शनिवार, अक्टूबर 28, 2017

चिट्ठी

परवीन शाक़िर के नाम एक ख़त

मेरे एहसास की तर्जुमानी करतीं तुम


यह चिट्ठी 13 अक्टूबर 2005 को लिखी गयी थी और इसके कुछ ही बाद मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी की पत्रिका "साक्षात्कार" में इसका प्रकाशन हुआ था।


नाम सुना था और कुछेक अशआर भी, लेकिन धुंधले हो चुके थे। पिछले दिनों एक शाम अचानक पढ़ने को मिलीं तुम्हारी ग़ज़लें और नज़्में। मुरीद के सिवाय क्या होना था इख़्तियार में। सोचा तुम्हें ख़त लिखूं, कभी मुलाक़ातें हों, बातें हों और हो सके तो कुछ और भी। बस, बेतरह तुम्हारे तसव्वुर में रात ढलने लगी।

Parveen Shakir. image source: Google
सोच भी ली थी, ख़त लिखने की तरतीब, एक तरक़ीब कह लो। लिखता तो शायद यूं लिखता कि मेरे एहसास की तर्जुमानी करतीं तुम्हारी ग़ज़लें, नज़्में पढ़ीं। सोचा कि कुछ बात कर लूं, फ़िलहाल ख़त के ज़रीये ही। बात करने लगा तो बात निकलती ही गयी जैसे चादर हटा के बर्फ़ की लहराने लगे हों हर्फ़ और तुम्हारी ग़ज़लों का तआस्सुर ये कि इन हर्फ़ों ने मेरा लिहाज़ भी रखा जैसे सूरज की शह पे तिनके भी बेबाक़ हो गये। चाहो तो ख़ता कह देना लेकिन ये क़तई नहीं कि बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गये। यक़ीन मानो मैं तुम्हारे अलफ़ाज़ से इतना मुतास्सिर हुआ कि तुम्हारे हुस्न का क़ायल हो गया। जी में आया कि तुम फ़ौरन हिंदोस्तान चली आओ और ये भी ऐतबार था मुझे कि अगर ऐसा हो जाये तो फिर तुम्हारी रिफ़ाक़त के लिए, मौसमे-गुल मेरे आंगन में ठहर जाएगा

हालांकि हम पहले कभी नहीं मिले। फिर भी न जाने क्यूं मुझे लगता है जैसे हम एक ही रूह के टुकड़े हों। हमारे आंगन अलग सही मगर उन पर एक ही बादल बरसता हो, हमारी प्यासी प्यास अलग सही लेकिन समंदर उतना ही चाहिए हो और जैसे मुझ पर एहसान करती हवा तेरी ख़ुश्बू का पता करती है। इन्हीं सब बातों के बीच मेरी दीवानगी ने तुमसे एक रिश्ता सा क़ायम कर लिया। एक पुल जिसके दोनों सिरे किसी धुंध में ग़ायब हों, यही ख़्वाहिश कि मैं वो सिरा तलाश लूं और तुम ये। एक डर तो रहता ही है सो था कि आख़िर किसकी तलाश पूरी हुई है। इन्हीं ख़्वाहिशों को लिये कितने बुलंदो-बाला शजर ख़ाक हो गये। बस, इसी तरह शब ढल गयी।

अगली शाम फिर तुम्हारी ग़ज़लों और नज़्मों की महफ़िल सजी। मैं कभी मुस्कुराया, कभी उदास हुआ, कभी तुम हो गया तो कभी रूह तक आ गयी तासीर मसीहाई की। आज तुम्हारी तस्वीर भी देखने को मिली। यक़ीन मानो तुम्हारी शायरी से कम ख़ूब नहीं लगी। तुम्हारा ही मिसरा याद आया चांद भी ऐन चैत का उस पे तेरा जमाल भी। सोचने लगा कि बख़्शने वाले ने तुम्हें सब कुछ बख़्शा। ऐ क़ाश कुछ कमी छोड़ देता। कम से कम तुम्हारे जैसे मासूम फूल को दुख न बख़्शता। लेकिन, वो तुमसे बहुत पाकीज़ा मुहब्बत करता होगा, इसीलिए तो फूल के सारे दुख ख़ुश्बू बनकर बह निकले हैं। यक़बयक़ महसूस हुआ कि ये मैं क्या कह रहा हूं? अगर ऐसा होता तो ये ख़ुश्बू कैसे बिखरती और मुझे कैसे महकाती। और फिर इस महरूमी के क्या मायने होते मेरे लिए, मुआफ़ करना शायद ये मेरी ख़ुदगर्ज़ी ही है। लेकिन ये बहुत बड़ा सच ही मानो कि मेरे लिए तुम्हारे वजूद का हर पहलू लाज़िमी है, ख़ास है और रहेगा।

ख़ैर, मेरी बातें छोड़ो। आगे सुनो, रात हुई और बिस्तर पर तुम्हारे एक शेर की सलवटें उभरने लगीं बिछा दिया था गुलाबों के साथ अपना वजूद/वो सो के उठे तो ख़्वाबों की राख उठाउंगी। हर सलवट पर बतौर औरत तुम्हारी पाकीज़गी, संजीदगी, समर्पण और मासूमियत मुझे साफ़ दिख रही थी। मैं तुम्हारा क़ायल हो रहा था। सांसों की जगह ग़ज़ल भरतीं तुम अपनी ही नज़्मों के बदन में ढलकर मेरे आसपास थीं उस वक़्त। मैं चाहता रहा कि मेरी निगाहें तुम्हारे चेहरे पर ग़ज़ल लिखती जाएं मगर... कुछ देर बाद उठा तो खिड़की पर चांद ने दस्तक दी। तुम्हारे ख़यालों में डूबा मैं उसे तकने लगा कि अचानक एक बादल ने उसे पूरा ढांक लिया। तब एक और खुलासा हुआ मुझ पर कि इतने घने बादल के पीछे/कितना तनहा होगा चांद। तुम समझ सकती हो कि बादल और चांद के मायने क्या थे मेरे लिए। मालूम नहीं था सिर्फ़ एक ध्यान रहा कि शायद पाकिस्तान में भी रात हो रही होगी और एक बज रहे होंगे। मेरे होंठों की लर्ज़िश से आवाज़ ये निकली सोता होगा मेरा चांद। कहीं नींद न टूट जाये, मैंने तड़पकर अपने लबों पर उंगली रख ली। लेकिन मजबूरी शायद इसी को कहते हैं कि मैं अपने बोलते हुए तसव्वुरात पर उंगली नहीं रख पाया। अपने अहवाल का ज़िक्र ज़रूरी तो नहीं लेकिन कहे बगैर रह नहीं पाउंगा तुम्हारा शेर ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने/सुब्हें जब अपनी थीं शामें उसकी। और रात का इज़ाफ़ा समझाने की बात तो नहीं। ये कोई शिक़ायत नहीं क्योंकि मेरी नींद ये सोचकर टूट चुकी थी कि किस तरह कटती हैं रातें उसकी। थोड़ी देर बाद अधूरी नींद में नीम ख़्वाबीदा आंखों में तुम्हारा ही ग़ुमान उतरने लगा। फिर दिन हो गया और दुनियावी मसाइल मुझे अपने आग़ोश में लेने लगे।

