी है लेकिन मुझे यह अज़ीज़ इसलिए हुआ कि मैंने आपसे, आपकी आवाज़ में सुना जब आपसे गाने की फ़रमाइश की गयी। कोई और एक्टर होता तो शायद अपनी फिल्म का अपने पर ही फिल्माया हुआ कोई गाना गा देता लेकिन आप दिलीप साहब हैं। आपकी बात और है, आपका अंदाज़ और है। मैं जानता हूं कि आप शायरी के चाहने वालों में रहे हैं और माशा अल्लाह ख़ुद भी एक शायर रहे हैं। लेकिन, हमारी बदक़िस्मती रही कि एक शायर के तौर पर हम आपको उस तरह समझ नहीं सके जिस तरह दरकार था। आप उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी बोलने, बरतने में जो महारत रखते हैं, वो एक जादू जैसा असर करने वाला ज़ाविया रहा है मेरे लिए। कितने कम कलाकार हैं, फिल्म इंडस्ट्री में, जो इस तरह बात कर सकते हैं। उनमें आप सिर्फ़ एक ही हैं।

Dilip Kumar's roles. image source: Google

मुग़ले-आज़म की बात करना चाहता हूं। एक ऐसी फिल्म जो बचपन से अब तक सौ से ज़्यादा बार देखी है, कैसेट में सुनी है और रेडियो पर भी। कह सकता हूं कि ज़बानी याद है। आपकी एक-एक अदा, आवाज़ का उतार-चढ़ाव, आंखें, भ्ज्ञंगिमाएं और चाल सब कुछ हर बार मुझे किसी तिलिस्म में बांधता रहा है। अपनी शायरी में कुछेक दफ़्अ इस फिल्म के हवाले महफ़ूज़ कर सका हूं लेकिन भरोसा है कि अभी और कई बार करूंगा। अक्सर सोचा कि आपका कोई समकालीन इस क़िरदार को इतनी ख़ूबी से निभा ही नहीं सकता था। यही क्या, आपके निभाये लगभग सभी क़िरदारों में किसी और का तसव्वुर ही मुमकिन नहीं हो पाता। गंगा जमुना, दीदार, दाग़, अमर, देवदास, संघर्ष कितने ही क़िरदार हैं जो आपने अमर कर दिये। मैं शर्तिया कह सकता हूं कि ये क़िरदार किसी और अदाकार ने अदा किये होते तो इतने पुरख़ुलूस और पुरअसर ढंग से यादों में नहीं रह पाते।

आपकी रेंज का क़ायल रहा हूं। ट्रैजडी किंग का ख़िताब हासिल कर लेने के बाद आपने कॉमेडी की तो कमाल किया, सलीम और देवदास से एक दीवाने आशिक़ की इमेज पायी तो सगीना महतो जैसा जनवादी और यथार्थपरक क़िरदार ऐसे जिया जिसका सानी नहीं, दाग़ का शराबी, दीदार का नेत्रहीन और अमर का एक मनोरोगी आपने जिस परिपक्वता और दूरदर्शिता के साथ प्ले किये, उसकी दाद कला को समझने वाला हर शख़्स देगा। आने वाले तमाम कलाकारों के लिए एक बड़ा पैमाना तो बनाया ही, आपने एक गाइडलाइन भी दी कि ऐसे निभाये जाते हैं ऐसे रोल। इसकी एक बड़ी और सच्ची मिसाल तो यही है कि देवदास आपसे पहले से आज तक दर्जनों अदाकार निभा चुके लेकिन देवदास की असली पहचान का नाम दिलीप कुमार ही है।

मुझे हमेशा लगता रहा है कि आपके समकालीन रहे हों, पूर्ववर्ती या परवर्ती, आपसे बेहतर अभिनेता हिंदी फिल्म जगत तो क्या भारतीय फिल्म जगत ने नहीं देखा। कहना नहीं चाहिए लेकिन मेरे एहसास की सच्चाई है कि अंदाज़ में राज कपूर साहब, इंसानियत में देव साहब, मुग़ले-आज़म में पृथ्वीराज साहब और सौदाग़र में राज कुमार साहब पर आप बिलाशक़ बीस साबित हुए। अमिताभ बच्चन साहब के इस जुमले से इत्तेफाक़ कौन कमबख़्त नहीं रखेगा कि - "जो अभिनेता यह कहता है कि वह दिलीप कुमार साहब से प्रभावित नहीं रहा है, वह झूठ बोलता है"।

मुसाफ़िर में आपने एक गीत को अपनी आवाज़ दी थी - लागी नाहीं छूटे रामा चाहे जिया जाये... लता जी के साथ आपने यह गीत गाया था। जिसे पता न हो कि यह गीत आपने ख़ुद ही गाया है, वह अगर सुन ले तो शायद यही समझे कि किसी प्रशिक्षित और दक्ष गायक ने गाया है। फिर आपका वही इंटरव्यू, जिसमें आपने फ़रमाइश पर एक ग़ज़ल के कुछ शेर सुनाये थे। अक्सर सोचता रहा कि फिल्मी अभिनेताओं के साथ आत्ममुग्धता के क़िस्से जुड़े रहे हैं। लेकिन, बावजूद इस हुनर के आपने अपने स्टारडम का उपयोग गायकी के लिए नहीं किया। और, गिने-चुने मौकों पर ही अपनी आवाज़ गीतों को दी। आपके संयम और कला के प्रति समर्पण को प्रणाम।

यूं कहता रहूं तो जाने क्या-क्या कहता चलूं लेकिन यह ज़रूर कहना चाहता हूं कि मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मैं कभी आपसे मिला नहीं या हम एक-दूसरे से अजनबी रहे हैं। यही महसूस हुआ है कि आपके साथ बेहतरीन और बहुत वक़्त गुज़ारा है। उम्र में तो आप मेरे दादू के बराबर होंगे लेकिन कहीं ऐसा लगता रहा है कि आपके बचपन में मैं भी कहीं बच्चा था, आपकी जवानी में आपके साथ मैं जवान हुआ था और आपके सफ़र में कहीं-कहीं आपके साथ रहा।

उम्र बरसों में नहीं होती, आप जानते हैं। आप अमर हो चुके हैं, यह भी आप जानते हैं। सालगिरह की मुबारकबाद देता हूं आपको लेकिन दुख होता है कि एक अरसे से आपको काफ़ी तक़लीफ़ रही है। जैसे देने वाला उस सब की क़ीमत वसूल रहा है, जो आपको दिया उसने। इस पूरे मंज़र में वो ही ख़ुदगर्ज़ लगता है, क्यूंकि आप तो ख़ामोशी से वो क़ीमत भी अता कर रहे हैं। आपको कष्टों से मुक्ति मिले, यही दुआ है। जानता हूं सालगिरह पर इस तरह की दुआ देने का रिवाज नहीं है लेकिन क्या करूं, जो अज़ाब दे रहा है, उसे शर्मिंदा करना चाहता हूं। आप हमेशा थे, हैं और हमेशा रहेंगे। हम अपने बच्चों को बता रहे हैं कि आपने क्या क़रिश्मे किये। उनसे वादा लेकर ही जाएंगे हम कि वो भी अपने बच्चों को बताएं कि दिलीप कुमार होने के मआनी क्या होते हैं।

हमें और कई नस्लों को ख़ुशक़िस्मत होने का मौक़ा दिया आपने दिलीप साहब। तहेदिल से शुक्रिया। एक मेरे नाना थे, जो आपकी हर फिल्म देखने के लिए ट्रेन से तक़रीबन सौ मील का सफ़र करते थे, क्यूंकि उनके क़स्बे में उस वक़्त कोई सिनेमा हॉल नहीं था। नाना ने अपने बेटे यानी मेरे मामा का नाम दिलीप सिर्फ़ इसलिए रखा था क्यूंकि वो मोहम्मद युसूफ़ ख़ान को दिलीप कुमार के नाम से जानते थे और आपसे मुहब्बत करते थे। मेरे नाना ही नहीं, जाने कितने ऐसे दीवाने रहे आपके। शायद आपको कोई अंदाज़ा भी हो लेकिन इन दीवानों की संख्या और दीवानगी के पूरे हाल से तो आप ख़ुद भी वाकिफ़ नहीं होंगे।

