बुधवार, नवंबर 08, 2017

नोट्स

भक्तिकालीन आंदोलनों के प्रमुख संप्रदाय एवं मत


एमए के दौरान भक्तिकालीन साहित्य विशेष रुचि का क्षेत्र रहा। उस समय तैयार किया गया यह ब्योरा अनेक स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर है। यह धार्मिक प्रवृत्तियों को तो रेखांकित करता ही है, इन संप्रदायों के हवाले से भक्तिकालीन आंदोलनों एवं परवर्ती साहित्य की अनेक धाराओं का स्पष्ट जुड़ाव निर्विवाद है इसलिए यह साहित्य के पाठकों एवं विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकता है।


संप्रदाय
प्रवर्तक/कवि
विशेष
श्री
रामानुजाचार्य
विशिष्टाद्वैत
रामावत (तपसी शाखा)
रामानंद
नाम स्मरण, दशधा भक्ति, रामभक्ति
नानक पंथ
गुरु नानक देव
'जपुजी' नानक दर्शन का सार तत्व
उदासी
श्रीचंद
गुरु नानक के पुत्र
विश्नुई
जंभनाथ
देहभेद, योगाभ्यास विषय, नाथपंथ से प्रभावित, 'संभराथल' समाधि स्थल
निरंजनी
स्वामी निरंजन
प्रवर्तक जगन हरिदास निरंजनी भी मान्य, नाथपंथ-संत मत का मध्यवर्ती
लाल पंथ
लालदास
नाम जप, रामभक्ति, अलवर में ही प्रचार
दादू पंथ
संत दादूदयाल
ब्रह्म से परब्रह्म संप्रदाय और इससे दादू पंथ बना, सत्संग स्थल 'अलख दरीबा'
बाबालाली
बाबालाल
इस नाम के 4 साधक, 'बाबालाल का शैल' नामक मठ बड़ौदा में, वेदांत सूफ़ी प्रभाव
बावरी पंथ
बावरी साहिबा (प्रमुख संत)
यारी साहब इस संप्रदाय के प्रमुख संत
साध
संत वीरभान (प्रमुख कवि)
'निर्वान ग्यान' इस संप्रदाय का प्रसिद्ध ग्रंथ
ब्रह्म
श्री मध्वाचार्य
द्वैतवाद, आठ मंदिरों का निर्माण
रुद्र
श्री विष्णुस्वामी
इस नाम के 3 आचार्य, शिष्य वल्लभचार्य
सनकादि (निंबार्क)
निम्बार्काचार्य
भेदाभेद या द्वैताद्वैत
वल्लभ
वल्लभाचार्य
शुद्धाद्वैत, पुष्टिमार्ग, रुद्र संप्रदाय के अंतर्गत
राधावल्लभ
हितहरिवंश गोस्वामी
राधा अधिक महत्वपूर्ण, रसोपासना
हरिदासी (सखी टट्टी)
हरिदास
निम्बार्क संप्रदाय की शाखा माना जाता रहा
चैतन्य (गौड़ीय, गोसाईं संघ)
कृष्ण चैतन्य महाप्रभु
अचिन्त्य भेदाभेद
रैदासी
रैदास (संत रविदास)

वारकरि
तुकाराम

धारकरी
रामदास

ऋषि
शेख़ नूरुद्दीन

सत्यनामी (सतनामी)
जगजीवनदास
दादूदयाल के शिष्य, कोटवा में समाधि तथा संप्रदाय की गद्दी
चरनदासी
संत चरनदास
52 शिष्यों द्वारा 52 शाखाएं, 21 ग्रंथ
शिवनारायणी
शिवनारायण
पिंड अंतर्गत हठयोग द्वारा दिव्य ज्योति प्राप्ति
साहब पंथ
तुलसी साहब
गद्दी समाधि हाथरस में आज भी
गरीबदासी
गरीबदास