शाम ढली और मुझे ख़बर नहीं थी कि एक सदमा मुझे आज झेलना होगा। तुम्हारा लाइफ़ स्कैच पढ़ने को मिला। आख़िर तक पहुंचा और अंदर-अंदर कुछ चटकने की आवाज़ों की तासीर मेरी पलकों ने बयान की। काश, 1994 के कैलेंडर में 26 दिसंबर की तारीख़ ही नहीं होती। काश ऐसा होता, काश वैसा होता... इस शाम बड़ा मन था कि तुमसे मुलाक़ात होगी, और बातें होंगी मगर..! अजीब तर्ज़े-मुलाक़ात अबकि बार रही/रवायतन ही सही कोई बात तो करते। मेरा एक सुनहला सपना धुंधला हुआ है। इरादा करता हूं कि इसे अंधेरों या ग़र्द की चादर के पीछे गुम नहीं होने दूंगा। वादा करता हूं कि जो सपना देख लिया था तुमसे मिलने का, बातें करने का और हो सके तो कुछ और का भी, उसे पूरा करने की कोशिश ताउम्र करता रहूंगा। मैं देख रहा हूं कि तुम "वहां" एक नीली झील के पास खड़ी हुई पानी में अपना अक़्स देख रही हो और हैरान हो रही हो कि क्या-क्या दिख रहा है। मुझे भी वहां आना नसीब हो कभी, वहीं मेरे उस सुनहले सपने की ताबीर हो। तुम्हारी क़सम अबसे मैं एक नेक इंसान बनने की राह पर ही क़दम रखूंगा क्योंकि अब मैं सब कुछ बर्दाश्त कर सकता हूं लेकिन ये क़तई नहीं कि मैं "वहां" न आ सकूं जहां तुम हो।

चाहो तो पुकार लो
दिलशाद

संगीत

ग़ज़ल गायकी: एक सफरनामा


ग़ज़ल के गायन से जुड़ी तक़रीबन डेढ़ हज़ार सालों की तारीख़ को प्रामाणिक ग्रंथों के हवाले से समेटता यह संक्षिप्त आलेख साहित्य सागर, अर्बाबे-कलम और देव भारती आदि कुछ पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका है।


19वीं सदी के पूर्वार्ध की बात है जब मिर्ज़ा ग़ालिब को दरबारों में एक शायर के तौर पर नकारा जाता था। ग़ालिब को अपने कलाम पर पूरा यक़ीन था, बावजूद इसके उन्हें जब एक शायर की हैसियत और वक़ार हासिल नहीं हो रहा था, उस दौरान उन्होंने अपने एक कलाम को एक कोठे से एक तवायफ़ की आवाज़ में सुना और वहां जाकर उन्होंने यह मालूम किया कि उन तक ये ग़ज़ल कैसे पहुंची। इसके कुछ ही दिनों बाद गली-कूचों में गाते हुए भीख मांगते हुए एक फ़कीर को उन्होंने सुना तो वह भी उनका ही कलाम गुनगुना रहा था। तब बेसाख़्ता उनके मुंह से निकला "जो कलाम कोठे में तवायफ़ और कूचे में फ़कीर की ज़ुबान पर हो, उसे कौन मार सकता है !" इस घटना के संदर्भ में गौर करें तो ग़ज़ल गायकी अपने इब्तिदाई दौर में फ़कीरों और तवायफ़ों से जुड़ी रही। हज़रत अमीर खुसरौ न सिर्फ एक मुकम्मल शायर थे, बल्कि संगीत का भरपूर ज्ञान रखते थे। उन्होंने एक तरह के सितार के ईजाद की थी। हज़रत खुसरौ और उनके बाद ग़ज़ल गायन की यात्रा से पहले कुछ बात उनसे पहले की ज़रूरी है।

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आचार्य बृहस्पति लिखित संगीत चिंतामणि में एक हवाला दिया गया है "हज़रत मुहम्मद के जन्म से पूर्व के कुछ अरबी ग्रंथ रामपुर के रज़ा पुस्तकालय में सुरक्षित हैं जिनमें कुछ गीतों की विशिष्ट स्वर-लिपि भी है"। इसी ग्रंथ में एक और बात स्पष्ट की गयी है कि 8वीं सदी के पूर्वार्ध में "मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बाद मनसूरा, कदावेल, वैजा, महफूज़ा और मुल्तान जैसी बस्तियां अरब और भारत के संगीत का संगमस्थल बन गयी थीं"। गोया कि यहां से हम उस तहज़ीब का बीजारोपण मान सकते हैं जो बाद में गंगा-जमुनी तहज़ीब के नाम से जानी गयी। 8वीं और 9वीं सदी में संगीत की विभिन्न धाराओं का प्रचार शुरू हुआ। नतीजा यह हुआ कि भारत के संगीत के साथ-साथ अरब के मुसलमानों का प्रचलित संगीत और फारस का संगीत भारतीय सीमाओं में गूंजने लगा। वस्तुतः हर संगीत के स्वभाव एवं गुणों में फर्क था। उपरोक्त ग्रंथ के ही अनुसार मुल्तान क्षेत्र में अरब मुसलमानों के प्रभाव से धुनों और रागों का जन्म हो रहा था, वहीं मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी अजमेर की लोक भाषा के छंदों और प्रचलित धुनों में गायकी के लिए कव्वालों को प्रेरित कर रहे थे। यह कोई प्रतिद्वंद्विता जैसी स्थिति नहीं थी, लेकिन अपनी मान्यताओं और कलाओं का प्रचार अवश्य था। 1967 के संगीत पत्रिका के अंक में उल्लेख है कि बनी अब्बास के ज़माने तक स्थायी कला के रूप में ग़ज़ल गाने का प्रचार हो गया था। यह भी बताया जाता है कि इब्राहीम बिन महदी, इब्राहीम मुसली, इसहाक इब्ने इब्राहीम और हमीद इब्ने इसहाक बड़े-बड़े गायक उस ज़माने में पैदा हुए।