आपके जादू में गिरफ़्तार मैं, आपके तमाम चाहने वालों की जानिब से आपको शुक्रिया भेज रहा हूं। जानता हूं यह बहुत बोरिंग और बेमानी लफ़्ज़ बन चुका है और इस लफ़्ज़ को मआनीख़ेज़ बनाने के लिए ही पहले इतना कुछ कहना लाज़िमी था। हमारी तरफ़ से एक सच्चा और एहसासों में पुरनम शुक्रिया क़ुबूल फ़रमाकर इनायत करें हम पर। ज़िंदाबाद, ज़िंदाबाद, दिलीप कुमार ज़िंदाबाद।

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शनिवार, दिसंबर 09, 2017

सिनेमा

कट्टरपंथ के निशाने पर फिर कला जगत


अब समाज को तय करना ही होगा कि वह किसके पक्ष में है - कला और स्वतंत्रता के या अराजक व्यवस्था और लचर सियासत के? हम अपने सम्मान, मूल्यों एवं औचित्यों के साथ मज़बूती से खड़े हों या हाथ में तलवार अथवा बंदूक लेकर हर आवाज़ के क़ातिल बन जाएं?


सोच में जब भी हार जाता है
वो मुझे गोली मार जाता है।

पहलाज निहलाणी साहब के विदा होने के बाद प्रसून जोशी जी आये। ऐसा लगा कि अब बेहतर कार्यशैली नज़र आएगी। लेकिन, भंसाली जी की फिल्म से जुड़े नये विवाद के स्पष्ट हो गया है कि सेंसर बोर्ड एक विचारधारा विशेष के कुछ समूहों व संगठनों के इशारे पर ही थिरक रहा है। जोशी जी की चुप्पी, निष्क्रियता एवं अस्पष्टता देखकर लगता है कि वे दिन हवा हो चुके जब राष्ट्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को सेंसर बोर्ड कहा जा सकता था। अब तो यह केवल नॉनसेंस बोर्ड प्रतीत होता है जो अपना औचित्य एवं प्रासंगिकता दरकिनार कर चुका है, प्रतिष्ठा तो ख़ैर बात ही दूर की है।

संजय लीला भंसाली साहब हमारे समय के प्रमुख एवं प्रतिष्ठित फिल्मकारों में शुमार हैं। यह और बात है कि मैं ज़ाती तौर पर पिछले लंबे समय से उनकी फिल्मों से निराश हूं लेकिन उनकी अपनी एक शैली और नज़रिया है, जिसके कारण उनका नाम सम्मान का हक़दार है। भंसाली साहब की आगामी फिल्म पर विवाद हो रहा है। मैं दरअस्ल, एक ऐसे मोड़ के इंतज़ार में था, जो इस विवाद की काली सुरंग में संवाद का प्रकाशद्वार खोले। लगभग दो महीने से चल रही हमाहमी के बाद यह मौक़ा नसीब हुआ।

एक अहम बयान आया बॉम्बे हाईकोर्ट की जानिब से जिसमें साफ कहा गया है -

"यह दुख की बात है कि एक व्यक्ति फिल्म बनाता है और सैकड़ों लोग दिन-रात काम करके उसे पूरा करते हैं, लेकिन लगातार मिल रही धमकियों के चलते फिल्म रिलीज नहीं हो पा रही है। यह एक अलग किस्म का सेंसर बोर्ड है। हम कहां पहुंच गए हैं? कोई खुलेआम धमकी दे रहा है कि जो भी अभिनेत्री को जान से मार देगा, उसे इनाम दिया जाएगा। यहां तक कि एक मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि वह अपने राज्य में फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे। इससे देश का नाम खराब हो रहा है। हमारी चिंता देश के लोकतंत्र एवं छवि को लेकर है।"

इस बयान के पार्श्व में गोविंद पानसरे और नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में जांच एजेंसियों के रवैये और समाज के बुद्धिजीवी वर्ग के सदस्यों की हत्या जैसी घटनाओं के प्रति दुख एवं रोष भी शामिल है। हाईकोर्ट की उपरोक्त टिप्पणी कुछ ज़रूरी पहलुओं पर सोचने के साथ ही एक किस्म की अराजकता के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए प्रतिबद्ध होने की दिशा दिखाने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है। तीन बिंदुओं पर फोकस करता हूं -

पहला
कोई संगठन खुलेआम किसी कलाकार की हत्या पर इनाम घोषित कर रहा है और टीवी पर यह बयानबाज़ी दिखायी जा रही है लेकिन उस व्यक्ति के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही। कलाकार और उसके परिवार को सुरक्षा दी जा रही है।

यह व्यवस्था की स्पष्ट नपुंसकता है। हिंदू हो या मुसिल्म या किसी और धर्म से संबंधित, व्यक्ति हो या संगठन, कोई भी इस प्रकार की धमकी खुलेआम देता है तो साफ़ ज़ाहिर होता है कि निशाने पर लिये गये व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था और सत्ता के लिए यह खुली चुनौती है। और ऐसे मामले में यदि सत्ता निष्क्रिय एवं निष्प्रभावी नज़र आती है तो दो ही कारण हो सकते हैं - या तो सत्ता नपुंसक है या फिर इसमें सत्ता की मिलीभगत है।

दूसरा
किसी राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा यह बयान दिया जाना कि हम अमुक फिल्म को राज्य में रिलीज़ नहीं होने देंगे, यह किस तरह की मानसिकता का परिचायक है? अब तक ऐसी कोई पुष्ट खबर नहीं है कि यह बयान उन मुख्यमंत्री जी ने फिल्म देख लेने के बाद दिया है।

कला में राजनीति नहीं होनी चाहिए। लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए, एक संप्रदाय विशेष की भावनाओं को उकसाकर अपना उल्लू सीधा करने के लिए राजनीति का यह कदम घिनौना होता है। ऐसी संकुचित और अपरिपक्व मानसिकता वाले बयान देने वाले राजनेताओं का सार्वजनिक रूप से इम्तिहान लिया जाना चाहिए और उनसे इतिहास, कला एवं साहित्य की समझ संबंधी प्रश्न खुले मंच से पूछे जाने चाहिए। उनकी योग्यता को परखा जाना चाहिए।

तीसरा
फिल्म के कलाकारों और हालिया अतीत में लेखकों व पत्रकारों को हत्या की धमकी दिया जाना, क़त्ल कर दिया जाना लोकतंत्र की किस छवि का निर्माण करना है? देश का नाम और पहचान विश्व में किस तरह से बन रही है?

सहिष्णुता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सर्वधर्म समभाव जैसे शब्द कागज़ी मालूम होते हैं जो भारत की एक ग्लोबल छवि प्रस्तुत करने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। ऐसे प्रसंग आने पर यह कोरा झूठ साबित हो जाता है। हम एक हिंसक, पक्षपाती एवं सांप्रदायिक सोच का मुज़ाहिरा करते हैं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि कलाकारों और बुद्धिजीवियों को धमकाने से देश की छवि खराब होती है। चिंता का विषय यह है कि देश का चरित्र कितना अच्छा है जो इसे छवि की चिंता हो? जो लोग छवि एवं चरित्र का नुकसान कर रहे हैं, वे यह भूल रहे हैं कि बुद्धिजीवी और कलाकार ही इस तस्वीर को अंजाम देते हैं। वैसे भी, अयोग्य चेहरों को पद एवं सम्मान देने वाली यह सरकार अपनी बौद्धिक कंगाली समय-समय पर साबित कर चुकी है।

गांधी जी ने कहा था - "एक लेख का उत्तर दूसरा लेख ही हो सकता है।"

यह भी विचारणीय बिंदु है कि कोई सरकार क्या गांधीजी से सिर्फ स्वच्छता का सबक ही सीखेगी, बाकी कुछ नहीं? अहिंसा, सत्य, स्वाबलंबन आदि शिक्षाएं भी गांधीजी ने दी हैं लेकिन ये क्यों नहीं सीखी जा रहीं? क्या ये सबक किसी सरकार की ब्रांडिंग के आड़े आते हैं? या उस सरकार पर कोई दबाव है कि आप हर अच्छी बात गांधीजी से ग्रहण नहीं करेंगे?