राधास्वामी
स्वामी शिवदयाल
योग, साधना, संत संबंधी उपदेश, साहित्य दृष्टि से महत्व नहीं
नाथ
मत्स्येंद्रनाथ
इनकी गोरखनाथ की गणना सिद्धों में भी
स्मार्त (स्मृति)
शंकराचार्य
पंचदेवोपासना व्यवस्था, बाद में अंधविश्वास, तीर्थ, मंदिर व्यापार केंद्र बने और पंडे-पुरोहित अमर्यादित हुए
मत
संप्रदाय
विशेष
शैव
पाशुपत, वीरशैव, लिंगायत, कश्मीरी शैव तथा नाथ-योगी उपसंप्रदाय
स्वामी रामानंद अनुयायियों ने लोकभाषा का आश्रय लिया, मूल में श्रमणण् संस्कृति की प्रेरणा जनसंपर्क का परिणाम
वैष्णव
द्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत, विशिष्टाद्वैत तथा उपसंप्रदायों में रामावत, सहजिया, वारकरी, पंचसखा, महानुभाव
दर्शन आधारित भक्ति, योग साधना का प्रभाव, उपसंप्रदायों द्वारा दर्शन पर बल नहीं
शाक्त
दो श्रेणियां - दक्षिणमार्गी, वाममार्गी
वाममार्ग पर कबीर ने अनास्था जतायी
बौद्ध
दो शाखाएं - महायान, हीनयान। महायान में मंत्रयान, वज्रयान, सहजयान, कालचक्रयान उपशाखाएं
उपशाखाएं पुराणपंथी परंपराओं के विरुद्ध चले आंदोलन की उपज। सूफ़ी साधकों सुधारवाणी का योगदान
इस्लाम
मुख्य संप्रदाय - शरा, बेशरा। अन्य संप्रदाय - चिश्ती, क़ादरी, सुहरवर्दी, नक़्शबंदी, शत्तारी
बेशरा संप्रदाय के उपसंप्रदाय - मदारी, मलंग, कलंदरी, रसूलशाही, लाल शाहबाज़िया, मूसासुहागिया। बेशरा साधक मलामती कहलाते हैं
अन्य
केरल का शास्तापूजक, बंगाल के धर्म-ठाकुर, सहजिया, बाउल, कर्ताभाता, उड़ीसा का प्रचसखा, महाराष्ट्र के वारकरी, महानुभाव
सभी भक्ति आंदोलन से संबद्ध। इनके द्वारा विपुल साहित्य सृजन

इनके अतिरिक्त कुछ अन्य संप्रदायों एवं उनके प्रवर्तकों के बारे में जानकारी इस प्रकार है -

शैव विशिष्टाद्वैत - श्रीकंठ
अविभागद्वैत - विज्ञानभिक्षु
वीरशैवविशिष्टाद्वैत - श्रीपति
पाशुपत - श्रीकंठ तथा लकुलीश
भेदाभेद - भास्कराचार्य

रविवार, नवंबर 05, 2017

हास्य-व्यंग्य

साहित्यिक गोष्ठियों का मनोरंजक योगदान


यह लेख या व्यंग्य, जो भी है, वर्ष 2002 में लिखा गया था। यह एक सच्ची घटना पर आधारित था और साहित्यिक पत्रिका साहित्य सागर के मार्च 2002 अंक में प्रकाशित हुआ था।


अब मुझे गोष्ठियों का काफी अनुभव हो चुका है और उसमें निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। वास्तव में, विचार गोष्ठियां साहित्य के सतत मूल्यांकन में महती भूमिका का निर्वाह करती हैं। नवयुवकों तथा नवलेखकों में क्रांतिकारी विचारों की नींव डालती हैं। ऐसे युवकों को जहां-तहां मित्रमंडली में भांति-भांति की गोष्ठियों की रूपरेखा तैयार करते देखा जा सकता है और इनमें इन गोष्ठियों का विषय, भागीदारों के नाम, गोष्ठी की रपट का लेखन और उसका प्रकाशन आदि की चर्चा प्रमुख रूप से की जाती है।

