मंगलवार, अक्टूबर 24, 2017

कला

भारतीय व पश्चिमी रंगमंच में कामदी व त्रासदी की अवधारणा


वास्तव में यह आलेख उस प्रश्न या विमर्श का नतीजा है जो रंगमंच से जुड़ाव के कारण सामने आया। "प्राचीन भारतीय नाट्य परंपरा में दुखांत नाटकों की संख्या लगभग न के बराबर है जबकि पश्चिम में स्थिति ठीक उलट, क्यों?" यह विमर्श रंगमंच के साथ ही साहित्य के पाठकों के लिए भी उपयोगी हो सकता है।


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प्राचीन भारतीय साहित्य के उल्लेख से प्रारंभ करने पर सर्वप्रथम हम संस्कृत काव्य का संस्पर्श करते हैं। श्रुति परंपरा के आदि ग्रंथों में वेद, भारतीय ही नहीं बल्कि वैश्विक धरोहर माने जाते हैं। इन ग्रंथों के माध्यम से हम जीवन, विश्व एवं ब्रह्म आदि संबंधी तत्व एवं दर्शन ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। तदुपरान्त, संस्कृत का भक्ति अथवा धार्मिक काव्य प्रस्तुत होता है। "रामायण" इस श्रेणी का महानतम ग्रंथ है। फिर, "महाभारत" एक और चमत्कार है। ये ग्रंथ विश्व साहित्य के अग्रणी ग्रंथ माने जाते हैं। दोनों की संक्षिप्त चर्चा आवश्यक है।

राम की कथा है रामायण। लंका विजय एवं रावण वध के बाद राम की अयोध्या वापसी, यह सुखांत है। किन्तु, उत्तर रामायण में सीता का धरती में समाना एवं राम का पुनर्गमन एकबारगी दुखांत का भ्रम देता है। ऐसा ही महाभारत में होता है। कौरवों पर पांडवों की विजय के बाद भीष्म की मृत्यु एवं पांडवों की वानप्रस्थ यात्रा के समय मृत्यु, वास्तव में किसी दुखांत के संकेत देते हैं। परन्तु ऐसा है नहीं। एक तो, दोनों ही कथाएं संपूर्ण जीवन चरित्र के रूप में व्याख्यायित हैं इसलिए मृत्यु पर ही समाप्त होंगी, स्वाभाविक है। दूसरा कारण यह कि दोनों ही काव्य ईश्वर एवं जीवन दर्शन संबंधी ज्ञान को प्रतिक्षण केंद्र में रखकर चलते हैं इसलिए हर त्रासद कथा प्रसंग का कोई न कोई प्रतीक, बोध एवं संकेत अवश्य अंतर्निहित है।

इन दो महाकथाओं के अंशों अथवा पूरी कथा के नाटकीय मंचन की परंपरा से ही प्राचीन भारत के आरंभिक रंगमंच की प्रथम परिकल्पना मानी जा सकती है। क्योंकि ये कथाएं लोक में समग्रता के साथ व्याप्त हुईं, इनमें भी रामक कथा अधिक और महाभारत के कृष्ण कथा के भाग। तो, रंगमंच या नाट्य में, संभवतः इन कथाओं के लीला प्रसंग ही प्रमुखता से मंचित हुए, अर्थात् सुखान्त की परिकल्पना। रामलीला एवं कृष्णलीला, सामान्यतया रावण वध एवं कंस वध के साथ ही समाप्त मानी जाती थीं।

अर्थात प्राचीन भारत में लोकमानस में नाट्य का सुखांत होना एक तरह से स्थापित हो चुका था, ऐसा कहा जा सकता है। फिर, काव्य के बाद संस्कृत नाटकों का प्रणयन हुआ। वर्जीनिया सौंडर्स लिखित आलेख का अंश - 
"We know that at least as early as Kalidas, the strict rules, whether written or traditional, barring tragedy from the Hindu stage, were firmly established and closely observed."

प्राचीन भारत में, नाट्य के संदर्भ में, पारंपरिक अथवा लोक दृष्टि ने कुछ नियम बना दिये थे जिनका पालन परवर्ती नाटककारों ने गंभीरता के साथ किया। ये नियम संभवतः लोक में प्रतिष्ठित होने के बाद ही लिखित रूप में प्रस्तुत हुए। भरतमुनि ने नाट्य शास्त्र में संभवतः प्रथम बार उल्लेख किया कि नाट्य का उद्देश्य लोक मंगल एवं लोक रंजन है। लोक मंगल हेतु आवश्यक है कि नाट्य सकारात्मक उर्जा को किसी लोकोपयोगी संदेश एवं प्रयोजन के साथ प्रकाशित करे।

भरतमुनि ने नाट्य शास्त्र में यह उल्लेख भी किया कि नाट्य मंचन के समय युद्ध, म्त्यु, त्रासदी एवं शव संबंधी क्रियाओं के साथ ही वीभत्स दृश्यों का प्रस्तुतिकरण अश्रेयस्कर है। इस नियम का प्रभाव स्पष्ट रूप से संस्कृत नाट्य लेखन परंपरा में दिखता है। इस नियम के कारण के बारे में चर्चा आवश्यक है जो यह भी स्पष्ट करती है कि ग्रीक नाट्य परंपरा में त्रासदी अथवा दुखांत परंपरा से भारतीय नाट्य परंपरा के उलट या पृथक होने का क्या कारण है।

शास्त्रीय संस्कृत नाट्य पर आधारित आलेख में प्रो. सिद्धार्थ सावंत संकेत करते हैं कि पाश्चात्य की त्रासद परंपरा एवं भारतीय सुखांत परंपरा के मूल कारण में दार्शनिक परंपरा महत्वपूर्ण है। चूंकि भारतीय दर्शन परंपरा में "कर्म" के सिद्धांत को बल मिलता है जबकि पाश्चात्य दर्शन "नियति" पर आधारित दिखता है। इसे मूलभूत अंतर माना जा सकता है। गीता में कर्म आधारित दर्शन पर विस्तृत विमर्श है और यह सिद्धांत प्रस्फुटित होता है कि मनुष्य की नियति वास्तव में उसके कर्मों से ही निर्धारित होती है। "जैसा कर्म वैसी गति"। अस्तु, त्रासदान्त होने की संभावना क्षीण हो जाती है क्यांकि जब दर्शक या श्रोता यह जानता है कि रावण का कर्म पतनोन्मुखी है, तो वह उसके पतन को त्रासद नहीं मानता बल्कि उसे स्वाभाविक गति स्वीकार करता है।