बहरहाल, गांधी जी के कोट की ज़बान में कहूं तो एक फिल्म का उत्तर उसकी समीक्षा व आलोचना या दूसरी फिल्म ही हो सकती है। कोई धमकी या अंकुश नहीं। और जैसा पहले हो चुका है, कलाकार के सीने पर गोली तो कतई नहीं। संस्कृति का हल्ला मचाने वालों को यह समझना चाहिए कि संस्कृति से पहले होती है सभ्यता। अगर आप सभ्य समाज ही नहीं हैं तो आपके मुंह से संस्कृति शब्द सिवाय बकवास के कुछ नहीं है।

शनिवार, दिसंबर 02, 2017

एक फ़नकार

ये वो नज़्म है जो भूली नहीं जाती


29 नवंबर को यौमे-पैदाइश पर ख़िराजे-अक़ीदत


फ़ैज़ और साहिर, मजरूह जैसे शायरों के समकालीन और उर्दू अदब के एक बेहद नायाब शायर अली सरदार जाफ़री; सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, पद्मश्री और भारतीय ज्ञानपीठ से उर्दू शायर के रूप में नवाज़े जा चुके अली सरदार जाफ़री; तरक़्क़ीपसंद तहरीक़ की शायरी की शक़्ल रचने वाले बेमिसाल शायर अली सरदार जाफ़री... कई परिचय हो सकते हैं इस फ़नक़ार के लेकिन मेरे लिए नजि़्मया शायरी के शहंशाह का नाम है अली सरदार जाफ़री।


कहां से छेड़ूं फ़साना कहां तमाम करूं... इसी पसोपेश में हूं सरदार और उनकी नज़्मों का ज़िक्र करने बैठा हूं तो। मेरे कुछ दोस्त और अज़ीज़ आपको गवाही दे सकते हैं कि पिछले कई बरसों से सरदार की नज़्म "मेरा सफ़र" मैं अक्सर सुनाता रहा हूं और मुझसे यह नज़्म सुने बिना दोस्तों की बहुत सी महफ़िलें उठी नहीं हैं। बरसों का रिश्ता बन चुका है इस नज़्म से। ज़बानी याद है और कई बार अकेले में इस नज़्म को दुहराता रहा हूं। कभी इसने हौसला दिया है तो कभी यक़ीन, कभी ताक़त तो कभी सूरते-तख़लीक़।

Ali Sardar Jafri. image source: Google

सरदार के ही समकालीन रहे हिन्दी के विराट् कवि नरेश मेहता। मेहता जी ने एक अमर काव्य लिखा है "महानिर्वाण"। इसके पन्ने पलटने पर पता चलता है कि इसमें और सरदार की नज़्म "मेरा सफ़र" में कई स्तरों पर कितना जुड़ाव है। बस भाषा का मिज़ाज अलग-अलग है। मेहता जी अपनी शैली में जिस अमरत्व और कालजयत्व का ज़िक्र कर रहे हैं, इंसान की उसी सत्ता और इंसानियत की उसी जाविदानी को रेखांकित कर रहे हैं सरदार। एक ऐसी नज़्म जिससे गुज़रकर उसे भुलाया जाना एक गुनाह से कम नहीं। मौत से शुरू होती और ज़िंदगी तक आती यह नज़्म अमरता पर मुक़म्मल हो जाती है। यह भारत के हर समय में पल्लवित हुए दर्शन का एक ऐसा कोण है जो इस नज़्म में सरदार ने पूरी शिद्दत के साथ इस तरह बुन दिया है कि एक बारीक़ दर्शन का समझने के लिए आपको मोटे-मोटे ग्रंथ न खंगालने पड़ें।

नज़्मों का ख़याल आते ही हमारे ज़हन में पहला नाम फ़ैज़ का गूंजने लगता है। मैं यह नहीं कहता कि ऐसा होना ग़लत है। और, ये भी एक हिमाक़त ही होगी कि मैं फ़ैज़ और सरदार के बीच किसी किस्म की तुलना करने लगूं। दरअस्ल, बात यह है कि फ़ैज़ की शायरी पूरी तरह से अवामी शायरी है। फ़ैज़ चूंकि सीधे तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और पाकिस्तान में तो इसके संस्थापकों में रहे तो जनगीतों या नारा बनने वाली शायरी की आवाज़ बने फ़ैज़। उनकी नज़्में भी गायी गयीं और बड़ी सहजता के साथ अवाम में घुल-मिल गयीं।

दूसरी तरफ़, सरदार की नज़्में अपने आकार में, अपनी लय में और अपनी सूरत में ज़रा ज़्यादा मुश्किल मालूम होती हैं। अब यह मुश्किल नाजायज़ नहीं है क्योंकि इनमें गंभीरता और बारीक़बयानी कम नहीं। सरदार की नज़्मों ने नारों की शक़्ल अख़्तियार नहीं की। किसी पार्टी या विचारधारा विशेष का झंडा लेकर जुलूस की अगुआ नहीं बनीं लेकिन ये अवाम की नज़्में नहीं हैं, ऐसा नहीं है। अवाम में गयीं, लेकिन अदब के साथ, बेतक़ल्लुफ़ी के साथ नहीं, रखरखाव के साथ। सज्जाद ज़हीर कहते हैं -

"सरदार जाफ़री की बड़ी कविताओं में बड़ी दीवारी चित्रकारी का आनंद है। उनके शब्द शक्तिशाली हैं, उनकी लय जोश से भरी हुई है, निश्चित रूप से उनकी शैली उपदेशकों जैसी है... क्या रूमी की मसनवी का, मीर अनीस के मर्सियों का, इक़बाल के शिक़वे का, शेक्सपियर के नाटकों का अंदाज़ उपदेशकों जैसा नहीं है..?"

प्रभाव के स्तर पर सरदार की नज़्में उतनी ही कामयाब हैं जितनी फ़ैज़ या किसी और कामयाब शायर की हैं या हो सकती हैं। सरदार ने अपनी नज़्मों में अपनी विश्व दृष्टि को भरपूर जगह दी है और उनकी नजि़्मया शायरी के हवाले से स्पष्ट कहा जा सकता है कि वह समाजवाद जैसी अवधारणा में विश्वास रखते रहे और पूंजीवाद के ख़िलाफ़ रहे। "एशिया जाग उठा", "हाथों का तराना" जैसी नज़्में इस बयान की तस्दीक़ करती हैं।

"पत्थर की दीवार", "भूखी मां भूखा बच्चा", "अनाज" और "एक ख़्वाब और" जैसी नज़्मों के रूबरू आते ही कोई भी पाठक सरदार की आवाज़ की सच्चाई को दिल में ख़ंजर की तरह उतरता हुआ पाता है। अपने समय के सच को पकड़कर शब्दों में घोल देना और आने वाले समय के लिए कई इशारे उन शब्दों के बीच के ख़ाली वक़्फ़ों में छुपा देना सरदार की शायरी का एक ऐसा पहलू है जिसकी बदौलत दुनिया उन्हें याद रख सकेगी। सिद्दीकुर्रहमान किदवाई के शब्दों में -