image source: Google

वैसे इन गोष्ठियों का आयोजन कोई सरल कार्य नहीं है। हालांकि कुछ लोगों जो अपने गुट या मंडली या मठों की बैठकों को इस तरह की संज्ञाएं देते हैं और उनके प्रेस तथा मीडिया में अच्छे हस्तक्षेप होते हैं, के लिए यह कार्य कतई मुश्किल नहीं। आयोजक के सिर पर कई सारी धारदार तलवारें लटकी रहती हैं। यदि किसी ने तय कर लिया कि ऐसा आयोजन करना है तो पहली उलझन है कि किस विषय पर? दूसरी समस्या, कहां, तीसरा मसअला, दिन तथा समय? चौथी दिक्कत, कितने लोगों की शिरकत? पांचवी परेशानी कार्यक्रम की रूपरेखाएवं हस्तियों की तलाश? छठा सिरदर्द, स्वल्पाहार का मीनू? सातवीं हैरानी, आमंत्रण पत्र, स्मारिका, प्रपत्र, समीक्षा आदि का प्रकाशन? वगैरा, वगैरा।

चलिए, इन मुद्दों को एक थोड़े विस्तृत कैनवास पर देखें। प्रथमतः विषय। आज के युग में यूं तो विषय हाल उपलब्ध हो जाते हैं लेकिन आयोजक इस पर कई प्रकार से परिक्रमा करते हैं जैसे विषय की व्यापकता, उसकी समकालीनता, उसके वक्तागण, विचारकों की उपलब्धता, कुछ नयापन और हां, अपने इष्ट मित्रों को ऑबलाइज करने का ख़याल आदि-आदि। फिर यह तय करना होता है कि इसे कहां आयोजित किया जाये? यदि स्थान नगर में प्रसिद्ध है तो फिर उसे निशुल्क या सस्ते में हासिल करने की जुगत लगाना होती है। समय तो अक्सर शाम का। रहा दिन, तो अवकाश हो तो बेहतर। उस दिन इतिहास में कोई विशेष घटना या जयंती अथवा पुण्यतिथि के सुयोग विचारणीय बिंदु होते हैं। फिर, खाने-बैठने वाले अदद, मीडिया, साहित्यिक बंधु, आयोजन के सहभागी, मुख्य अतिथिगण और दस-बीस अन्य को जोड़कर लगभग पच्चीस-पचास तो आमतौर पर आ ही जाते हैं।

तत्पश्चात स्वल्पाहार में चाय ही स्सती व सुंदर है और साथ में समोसा या दो बिस्कुट या चखना टाइप की कोई चीज़। किसी को, विशेषकर कार्यक्रम के अध्यक्ष या मुख्य अतिथि को डायबिटीज़ हो तो उसका भी ध्यान रखते हुए शुगर फ्री इंतज़ाम करना होता है। आयोजक सर्वाधिक हैरान रहता है प्रिंटिंग में। कोई सहयोगी न हो तो शुरू-शुरू में यह एक सिरदर्द रहता है। सबसे मनोरंजक परेशानी है क्रमांक पांच। इसमें दिमागी कसरत और शारीरिक ताकत दोनों का उपयोग होता है। कार्यक्रम की शुरुआत, फिर स्वागत बेला, स्वागत उद्बोधन, संचालन, अतिथि, अध्यक्ष तथा प्रमुख व्यक्तियों के वक्तव्यों का क्रम निर्धारण व समय सीमा, वैचारिक परिवेश की मिर्मिति, कृतज्ञता ज्ञापन, प्रकाशन वितरण जैसे अनेक पायदानों की नियति आदि। इन सभी को सेट करने में हर सहभागी अपना-अपना राग अलापता है। अन्य बातें जो समापन के बाद तक चलती रहती हैं उनमें, दो चार वाहनों तथा व्यक्तियों की सदा उपलब्धता, हर व्यवस्था का एक विकल्प आदि आयोजक को दूरदर्शी कहलाने में सहायक सिद्ध होते हैं। आयोजन उपरांत प्रमुख तलवारों में प्रचार, प्रतिक्रियाएं एवं लेनदारों की कतारें शाश्वत हैं।