अलक़िस्सा, 12वीं सदी तक ग़ज़ल गायन मौसिक़ी की एक महत्वपूर्ण धारा बनकर उभरा। डॉ. प्रेम भंडारी लिखते हैं कि भारतीय संगीत में ग़ज़ल गायकी के प्रचार का एक बहुत बड़ा श्रेय सूफ़ी संतों को है। अनेक आलोचक मानते हैं कि भारत में ग़ज़ल गायकी का प्रचलन 13वीं शताब्दी के पूर्व ही हो चुका था। डॉ. श. श्री. परांजपे लिखते हैं कि सूफियों ने प्रार्थना संगीत में फ़ारस की ग़ज़ल को स्थान दिया और उसे भारतीय रागों और तालों में ढालने की शुरुआत की। कुछ ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सन् 1210 से 1388 तक ग़ज़ल आम जनजीवन और दरबारों में शोहरत पा चुकी थी। इस वक़्त में कव्वाल मेहमूद, मोहम्मद और खुदादी जैसे ग़ज़ल गायकों के नाम लिये जाते हैं। कहा जाता है इल्तुतमिश, बलबन, खिलजी, तुग़लक जैसे शासकों के युग में ग़ज़ल गायकी को सम्मान मिला। इसी समय के बीच में हज़रत खुसरौ हुए जो ग़ज़ल के साहित्यिक और सांगीतिक विकास के एक महत्वपूर्ण स्तंभ माने गये। अनेक लेखकों और ग्रंथों में माना गया है कि भारत के लोकजीवन में ग़ज़ल को प्रचलित और प्रतिष्ठित करने में उनकी भूमिका सराहनीय रही। "मुसलमान और भारतीय संगीत" नामक पुस्तक में ज़िक्र है कि दक्षिण के मोहम्मद शाह प्रथम के दरबार में 300 गायकों द्वारा खुसरौ की ग़ज़लें गायी गयीं।

इसके बाद संगीत कला की उन्नति हुई, लेकिन ग़ज़ल का साहित्यिक सफर कुछ ठहर सा गया। चूंकि ग़ज़ल एक मुक़ाम हासिल कर चुकी थी इसलिए ग़ज़ल का सांगीतिक सफ़र जारी रहा, लेकिन 14वीं और 15वीं सदी में ही ये हालात बन गये कि गायक पूर्ववर्ती शायरों की ही ग़ज़लें गाते थे, समकालीनों की ग़ज़लें बहुत कम। इंडियन म्यूज़िक नामक किताब में गार्ली ओबिंस लिखते हैं कि सिकंदर लोदी विद्वानों का आदर करता था और उसके समय में भारतीय संगीत की उन्नति हुई। ख़्याल और ग़ज़ल अधिक बने। फिर, मुग़लकाल भारतीय कलाओं के स्वर्ण काल के रूप में जाना जाता है। इस समय में एक तरफ़ तो हिंदी का कालजयी लोक काव्य रचा जा रहा था, दूसरी ओर, कुछ उल्लेखनीय शायर ऐसा काव्य रच रहे थे जो एक नयी भाषा की आमद का संकेत था, जिसे बाद में उर्दू कहा गया। यह हिंदोस्तान में पैदा हुई एक ऐसी ज़ुबान थी, जिसमें बहुत से रंग मिले-जुले थे।

मुगल बादशाह अकबर के समय में फ़ैज़ी, नज़ीरी, शेख सादी मक़बूल शायर थे और तानसेन, बैजू और रामदास जैसे सिद्ध गायकों द्वारा ग़ज़लें गाये जाने के उल्लेख मिलते हैं। जहांगीर कलाओं का शौकीन था और भगवतीशरण शर्मा लिखते हैं कि उसे संसार में कुछ पसंद था तो शांति और संगीत। इसके बाद शाहजहां के काल में रोज़ा और अकबर प्रमुख ग़ज़ल गायक हुए तो नासिर अफ़ज़ली इलाहाबादी और पंडित चंद्रभान उर्दू के प्रमुख शायर। शर्मा जी लिखित "भारतीय संगीत का इतिहास" नामक पुस्तक में उल्लेख है कि शाहजहां के समय में संगीत नये सांचों में ढला, नयी राग-रागिनियों की रचना हुई और ईरानी-अरबी संगीत का भारतीय संगीत में तीव्रता से सम्मिश्रण हुआ।

फिर, औरंगज़ेब के समय में संगीत और शायरी को दरबार में जगह नहीं मिली, लेकिन इसका फायदा यह हुआ कि संगीत, शायरी और ग़ज़ल गायन को छोटी-छोटी रियासतों में पनाह मिली जिससे इन कलाओं का विस्तार हुआ और ये लोकजीवन से जुड़ने लगीं। इसके बाद, मोहम्मद शाह रंगीले के समय को भारत में ग़ज़ल और ठुमरी गायन का उत्कर्ष काल माना जाता है। औरंगज़ेब की एक पुत्री दिलरस बानो उर्फ़ ज़ेबुन्निसा विद्वान संगीतज्ञ थी। उसी परंपरा में, रंगीले के समय में घूमन और हसीना दो प्रमुख ग़ज़ल गायिकाएं हुईं। इस काल में अनेक प्रसिद्ध संगीतज्ञों के नाम आते हैं। इसी सिलसिले को बुलंदी मिली बहादुर शाह ज़फ़र के समय में। ज़फ़र खुद एक बड़े शायर थे। रंगीले और ज़फ़र के बीच के समय में मीर और दर्द जैसे महान शायर हुए तो ज़फ़र के समय में ग़ालिब, मोमिन, ज़ौक़ आदि अनिवार्य शायर हुए। इस समय में प्रसिदु जी, विश्वेश्वर मिश्र, मनहर मिश्र जैसे आला ग़ज़ल गायक भी हुए और डोमनी नाम की प्रसिद्ध ग़ज़ल गायिका भी इसी समय में हुई। कहा जाता है कि शास्त्रीय संगीत के उत्कृष्ट गायक मौलाबख़्श भी ग़ज़ल गाते थे।

मुग़लों के पतन के बाद, अंग्रेज़ी हुकूमत के दौरान ग़ज़ल गायकी परवान चढ़ती गयी और लगातार विकसित होती रही। मुग़लकाल के पतन के प्रारंभ के समय से ही ग़ज़ल कोठों तक आम हो चुकी थी। तवायफ़ें मुजरों में ग़ज़लें गाती थीं और उनसे ठुमरियों और ग़ज़लों की ही फरमाइशें हुआ करती थीं। अंग्रेज़ी शासनकाल में यह सिलसिला चलता ही रहा, लेकिन इसके साथ ही ऐसे कुछ संगीतज्ञ ग़ज़ल से जुड़ने लगे जो समाज और धर्म में प्रतिष्ठित थे। इन्होंने ग़ज़ल गायकी को नये आयाम दिये। फैयाज़ खां, रशीद अहमद खां, मजी खां, पंडित लक्ष्मण प्रसाद, आदि उस्ताद संगीतज्ञ थे जिन्होंने ग़ज़ल गायी और ख्याति पायी।