"... दरअस्ल, प्रगतिशील आंदोलन इसी युग का प्रतीक है और सरदार जाफ़री की शाइरी के बग़ैर इस इतिहास को मुक़म्मल नहीं कहा जा सकता। इसी सिलसिले में उनकी नज़्म "नयी दुनिया को सलाम" इस युग के शे'री सरमाये में एक ख़ास मुक़ाम रखती है। ऐसी कोई दूसरी मिसाल उस ज़माने में हमें नहीं मिलती।"

चन्द मिसरों की नज़्मों से लेकर चन्द पन्नों तक की नज़्मों तक, सरदार हमेशा मेरे लिए उन ज़रूरी शायरों में रहे हैं और रहेंगे जो मेरे दिल के बहुत क़रीब हैं। मैंने जिनसे ज़िंदगी के कुछ दर्स हासिल किये हैं और कर रहा हूं। इन तमाम नज़्मों के शायर सरदार को सलाम करते हुए मैं फिर दुहराना चाहता हूं कि "मेरा सफ़र" एक ऐसी नज़्म है, जिसे अदब और शायरी के हर चाहने वाले को अपनी ज़िंदगी में ज़रूर पढ़, समझ और कंठस्थ कर लेना चाहिए।

..और सारा ज़माना देखेगा हर क़िस्सा मेरा अफ़साना है
हर आशिक़ है सरदार यहां हर माशूक़ा सुल्ताना है...

शुक्रवार, नवंबर 17, 2017

कला

सिनेमा और साहित्य - किश्त चार


"गंभीर, सुरचित फिल्में - ऐसी फिल्में जो अंतर्दृष्टि और कल्पनाशीलता के साथ सिनेमा की भाषा का उपयोग करती हैं, हमारी संवेदनाओं को उसी तरह चुनौती देती हैं जैसे पेंटिंग, संगीत और साहित्य की असाधारण कृतियां। यहां तक कि साधारण शिल्प वाली एक फिल्म, जो हमारी भावनाओं पर सीधे प्रभाव डालती है, गहरी समझ की मांग करती है।"


महान फिल्मकार सत्यजीत रे का यह कथन एक स्तर पर विभिन्न कलाओं में एक साम्य तलाशने की राह देता है वहीं, एक परत यह भी खोलता है कि फिल्मों की अपनी एक भाषा होती है। शुरुआती समय में न सही लेकिन समय के साथ सिनेमा ने अपनी एक भाषा गढ़ने का प्रयास किया है जिसके लिए एक समझ का विस्तार हुआ भी है और होना चाहिए भी।

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दूसरी ओर, यदि किसी साहित्यिक कृति पर एक फिल्म बन रही है, तो उसमें महत्वपूर्ण क्या है? साहित्यिक कृति, जिसकी अंतर्वस्तु पर फिल्म आधारित है, या फिल्म, जिसके कारण साहित्य एक अलग माध्यम में प्रवेश करता है? सवाल पेचीदा है और निजी अनुभवों से इसका जवाब खोजने पर संभव है कि उत्तर अलग-अलग मिलें। उत्तर तलाशने की प्रक्रिया में कुछ और प्रश्नों से गुज़रना होता है जैसे कि ऐसी फिल्म को देखने के बाद यदि उस साहित्य को पढ़ा जाये तो पाठक के मन में क्या शब्दों के साथ छवियां चलेंगी? और यदि पहले साहित्य पढ़कर फिर फिल्म देखी जाये तो पाठक के सामने चल रही छवियां क्या उसके अनुभव एवं कल्पनाशीलता को एक संतोषजनक स्तर पर जस्टिफाई करेंगी? साहित्य और सिनेमा के बीच का संबंध ऐसे ही कुछ उलझे प्रश्नों और द्वंद्वों की तरह दिखायी देता है।

सत्यजीत रे ने ही एक व्याख्यान में कहा था - 
"एक फिल्म चित्र है, एक फिल्म शब्द है, एक फिल्म नाटक है, एक फिल्म संगीत है, एक फिल्म हज़ारों तरह के अभिव्यंजक श्रव्य व दृश्य विगत है। वर्तमान में एक और बात जोड़नी होगी कि एक फिल्म रंग है..."

वास्तव में, साहित्य और सिनेमा न केवल दो अलग माध्यम हैं बल्कि दोनों के सृजन एवं उद्देश्यों में कई स्तरों पर अंतर हैं। साहित्य का सृजन एक व्यक्ति करता है जबकि सिनेमा अनेक कलाकारों की सामूहिक रचना है। साहित्य सृजन के समय लेखक अपने अनुभव, दृष्टि एवं प्रतिभा को आधार बनाता है जबकि सिनेमा में कुछ कलाकारों का दख़ल होता है जिसकी बागडोर निर्देशक के हाथ होती है। साहित्य सृजन का उद्देश्य लोकमंगल होता है जबकि सिनेमा का उद्देश्य लोकरंजन। साहित्य सृजन के समय किसी प्रकार की बाज़ार चिंता या भावना न्यूनतम प्रभावी होती है जबकि सिनेमा सृजन में अधिकतम।

उपरोक्त संदर्भ में यह समझना भी अनिवार्य है कि पाठ्य माध्यम एवं दृश्य-श्रव्य माध्यम का नैरेटिव, ढांचा और पहुंच अलग-अलग होती है। इस भूमिका के बाद यह तो स्पष्ट है कि साहित्य किसी फिल्म का आधार हो सकता है, फिल्म का पूरा चेहरा नहीं। संभवतः इसी कारण फिल्म की श्रेणियों जैसे व्यावसायिक सिनेमा, कला सिनेमा, पीरियड सिनेमा आदि में अब तक साहित्यिक सिनेमा जैसी किसी श्रेणी की चर्चा नहीं होती है। ऐसी तमाम श्रेणियों में कभी-कभी साहित्य का आश्रय अवश्य लिया जाता है। इस संदर्भ में गुजराती फिल्म समीक्षक बकुल टेलर का कथन समीचीन है – 
“साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्म अपने आप अच्छी हो, ऐसा नहीं होता। वास्तविकता यह है कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्यशास्त्र और सिनेमा का सौन्दर्यशास्त्र अलग-अलग हैं और सिनेमा सर्जक भी साहित्यकृति के पाठक रूप में साहित्यिक आस्वाद तत्वों पर मुग्ध होकर उनका सिनेमेटिक रूपांतरण किए बगैर आगे बढ़ जाते हैं।“

हिंदोस्तान में जब बोलते हुए सिनेमा की शुरुआत हुई, उससे पहले किसी भाषा का सिनेमा तो बन नहीं रहा था इसलिए उसे हम भारतीय सिनेमा कहते हैं। मूक सिनेमा में अधिकांश स्थानों पर साहित्य का प्रश्रय या आधार दृष्टव्य है। दादासाहेब फालके निर्मित पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ ही भारत के प्राचीन साहित्य पर आधारित थी और कुछ विद्वान इसे 19वीं सदी के हिंदी साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र लिखित नाटक पर आधारित भी घोषित करते हैं। बहरहाल, यहां से हिंदी साहित्य के सिनेमा के साथ जुड़ाव को स्वीकार कर लिया जाये तो इसके आगे की यात्रा से पहले साहित्य और सिनेमा के बारे में तत्कालीन महत्वपूर्ण घटनाओं एवं परिदृश्य से वाकिफ़ होना ज़रूरी है।