आइए, एक विचार गोष्ठी के कुलरंग से आपका साक्षात्कार भी करा दूं। फर्ज़ कीजिए कि आप समय से आधे घंटे बाद पहुंचे तो आप देखेंगे कि आपके अलावा गिनती के दो-चार लोग और मिलेंगे। घबराइए मत और भ्रमित भी न होइए, गोष्ठी यहीं होगी। धीरे-धीरे और आएंगे और अगले आधे घंटे यही बात होती रहेगी कि समय से आना चाहिए। आगंतुकों में आप वृद्धों की वैरायटी देखेंगे। एक आपको पहचाना सा या शानदार व्यक्तित्व का मालिक लगेगा जिसके आस-पास अनेक लोग जुटते दिखेगे। समझ लीजिए संभवतः वही कार्यक्रम का मंच सुशोभित करने वाला है।

आप किसी भी ऐसे कार्यक्रम में जाएं, एक न एक शख़्स ऐसा मिल ही जाएगा जो आपका ध्यान आकर्षित करेगा, अपने अजीब चेहरे, लिबास, आवाज़ या हरकतों से। ऐसे शख़्स को आप बहुत दिन तक याद रखेंगे। ख़ैर, कार्यक्रम शुरू होगा तो कुछ देर रस्म अदायगी और औपचारिक हंसी-ठिठोली का दौर चलेगा। धीरे-धीरे कार्यक्रम गंभीर होता जाएगा। कुछ लोग वाक़ई चले जाएंगे और कुछ आएंगे-जाएंगे। आप अपने पड़ोस में बैठे मित्रों से हर वक्तव्य तथा व्यक्तित्व पर तात्कालिक प्रतिक्रियाएं सुनने को विवश होंगे। हां, हूं, ना, नूं भी करना पड़ेगी। कुछेक शब्द जैसे बोरिंग, क्लिष्ट, झिलाउ, केयरफुली केयरलेस, अल्टीमेट, भ्रष्ट आदि आप भिन्न-भिन्न संदर्भों में सुनेंगे। और, आख़िरकार शैकसपियरियन कॉमेडी के तरह का कार्यक्रम अंततः आपको भला लगने लगेगा जब आप स्वल्पाहार के लिए आमंत्रित किये जाएंगे और कुछ प्रकाशित सामग्री अपने हाथ में महसूस करेंगे।

यूं तो मैं कई गोष्ठियों में जा चुका हूं लेकिन हाल में आयोजित एक विचार गोष्ठी ने बहुत प्रभावित किया। दरअस्ल, यह प्रभाव ही इस लेख का कारण है। एक पत्रिका ने ने एक लेखिका पर केंद्रित एक विशेषांक का प्रकाशन किया जिसके विमोचन उपलक्ष्य में इस गोष्ठी का उपक्रम हुआ। गोष्ठी में, लेखिका की पूर्व में प्रकाशित एक पुस्तक पर चर्चा तथा लेखिका के सामाजिक, साहित्यिक सरोकारों से संबंधित विचार प्रस्तुत किये जाने थे। शायद मैं अकेला ही नवयुवक था इस गोष्ठी में, बाकी वृद्ध, प्रौढ़ और महिलाएं। वृद्धों में एक श्वेतकेशी अध्यक्ष पद पर पधारे। एक अदद विचित्र जीव और वही शब्दों की जुगाली। सब कुछ पूर्ववर्णन जैसा ही था लेकिन एक तत्व जो ज़ह्न में उतर गया, वह था, गोष्ठी का आधार और उस पर खड़ी हुई इमारत।

अस्ल में, गोष्ठी उस कृति के विभिन्न पहलुों या मूल्यों पर विचार करने के लिए आयोजित की गयी थी। इसी वज्ह से पहले एक नवोदिता ने अपनी लिखित समीक्षा निवेदित की। तत्पश्चात अन्य आमंत्रितों विद्वानों को उस कृति पर अपने विचार प्रकट करने के साथ ही सवाल-जवाब सत्र शुरू हुआ। लेकिन हुआ कुछ और। और, जो कुछ हुआ वह कम से कम मुझे तो चकित कर गया। मैं तो पहले से ही नर्वस था क्योंकि मैं ही सबसे छोटा था इसलिए कहीं सर्वप्रथम संचालक मुझे अवसर न दे डालें, यह सोचकर। उस कृति को पढ़ना तो दूर, मैंने तो उसका नाम तक न सुना था पहले। जाने कैसे संचालक महोदय का आभार प्रकट करूं कि उसने मेरी ओर देखा तो अर्थपूर्ण किंतु मौक़ा नहीं दिया। लेकिन आश्चर्य यह था कि तमाम उपस्थित विद्वानों में से किसी ने भी वह कृति नहीं पढ़ी थी जिन्हें उस पर विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया था।