इस विमर्श का दूसरा सिरा यह है कि पश्चिम में दर्शन एवं चिंतन की धारा में मृत्यु का भय व्याप्त हो चुका था। तब भी यह एक ऐसी अवस्था या घटना थी जिस पर मानव का कोई वश नहीं था और न आज तक पूर्णतः हो सका है। यह ईश्वरीय प्रकोप की तरह समझा गया। यह मानव की शक्ति पर वज्राघात के समान माना गया। मानव की सत्ता को क्षण में समाप्त कर देने के संकेत रूप में विश्लेषित किया गया। यह भय पश्चिम की अनेक कलाओं में अनेक संकेतों एवं प्रतीकों के माध्यम से प्रकट हुआ। अस्तु, नाट्य परंपरा में दुखांत का एक कारण भी बना।

अंग्रेज़ी के मशहूर लेखक ऑल्डस हक्स्ले ने "एपिक एंड दि होल ट्रुथ" (Epic And The Whole Truth) में इस विषय पर सूत्र रूप में विशद विमर्श किया है। इसी संबंध में, निर्मल वर्मा लिखित निबंध "पूर्व और पश्चिम" से कुछ बिंदुओं को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है। वास्तव में, निर्मल वर्मा का यह निबंध हक्स्ले द्वारा भारतीय साहित्य के संबंध में रखे गये प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं के उत्तर रूप में प्रकाश में आता है। पश्चिमी एवं भारतीय साहित्य की मूल प्रवृत्तियों के आधार पर इस लेख में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को इंगित किया गया है जिनमें से यहां कुछ उपयोगी अंश प्रस्तुत हैं -

"पश्चिमी महाकाव्य में एक तरह की ठंडी वस्तुपरकता है, जहां खून में सने सैनिकों के शव उसी तरह धूल में लोटते हैं, जैसे किसी भीषण आंधी में पेड़ों के धड़ गिरते हैं। भारतीय महाकाव्य में भी युद्ध की भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं है, किंतु वहां कुरुक्षेत्र सिर्फ लड़ाई का मैदान नहीं है, वह धर्मक्षेत्र भी है, नीति और न्याय के परिप्रेक्ष्य में ही महाभारत अपनी काव्यात्मक गरिमा अर्जित करता है।"
"भारतीय परंपरा में मनुष्य का 'आत्म' उसके अहं (Ego) की तुलना में बृहत्तर है, जो अपने को जीव-जगत की समस्त सत्तओं से अंतर्संबंधित पाता है। ....पश्चिमी साहित्य में 'ट्रेजडी' जैसी सशक्त, सांद्र, विस्फोटक विधा का आविर्भाव इसलिए संभव हो सकता क्योंकि वहां मनुष्य और मनुष्य, मनुष्य और प्रकृति, आत्म और अन्य के बीच की खाई अंधेरी और अलंघ्य जान पड़ती है।"
"कहीं ऐसा तो नहीं है कि जिसे मैं 'पश्चिम' कहता हूं, वह कहीं पहले से ही मेरे भारतीय अनुभव संसार के भ्राीतर बर्फ की तरह जमा है, जो यूरोपीय कलाकृति की थोड़ी सी धूप और गरमाई पाते ही पिघल कर हमारे भीतर बहने लगता है, कुछ वैसे ही जैसे पूर्वी संस्कृतियों का अवदान यूरोपीय मानस की परतों को उघाड़कर एक नयी अंतर्दृष्टि देता है।"

अंततः कहा जा सकता है कि भारतीय दर्शन परंपरा भरतमुनि के नाट्य सिद्धांत एवं लोक मंगल की प्रतिष्ठा आदि कारणों से प्राचीन भारत के संस्कृत नाटकों में सुखांत के दर्शन होते हैं, या यों कहें कि पश्चिम जैसी "ट्रैजडी" नहीं मिलती। ऐसा भी नहीं है कि संस्कृत नाटकों में यह ट्रैजडी है ही नहीं, "उरुभंग" एवं "कर्णभार" नामक नाटक ऐसे हैं जिन्हें पश्चिम के समान ट्रैजडी कहा जा सकता है। इस प्रकार के संभवतः यही दो संस्कृत नाटक हैं।

निष्कर्ष यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि हमारे संस्कृत नाटककारों में मानवीय द्वंद्व के आधार पर त्रासदी रचने की प्रतिभा नहीं थी, बल्कि इसका कारण यही था कि जनमानस में स्वस्थ एवं सकारात्मक चेतना का संचार हो। वर्जीनिया सौंडर्स का एक और कथन महत्वपूर्ण है -
... some of the writers of these plays could not have written real tragedies if they had so wished. There is an abundance of evidence to show that these playwrights were keen psychologists, and they were certainly well versed in the making out of cause and effects.

संस्कृत काल के बाद भी भारतीय नाट्य परंपरा में दुखांत या त्रासद नाटकों के प्रति अरुचि का कारण कालखंड के अनुसार समझा जा सकता है। बाद के काल में चूंकि भारत लगातार आक्रमणों का सामना करता रहा इसलिए एक लंबे समय तक राष्ट्रीय चेतना, आत्मगौरव, नायकत्व प्रदान करने के उद्देश्य से नाटकों का सृजन हुआ इसलिए इनमें हम शास्त्रोक्त नायक के दर्शन करते हैं जो "धीर, वीर, गंभीर एवं उदात्त" चारित्रिक गुणों पर आधारित होता है और जनमानस को आंदोलित करने की संभावनाएं तलाशता है।

आधुनिक काल के हिन्दी नाटकों तक, जयशंकर प्रसाद तक, हम इस तरह के नाटकों का पल्लवन होना देखते हैं जो भारतीय परंपरा एवं कला के अनुरूप है। प्रसाद के काव्य में सुखांत एवं दुखांत को लेकर काफी चर्चा होती है और कई आलोचक उनके द्वारा दिये जाने वाले अंत को 'प्रसादांत' मानते हैं। कतिपय उनके नाटकों में भी इसी प्रसादांत के संकेत हैं। इस बारे में भी विस्तृत चर्चा संभव है। प्रसाद के बाद के नाटकों में सुखांत एवं दुखांत या त्रासदी एवं कामदी संबंधी चर्चा में देखा जा सकता है कि प्राचीन भारतीय नाट्य परंपरा एवं सिद्धांत उतनी प्रमुखता एवं सशक्तता के साथ परिलक्षित नहीं होते इसलिए त्रासद या दुखांत नाटकों के सृजन में वृद्धि हो रही है।

सोमवार, अक्टूबर 23, 2017

समालोचना

हिंदी-उर्दू के फ़ासले को मिटातीं रौशन ग़ज़लें


कृति - सुर बांसुरी के
कृतिकार - डॉ. स्वामी श्यामानंद सरस्वती रौशन
समीक्षा लेख - भवेश दिलशाद 