एक ओर, 30 के दशक में साहित्य जगत में ऐतिहासिक चेतना का संचार हो रहा था। मार्क्सवाद और फिर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुई रूस क्रांति के बाद क्रांतिकारी विचार सामने आ रहे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रगतिशील विचार का उदय हुआ। इससे हिंदी, उर्दू सहित तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्यकार और कलाकार जुड़े। साहित्य और सिनेमा संबंधी एक और महत्वपूर्ण स्थिति यह थी कि हिंदी के साहित्यकार बहुत कम संख्या में सिनेमा से जुड़े और जो जुड़े भी, उनमें बहुत कम लंबे समय तक संबद्ध रहे। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा की नींव में बांग्ला, मराठी, उर्दू, पंजाबी भाषा के लेखकों और कलाकारों का नाम लिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, सिनेमा निर्माण यानी वित्तीय प्रबंधन उपरोक्त कलाकारों के साथ ही पारसियों के हाथ में रहा। यह शुरुआती स्थिति थी, जो बोलती फिल्मों के आगमन से करीब दो दशक तक प्रभावी रही।

इन स्थितियों एवं घटनाओं के मद्देनज़र हिंदी साहित्य की ओर झुकाव कम होना, शुरुआती फिल्मों पर पारसी थिएटर का प्रभाव होना और कथित हिंदी सिनेमा की भाषा पूरी तरह हिंदी नहीं बल्कि ‘हिंदोस्तानी’ होना स्वाभाविक ही था। वास्तव में, जिसे हिंदी सिनेमा कहा जाता है, वह एक मिली-जुली भाषा यानी हिंदोस्तानी ज़बान का सिनेमा ही है। जब आप उर्दू सिनेमा का इतिहास लिखने बैठेंगे तो उन्हीं फिल्मों का ज़िक्र करेंगे, जिनका हिंदी फिल्मों के रूप में किया जाता है।

तो क्या हिंदी साहित्य को सिनेमा से पूरी तरह ख़ारिज ही समझा जा सकता है? ऐसा नहीं है। 30 के दशक में बोलती फिल्मों की शुरुआत के साथ ही करीब एक दशक तक सिनेमा एक प्रकार से अपने माध्यम को समझने की ही चेष्टा कर रहा था। एक नया माध्यम, नये कलाकार और नयी चुनौतियों से जूझते हुए सिनेमा अपने स्वरूप को परिभाषित एवं स्थापित करने की जद्दोजहद में था। इस समय में मुंशी प्रेमचंद सिनेमा के संपर्क में आये। प्रेमचंद की एक कहानी पर एक फिल्म ‘मिल मज़दूर’ बनी जो उन्हें अपने साहित्य के अनुरूप नहीं लगी। निर्माता एवं अंग्रेज़ी सेंसर पर आरोप लगाते हुए उन्होंने यह तक कह दिया कि “यह प्रेमचंद की हत्या” होने जैसा है। खिन्न होकर वह ज़्यादा समय तक सिनेमा से जुड़े रह नहीं सके।

इसी प्रकार कई और हिंदी साहित्यकारों का जुड़ाव एक-दो फिल्मों तक ही सीमित रह गया। एक अमृतलाल नागर ही थे, जो सिनेमा से लंबे समय तक जुड़े रहे। हालांकि उन्होंने सिनेमा में संवाद एवं पटकथा लेखन तक ही स्वयं को सीमित रखा और साहित्य लेखन को सिनेमा से अलग रखा। बाद में एक नाम रहा कमलेश्वर, जिनका सिनेमा के साथ जुड़ाव उल्लेखनीय रहा। 1948 में उदय शंकर निर्देशित फिल्म ‘कल्पना’ के लिए नागर ने जहां संवाद लेखन किया, वहीं सुमित्रानंदन पंत ने गीत रचे। फिल्म को विश्व स्तर पर सराहना मिली। बावजूद इसके पंत जी भी फिर कभी सिनेमा से नहीं जुड़े। इसी प्रकार भगवतीचरण वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, पांडेय बेचन उग्र, उपेंद्रनाथ अश्क, फणीश्वरनाथ रेणु जैसे कुछ तत्कालीन साहित्यकारों की एकाध कृति पर फिल्मों का निर्माण हुआ लेकिन हिंदी के साहित्यकारों का लंबा जुड़ाव सिनेमा के साथ रह नहीं पाया।

दूसरी ओर, उर्दू के लेखक मंटो, राजेंदर सिंह बेदी, कृष्णचंदर, ख़्वाजा अहमद अब्बास, कमाल अमरोही, आगा हश्र कश्मीरी, राही मासूम रज़ा, अबरार अलवी आदि सिनेमा से लगातार जुड़े रहे। स्वाभाविक रूप से, हिंदी सिनेमा की भाषा, चरित्र एवं अवधारणा स्थापित करने में इन कलाकारों का योगदान हिंदी साहित्यकारों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण रहा है। एक पहलू है लोकभाषाओं के सिनेमा का। भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी आदि भाषाओं के सिनेमा में यदा-कदा हिंदी साहित्य की करवटें ज़रूर हैं लेकिन दर्शक वर्ग सीमित होने के कारण सिनेमा के स्वर्ण समय में एक तो फिल्में ही कम बनीं, दूसरी इन फिल्मों से भी साहित्यकारों की संबद्धता प्रत्यक्ष नहीं रही।

फिर आता है 70 का दशक। हालांकि कला सिनेमा का एक धरातल 40 के दशक से ही सिनेमा में तैयार हो चुका था जिसकी पूर्वपीठिका के रूप में 30 के दशक में वी. शांताराम एवं अब्बास जैसे कलाकारों की फिल्मों को माना जा सकता है। 70 के दशक में शासन सिनेमा से प्रत्यक्ष रूप में जुड़ चुका था और कला सिनेमा को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं एवं गतिविधियां होने लगी थीं। राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, मुक्तिबोध, धर्मवीर भरती जैसे कुछ तत्कालीन हिंदी साहित्यकारों के साहित्य पर फिल्मों का निर्माण हुआ भी लेकिन इन फिल्मों में सिनेमा की अभिव्यंजकता एवं संप्रेषणीयता को लेकर एक विमर्श निरंतर बना रहा। इस समय में एक उम्मीद जागी थी कि अब हिंदी साहित्य का सीधा हस्तक्षेप सिनेमा में संभव है। लेकिन ऐसा फिर नहीं हो सका। एक आलेख में इक़बाल रिज़वी लिखते हैं –
“हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर फिल्म न बनने का शोर 60 के दशक में सरकारी वर्ग तक भी पहुँचा। फिल्म वित्त निगम ने आगे बढ़कर सरकारी खर्च पर अनेक ख्याति प्राप्त साहित्यकारों की कृतियों पर फिल्मों का निर्माण कराया। इनमें से अधिकांश फिल्में डिब्बों में बंद हैं। कुछ फिल्में गिने-चुने स्थानों पर रिलीज जरूर हुईं लेकिन वे इतनी नीरस और शुष्क थीं कि सीमित बौद्धिक वर्ग के अलावा किसी ने उनकी चर्चा तक नहीं की। इन फिल्मों को बनाने वाले अधिकतर फिल्मकारों ने फिल्म तकनीक का तो ध्यान रखा, लेकिन दर्शक उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं था।“

अब, दूसरा पक्ष है हिंदी काव्य और सिनेमा का संबंध। हिंदी के मुख्यधारा के लेखकों की ही भांति कवि भी सिनेमा से उसी प्रकार का परहेज़ करते दिखायी दिये। पंडित सुदर्शन, पंडित इंद्र जैसे कुछ गीतकार 30 और 40 के दशक में सक्रिय रहे लेकिन मुख्यधारा के सिनेमा से नहीं जुड़ सके। इस प्रसंग में भी उर्दू के मशहूर शायर ही फिल्मी गीतों के स्तंभ रूप में उभरे। पंडित भरत व्यास, कवि प्रदीप और शैलेंद्र को हिंदी गीतकारों की वह तिकड़ी करार दिया जा सकता है जिसने सिनेमाई गीतों में हिंदी काव्यधारा का सूत्रपात किया। शैलेंद्र की भाषा हिंदी परंपरा की न होकर हिंदोस्तानी के क़रीब रही लेकिन व्यास एवं प्रदीप ने हिंदी गीत परंपरा से सिनेमा को कालजयी रचनाएं प्रदान कीं। इसके बाद एक और उल्लेखनीय नाम गोपालदास नीरज का है।