धीरे-धीरे सारे के सारे लोग मेरे सामने खुलते चले गये। यक़ीन मानिए उस लेखिका तथा समीक्षिका के अलावा तीसरा कोई शायद पढ़ा-लिखा नहीं था। सबसे उस समीक्षा को आधार मानकर कुछ प्रशंसाएं और विचार ठोक दिये।

ख़ैर यह भी एक अनुभव हुआ जिसने समझा दिया कि नर्वस होने की कोई ज़रूरत नहीं होती। ज़रूरी नहीं कि पर्वत पत्थरों का ही बना हो, राई का भी हो सकता है। हो सकता है, यह सब जो हुआ, पूर्व नियोजित रहा हो। आयोजक शायद कुछ "नया या हटकर" करना चाहते हों। लेकिन साहब मुझे तो गवारा नहीं था, यह तय है। चाहे किसी को कुछ भी लगे। सोचता हूं उस लेखिका को इस गोष्ठी के बाद खुद को राष्ट्रीय स्तर की लेखिका कहने या समझने में कैसा लगता होगा?

शनिवार, नवंबर 04, 2017

एक ग़ज़ल

तारीख़ में औरत के एहसास के ज़ाविये


भोपाल शायरी के गढ़ के रूप में पहचान बना चुका है और दौरे-हाज़रा में जो शायर सरज़मीन-ए-भोपाल का नाम दुनिया भर में रोशन कर रहे हैं, उनमें से एक हैं मोहतरमा नुसरत मेंहदी। मेंहदी साहिबा को दुनिया भर में मुशायरों में न सिर्फ़ बाइज़्ज़त बुलाया जाता है बल्कि उन्हें चाव से सुना जाता है।



Nusrat Mehdi.
भोपाल के उर्दू अदब में पिछले कुछ वक़्त से एक नाम जो बड़ी तेज़ी के साथ मक़बूल हुआ है, वह है नुसरत मेंहदी। सूबे की उर्दू अकादमी के सचिव का ओहदा संभालने के बाद गुज़रे कुछ सालों में मेंहदी साहिबा ने भोपाल में न केवल शायरी बल्कि उर्दू ज़बान और अदब के हवाले से जिन सरगर्मियों को अंजाम दिया है, उनकी गूंज बहुत दूर तक पहुंची है और पहुंच रही है। बहरहाल, यहां उर्दू अकादमी की सेक्रेट्री नुसरत मेंहदी नहीं बल्कि शायरा नुसरत मेंहदी की एक ग़ज़ल के तआल्लुक से कुछ लाज़िमी पहलुओं पर गुफ़्तगू की हसरत है।

भोपाल के तक़रीबन हर क़ाबिले-ग़ौर मुशायरे, महफ़िल या नशिस्त में अपनी बावक़ार मौजूदगी दर्ज करने वाली मेंहदी साहिबा की एक ताज़ा ग़ज़ल औरत के वजूद और पूरी तारीख़ को चन्द मिसरों में समेटने के लिहाज़ से ख़ास तवज्जो का तक़ाज़ा करती है। अब तक यानी 3 नवंबर 2017 की रात तक, इस ग़ज़ल में कुल सात शेर ख़ुद शायरा की जानिब से मेरी जानकारी में आये हैं, जिनमें से 5 शेर इस सिलसिले में सीधे तौर पर शामिल होते हैं।