स्वामीजी को उर्दू-हिंदी ज़ुबान पर यक़सां महारत हासिल है। उर्दू, फ़ारसी अरूज़ पर वह पूरी तरह क़ुद्रत रखते हैं इसलिए उर्दू और हिन्दी के चोटी के फ़नकार उनसे तबादिला-ए-ख़यालात कर सकते हैं और हम जैसे उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। इल्मे-अरूज़ से क़त्ए-नज़र उर्दू ज़ुबान और हिंदी ज़ुबान को मादरी दर्जा देने वाले अमली तौर पर ऐसे लोग अगर नायाब नहीं हैं तो बेहद कमयाब हैं। इसलिए उन्हें क़ुद्रत हासिल है कि वह अपनी ग़ज़ल में उर्दू और हिंदी के अलफ़ाज़ की इकाई बड़े और वसीअ पैमाने पर बना सकते हैं। मैं कह सकता हूं कि स्वामीजी के यहां ग़ज़ल को इन सत्हों पर कामयाबी मिली है।

"सुर बांसुरी के", डॉ. श्यामानंद सरस्वती का ग़ज़ल संग्रह है। इस किताब में डॉ. बशीर बद्र के ये अलफ़ाज़ पढ़कर तसल्ली हुई कि हिंदी में कम से कम एक ग़ज़लगो तो है जिसकी ग़ज़ल को इन सत्हों पर कामयाबी मिली है। डॉ. बद्र ने यह भी अर्ज़ किया है कि स्वामीजी की हिंदी ग़ज़लों के इस संग्रह में उर्दू में लिखी गयी ग़ज़ल की आला रिवायात और उस मिज़ाज का निर्वहन होता है। दरअस्ल, ये रिवायात अपनी वुसअत में कई सदियों को समेटे हुए हैं। उस वक़्त उर्दू सिर्फ़ राजकीय काम की भाषा थी जिसे ज़्यादा सम्मान प्राप्त नहीं था। वली ने उर्दू को ग़ज़ल की मेहबूब ज़ुबान का दर्जा दिलाया और वह भी दिल्ली तक। वली के बाद ग़ज़ल की लिसानी तक़रारों को छोड़कर ज्यादातर शायर उर्दू की ओर प्रवृत्त हुए और ग़ज़ल की परंपरा की शुरुआत हुई। 18वीं सदी ने सिराजुद्दीन आरज़ू, मिर्जा मज़हर जानेजानां जैसे शायर पैदा किये। और इसके बाद तारीख़ के तीन बेहतरीन शायरों दर्द, सौदा और मीर का भी दीदार किया। दर्द जहां उर्दू के सबसे ख़ास शायर कहे गये वहीं अपनी ताज़ा तरीन शैली और ख़याल की नज़ाक़त ने मीर को ग़ज़ल का सबसे बड़ा शायर घोषित किया। कई और शायरों के साथ ग़ज़ल को ग़ालिब मिला। और फिर, दाग़, ज़ौक़, ज़फ़र, हाली, जिगर, फ़िराक़ और फ़ैज़ आदि।

वली के पहले से फ़ैज़ के बाद तक जो रिवायात चली आती हैं, उनका मिज़ाज और लहजा उर्दू और ग़ज़ल दोनों के लिए ही ख़ूबसूरत शाहकार है। अस्ल में, ग़ज़ल की परंपरा और रिवायात को बहुत ही सीमित रूप में पेश कर दिया जाता है। हुस्न, इश्क़, जाम, मीना और ख़ुदा, बंदगी जैसे अलफ़ाज़ का सहारा लेकर, ख़ासकर हिंदी के क्षेत्र में ग़ज़ल की मीरास के बारे में काफी संकुचित धारणाएं स्थापित हैं जो ग़ज़ल की तवील परंपरा को नकारती सी प्रतीत होती हैं। उर्दू का फ़ारसी पर हावी होकर ग़ज़ल का जांनशीन होना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ या मामूली घटना नहीं था। दरबारों और अदब में ग़ज़ल और उर्दू का प्रतिष्ठित होना, राजनैतिक उथल-पुथल के कारण ग़ज़ल का केंद्र दिल्ली से विस्थापित होकर लखनउ बनना, इंशाल्लाह ख़ां, गुलाम मुसहफ़ी का लखनउ स्कूल की बुनियाद डालना, ग़ज़ल में फिक्र और तसव्वुर की इन्फ़िरादियत का मशहूर होना और कमोबेश हर दौर में ग़ज़ल का आम आदमी से जुड़े रहना, ये तमाम बातें साफ़ करती हैं कि ग़ज़ल न सिर्फ़ एक परंपरा बनाती है बल्कि एक कल्चर को भी उद्घाटित करती है।

कमलेश्वर के शब्दों में - "ग़ज़ल जैसी सांस्कृतिक विधा ख़ुद एक लौकिक संस्कृति का निर्माण करके उसे एक अलौकिक अनुभव तक उठा ले जाती है।" इसी अनुभव का सत्य और सुरूर स्वामी श्यामानंद सरस्वती की इन ग़ज़लों में मौजूद है।

यह नितांत उचित है कि ग़ज़ल एक सांस्कृतिक विधा है। इसके अंतस में भारतीय संस्कृति के सूत्र निहित हैं। भारतीय संस्कृति की कोख में सनातन, इस्लाम, बौद्ध और अनेक अन्य संप्रदायों व मतों के दर्शन बीज रूप में हैं। एकेश्वरवाद की सूफ़ियाना व्याख्या और शंकराचार्य का अद्धैतवाद समरसता प्रतिपादित करता है। इस्लाम और वेद में निराकार की चर्चा भी समानता का मूल्य स्थापित करती है। ईश्वर की सार्वकालिक सत्ता को भी हर धर्म व मत में स्वीकृति प्राप्त है। कमलेश्वर बजा फ़रमाते हैं कि - "इसे न तो धार्मिकताग्रस्त अंध इस्लाम परस्त स्वीकार कर पा रहे हैं, न जड़ ईसाई लोग और न ही भारत के वेदांती बंद दिमाग।" लेकिन, ग़ज़ल निर्विवाद रूप से इस सत्य का उद्घाटन करती रही है और करती रहेगी। संस्कृति को अपने अंदर समाहित कर जब ग़ज़ल महान बन जाती है तब ग़ज़लकार तिरोहित हो जाता है और सत्य आत्मज्ञान बनकर निसंकोच भाव से प्रस्तुत होता है। सत्य और संस्कृति की यही अनुगूंज डॉ. श्यामानंद सरस्वती रौशन की ग़ज़लों में भी सुनायी देती है। ऐसा भी नहीं कि डॉ. रौशन की ग़ज़लों में आज के संदर्भ व प्रसंग नदारद हों। उनकी ग़ज़ल ज़िंदगी, आदमी और आलम की मुख़्तलिफ़ और तरीन तसावीर पेश करती है। डॉ. बद्र कहते हैं - "वली से लेकर मलिकज़ादा जावेद जैसे नये शायर की ग़ज़ल में जो ज़ुबान जारी ओ सारी है, उस ज़िंदा, रवां-दवां ज़ुबान के शेर स्वामी साहिब जैसे बुज़ुर्ग के यहां ताज़ा-ताज़ा और नये-नये से लगते हैं।"