वस्तुतः हिंदी के गीतकारों ने कुछ अमर रचनाएं हिंदी सिनेमा को अवश्य दीं लेकिन हिंदी सिनेमा के काव्य का कोई स्वरूप या सौंदर्यशास्त्र रचा हो, ऐसा कहना कठिन है। साहिर, शकील, हसरत, मजरूह जैसे गीतकारों ने जो कारनामा इस स्तर पर किया, वह अधिक महत्वपूर्ण रहा है। समय-समय पर कुछ नाम आते रहे और कुछ मरणोपरांत किन्हीं संदर्भों में गूंजते रहे लेकिन हिंदी के मुख्यधारा के साहित्य ने हिंदी के मुख्यधारा के सिनेमा से हमेशा एक दूरी बनाये रखी, यही सच प्रतीत होता है। एक सिरा यह भी है कि साहित्य की दुनिया में फिल्मी लेखन को हिकारत की नज़र से देखा जाता था। यदि किसी कवि ने फिल्मों में गीत लिखे तो उसे साहित्यिक बिरादरी से खदेड़ने की कवायद शुरू हो जाती थी। ऐसे कई उदाहरण हैं। राज कपूर के पहले न्यौते पर शैलेंद्र ने कहा कि “मैं बिकना नहीं चाहता”। उन्हीं शैलेंद्र ने बाद में कहा कि “लो मैं बिकने आ गया”। नीरज ने भी ऐसी ही उधेड़बुन में फिल्मी दुनिया को छोड़ा।

साहित्य की बदलती धाराओं एवं स्थापनाओं के कारण ऐसा हुआ या हिंदी साहित्य के शुद्धतावादी कलात्मक दृष्टिकोण के कारण या सिनेमा को साहित्य का शोषण करने वाला माध्यम मानने के कारण, कारण कुछ भी रहे हों, हुआ यह कि हिंदी साहित्य का सिनेमा से अन्तर्संबंध जिस तरह का अपेक्षित था, वह स्थापित हो नहीं सका। सिनेमा पर लेखकों एवं कवियों की रचनात्मकता का अतिक्रमण या शोषण करने का आरोप एक हद तक जायज़ मालूम होता है और सिनेमा की दुनिया का बाज़ारवाद भी एक कारण प्रतीत होता है जिसने साहित्य जगत में एक उद्विग्नता पैदा की। इस पूरे परिप्रक्ष्य में कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य की परंपरा जितनी समृद्ध एवं गौरवशाली रही है, सिनेमा में उसकी एक चौथाई झलक भी प्रविष्ट नहीं हो सकी।

हिंदी साहित्य और सिनेमा के बीच एक महत्वपूर्ण पहलू का उल्लेख और आवश्यक है और वह है सिने पत्रकारिता। 50 के दशक में सिनेमा से जुड़ी मूल्यपरक पत्रकारिता का विकास हुआ। एक ओर उर्दू पत्रिका ‘शमां’ उल्लेखनीय रही तो वहीं ‘माधुरी’ ने अनेक नूतन परिभाषाएं गढ़ीं। फिल्म लेखकों, कवियों और कलाकारों से संवाद के समानांतर माधुरी ने हिंदी के शीर्ष साहित्यकारों से संवाद बनाया और सिनेमा पर साहित्यकारों की दृष्टि को महत्व दिया। अपने एक लेख में इतिहासकार रविकांत लिखते हैं –
“साहित्य और सिनेमा के बीच सेतु बनाने में माधुरी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, हिन्दी को हरेक अर्थ में प्रतिष्ठित करने की भी हर कोशिश इसने की। इसरार करके हिन्दी के दिग्गजों से लेख लिखवाए, हरिवंश राय बच्चन से गीतों पर, पंत से फ़िल्मों की उपादेयता, उनके गुण-दोषों पर और दिनकर को तो बाक़ायदा एक फ़िल्म दिखवाकर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी भी छापी..”

इसके बाद कुछ और पत्रिकाओं ने सिनेमा और साहित्य के तालमेल के कुछ प्रयास किये जिसमें कन्हैयालाल नंदन के संपादन में प्रकाशित होने वाली ‘सारिका’ और ‘दिनमान’ का नाम विशिष्ट है। समय के साथ सिनेमा केंद्रित पत्रिकाएं व्यावसायिक होती चली गयीं और साहित्य का दामन छूट गया।

साहित्यकारों एवं फिल्मकारों के बीच लगातार संवाद होते रहे हैं, हो रहे हैं परन्तु अब तक किसी ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका है, जो हिंदी साहित्य और सिनेमा के संबंध को प्रगाढ़ करने के प्रति किसी सकारात्मक बोध का सूचक हो। दोनों माध्यमों को एक-दूसरे को समझने की चेष्टा करने की आवश्यकता एवं अपने-अपने अहंकारों एवं स्वार्थों से परे जाकर समूह बनने की गुंजाइश बनी हुई है। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक होगा यही, कि प्रेमचंद फिल्मी दुनिया छोड़ते रहेंगे और उनके फ़ना होने के सालों बाद कोई सत्यजीत रे आएगा और सिनेमा में प्रेमचंद के साहित्य को पुनर्परिभाषित करने की चेष्टा करेगा।

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सिनेमा और साहित्य - किश्त तीन
सिनेमा और साहित्य - किश्त दो
सिनेमा और साहित्य - किश्त एक

बुधवार, नवंबर 15, 2017

ग़ज़ल

हम फ़नकार हैं, तुम पागल कह लो..!


ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ 
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ

एक रूह होती है फ़नकार की, जो अपने फ़न के ज़रीये इंसानियत के हक़ में इंसानों को जोड़ने के लिए कोशिशें करती रहती है। कहते हैं हज़रत ख़ुसरो ने फ़न का बेमिसाल नमूना पेश किया इस ग़ज़ल में और ग़ज़ल के हर शेर में तीन भाषाओं को साधा। फ़ारसी, हिन्दी (लोकभाषा) और उर्दू की मिली-जुली शब्दावली में कही हज़रत ख़ुसरो की यह ग़ज़ल आज भी शायरी में अपना मक़ाम रखती है। मैं बात करना चाहता हूं कि ख़ुसरो ने ऐसा क्यूं किया? यानी उनके दिल में क्या आया होगा कि उन्होंने यह प्रयोग किया?