20वीं सदी के प्रारंभ में एक महत्वपूर्ण घटना यह घटी कि एक ऐसी तकनीक का आविष्कार हुआ जो संगीत को रिकॉर्ड कर सकती थी। इसके बाद गायकों को धीरे-धीरे अधिक लोकप्रियता मिलना शुरू हुई। भारत में 1908 के बाद रिकॉर्डिंग शुरू होने के प्रमाण मिलते हैं, जिसे प्रचलन में आने में करीब 20 साल का समय लगा। इसके बाद कोठों में ग़ज़लें गाने वाली डेढ़ दर्जन से ज़्यादा गायिकाएं प्रमुख ग़ज़ल गायिकाओं के रूप में दर्ज हो गयीं। डॉ. प्रेम भंडारी ने 1913 के बाद से स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले तक के प्रमुख ग़ज़ल गायकों की गायकी का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि इस समय की ग़ज़लों पर ठुमरी, दादरा, ठप्पा और कव्वाली शैलियों का प्रभाव रहा। साथ ही, ग़ज़ल गायकी शास्त्रीय संगीत की रागों पर आधारित रही।

स्वतंत्रता के बाद के ग़ज़ल गायन में कुछ तब्दीलियां दिखायी देती हैं। ग़ज़लों पर दिखने वाली ठुमरी, दादरा आदि की छाप धीरे-धीरे ख़त्म होने लगी। शुद्ध रागों के अलावा ग़ज़लों में विवादी स्वरों का प्रयोग होने लगा और रागों से अलग हटकर भी ग़ज़लें गायी गयीं। दो-एक फ़र्क ऐसे भी आये जो पूर्ववर्ती युग की ग़ज़ल गायकी में सुधार करते थे जैसे ग़ज़ल की भावना और संवेदना को समझकर उसके अनुकूल रागों या धुनों का चयन किया जाना और ग़ज़ल के अलफ़ाज़ के सही और शुद्ध उच्चारण पर ध्यान दिया जाना आदि। सरगम, आलाप और तानें भी इस दौर की ग़ज़ल गायकी में इज़ाफ़ा मालूम होती हैं।

फिल्मों के संगीत ने ग़ज़ल को बेहद लोकप्रिय बनाया और कई गायकों ने ग़ज़ल गायक के तौर पर खुद को स्थापित किया तो कुछ ने गीतों के साथ ग़ज़लें भी बखूबी गायीं। बेग़म अख़्तर, केएल सहगल, तलत मेहमूद, मोहम्मद रफ़ी आदि गायकों को ग़ज़ल गायकी में अपार सफलता मिली। तलत मेहमूद की मखमली आवाज़ ग़ज़ल के लिए बेहद माकूल साबित हुई।

50 के दशक के उत्तरार्ध में एक नाम ग़ज़ल की दुनिया में बड़ी तेज़ी से उभरा और कुछ ही समय में शहंशाहे ग़ज़ल कहा जाने लगा। यह नाम था मेंहदी हसन। विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गये हसन ने रेडियो लाहौर से मीर की ग़ज़ल गायी "देख तो दिल कि जां से उठता है" और उसके बाद उनकी ग़ज़ल गायकी को पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। हसन ने मीर, ग़ालिब, दाग़ जैसे शायरों के साथ ही समकालीन शायरों की ग़ज़लें गायीं और न सिर्फ खुद को बल्कि अपने हमअस्र शायरों को भी शोहरत दिलायी। इन शायरों में अहमद फ़राज़, क़तील शिफ़ाई, परवीन शाकिर, फ़रहत शहज़ाद और खातिर आदि के नाम प्रमुख हैं। हसन की बेजोड़ गायकी ने ग़ज़ल गायन परंपरा में जो योगदान दिया उसकी मिसाल यह है कि कई ग़ज़ल गायक उनकी गायन शैली से प्रभावित होकर भी प्रसिद्ध हुए और उनके नाम से ग़ज़ल गायकी में हसन घराना सोने के सिक्के की तरह प्रचलित है। हसन से प्रभावित होने वाले मशहूर ग़ज़ल गायकों में जगजीत सिंह, परवेज़ मेंहदी, राजकुमार रिज़वी, हरिहरण, असलम खान आदि प्रमुख हैं।

इसी तरह बेग़म अख़्तर से प्रभावित ग़ज़ल गायकों में नैना देवी, इकबाल बानो, शोभा गुर्टू, रीता गांगुली, नूरजहां, छाया गांगुली आदि के नाम प्रमुख हैं। इसके अलावा एक ऐसी धारा के कुछ गायक भी अपना नाम स्थापित करने में कामयाब हुए जो ग़ज़ल गायकी की किसी खास शैली से प्रभावित नहीं रहे लेकिन उनकी गायकी में हर शैली की छाप कहीं न कहीं कमोबेश दिखती है। ऐसे गायक अपने अलहदा और ख़ास अंदाज़ की वजह से मक़बूल हुए लेकिन जिस तरह ग़ालिब ने मीर का ऐहतराम किया, उसी तरह ये गायक भी अपने पूर्ववर्ती हसन, बेगम अख़्तर, मलिका पुखराज और उनसे पहले के गायकों का प्रभाव खुद पर स्वीकार करते रहे। इस धारा के गायकों में सबसे बड़ा नाम गुलाम अली का है जिनके भारत और पाकिस्तान में अनेक मुरीद हैं। फ़रीदा खानम, पंकज उधास, अनूप जलोटा और मोहम्मद हुसैन-अहमद हुसैन आदि कुछ ऐसे नाम हैं जिन्हें इसी धारा के अंतर्गत प्रमुख ग़ज़ल गायक तस्लीम किया जा सकता है।

पिछले दिनों मेंहदी हसन, जगजीत सिंह के निधन के बाद ग़ज़ल के गलियारों में एक सन्नाटा पसरा रहा। ग़ज़ल के भविष्य को लेकर आए-दिन कलाजगत में चर्चाएं होती हैं। ग़ज़ल गायन के आने वाले कल को लेकर एक संशय की स्थिति बनी हुई है। इसका एक कारण तो यह है कि ग़ज़ल के प्रति गायकों का रुझान कम हो रहा है क्योंकि इसे व्यावसायिकता की दृष्टि से एक विशिष्ट वर्ग की वस्तु मान लिया गया है। और, बड़ा कारण यह है कि इस समय में ग़ज़ल और खासकर उस खास ज़ुबान, जो ग़ज़ल के लिए मुफ़ीद मानी जा सकती है, को सामाजिक जीवन में बहिष्कार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। जब ग़ज़ल सुनने, समझने और चाहने वालों के वर्ग को समाप्त कर दिया जाएगा तो ग़ज़ल गाने वाले वर्ग का महदूद होते जाना स्वाभाविक ही है। फ़िलहाल पाकिस्तान में यह स्थिति कम ख़तरनाक दिख रही है, लेकिन भौतिकवादिता की जड़ें और अंग्रेज़ियत का भूत वहां भी पनपने लगा है। भारत में यह चिंता का विषय है।