उम्र कागज़ का एक टुकड़ा है
बूंद पड़ते ही गल गया बाबा।
एक बच्चे को क्या ले लिया गोद में
मेरे बचपन का मौसिम हरा हो गया।

डॉ. रौशन अरूज़ के बादशाह हैं और रुबाई, ग़ज़ल, दोहा, गीत आदि तमाम छंदों की रियाज़त उनके फ़न का सरमाया है। ज़ुबान, शिल्प और साख़्त के स्तर पर डॉ. रौशन अपना सानी नहीं रखते हैं। इन्हीं स्तरों पर वह कमाल भी करते हैं। हिंदी में ग़ज़ल के पैरोकार होने के नाते उनके अधिकांश अशआर में हिंदी के हर तरह के शब्दों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत ज़्यादा होता है। उर्दू की और ग़ज़ल की रिवायत को ज़िंदा रखने के कारण उनकी ग़ज़ल दोनों भाषाओं को करीब लाने की कोशिश भी दिखती है। डॉ. बद्र उनकी ग़ज़ल की ज़ुबान को उर्दू और हिंदी के मुश्तरक़ और क़ाबिले-फ़ख़्र मीरास मानते हुए कहते हैं कि इसके वसीले से ग़ज़ल का शब्दकोष वृहत्तर होगा। इस अर्थ में स्वामीजी की ग़ज़ल की ज़ुबान में दोगुनी ख़ूबसूरती पैदा हो जाती है। कहीं-कहीं हिंदी के कठिन शब्दों से भी स्वामीजी परहेज़ नहीं करते। आम पाठक के लिए शायद उन्होंने कुछ शेर नहीं कहे हैं। लगता है चंद अशआर अपना एक अलग दायरा या श्रेाता समूह बनाते हैं। बावजूद इसके, कहीं-कहीं उनका कथ्य भी ग़ज़ल में कमाल करता है -

क्या तमाशा है उसका जलवा भी
नके बैठा है अजनबी मुझमें।
प्रेम की आग रूप ही से लगे
रूप क्या है दियासलाई है।

और भी उम्दा अशआर इस संग्रह में देखने को मिलते हैं। कथ्य या फिक्र तो आज भी और शायरों में बहुत शिद्दत के साथ मौजूद है लेकिन शिल्प और अरूज़ी इल्म को लेकर ग़लतफ़हमियों तथा कंगाली का दौर जारी है। शिल्प और अरूज़ी इल्म की जितनी दौलत डौ. रौशन को हासिल है, उतनी समंदर को बूंदें। उन्होंने इसे पाने के लिए जितनी सदियों की तपस्या व साधना की है, उसका अनुमान ही लगाया जा सकता है, निर्धारण नहीं किया जा सकता। उसी तपस्या के फलस्वरूप उन्हें यह सिद्धि मिली है और इसका संकेत भी डॉ. रौशन की शायरी में मिल जाता है। वह कहते हैं -

यह ज़िंदगी है पूर्णतः साहित्य के लिए
मेरी कला के शिल्प को परखा करेंगे लोग।
बोलता है ग़ज़ल का हुनर
श्याम की बांसुरी है ग़ज़ल।

ग़ज़ल के आशिक़ों का डॉ. रौशन के इस हुनर का क़द्रदान न होना और शायरों का तलबग़ार न होना डॉ. रौशन के लिए दुख या निराशा की बात हो सकती है लेकिन उन आशिक़ों और शायरों के लिए बेहद बदक़िस्मती और शर्म की बात है।

डॉ. रौशन का यह ग़ज़ल संग्रह शायरी की विरासत का एक अहम हिस्सा है। इसी तरह, वह पहले रुबाई की अहम मीरास "सत्यम शिवम सुंदरम" किताब के ज़रीये दे चुके हैं। कमलेश्वर ने डॉ. रौशन को रुबाई का स्थापित शहंशाह कहा भी है और यह शेरजंग गर्ग, सरस सहित इल्म के तमाम पारखी भी मानते हैं। बक़ौल डॉ. रौशन -

कम नहीं है ग़ज़ल विधा लेकिन
बात कुछ और है रुबाई की।

अपने अंदर के इस सच को ग़ज़ल की किताब में उकेर देना एक सच्चे शायर और शायरी के सच्चे साधक के बस की ही बात है।

एक ज़िक्र और ज़रूरी है। हिंदी में ग़ज़ल के नामकरण को लेकर सिर्फ़ भाषा बदलने के लिहाज़ से विधा को अलग नाम देना ज़रूरी नहीं है। वैसे भी यह नाम सिर्फ़ भाषान्तर और उस भाषा के व्याकरण के इस्तेमाल से ज़्यादा कुछ और ध्वनित नहीं करता। यूं भी उर्दू की आत्मा तो ग़ज़ल कही जा सकती है। ग़ज़ल की आत्मा उर्दू नहीं क्योंकि विधा की आत्मा भाषा नहीं होती। उसकी आत्मा होती है विधा की संस्कृति या विधापन, विधा का शरीर होता है लहजा और कथ्य एवं विधा की पहचान होते हैं उसके तत्व और शिल्प। इसलिए ग़ज़ल की पहचान के एक अंश को परिवर्तित कर देने से कोई ख़ास फर्क़ नहीं पड़ता है लेकिन उसे एक नया नाम देने से एक विकृति उत्पन्न होती है और भ्रम की स्थिति बनती है। उर्दू और हिंदी दोनों ही महान भाषाएं हैं। विस्तृत अर्थों में एक हैं और दोनों ही नेक हैं। मेरा ही एक शेर है -

जुनूं है चंद लोगों का ज़ुबां मसला नहीं कोई
ग़ज़ल हिंदी में हो उर्दू में हो कल्चर सुहाना है।