मेरा ख़याल है कि हज़रत ख़ुसरो ने ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं किया होगा कि वह कई भाषाओं पर अपनी महारत या कमांड साबित करना चाहते होंगे। इसलिए भी नहीं किया होगा कि ऐसा करने से तीन भाषाओं का पाठक वर्ग उन्हें नसीब हो सकेगा। शायद इसलिए भी नहीं किया होगा कि आने वाले ज़माने इस कला-कौशल पर हैरान होते रहें और उन्हें महान समझते रहें। फिर? मेरा ख़याल है कि हज़रत ख़ुसरो दूरदृष्टा रहे होंगे। सूफ़ी तो थे ही तो रोशन इल्हाम और नूर नज़र तो रही ही होगी। उन्होंने समझा होगा कि आने वाले ज़मानों में लोग ज़ुबानों को लेकर लड़ेंगे, झगड़ेंगे और आपस में उलझेंगे। इस उलझन की गिरफ़्त में शायर और अदीब भी आ जाएंगे। ज़ुबानों की ख़ेमेबाज़ी और सियासत होगी। ऐसे माहौल में अदब में, फ़न में एक मिसाल ऐसी होनी चाहिए जो रोशनी दिखाये कि एक साथ कई भाषाओं से मुहब्बत की जा सकती है। इस मुहब्बत की ज़रीये आपस में जुड़ा जा सकता है। इस जुड़ाव के ज़रीये एक मुल्क़ और दुनिया को अपना घर बनाया जा सकता है यानी "वसुधैव कुटुंबकम"।

मुझे हमेशा लगता रहा है कि यह ग़ज़ल भाषा और साहित्य की दुनिया की तरफ़ से पूरी दुनिया को एक बहुत बड़ा संदेश है प्रेम का, पैग़ाम है पज़ीराई का और शायद पहला कलात्मक उल्लेख है भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब के हक़ में। इस सूत्र को समय-समय पर शायरों ने समझा और इस परंपरा से जुड़ते रहे। हिंदोस्तान की शायरी के इतिहास से ऐसी कई मिसालें हाथ लगती हैं जो भाषा से प्रेम के इस पैग़ाम को बार-बार दुहराती रहीं। पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, पिया बाज पियाला पिया जाये ना, लाम की मानिंद हैं गेसू मेरे घनश्याम के और न जाने ऐसे कितने मिसरे और शेर आपको मिलेंगे जिन्हें आप उर्दू शायरी के इतिहास में शामिल पाएंगे। एक और मिसाल देखिए। इक़बाल साहब का मशहूर मिसरा -

गोदी में खेलती हैं जिसकी हज़ारों नदियां

इक़बाल साहब शायरी के उस्ताद थे, माहिरे-फ़न और ज़ुबान थे। चाहते तो ऐसा भी कह सकते थे -

गोदी में खेलते हैं जिसके हज़ारों दर्या

न इसमें लय या वज़्न संबंधी कोई समस्या आती है और न ही समझने में भाषा की कोई क्लिष्टता पैदा होती है, फिर इक़बाल साहब ने उर्दू की एक ग़ज़ल में यह हिन्दी का मिसरा क्यूं सजा दिया? समझने वाले समझते हैं कि यह वही दर्स है, उसी रूह का कारनामा है जो जोड़े रखना चाहती है, मुहब्बत का माहौल रचना चाहती है। तो, इस पूरी भूमिका के बाद मैं अर्ज़ यह करना चाहता हूं कि ज़ुबान के नाम पर अपने ज़ह्न में बड़े सख़्त सांचे बना लेना कोई अच्छी बात नहीं है। उर्दू की ग़ज़ल में एक लफ़्ज़ हिंदी का या हिंदी की रचना में एक लफ़्ज़ उर्दू का आने पर अगर उस पर ऐतराज़ किया जाएगा, तो यह दोनों ही भाषाओं के लिए न तो सेहतमंद उपाय है और न ही अदब की जानिब से कोई वाजिब पैग़ाम है।

यह समय वास्तव में, इंसान के प्रकृति से दूर जाने का समय है। कमाल की बात यह है कि प्रकृति के लिए समानार्थी शब्द हिंदी में स्वभाव, उर्दू में कुदरत और अंग्रेज़ी में नेचर हैं, जो सीधे मनुष्य के मन और मूल से जुड़े शब्द हैं। इशारा यह है कि पर्यावरण के बहाने से अपने भीतर झांकें और मंथन करें कि हम अपने मूल, मन या कुदरती दिशा के विपरीत क्यूं जाने लगे हैं। इसका जवाब मिलते ही भाषा, रंग, जाति, धर्म से जुड़े बहुत से मसअले तो अपने आप ही सुलझ सकते हैं।

बात यहां तक बढ़ चुकी है कि अगर ग़ज़ल में एकाध लफ़्ज़ हिंदी का आ जावे तो उसे फ़ौरन हिंदी ग़ज़ल कह दिया जाये और इसके उलट भी यही। मैं यहां डॉ. बशीर बद्र साहब को कोट करना चाहता हूं जो अक्सर कहा करते थे कि ग़ज़ल की अपनी एक ज़बान है और ग़ज़ल को अपनी ही एक ज़बान रचने के सफ़र पर आगे बढ़ने से ही मंज़िल मिल सकती है। यह जो हिंदी ग़ज़ल का बड़ा शोर पिछली कुछ दहाइयों से मचा हुआ है, इसके बारे में फिर कभी विस्तार से बात करूंगा लेकिन इशारा कर दूं कि मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर "साये में धूप" के प्रकाशन के समय श्रद्धेय दुष्यंत कुमार जी वह संक्षिप्त भूमिका न लिखी होती तो इस तरह का इतना हंगामा नहीं हुआ होता। बक़ौल ख़ुद दुष्यंत भी, हंगामा खड़ा करना मक़सद नहीं था लेकिन कुछ स्वार्थी सियासी तत्वों की कारगुज़ारियां हैं कि हंगामा ज़्यादा है, सूरत बदलने की कोशिश हाशिये पर है।

उर्दू की दुनिया वाले, जो हिन्दी को और हिन्दी की दुनिया वाले, जो उर्दू को या तो ख़ारिज करते फिरते हैं या अपनी मनगढ़ंत शर्तों के मुताबिक़ अपनाना चाहते हैं, उनसे बहुत इल्तिमास के साथ मैं अर्ज़ यह भी करना चाहता हूं कि जनाब एक ज़ुबान है हिंदोस्तानी। यह कोई विलुप्त हो चुकी चिड़िया नहीं है कि इसे आप दरकिनार कर दें। अगर विलुप्त हो भी रही है तो आप जैसे ही इसके ज़िम्मेदार हैं। और हम जैसे कुछ हैं जो इसको बचाना चाहते हैं, इसे एक पूरी तारीख़ और तहज़ीब के हवाले से और जानदार करना चाहते हैं। आपकी आप जानें, यक़ीन यह है कि इतिहास और आने वाली नस्लें फ़नक़ार कहेंगी हम जैसों को, आप चाहें तो पागल, नासमझ और कमइल्म कह सकते हैं। फ़िलहाल अपने कुछ अशआर के साथ इस वक़्त इजाज़त लेता हूं -

इन्हें उर्दू से है परहेज़ वो हिन्दी से हैं नाराज़
चली आओ ज़बानों सब कुशादा दर हमारे हैं।
लचीले तक नहीं हैं वो बनाये हमने सांचे जो
जो फिट हो जाएं इनमें ख़ुदबख़ुद आकर हमारे हैं।
बड़े बंगलों में रहते हैं बड़े शायर हैं जितने भी
नगर की शान पर बट्टे ये कच्चे घर हमारे हैं।

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गुरुवार, नवंबर 09, 2017

आलेख

इसका मतलब यह साहित्य का सेल्फ़ी युग है..!