उठा रही थीं इक के बाद एक सर तो ये हुआ
कि ख़्वाहिशों की इक बड़ी क़तार मार दी गयी।

मत्ले के बजाय इस ग़ज़ल पर इस शेर से बात शुरू करने की वज्ह यह है कि इस शेर की हैसियत और वुस्अत बहुत ज़्यादा है। मेरे ख़याल से पूरी तारीख़ और हालिया दौर के हवाले से हर औरत का बयान इस शेर में आवाज़ पाता है। यह औरत का मुक़द्दर रहा है या आदमी की हुक़ूमत वाले समाज में औरत के वजूद को कुचलने की साज़िश, इस शेर के पसमंज़र में एक बड़ी, पुरानी और जारी-व-सारी दास्तान सुबकती हुई सी है। अब ग़ज़ल का मत्ला देखिए - 

तो ये हुआ कि फिर अना की जंग हार दी गयी
उदास था कोई तो उसपे जीत वार दी गयी।

हमारा समाज औरत को देवी बना देता है। इफ़्फ़त, क़िरदार, हया, फ़र्ज़, उसूल यानी कि हर तरह से औरत होने के मआनी एक आदर्श के सांचे में क़ैद कर दिये गये हैं। मां, बीवी, बेटी तमाम शक़्लों में औरत से इसी तरह के बर्ताव की उम्मीद की जाती है कि वह बेटे, शौहर या बाप सभी के लिए अपनी ख़ुशी और अना को क़ुर्बान कर दे। अब इस शेर में ज़बान की शाइस्तगी और लफ़्ज़ बरतने का हुनर भी क़ाबिले-दाद है। “तो ये हुआ...” इन अल्फ़ाज़ से मिसरा उठाना अपने आप में एक मायूसी समेटता है। “कि फिर...” ये लफ़्ज़ एक तवील रवायत की तरफ़ इशारा करते हैं। “वार दी गयी...” ये लफ़्ज़ लोकभाषा या हिंदोस्तानी की एक बोली से आते हैं। यानी एक ज़ुल्म को रवायत के तौर पर दर्ज करने के लिए ज़बान की रवायत का ख़याल ख़ूबसूरती से रखा गया है। इस शेर में आप कम अज़ कम दो ज़बानों का उफ़ुक तो तलाश ही सकते हैं।

तमाम उम्र मैंने कोई शर्त ही नहीं रखी
कहा गया गुज़ार दो तो बस गुज़ार दी गयी।

यह शेर उसी क़िरदार को ढोती हुई ज़िंदगी का हवाला देता है जो किताबों और रवाजों की बिना पर औरत के लिए तय कर दिया गया है। ये क़िरदार ढोना औरत की मजबूरी बन गयी है क्यूंकि वक़्त के साथ सोच पत्थर हो चुकी है। आदमी के समाज को औरत की कोई शर्त गवारा ही नहीं। एक और कामयाब शेर। ज़बान के फ़न से लबरेज़। इस शेर के सानी मिसरे में जो लफ़्ज़ है “बस...” इस शेर के पूरे मफ़हूम से मुताल्लिक़ मजबूरी या लाचारी इसी एक लफ़्ज़ की शीशी में बंद कर दी गयी है।

दरअस्ल, यह पूरी ग़ज़ल जौन एलिया के ग़ज़ल के एक मिसरे या एक शेर की ज़मीन का इस्तिफ़ादा है। जौन एलिया का शेर है -

उसकी उमीदे-नाज़ का हमसे ये मान था कि आप
उम्र गुज़ार दीजिए उम्र गुज़ार दी गयी।

इस शेर की ज़मीन से मेंहदी साहिबा ने अपनी ग़ज़ल की ज़मीन तलाश की है जो एक सत्ह पर इस शेर की वुस्अत कही जा सकती है लेकिन अस्ल में, मेंहदी साहिबा की ग़ज़ल इतनी वसीअ है कि जौन साहब के शेर के दायरों के बाहर निकलकर एक बड़ा दायरा नज़्म करती है। मेंहदी साहिबा इसलिए भी मुबारकबाद की हक़दार हैं कि वह अपनी इस ग़ज़ल को सामईन के हवाले करते वक़्त जौन की ज़मीन का ज़िक्र करती हैं और समझने वालों के लिए बात आगे तक लेकर जाती हैं।