शायरी में इज़ाफ़त तो दूर, फ़िक्रो-तसव्वुर का खूबसूरती और मानीखेज़ तरीके से दिखायी देना दुर्लभ होता जा रहा है। शायरी की बदहाली का आलम यह है कि शायरों के घरों में उनकी क़द्र नहीं होती और खुद शायर अपने बच्चों को यह समझा पाने में दिलचस्पी नहीं रखते कि वे एक कला के साधक हैं और वे जो हैं, वह सम्मानजनक है। ग़ज़ल की शायरी और गायकी को एक धरोहर मानकर उसे सहेजे जाने की ज़रूरत है और यह तभी संभव है कि जब शिक्षा और परिवारों के परिवेश में संस्कारों और अपनी निजी संस्कृति से आने वाली पीढ़ियों को परिचित कराया जाये और जोड़ा जाये।

शायरी

शायरों से जुड़े कुछ रोचक प्रसंग


शायरी की दुनिया में बहुत से दिलचस्प वाक़यात हैं कुछ सुने, कुछ कम सुने और कुछ अनसुने भी। ख़ुसरो से लेकर दिलशाद तक शायरों की ज़िंदगी में ऐसे कुछ प्रसंग हैं जिन्हें पढ़कर लुत्फ़ भी आता है तो कभी कुछ सबक़ भी मिल जाते हैं। कुछ चुनिंदा टुकड़े यहां


दिलचस्प 1: मीर को अपनी ही कौम की एक लड़की से इश्क़ था जिसके लिए उन्होंने पारिवारिक और सामाजिक बंधनों को तोड़ा भी लेकिन अंततः मायूसी हाथ लगी। मीर के इश्क़ का उत्कर्ष यह था कि सारी ज़िंदगी उन्होंने उसी लड़की की चाहत में काटी, इसलिए उनकी शायरी में इश्क़ की पाकीज़गी और इंतिहाई दर्द के कलाम अक्सर मिलते हैं।

दिलचस्प 2: नज़ीर फ़कीराना मिज़ाज के शायर थे। आगरा में जाटों के हमले में उनका घरबार और तमाम मालो-ज़र लुट गया। लूट के शिकार नज़ीर की खबर जब आम हुई तब नवाब वाजिद अली शाह ने आपको बहुत सा धन भिजवाकर लखनऊ बुलवाया लेकिन फ़कीरी का आलम यह था कि नज़ीर ने वह धन लौटा दिया और लखनऊ नहीं गये। हालांकि वह धन की कीमत ख़ूब समझते थे सो धन की महिमा गाती एक नज़्म ज़रूर लिख दी जिसमें दौलतमंदों पर करारे तन्ज़ किये गये।

दिलचस्प 3: ग़ालिब से जुड़े कई दिलचस्प किस्से हैं। इनमें से एक काफी मशहूर है। ग़ालिब अपनी हाज़िरजवाबी के लिए भी जाने जाते थे। वह आम खाने-खिलाने का शौक़ रखते थे। एक मौसम में ढेर सारे आम रखकर एक नुक्कड़ पर यारों-दोस्तों के साथ वह आम खा रहे थे और सभी आम के छिलके गली में ही फेंकते जा रहे थे। तभी एक कुम्हार अपने गधे को लेकर उस गली से गुज़रा। गधे आम के छिलकों और गुठलियों को सूंघा और मुंह फेर लिया, तभी ग़ालिब के एक साथी ने चुटकी ली कि "देखा मिर्ज़ा नौशा आम तो गधे भी नहीं खाते", इस पर ग़ालिब ने तुरंत जवाब दिया "मियां जो गधे होते हैं, वो आम नहीं खाते"।

दिलचस्प 4: मजाज़ लखनवी आज़ादी के बाद के युग में मशहूर होने वाले शायर थे। बाकमाल शायरी के साथ उनके कुछ शौक भी काफी चर्चित रहे जैसे आशिकमिज़ाजी और शराबनोशी। वह बेतहाशा शराब पीने के लिए बदनाम भी थे। एक दफ़ा उनके एक दोस्त ने सलाह दी कि शराब पीने का एक उसूल बनाओ, सामने घड़ी रखा करो और तय वक़्त तक ही शराब पिया करो। इससे कई मुश्किलें हल हो जाएंगी। जवाब में मजाज़ ने कहा कि मेरा बस चले तो घड़ी नहीं घड़ा रखकर पिया करूं।

दिलचस्प 5: एक मुशायरे का किस्सा है। मंच पर शायरों में अनकही प्रतिद्वंद्विता चलती थी। एक शायर ने शेर पढ़ा "ख़त कबूतर किस तरह ले जाये बामे-यार पर/पर कतरने जब लगी हों कैंचियां दीवार पर"। कुछ देर बाद दूसरे शायर ने जवाबी शेर पढ़ा - "ख़त कबूतर इस तरह ले जाये बामे-यार पर/ख़त का मजमूं हो परों पर पर कटे दीवार पर"।

दिलचस्प 6: ऐसा ही एक किस्सा 19वीं सदी के एक मुशायरे का है। तब मजलिसों में हिंदू-मुसलमान शायरों के बीच रंजिश सी पला करती थी। मुसलमान शायर हिंदू शायरों का मखौल उड़ाया करते थे। एक दफ़ा मुशायरे में एक वरिष्ठ हिंदू शायर को नीचा दिखाने के लिए मिसरा उछाला गया- "हैं वो क़ाफ़िर जो नहीं क़ायल हुए इस्लाम के’ और इस पर शेर बांधने की शर्त रखी गयी। तब क्या ख़ूबी से उस शायर ने बाज़ी पलट दी। ग़ौर से देखिये - "लाम की मानिंद हैं गेसू मेरे घनश्याम के/हैं वो क़ाफ़िर जो नहीं क़ायल हुए इस लाम के"।

शुक्रवार, अक्टूबर 27, 2017

आलेख

आदिशक्ति के अस्तित्व पर पौरुष का संकट


यह आलेख वर्ष 2003 में महिला उत्पीड़न से जुड़ी एक खबर के बाद एक समाचार पत्र के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशन हेतु लिखा गया था। हालांकि इस आलेख में कुछ संशोधन किये गये हैं लेकिन घटनाओं का उल्लेख 2003 के अनुसार ही रखा गया है।


शक्ति और रोशनी का रिश्ता कई परतों का है। जब शक्ति से अंधेरों का सीना चीरकर रोशनी की तरफ बढ़ा जाता है और रोशनी की हिफ़ाज़त की जाती है तब शक्ति हितकारी होती है। वैयक्तिक स्तर से वैश्विक स्तर तक। जब उसी शक्ति से रोशनी पर काबिज़ हो जाया जाता है और रोशनी का व्यापार किया जाता है, तब रोशनी की शक्ति काम करती है। रोशनी ख़ुद शक्ति बन जाती है और मनुष्य की शक्ति को अंधेरों की अतल गहराई में डुबो देती है। रोशनी का स्वभाव ही फैलना है, क़ैद उसे किया नहीं जा सकता। भलाई इसी में है कि इस प्रकार का प्रयास किया न जाये। ये तथ्य शायद वैदिक काल या उससे पहले ही समझ लिये गये होंगे अन्यथा शक्ति को न तो दैवीयता मिलती, न ही उसकी आराधना की परंपरा चलती। सूर्य-चन्द्र भी देव माने गये और प्रकाश के विभिन्न पुंजों का महत्व भी रूपायित किया गया।