इसी कल्चर की पैरवी करते हुए हिंदी और उर्दू के बीच के फ़ासले को मिटाते हुए डॉ. रौशन की ग़ज़लें ज़हनो-दिल को रौशन करती हैं। डॉ. बशीर बद्र की बात से मैं भी सहमत हूं कि "डॉ. रौशन की ग़ज़लें ज़ुबान को संवारती ग़ज़लें हैं।"

इस संग्रह, सुर बांसुरी के, के माध्यम से इतनी मक़बूल और हसीन ग़ज़लें हम तक पहुंचाने और साथ ही अरूज़ी ज़िक्र करने की वज्ह से वह साधुवाद के पात्र हैं। यक़ीन है कि डॉ. रौशन की रौशनाई से निकली ये ग़ज़लें रौशनी का इज़ाफ़ा करने में कामयाब होंगी।

(वर्ष 2004 में लिखित यह समीक्षा 2004 में ही साहित्य सागर पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।)

शनिवार, अक्टूबर 21, 2017

नोट्स

प्रसाद का तुलनात्मक अध्ययन - भाग एक


एमए के दौरान तैयार किये गये नोट्स का एक अंश। प्रसाद चूंकि मेरे प्रिय रचनाकारों में शामिल रहे इसलिए उन्हें पढ़ना और उनके बारे में जानकारियां जुटाना हमेशा समय का सदुपयोग ही मालूम हुआ।


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आंसू, झरना एवं कामायनी जैसी प्रसिद्ध एवं कालजयी काव्य कृतियों के रचयिता और हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के छायावाद के स्तंभ कवि जयशंकर प्रसाद अपनी श्रेष्ठ काव्य कला के लिए अविस्मरणीय हैं। उनकी काव्य यात्रा के सोपानों से गुज़रते हुए पश्चिमी काव्य साहित्य के साथ कुछ साम्य एवं वैषम्य दिखता है। इस अवलोकन का एक संक्षेप यहां प्रस्तुत हैं। अगली कड़ियों में प्रसाद के पूर्ववर्ती भारतीय कवियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन को प्रस्तुत करने की चेष्टा रहेगी।
  • जयशंकर प्रसाद और जर्मनी के महान साहित्यकार गेटे में वास्तव में काफी समानता है। दोनों के ग्रंथों के अनुशीलन से यह तथ्य तार्किक प्रतीत होता है। कामायनी से पहले इन दोनों महान कलाकारों की शुरुआती रचनाओं पर बात करें तो ऐसा लगता है जैसे प्रसाद के आंसू और गेटे के ग्रंथ The Sorrows Of Werther में भी गहरा संबंध है। गेटे और प्रसाद के विचित्र जीवन में जो करुण अनुभूतियां हुईं, तो आघात लगे और वेदनाएं तथा निराशाएं इकट्ठी हुईं। वही इन दोनों ने उपरोक्त कृतियों के माध्यम से अभिव्यक्त कीं।
  • बेशक अंतर है लेकिन तत्वों और अनुभूति के स्तर पर दोनों के सुर मेल खाते हैं। जैसे गेटे के फॉस्ट (Forst) और प्रसाद की कामायनी को लेकर तालमेल दिखता है।
  • हां तो, बात करते हैं कामायनी और फॉस्ट पर। अस्ल में, प्रसाद और गेटे की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने मानव जीवन के तकरीबन हर पहलू को छुआ और यह हुआ प्रमुख रूप से कामायनी और फॉस्ट में। चित्रों में जैसे स्थूलता दिखायी दे और रेखाएं व बिंदु सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होते जाएं। एक अद्भुत विचार और विश्व दृष्टि जैसे अभिभूत कर दें। 
  • गेटे ने फॉस्ट में रहस्य को बखूबी अभिव्यक्त किया है। खासकर वह दृश्य जिसमें नायिका मारग्रेट से फॉस्ट कहता है कि उसे ईश्वर की सत्ता हर कण, हर क्षण में दिखती है। उसके अनुभव को नकारा नहीं जा सकता।
  • कविता केवल विचारों, विचारधाराओं या दर्शन की जटिल अर्थ प्रतीतियों का ही नाम नहीं है। वह सौंदर्य को भी साधती है और मत को भी। वह भावना को भी पोसती है और अभिमत को भी। अब यदि सौंदर्य की बात करें तो फिर प्रसाद को गेटे के साथ खड़ा करना ठीक नहीं है क्योंकि गेटे के रचनाधर्म में सौंदर्य प्रमुख नहीं है। जबकि, Romancism के पोषक रहे प्रसाद इससे अधिक मोहित रहे हैं। इस दृष्टि से अंग्रेज़ी साहित्य के एक महान लेखक व कवि थॉमस हार्डी से प्रसाद का तालमेल समझा जा सकता है। प्रसाद जब प्राकृतिक सौंदर्य को देखते हैं तो वैचित्र्य उत्पन्न होता है।
"अंतरिक्ष विशाल में है मिल रही
चंद्रमा पीयूष वर्षा कर रहा
दृष्टि पथ में सृष्टि है आलोकमय
विश्व वैभव से धरा यह धन्य है"
  • थॉमस हार्डी का प्रकृति चित्रण एक सूक्ष्म और अनुभवजन्य जगत से परिचय कराता है जैसे - "The sky was clear - remarkably clear - and the twinkling of all the stars seemed to be but throbs of one body, timed by a common pulse." यानी हार्डी का प्रकृति के प्रति आकर्षण बौद्धिकता से भी सराबोर है जबकि प्रसाद की प्रकृति के प्रति दृष्टि सम्मान व्यक्त करती हुई और चेतना का खुलासा करने वाली है।

शुक्रवार, अक्टूबर 20, 2017

सिनेमा

ख़ुदा के लिए... बोल... या रब !


2014 में रिलीज़ हुई फिल्म "या रब" पर केंद्रित यह आलेख उसी साल लिखा गया था। उस समय यह एक-दो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था लेकिन चूंकि यह आलेख फिल्म के बहाने कुछ मुद्दों को केंद्र में रखता है इसलिए इसका समय अभी शेष है, शायद।


अक्सर होता है कि समाज उस बात या कलाकृति को नकार देता है या अपनाने से कतराता है, जो उसको कवे सच और उसकी कुरूपता से रूबरू कराती है। यह वही समाज है जो सुकरात को ज़हर देता है, ईसा मसीह को सलीब, कबीर को सज़ा, मीरा को विष का प्याला, दारा शिकोह को मौत और प्रेमचंद को अभावग्रस्त जीवन देता है। फिर एक बदलाव आता है और यही समाज सुकरात को सच का मुहाफ़िज़, ईसा को मसीहा, कबीर को महात्मा, मीरा को जोगन, दारा शिकोह को संस्कृति का सिपेहसालार और प्रेमचंद को कलम का सिपाही कहकर नवाज़ता है।