तस्वीर बदलने के लिए हैं सभी तैयार
उम्मीद में बैठे हैं पहल होके रहेगी।

साहित्य बदलता रहा है और बदलता रहता है। बदलाव का यह कुदरती नियम चूंकि हर तरफ लागू होता है इसलिए साहित्य पर भी। बदलाव होता है, लेकिन कुछ मूलभूत सिद्धांत या ढांचे नहीं बदलते। इन्हें आधार या बुनियाद भी कहा जा सकता है। यूं भी कह सकते हैं कि इनमें बदलाव आने में बहुत लंबा वक़्त लगता है। तो, साहित्य का स्वरूप बदलता रहता है। उसकी प्रवृत्तियां बदलती रहती हैं। नज़रिये और तेवर बदलते रहते हैं।

image source: Google

साहित्य के साथ बदलाव अनेक स्तरों पर जुड़ता है। एक उपन्यास के पहले शब्द से लेकर अंतिम शब्द तक लेखन और पाठक के भीतर बहुत कुछ बदल जाता है। उपन्यास तो बहुत बड़ी चीज़ है, एक कविता में भी इतनी ताकत होती है और एक पंक्ति तक में भी। संस्कृत काल के एक कला आचार्य ने कहा था कि "कवि या कलाकार होने के लिए नवनवोन्मेषशालिनी बुद्धि का होना ज़रूरी है"। ज़ाहिर है कि ऐसी बुद्धि नव्यता के माध्यम से बदलाव को ही लक्ष्य करती है। साहित्य में नव्यता आती है दृष्टिकोण, भाषा और शैली जैसे स्तरों पर। संवेदना के धरातल, भावनाओं के प्रवाह एवं विचारों के शून्य संभवतः जल्द नहीं बदलते लेकिन इनसे उपजने वाला कथ्य नव्यता के साथ पनपते हुए अलग रंगों और शेड्स का सृजन करता है।

"ये दुनिया एक रंगमंच है और हम सब क़िरदार हैं जिनका आना-जाना तय है।" शेक्सपियर ने जब यह कहा था तब फिल्में नहीं थीं। कुछ लोग कहते हैं कि अगर उस समय में फिल्में होतीं तो शेक्सपियर दुनिया को रंगमंच नहीं एक फिल्म कहता। चलिए, मान लिया कि ऐसा होता। सवाल यह है कि रंगमंच की जगह फिल्म कह देने से इस विचार में क्या इज़ाफ़ा होता? विचार की अभिव्यंजकता तो वही रहती। उसके अर्थ तो इस शब्द से नहीं बदलते। एक शब्द का यह बदलाव केवल समय के बदलाव की सूचना देता है।

"साहित्य समाज का दर्पण होता है।" महावीर प्रसाद द्विवेदी ने यह कथन शुरुआती 20वीं सदी में किया था। इस वाक्य को भी साहित्य के बदलते वक़्तों और तेवरों के अनुसार कई तरह से बदलकर कहने का प्रयास किया गया। मंतव्य वही रहा। बस, हम नयी तकनीक से पैदा हुए शब्दों के खांचे में इस परिभाषा को समझने की चेष्टा करते हैं। वास्तव में, कुछ कालजयी वाक्यों या शब्दों में इतनी शक्ति होती है कि वह एक मूल विचार या संदेश को अपने में इस तरह कैप्चर कर लेती है कि उसमें एक शब्द बदलने से केवल आप अपने समय को इंगित कर पाते हैं, उसकी मौलिकता से इतर कुछ और कह नहीं पाते।

कुछ लोग जो गंभीरता या बारीक़ी से बदलाव को नहीं समझ पाते, बाहरी बदलावों पर ही रुक जाते हैं। पहले साहित्य में डाकिया या क़ासिद था, लेकिन अब नहीं है। अब फोन, ईमेल और मैसेज है। पहले दीये और चराग़ साहित्य में ज़्यादा जलते-बुझते थे लेकिन अब बल्ब और बिजली के उपकरण आ गये हैं। यह भाषा के स्तर के बदलाव हैं। ये हमेशा होते रहे हैं। गुरुदेव रबींद्रनाथ ने अंग्रेज़ी में लिखा लेकिन उनका कथ्य भारतीय था इसलिए उन्होंने अंग्रेज़ी में घड़ा (GHURRA) ही लिखा क्यूंकि अंग्रेज़ी में उसके लिए कोई शब्द उन्हें मिला ही नहीं।

मूल परिवर्तन के बारे में हमें समय के प्रति एक दृष्टि विकसित करना होगी, तब हम साहित्य के बदलावों को रेखांकित कर सकेंगे। हिंदी के भक्तिकाल में प्रवृत्तियों का विवेचन मिलता है। इन प्रवृत्तियों या चेतनाओं के कारण ही उस समय महान साहित्य रचा गया। उसके बाद कई तरह के विज्ञान, औद्योगिकीकरण और सामाजिक, राजनैतिक क्रांतियों का प्रभाव साहित्य पर देखा गया। अब कथ्य के स्तर पर बदलाव इस तरह से रेखांकित किया जा सकता है कि गुरुदेव के साहित्य में ही ब्राह्मणवाद से मानवतावाद की ओर यात्रा दिखायी दी।

साहित्य अपने समय से चूंकि सीधे तौर पर संबद्ध होता है इसलिए उसमें बाहरी बदलाव जल्दी आते हैं और फिर आंतरिक। इस समय में हम चारों ओर से बाज़ार और तकनीक से घिर चुके हैं। मनुष्य ने रोबोट तक ऐसे विकसित कर लिये हैं जो इंटेलिजेंट भी हैं। स्टीफन हॉकिंग्स मानते हैं कि "कुछ समय बाद इसी नकली बौद्धिकता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का मानव सभ्यता की सबेस खतरनाक व खराब घटना के तौर पर याद किया जाएगा"। हॉकिंग्स का यह भी मानना है कि प्रदूषण इसी तरह बढ़ता रहा तो कुछ ही सदियों में हमारी पृथ्वी आग का गोला बन जाएगी।

दूसरी सोच यह है कि मनुष्य विजेता है, वह हर स्थिति से जूझना और उसका विकल्प खोजना जानता है। किसी और ग्रह पर जीवन की तलाश इसलिए मानव का सबसे बड़ा मिशन है। यह हमारे समय की दर्दनाक, खतरनाक परिस्थितियां हैं जो साहित्य में कुछ स्तरों पर प्रवृत्तियों की भांति इंगित हो रही हैं। कुछ प्रवृत्तियों को बिंदुवार देखते हैं -

  1. हमारा सामाजिक ढांचा जिस प्रकार समूह से व्यक्तिपरक होता जा रहा है, उसी प्रकार साहित्य में एक व्यष्टिवादी विचार घर कर रहा है। कृतित्व से लेकर व्यक्तित्व तक।
  2. हमारे साहित्य में एक नकली बौद्धिकता (Artificial Intelligence) का प्रवेश तेज़ी से हो रहा है। क्या हम साहित्य में रोबोट प्रणाली विकसित करने में लगे हैं?
  3. संभवतः पूर्व के किसी भी समय की तुलना में वर्तमान साहित्य में पलायनवादी सोच के उदाहरण बहुत अधिक हैं।
  4. साहित्यकार जिस प्रकार बाज़ार के कब्ज़े में आ रहे हैं, उससे साफ़ है कि वे साहित्य में बाज़ार का विरोध भले कर रहे हों लेकिन अपने यश एवं सम्मान के लिए उसी बाज़ारवाद को बढ़ावा भी दे रहे हैं। साहित्य में भी इसी बाज़ारवाद से प्रेरित सृजन को साफ चीन्हा जा सकता है।

ऐसी ही और प्रवृत्तियों में बदलाव को सीधे तौर पर समझा जा सकता है। और प्रदूषण के स्तर पर साहित्य में प्रदूषण से तो सभी वाकिफ़ हैं। द्विवेदी जी के शब्दों को पुनर्गठित करने का प्रयास किया जाये तो कहा जा सकता है कि हम साहित्य के सेल्फ़ी युग में हैं। यह परिभाषा कुछ नये अर्थ प्रतिपादित कर सकती है। सेल्फ़ी के अर्थ को एक प्रचलित अर्थ के साथ ही अन्य संभावनाओं में भी समझें। इस समय का साहित्य और साहित्यकार जिस तरह आत्ममुग्धता, आत्मव्यामोह और स्वकेंद्रितता के शिकार हैं, जिस तरह समाज के विघटन को रेखांकित किया जा रहा है, जिस तरह एक संकुचित दायरे को पोसा जा रहा है और इसी तरह की और बहुत सी प्रवृत्तियों की रोशनी में सेल्फ़ी के अर्थ को समझा जा सकता है। दर्दनाक अवश्य है लेकिन सवाल सच्चा है कि क्या यह समय वाक़ई साहित्य का सेल्फ़ी युग है? या होने की तरफ अग्रसर है?