भारतीय सभ्यता और हिंदू संस्कृति-धर्म में शक्ति एक देवी की तरह पूजी गयी। अर्थात् उसका स्वरूप स्त्री के रूप में ग्रहण किया गया। सनातन काल में स्त्री को श्रद्धा तथा उन्नत गुणों से सम्पृक्त निष्ठा का भोग लगाया गया। उसे भाग्यलक्ष्मी, कुलवधू, स्वामिनी, राजमाता और गुरुमाता आदि सम्मानजनक सम्बोधन दिये गये। धीरे-धीरे युग बदलते चले और आदिशक्ति पर आदिब्रह्म किसी प्रकार हावी होता चला गया। आदिब्रह्म का युग चल पड़ा और उसकी पीढ़ियां पैदा होने लगीं। पहले ब्रह्मा, विष्णु, महेश फिर गणेश, राम, कृष्ण आदि नाना रूपों में उसकी लीलाएं निरन्तर चलायमान रहीं। इस समय शक्ति सुषुप्तावस्था में थी या किसी तपस्या में लीन... या कहीं और... लेकिन वह लुप्तप्राय होने लगी। एक मज़ेदार प्रश्न यह है कि आदिब्रह्म और आदिशक्ति में सम्बन्ध क्या था, पिता-पुत्री, माता-पुत्र या पति-पत्नि? चूंकि, शक्ति तो आदि थी इसलिए उनके पिता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसके लिए एक कथा का सहारा लिया जाता है, मनु और श्रद्धा की कथा।

आदिब्रह्म और आदिशक्ति को पति-पत्नि इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि मनु तो श्रद्धा क्या इड़ा के आगे भी असहाय रहे। मनु और श्रद्धा का एक पुत्र था मानस, जिसकी पूर्ण व्याख्या नहीं मिलती। हो सकता है कि यही मानस खुराफ़ाती निकला हो और आदिब्रह्म के वेश में प्रकट हो गया हो। शैशवावस्था में इस मानस ने परम्पराएं गढ़ीं, फिर किशोरावस्था में इन प्रथाओं का पोषण शुरू किया तथा युवावस्था या कलियुग तक आते-आते मानस मनुष्य इतना अधम हो गया कि लाचारों पर बलारोपण करने को अपना पौरुष कहने गला और अधमता की इस सीमा में वह पुरुष कहाया। तो, कलियुग की शब्दावली में आदिब्रह्म-पुरुष और आदिशक्ति-स्त्री कहलाये।

निर्लज्जता की पराकाष्ठा यह कि पुरुष शोषक की भांति स्त्री को शोष रहा है, भोग रहा है और बातें वैदिक युग करने से चूक भी नहीं रहा। तोते की तरह अनवरत रटता-रटाता जा रहा है कि "यत्र नारयस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"। हालांकि अति व्यापक पुरुष समुदाय का एक अंश कुछ समय से इन कुप्रथाओं के विरोध में खड़ा हुआ है और सुधारवादी तथा नितान्त सात्विक दृष्टिकोणों के माध्यम से स्त्री को प्रतिष्ठित करने में जुट गया है।

लेकिन इस अंश की असफलता आज भी सिद्ध करती है कि व्यापक पुरुष की प्रवृत्ति स्थूलाकार है। वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में कुछ दिनों तक यह अंशमात्र प्रभावी भूमिका में रहता है लेकिन "सौ सुनार की एक लोहार की" को साबित करता हुआ स्थूल, अपनी एक चोट से यह जता देता है कि "कुत्ते की पूंछ कभी सीधी हो नहीं सकती"

अभी सुनने में आया कि किसी सर्वेक्षण के अनुसार भारत में एक दिन में लगभग 15 लाख स्त्रियां, पुरुषों द्वारा गंभीर रूप से प्रताड़ित की जाती हैं। यों, प्रताड़ना का आंकड़ा कुल जनसंख्या का अस्सी से नब्बे प्रतिशत का है। सती प्रथा का जोर अपेक्षाकृत कम हुआ है, दहेज के विरुद्ध समाज चैतन्य हुआ है, स्त्री की अशिक्षा का रवैया शिथिल हुआ है, स्त्री आत्मनिर्भरता की जागरूकता आयी है... कितने सार्थक वाक्य हैं ना..? आंकड़ा पिछले वर्ष यदि नब्बे प्रतिशत का था और इस वर्ष घटकर अस्सी प्रतिशत पर आ गया तो उपरोक्त निष्कर्ष निकाल लिया गया। प्रश्न यह है कि ऐसी चेतना किस काम की जो केवल दस प्रतिशत पर ही दम तोड़ देती है?

इन्हीं सब अच्छी बातों के बीच देखने में आता है - तंदूर कांड, पटना-तमोली कांड, शिवानी हत्याकांड, मुरैना का बादामी बलात्कार कांड तथा मधुमिता हत्याकांड और स्विस राजनयिक के साथ बलात्कार। कचनोंधा में बादामी पर बलात्कार किया गया और उसके द्वारा पुलिस कार्यवाही करने पर उसे ज़िन्दा जला दिया गया। शोषित-पीड़ित यदि ज़ुल्म के विरुद्ध आवाज़ उठाये, न्याय मांगे तो ज़िन्दा जला दिया जाये और कभी पुरुष अथवा शक्तिशाली आदिब्रह्म के मनचाहे शोषण का शिकार बने। जो बादामी के साथ हुआ, स्विस महिला के साथ हुआ, वह चुनौती है हर स्त्री के लिए और कलंक है पौरुष पर।

महिला दिवस हर वर्ष मनाया जाता है, महिलाएं जुटती हैं और उत्थान की बातें करती हैं। कल्पना चावला जैसी स्त्रियों पर गर्व कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। सब झूठ लगता है, अभिनय, औपचारिकता। खामोश रहना अच्छा है लेकिन ज़ुल्म के खिलाफ जुर्म है। समय-समय पर होने वाली बादामी की मौत मजबूर करती है, पौरुषता पर लज्जित होने को। लेकिन स्त्रियों का भी कर्तव्य बनता है कि वे इरादा करें, आदिशक्ति बनने का। जान लें कि राम को भी शक्ति-पूजा करना पड़ी थी।

स्त्रियों को यह भी जान लेना चाहिए कि यह भी एक छद्मोक्ति ही है कि अस्तित्व का सिद्धांत पश्चिम से आया। यह गीता है। स्त्री के अस्तित्व के लिए लड़ाई का समय है और स्त्री को अपना गौरव वापस हासिल करने के लिए दृढ़ संकल्पित होना ही पड़ेगा।

सिनेमा

शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद..!