खुलेंगे कितने ज़ख़्म और सुलग उठेगी ज़िंदगी
ख़मोशियों की ये परत अगर उतार दी गयी।

अब ये शेर ग़ज़ल में एक इन्क़िलाबी शेर की तरह आता है लेकिन इसकी आंच भड़कते हुए शोलों जैसी नहीं, बल्कि राख में दबी चिंगारी की तरह महसूस होती है। ये एक धमकी से कम सख़्त लहजे की बात है, तक़रीबन चेतावनी जैसी। चूंकि पहला मिसरा एक मुलायम या दर्दनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया गया है इसलिए सानी मिसरे की आंच मद्धम हो जाती है। इस शेर को शायद दो मोड़ दिये जा सकते थे, एक दमदार धमकी का तेवर और दूसरे मोड़ से इसे तारीख़ के उन हवालों से वाबस्ता किया जा सकता था जहां औरतों ने बग़ावत की है, सर उठाया है या आवाज़ बुलंद की है। लेकिन, मेंहदी साहिबा ने जिस तर्ज़ को इस शेर में मुनासिब समझा है उसकी वज्ह यह भी हो सकती है कि एक तो औरतों की जानिब से कोई बड़ा इन्क़िलाब मर्दों की दुनिया के ख़िलाफ़ हुआ नहीं है और शायद यह कि औरतें अगर मुख़ालफ़त पर उतारू हो गयीं तो एक समाज का ढांचा टूटेगा और नया बनने में जो वक़्त लगेगा, उस दरमियान एक लंबे वक़्त तक ज़िंदगी सुलगती ही रहेगी।

किताबे-ज़ीस्त खोलकर है नुसरत आज सोच में
सफ़ाई किन ख़ताओं की ये बार-बार दी गयी।

तो इस तरह ग़ज़ल मक़्ते तक पहुंचती है। औरत के दर्द के एक और ज़ाविये को आवाज़ देता यह शेर पुरअसर महसूस होता है। डॉ. नसीम निक़हत हिंदोस्तान की एक और ऐसी शायरा हैं जो इस पूरी तम्हीद में अपने शेरों के हवाले से याद आती हैं। औरत के जज़्बात, एहसास, दर्द और सोच को डॉ. निक़हत ने भी कुछ अशआर में बड़े पुरअसर ढंग से ढाला है। पाकिस्तान की शायरात का ज़िक़्र करूं तो परवीन शाकिर, फ़हमीदा रियाज़ और किश्वर नाहीद का नाम बरबस ही ज़ह्न में उतरता है। जिन शायरात ने औरत के वजूद के मुताल्लिक यादगार शायरी की है, उनमें मेंहदी साहिबा का नाम किस सत्ह पर लिया जा सकता है, यह तो उनके दीवान से गुज़रकर ही कह पाना मुनासिब होगा लेकिन अगर बात सिर्फ़ इस ग़ज़ल की है तो इतना तो यक़ीनी तौर पर कह सकता हूं कि औरत की आवाज़ जो शायरी बनती है या जिस शायरी को औरत की आवाज़ के नाम से आइंदा वक़्तों में याद किया जाएगा, उसमें यह ग़ज़ल शामिल ज़रूर होगी।

अब इस ग़ज़ल के बारे में दीग़र बातें ये भी करता चलूं कि एक तो चूंकि पूरी ग़ज़ल में कहीं औरत लफ़्ज़ सीधे नहीं आया है तो इसके और भी मआनी या तफ़्सीलात पेश की ज़रूर जा सकती हैं, लेकिन यह ग़ज़ल के शेरों में तहदारी की बात है कि एक ही शेर को मुख़्तलिफ़ थीम्स या मुद्दों पर उतारा जा सके। एक बात यह कि इस ग़ज़ल की ज़बान को मैं हिंदोस्तानी ज़बान कहना ज़्यादा मुनासिब समझता हूं बजाय उर्दू कहने के। और यह भी कि इस ग़ज़ल के मिसरों की मुहावरेदानी की वज्ह से एक ख़ुशरंग ज़बान रोशनी में आती है। यह ग़ज़ल एक सत्ह पर रवायती भी है तो दूसरी सत्ह पर ग़ालिबन इसमें जदीदियत की निशानदेही भी है।