यह समाज समय पर जागने का हामी रहा होता तो शायद किसी कृष्ण, ईसा, पैगंबर, नानक, कबीर, विवेकानंद का जन्म ही नहीं होता। यह समाज सत्य से आंखें नहीं चुराता तो शाश्द अनेक कालजयी कलाकृतियों की रचना ही नहीं होती। आज के समय में हमारे देश में सुधार और बदलाव की लहर ज़रूर है लेकिन सोच ख़ारिज है। विद्रोह की बातें हैं लेकिन कोई सुनिश्चित लक्ष्य नहीं है। हर चेहरा, अपना ही चेहरा है, तो किसको कलंकित कहें? ऐसी अनेक विसंगतियां हैं इसलिए साहित्य, चित्र, सिनेमा, नाटक आदि कलाओं में कुछ ज़रूरी तेवर रह-रहकर सामने आते हैं, जो होते तो हैं समाज के लिए लेकिन अक्सर सिर्फ कुछ बुद्धिजीवियों या फिर गिनती के जागरूकों तक ही पहुंच पाते हैं। शायद यह भी एक विडंबना ही है।

Ya Rab poster. image source : Google

ऐसी ही एक मिसाल और दिखी जब हाशिये पर रिलीज़ हुई फिल्म या रब। फिल्म को एक बड़ी वितरक कंपनी मिलने के बावजूद न तो इस फिल्म को सिनेमाघरों में शो मिल सकें न दर्शक। प्रचार के व्यापार के इस दौर में कई बार अपेक्षित विचार को मंच नहीं मिल पाता। अपना ही एक शेर याद आता है:

एक ने भी अनमोल न समझा
बाज़ार में जब क़ीमत न रही।

आपको याद होगा, कुछ चार-पांच दशक पहले सार्थक सिनेमा की एक धारा प्रवाहित हुई थी। इस धारा को फिर कला सिनेमा कहा जाने लगा। यह सिनेमा विदेशों में तो प्रशंसित होता रहा लेकिन अपने ही देश में दर्शकों को तरसता रहा। जैसे ही यह आरोप लगने लगा कि कलात्मक सिनेमा भारत में असफल सिद्ध होता है, वैसे ही इसे कला सिनेमा के स्थान पर समानांतर सिनेमा कहा जाने लगा। चूंकि ऐसे आरोप हमारे सिस्टम को लचर घोषित करते हैं इसलिए संभव है कि कला सिनेमा को कला सिनेमा न कहने की सिफारिश या दबाव सिस्टमजनित ही रहा हो।

गुरुदत्त की प्यासा ने समाज के इस दोगले सोच का पर्दाफाश किया और फिल्म असफल रही। एक शायर और एक वेश्या को समाज की ऐसी औलाद के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसे समाज अपना मानना नहीं चाहता, धिक्कारता है। इससे पहले भी बिमल राय, चेतन आनंद, केए अब्बास, वी शांताराम, सत्यजीत रे जैसे फिल्मकारों ने कुछ ऐसी फिल्मों का निर्माण किया था जिन्हें कला सिनेमा के बीज रूप में समझा जा सकता है। 80 के दशक के बाद कला सिनेमा के निर्माण में एक गतिरोध सा दिखायी देता है और फिल्मकार भी इस तथ्य से सामंजस्य बिठाते दिखते हैं कि वे मात्र कुछ पुरस्कारों या विदेशों में प्रदर्शन के लिए इस प्रकार के सिनेमा का निर्माण करते हैं, अपवाद अवश्य हैं।

इस संदर्भ में फिल्म या रब भी सिर्फ कुछ ही लोगों तक पहुंच पायी। एक बात स्पष्ट कर दूं कि अगर फिल्म की संरचनागत एवं शिल्पगत कलात्मकता का विश्लेषण किया जाये तो यह फिल्म कला सिनेमा की कड़ी में शुमार नहीं की जा सकती। इस दृष्टिकोण से फिल्म में अनेक ख़ामियां नज़र आती हैं। अर्थात, फिल्ममेकिंग के नज़रिये से यह कोई यादगार फिल्म नहीं है। फिर भी, इस फिल्म की चर्चा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह फिल्म एक संवेदनशील मुद्दे पर सार्थक बहस करती है। आप इसके पक्ष या विपक्ष में हो सकते हैं लेकिन इस मुद्दे को छोड़ा नहीं जा सकता। मुद्दा है इस्लाम में प्रगतिशीलता का, आत्मघाती मानव बमों का, आतंकवाद से धर्म की संलिप्तता का और युवा नस्ल को धर्म के गलत सबक़ देकर गुमराह करने का। फिल्म के कुछ संवाद ऐसे पहलुओं पर एक सकारात्मक सोच का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

वास्तव में, हसनैन हैदराबादवाला निर्देशित यह फिल्म उस अंदाज़ की फिल्म है, जो पाकिस्तान के फिल्मकार शोएब मंसूर ने अपनी दो फिल्मों ख़ुदा के लिए और बोल से क़ायम किया है। इन दोनों ही फिल्मों में इस्लाम को लेकर उन पहलुओं पर चर्चा की गयी है, जिन पर खुलकर बात करने में भी लोग डरते और कतराते हैं। क़ुरआन की कुछ पंक्तियों की ग़लत या अधूरी व्याख्या कर युवाओं को बरगलाया जाता है। ये मुद्दे भी इन दो फिल्मों में उठाये गये थे। संभवतः सिनेमा के माध्यम से इस्लाम में प्रगतिशीलता के विचार का सूत्रपात इतने मुखर तरीके से करने का यह पहला प्रयास था इसलिए पाकिस्तान में मंसूर की इन दोनों ही फिल्मों को उचित प्रतियसाद नहीं मिला, उल्टे विरोध प्रदर्शन हो गये। कमोबेश यह हमारे महाद्वीप की ही विडंबना है। महाद्वीप ही क्यूं, शायद पूरे विश्व में ही ऐसा होता है। हमारे वैश्विक समाज में पैगंबर का कार्टून बनाने वाले चित्रकार के खिलाफ क़त्ल का फ़तवा जारी करने के क़ायदे हैं लेकिन एक मज़हब की ग़लत व्याख्या कर उसको दुनिया के सामने मज़ाक बना देने वाले धर्म के तथाकथित ठेकेदारों के विरुद्ध एक स्वर तक नहीं फूटता ! अदालतें ख़ामोश रह जाती हैं !