श्री तपेश सक्सेना लिखित यह फिल्म समीक्षा केतन मेहता निर्देशित फिल्म मांझी पर एक बेहतरीन वक्तव्य है। तपेश की यह समीक्षा फिल्म के कलात्मक पहलुओं पर साहित्यिक दृष्टिाकेण से संवाद करती है। आकार में हालांकि मध्यम है लेकिन यह समीक्षा भरपूर ढंग से अपनी बात कहती है और फिल्म के कई ज़रूरी आयामों का स्पर्श करती है। यह समीक्षा साहित्यिक पत्रिका साहित्य सागर में प्रकाशित हो चुकी है। पुनर्पाठ के लिहाज़ से यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।


Manjhi poster. image source: Google


सच्चे प्रेम का आध्यात्मिक नशा आदमी को परमार्थी बना ही देता है। और अगर उसमें वेदना के दो चार घूँट और मिल जाएँ तो फिर तो कमाल ही हो जाता है। 'मांझी' ऐसे ही एक कमाल की कहानी है। ये भारतीय सिनेमा में अब तक की सबसे ज़्यादा सार्थक "बायो-पिक" (किसी के जीवन की सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म) है। भारतीय सिनेमा ने एक दौर वो भी देखा है जब गुलज़ार कहते थे कि 'दीवार में कब कोई दर होगा' और शहरयार कहते थे 'सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है' और अब ये दौर है कि सीने की जलन और आँखों के तूफ़ान ने मिलकर दीवार में दर बना ही डाला। 

'मांझी' को भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई तरह से याद किया जाएगा। ये फिल्म उस दौर में आई है जबकि हम में से अधिकतर लोग अच्छी शिक्षा पा सकना, खूब सारा पैसा कमा पाना, विदेशों में सैर कर पाना, नाम कमा पाना, आदि को ही अपने जीवन का लक्ष्य समझते है। 'मांझी' उस सोच के साँचे को बदलने की एक शानदार कोशिश है। 'मांझी' वेदना में पनपती संवेदना की आवाज़ को ध्यान से सुनना सिखाती है। 'मांझी' एक नए आयाम का निर्माण करती है जो व्यक्तिगत प्रेम और वेदना को समाज और देश के लिए एक सुखदाई अनुभव बना देता है।

एक फिल्म के लिहाज़ से 'मांझी' में कुछ कमियां नज़र आती तो हैं जैसे कि इसके गीतों में कहानी की आत्मा की झलक का न मिल पाना, जैसे कि कुछ दृश्यों का आपकी भूख को बढ़ा देना लेकिन फिर आगे के दृश्यों का उस बढ़ी हुई भूख को संतुष्ट न कर पाना, आदि। पर इन सब कमियों के लिए 'मांझी' को माफ़ किया जा सकता है क्यूंकि ये कमियां इस दौर की कमियां हैं, शायद ये दौर इन कमियों के लिए ही सबसे ज़्यादा याद किया जाएगा। अभिनेता के तौर पर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी निसंशय अपने सबसे अच्छे समय से गुज़र रहे है। आज के समय में वो अकेले ऐसे अभिनेता हैं जिनके मुंह से "शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद" सुनकर अच्छा लगता है क्यूंकि इन तीन शब्दों तक पहुँचने का उनका सफर जिस मार्ग से होकर गुज़रता है वो दशरथ मांझी की तरह ही उनका खुद का बनाया हुआ मार्ग है, वहाँ पर भी परिवारवाद नाम का एक बहुत ऊंचा पर्वत था जिसको उन्होंने बखूबी काटा है।

गुरुवार, अक्टूबर 26, 2017

एक फ़नक़ार

तोरू दत्त : भारत की जॉन कीट्स


साहित्य सागर पत्रिका के जून 2003 अंक में प्रकाशित यह लेख अंग्रेज़ी की भारतीय कवयित्री तोरू दत्त के जीवन और कृतित्व की संक्षिप्त झांकी प्रस्तुत करता है। वास्तव में तोरू का अवदान उल्लेखनीय रहा है और इसे समझने की ज़रूरत बनी हुई है।


एडमण्ड गूज़ ने उसकी किताब के बारे में टिपपणी करते हुए कहा है कि "समग्र उपलब्धि के रूप में यह किताब आश्चर्यचकित कर देती है"। उनका यह कथन नितांत उचित ही है।

Toru Dutt and the famous book cover. image source : Google


वास्तव में तोरू ने कम नहीं लिखा तथा श्रेयस्कर भी लिखा। उसकी लेखनी पर उसके जीवन का प्रभाव स्वतः स्पष्ट है। जिस तरह कोई पक्षी तालाब के जिस घाट पर होता है, वहीं के पानी से अपनी प्यास को शांत करता है। और प्यास को बुझा लेने के बाद सांझ होते अपने नीड़ को लौटने की चेष्टा करता है।

अब मात्र तीन ही साल बचे थे कि तोरू यूरोप, फ्रांस एवं कैम्ब्रिज में रहकर, पढ़-लिख कर वापस भारत आ गयी। अठारह वर्ष की आयु में उसका पहला निबन्ध सन् 1874 में बंगाल पत्रिका में प्रकाशित हुआ। तोरू ने फ्रेंच कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया और पुस्तक "ए शीफ ग्लेंड इन फ्रेंच फील्ड्स" के नाम से सन् 1876 में प्रकाशित हुई। इन 165 कविताओं में से 8 कविताओं का अनुवाद उसकी बड़ी बहन अरु ने किया था जिसकी मृत्यु सन् 1874 में हो चुकी थी। सी पॉल वर्गीज़ ने तोरू को दोनों भाषाओं में निपुण बताया। वहीं, एडमण्ड गूज़ ने भी इस किताब की अत्यधिक सराहना की। विंसेंट अरनॉल्ड की "द लीफ" कविता के अनुवाद में जहां तोरू ने भावनाओं और संवेगों को सार्थक और सरल रूप में अनूदित किया वहीं विक्टर ह्यूगो की कविता "द रोज़ ढंड द टूंब" भी एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

1877 में ज्वर, कफ़ आदि के प्रकोप के कारण तोरू का स्वास्थ्य तेज़ी से बिगड़ने लगा और 30 अगस्त 1877 को मात्र 21 वर्ष की आयु में कवयित्री अपने पीछे अपना अमूल्य साहित्यिक अवदान छोड़कर चली गयी। विभिन्न देशों, नगरों का भ्रमण, वहां शिक्षा, जीवन-यापन तथा बड़े भाई अब्जू और बड़ी बहन अरु की असामयिक मृत्यु को अपने छोटे से जीवन में देखना तोरू के स्पर्शी अनुभव थे। इन्हीं का प्रभाव उसकी कविताओं में दिखता है।