मेंहदी साहिबा अपने तरन्नुम के लिए भी ख़ासी मशहूर हैं। यह ग़ज़ल उनसे तरन्नुम में सुनी है इसलिए कह सकता हूं कि चन्द और ग़ज़लों की तरह इस ग़ज़ल में भी उनका तरन्नुम डॉ. बशीर बद्र के तरन्नुम से मुतास्सिर है। इस ग़ज़ल की सिफ़त यह है कि मेंहदी साहिबा से तरन्नुम में इसे सुनें, तहत में सुनें या ख़ुद कहीं भी पढ़ें, यह ग़ज़ल आपके साथ जुड़ जाती है और शायद कुछ मुरीदों की याददाश्त में रह भी जाएगी। आख़िर में इस ग़ज़ल के बाक़ी दो शेर भी आप तक पहुंचाता चलूं जिन पर बात फिर कभी, क्यूंकि अभी जिस मक़ाम और क़ैफ़ियत से इस ग़ज़ल का तब्सरा कर रहा हूं, वहां से इन दो शेरों पर बात कर पाना वाजिब नहीं होगा।

जब उसके लफ़्ज़ कुंद होके बेअसर हो गये
तो फिर ज़बान पर नये सिरे से धार दी गयी।

बुखार सच का उसके सर पे इस क़दर सवार था
कि टोने टोटके से उसकी लू उतार दी गयी।

क्या फ़िक़्रअंगेज़ वाक़या है कि एक रोज़ पहले पढ़ी ख़बर ज़ह्न में करवटें ले रही थी कि साउथ अमेरिका के पेरू में मिस पेरू मुक़ाबले के दौरान शरीक़ मॉडल्स ने रस्म को तोड़ते हुए अपने साइज़ का ब्यौरा देने के राउंड में अपने इलाक़े में होने वाले उन ज़ुल्मों और गुनाहों के आंकड़े रखे, जो औरतों के ख़िलाफ होते हैं। और इसी सोच में डूबा हुआ मैं एक दिन बाद मेंहदी साहिबा की इस ग़ज़ल से रूबरू हुआ, जो आंकड़ों से नहीं, परत-दर-परत घुले एहसासों से तक़रीबन उसी आवाज़ की गूंज है।

आख़िरश, ये ग़ज़ल औरत की तारीख़ या तारीख़ में औरत की जिस ज़मीन पर नुमाइंदगी करती है, वहां किसी मज़हब की औरत, किसी इलाक़े की औरत या किसी ख़ास रंग की औरत की बात बेमानी है। इन शेरों में औरत सिर्फ़ औरत है - यानी ठीक आधी दुनिया।

शुक्रवार, नवंबर 03, 2017

ग़ज़ल

"दिलशाद ही होना है सिकंदर नहीं होना"


मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर भोपाल सिथत राज्य संग्रहालय में मप्र उर्दू अकादमी की जानिब से "जश्ने-सुख़न" का आयोजन किया गया। बुज़ुर्ग, आला और उभरते हुए अदीबों से सजे स्टेज पर भवेश दिलशाद ग़ज़लसरा हुए। समारोह की सदारत डॉ. मुख़्तार शमीम साहब ने की जबकि मेहमाने ख़ुसूसी के तौर पर जनाब रईस सिद्दीकी साहब, जनाब हमीदुल्लाह मामू साहब और जनाब यूसुफ़ खान मौजूद थे। डॉ. नुसरत मेंहदी की सरपरस्ती में हुए इस समारोह में निज़ामत जनाब बद्र वास्ती साहब ने की। इस मौक़े की चन्द तस्वीरें और वीडियो यहां प्रस्तुत हैं।



Mrs Nusrat Mehdi welcomes Bhavesh Dilshaad.


Bhavesh Dilshaad recites his poetry.