शोएब मंसूर के अंदाज़ में बनायी गयी हसनैन की फिल्म या रब में एक संवाद है: हिंदू आतंकवाद, मुस्लिम दहशतगर्दी या क्रिश्चियन टैरेरिज़्म जैसे शब्द बेमानी हैं, कोई धर्म आतंकवाद का साथ नहीं देता बल्कि कुछ लोग अपने फ़ायदे के लिए ये गुनाह करते हैं। यह बात समझने की है कि धर्म, जाति, भाषा, वर्ग आदि के आधार पर आप मनुष्य की शराफ़त या चरित्र की पैमाइश नहीं कर सकते। ऐसे कुछ और सार्थक संवाद इस फिल्म को विशेष और सोच-विचार की वस्तु बनाते हैं। यह प्रश्न लंबे समय से बना हुआ था कि आतंकवाद में इस्लामी देशों की संलिप्तता पर मुस्लिम बुद्धिजीवी मुखर क्यों नहीं होते? वे इस्लाम की अनुचित धार्मिक व्याख्याओं के प्रचार का विरोध क्यों नहीं करते? मंसूर और हसनैन की फिल्मों को इसलिए भी सराहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपनी फिल्मों के ज़रीये ऐसे प्रश्नों का सार्थक उत्तर डंके की चोट पर प्रस्तुत करने का बीड़ा उठाया।

अंततः यही लगता है कि अपने देश में अभी तो शिक्षा के नाम पर अक्षर ज्ञान कराने का ही काम चल रहा है, पता नहीं हम जागरूक कब तक हो पाएंगे? सरकारी आंकड़ों में नहीं, हक़ीक़त में। अक्षर ज्ञान, शिक्षा और जागरूकता के अर्थ अलग-अलग हैं, इन्हें समझने की ज़रूरत बनी हुई है। ठीक उसी तरह, जिस तरह आवश्यक फिलमें, कालजयी साहित्य, श्रेष्ठ कलाकृतियों के उचित मूल्यांकन की ज़रूरत बनी हुई है। जब हम जागरूक होंगे, शायद तब उचित मूल्यांकन भी हो सकेंगे।

सिनेमा

दो फिल्में - दूसरी नज़र से दो कमेंट्स


फिल्म समीक्षाएं नहीं है ये। फिल्मों पर कोई लेख भी नहीं कहा जा सकता इन्हें। फिल्म देखते हुए या देखकर एक दर्शक के मन में उठने वाले भाव की संज्ञा दी जाये तो भी उचित नहीं होगा। फ़िलहाल इन्हें कमेंट्स कहते हैं। बाद में कोई नाम मिल गया तो देखा जाएगा। इन कमेंट्स के ज़रीये फिल्मों के विचार का एक सारांश समेटा हुआ दिखता है, फिल्मों की कथावस्तु की रूपरेखा मिलती है और कहीं फिल्म को लेकर एक स्तर पर समझ भी दिखायी देती है।


तपेश के कमेंट में काव्यात्मकता है और यह कमेंट पढ़ना हमेशा मुझे सुखद आश्चर्य लगता रहा कि किसी फिल्म को ऐसे ढंग से भी बयान किया जा सकता है। कविता जैसी लय, रवानी तो है ही इस कमेंट में, साथ ही कई और तत्व भी भावना व विचार के स्तर पर समेटे गये हैं। कम शब्दों में ज़्यादा कहता हुआ यह कमेंट साहित्य के पाठकों और सिनेमा के दर्शकों दोनों के लिए उपयोगी होगा, ऐसा विश्वास है। दूसरा कमेंट मैंने ही लिखा है इसलिए उसके बारे में कोई विवेचना नहीं। इन दो कमेंट्स से गुज़रकर आप जो महसूस करें, वो साझा करें तो आगे इस प्रयास को जारी भी रखा जा सकता है और कुछ सुधार भी संभव हो सकते हैं।

फिल्म - रेनकोट 2004
निर्देशक - रितुपर्णो घोष
टिप्पणी - तपेश सक्सेना

Raincoat poster. image source : google

वह रिश्ता एक उतरन की तरह ही था। खूंटी पर टंगा दिखा तो पहन लिया। कहते हैं कि नज़र से नज़र की डोर बड़ी पक्की होती है। उस रोज़ दायरे में कांच भी था लेकिन डोर साबुत थी। एहसास की बूंदें जब गिरती हैं तो आवाज़ नहीं होती, बस लिबास भीग जाता है। बहुत कोशिश की कि इस डोर पर लिबास सुखा लूं। मगर अंदाज़ा न था बारिश होती ही रहेगी। वैसे भी मां कहती थी कि बारिश में नये कपड़े मत पहना कर। लेकिन, एक बात तो उसने भी नहीं कही थी या शायद मेरे ही सुनने में नहीं आ पायी कि लिबास तो डोरी पर डालकर सुखाये जो भी सकते हैं लेकिन रेनकोट तो वहीं बाहर दरवाज़े पर ही उतारने का रिवाज है। उन्हें निचोड़ा भी नहीं जाता। शायद निचोड़ने से फट जाते होंगे। खूंटी पर वहीं बाहर ही एक रिश्ता टंगा है। जो बारिश रुके तो शायद सूख जाये। और अगर सूखे तो अपना वजूद ढंक लूं उससे।

फिल्म - बॉम्बे वेलवेट 2015
निर्देशक - अनुराग कश्यप
टिप्पणी - भवेश दिलशाद

Bombay Velvet poster. image source : Google

बॉम्बे वेलवेट का अर्थ है मखमली महानगर ! इस शीर्षक में दो शब्दों मखमली और महानगर को दो मिले-जुले रूपकों में देखता और खोजता हूं। यह जो मखमली कालीन है, यह आडंगर है, एक परदा है जो कई लाशों को ढांकता है। जिन लाशों पर मखमली कालीन बिछाया गया है, वो समाजवाद, आदर्शवाद, सच्चाई और निर्बल वर्ग की लाशें हैं। राजनीति के सहयोग से पूंजीवाद ने हत्याएं करवायीं और ये हत्याएं कीं कुछ निराधार महत्वाकांक्षाओं वाले चरित्रों ने, जो अवसरवादी भी थे लेकिन कुछ मानव भी। बाद में इन्हें अपराधी कहा जाने लगा जबकि इन लाशों पर बिछे कालीनों पर खड़ा है स्वार्थी, भावशून्य एवं अमानुष पूंजीवाद।