1882 में मेसर्स कीगन पॉल एंड कॉरपोरेशन, लंदन द्वारा "एन्शिएंट बैलेड्स एंड लीजेंड्स ऑफ हिन्दोस्तान" का प्रकाशन किया गया जिसकी भूमिका एडमण्ड गूज़ ने लिखी। अपने जीवन के अंतिम दिनों में तोरू ने संस्कृत का अध्ययन किया था तथा भारतीय संस्कृत साहित्य महाभारत, रामायण, विष्णु पुराण एवं श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ा था। अपने काव्य में तोरू ने भारतीय साहित्य के अमर चरित्रों का वर्णन किया। उपरोक्त संग्रह में तोरू के 9 बैलेड्स् हैं। 1) सावत्रिी 2) लक्ष्मण 3) जोगाध्याय उमा 4) द रॉयल ऐसेटिक एंड दि हिन्द 5) ध्रुव 6. बुत्तू (एकलव्य) 7) सिन्धु (श्रवण कुमार) 8) प्रहलाद और 9. सीता। इनके अतिरिक्त दो और वर्स विशेष उल्लेखनीय हैं - "दि लोटस" एवं "अवर कैज़ुरिआना ट्री"। इन बैलेड्स एवं वर्स ने तोरू दत्त को अमरता प्रदान कर दी है। इनमें तोरू की भारतीयता के संस्कार उद्घाटित होते हैं। अंग्रेज़ी आलोचकों ने माना है कि "अवर कैज़ुरिआना ट्री" अंग्रेज़ी साहित्य में किसी विदेशी द्वारा लिखी गयी सर्वाधिक उल्लेखनीय कविताओं में से एक है।

जीवन ने साथ नहीं दिया अन्यथा तोरू की योजना थी कि वह "ए शीफ ग्लीण्ड" को "संस्कृत फील्ड्स" के साथ संबद्ध करे। कलकत्ता में जन्मी इस 21 वर्षीया कवयित्री ने जो साहित्यिक उपलब्धियां अर्जित की हैं, जिन्हें विदेशी आलोचकों ने तहेदिल से सराहा है, उन पर हर भारतीय गर्व कर सकता है। साथ ही, अब तक हिन्दी में इन उत्कृष्ट कविताओं का न तो कोई प्रामाणिक अनुवाद ही किया गया है, न तोरू के अमूल्य अवदान को रेखांकित किया गया है। भाषा भले ही दूसरी हो, लेकिन तोरू की अनुभूति में भारतीयता के ऐसे चित्र हैं जो हिन्दी साहित्य में भी दुर्लभ हैं। तोरू की धरातलीय चेतना उसके साहित्य को भारतीय साहित्य की श्रेणी में खड़ा करती है, न कि हिन्दी या अंग्रेज़ी या अन्य साहित्य की।

एक फ़नक़ार

भीष्म साहनी के न रहने के मायने


अनेक प्रसिद्ध कहानियों के साथ ही नाटक और सिनेमा के माध्यम से भीष्म साहनी को याद रखा जा सकता है। भीष्म साहनी के व्यक्तित्व और कृतित्व के कई आयाम हैं जिन पर कई पुस्तकों का सृजन संभव है। यहां प्रस्तुत संक्षप्त आलेख उनके दुनिया-ए-फ़ानी से कूच करने के ऐन बाद श्रद्धांजलि स्वरूप लिखा गया था, जो साहित्य सागर पत्रिका के अगस्त 2003 अंक में प्रकाशित हुआ था।


यों तो साहित्य की भी एक दुनिया है। दुनिया की फितरत होती है कि वह किसी के चले जाने से रुक नहीं जाती। बिल्कुल ज़िंदगी की ही तरह। कई लोग इस दुनिया की रिदा पर अपना कोई निशान छोड़े बिना ही रुख़सत हो जाते हैं। चन्द ही लोग होते हैं जिनके रहने के मायनों पर उनके जाने के मायने हावी रहते हैं। जो वक़्त के सांचे बदल दें, वक़्त भी उनका पैकर धुंधला नहीं होने देता। वक़्त की रफ़्तार से रफ़्तार मिलाकर उसे एक नया रूप देने वाले भीष्म की स्कृति के आकारों को मिटा सकने की ताब वक़्त में भी नहीं है।

Bhisham Sahni. image source : Google


भीष्म की रचनाएं उनकी सोच, नज़रिये, सवेदन, मानस और बेशक उनके वक़्त को साफ़-साफ़ बयान करती हैं। शेष तो अन्य साहित्यकारों में भी पर्याप्त होने के साथ-साथ सौम्य रूप में मिल जाता है। लेकिन मानस और वक़्त का रूपांकन ही भीष्म को एक अलग कैनवास और दर्जा दिलाता है। ख़ुद भीष्म ने भी कहा था -

"लेखक सत्यान्वेषी है, सच्चाई की खोज करने वाला.... सत्य की खोज न कहें तो प्रामाणिकता की खोज कह लें, बात करीब-करीब एक ही है। हमारी जो रचना हमारे काल की सच्चाई को पकड़ पाती है, वह रचना सार्थक हो जाती है और यदि कोई लेखक बार-बार अपनी रचना में संशोधन करता है तो इसमें भी उसका मूल अभिप्राय उस सच्चाई को अधिक स्पष्टता के साथ लक्षित कर पाना ही है।"

और, भीष्म के वक़्त की सच्चाइयां एक और मार्मिक, दारुण, दर्दनाक और भयावह थीं तो दूसरी ओर, मूल्यपरक, कलात्मक और रचनात्मक सौम्यता से युक्त। दरअस्ल, भीष्म के लेखक का दर्द उस वक़्त को बेधते हुए गुज़रता नहीं है, बल्कि उसके मायाजाल या उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाता रहता है, हां उनका लेखक इस ताने-बाने में घुटकर नहीं रह जाना चाहता। यह दर्द वही था जो "तमस" से पहले यशपाल के "झूठा सच" में अंतस तक बेध गया और "तमस" के बाद मोहन राकेश, रांगेय राघव और गुलज़ार के ज़रीये बार-बार अपना एहसास कराता रहा।

भीष्म अपने वक़्त की चेतना के कथाकार थे और उनके उपन्यासों व अन्य रचनाओं में भी उनकी समसामयिक संवेदना निरन्तर रहती है। भीष्म के लेखक का मुख्य संघर्ष अपने समय और सोच के बीच है। वह समय की नब्ज़ जांचता है और इलाज करने की बजाय उसकी तक़लीफ़ को समझना और उसकी वज्ह को खोजना चाहता है। यहीं भीष्म के लेखक का वजूद असर दिखाता है। न सिर्फ़ पात्र जीवंत लगने लगते हैं, बल्कि उनके हालात, दायरे, प्रतिक्रियाएं और द्वंद्व भी बेमानी नहीं लगते।

इसी द्वंद्व व सच्चाई को वैचारिक धरातल पर कलात्मक रूप में प्रस्तुति देने वाले वक़्त के अनोखे फ़नक़ार भीष्म साहनी की यादें साहित्य की दुनिया में ही क़ैद नहीं रह जाएंगी, वरन् इंसान की हदों के स्पर्श तक पहुंच सकेंगी।