इकाइयां जब एकत्रित होती हैं तब एक बड़ी संख्या बनती है लेकिन विकास की तथाकथित धारा इस एकत्रीकरण या एकता के विचार की नहीं बल्कि बलि के विचार की पक्षधर है। सैकड़ों छोटे-छोटे गांवों की बलि से महानगर बनते हैं। गांवों की एकता से नहीं। कुर्बान होते हैं गांव, कस्बे और संपन्न होता है नगर, नगर का एक वर्ग विशिष्ट। तो इकाइयों की बलि से बना महानगर, लाशों को ढांकते हुए एक मखमली कालीन पर खड़ा भी और उस कालीन का समर्थक भी है। यही है बॉम्बे वेलवेट।

अनुवाद

प्रॉस्पिस यानी आगे की सोचना


अंग्रेज़ी साहित्य में विक्टोरियन कवियों की सूची में रॉबर्ट ब्राउनिंग का नाम सम्मान के साथ दर्ज है। ब्राउनिंग की कविताएं चिंतन और दर्शन के अनेक पहलुओं और प्रश्नों को टटोलती हैं और साथ ही, काव्य के सौंदर्य को भी रेखांकित करती हैं। अलंकार और वक्रोक्ति इन कविताओं में प्रमुखता से पाये जाते हैं। यानी समझा जा सकता है कि इनका पाठ कितना कठिन है और अनुवाद और कितना..!


प्रॉस्पिस, ब्राउनिंग की बेहद चर्चित कविताओं में से एक है जो संभवतः उन्होंने अपनी पत्नी एलिज़ाबेथ की मृत्योपरांत लिखी थी। आलोचक मानते हैं कि इस कविता में नायक कोई और नहीं बल्कि कवि स्वयं ही है जो अपनी पत्नी की आत्मा में विलीन होने की कामना में मृत्यु से युद्ध करने की कल्पना कर रहा है। इस कविता का प्रारंभ एक विषाद के साथ होता है, परंतु यह कविता धीर, वीर नायक का चरित्र प्रस्तुत करती है। मृत्यु से जुड़े दर्शन के कुछ मूलभूत प्रश्नों को उठाती यह कविता कल्पनाशीलता के माध्यम से सुनहरे पन्नों पर दर्ज हो जाती है।

Robert Browning. image source : Google (modified)

वास्तव में, विक्टोरियन कवियों ने अनेक सिरों से मृत्यु पर कविताएं रचीं। मैथ्यू ऑर्नल्ड, अल्फ्रेड लॉर्ड टेनिसन, अल्फ्रेड ऑस्टिन और डब्ल्यू बी रैंड्स अन्य प्रमुख विक्टोरियन कवि हैं। ब्राउनिंग के यहां सरलता कम है और रूपक एवं प्रतीकों की भरमार है जिसके कारण वह अपने समकालीन विक्टोरियन कवियों से अलग चीन्हे जाते हैं। प्रॉस्पिस कविता को पढ़कर कहीं निराला की राम की शक्तिपूजा का स्मरण भी हो जाता है तो कहीं प्रसाद रचित कामायनी की कुछ पंक्तियां स्मृतियों में तैरने लगती हैं। यह दर्शन की बारीक समझ होने के कारण संभवतः होता है।

यहां ब्राउनिंग की कविता प्रॉस्पिस का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है जो श्री तपेश सक्सेना ने किया है। तपेश ने इस कविता के अनुवाद के उद्यम में मूल कविता की राइमिंग स्कीम यानी तुकबंदी, लयता एवं छन्द का ध्यान रखा है। तपेश के अनुवाद की भाषा में हिन्दी और कतिपय उर्दू का इस्तेमाल होने के कारण यह एक आमफहम भाषा कही जा सकती है। इस अनुवाद में क्लासिक अनुवाद परंपरा की छुअन है और यह आजकल बहुतायत में किये जा रहे अतुकांत व शब्द दर शब्द अनुवादों से अलग भी है। इस अनुवाद की और भी खूबियां हैं जो पाठक इससे गुज़रते हुए महसूस कर सकते हैं। यहां ब्राउनिंग की मूल अंग्रेज़ी कविता और तपेश द्वारा किया गया अनुवाद प्रस्तुत है।

PROSPICE

Fear death?—to feel the fog in my throat,
The mist in my face,
When the snows begin, and the blasts denote
I am nearing the place,

मौत का भय? कंठ कुहरे का करे एहसास थमकर
और चेहरे पर पड़ी है धुंध भी तो
अब बरफ भी गिर रही है आंधियों के साथ जमकर
यूं लगे गंतव्य है नज़दीक ही तो

The power of the night, the press of the storm,
The post of the foe;
Where he stands, the Arch Fear in a visible form,
Yet the strong man must go:

रात ताकत आज़माकर ज़ोर तूफानी लगाकर
शत्रु का आभास मुझको दे सकी है
भय ख़ा है साथ मेरे राजसी सूरत बनाकर
पर गति यह आदमी की कब रुकी है

For the journey is done and the summit attained,
And the barriers fall,
Though a battle's to fight ere the guerdon be gained,
The reward of it all.

इस सफ़र का छोर पाने के लिए ही तू चला है
तोड़ दे तू अड़चनों का आज घेरा
युद्ध का उद्देश्य तुझको बिन लड़े कब मिल सका है
अब विजय ही हो सके ईनाम तेरा

I was ever a fighter, so—one fight more,
The best and the last!
I would hate that death bandaged my eyes and forbore,
And bade me creep past.

मैं सदा था वीर योद्धा, यह लड़ाई फिर लड़ूंगा
सर्वोत्तम हो यह लड़ाई आखिरी हो
प्यार दूं इतिहास को मैं मौत से नफ़रत करूंगा
गर ढंकेगी मौत मेरी आंख को तो

No! let me taste the whole of it, fare like my peers
The heroes of old,
Bear the brunt, in a minute pay glad life's arrears
Of pain, darkness and cold.

पर नहीं! अब सोचता हूं चख ही लूं मैं स्वाद सारे
चख चुके जो ऐतिहासिक दोस्त मेरे
फिर खुशी की ज़िंदगी के मैं चुका दूं ख़ामियाज़े
आंसुओं के, रात के और दर्द के रे

For sudden the worst turns the best to the brave,
The black minute's at end,
And the elements' rage, the fiend-voices that rave,
Shall dwindle, shall blend,

हां अचानक हर बुरा बनता है अच्छा वीर मन से
खत्म होने को है काली सी घड़ी यह
तत्व भी नाराज़ हैं सब प्रेत करते हैं रुदन से
मिट रहा सब हो रहा है शून्य में लय

Shall change, shall become first a peace out of pain,
Then a light, then thy breast,
O thou soul of my soul! I shall clasp thee again,
And with God be the rest!

अब उठा दो अब जगा दो शांति को भी वेदना से
रोशनी को छातियों से मुक्त कर दो
फिर परस्पर लीन हो लें आत्मा में आत्मा से
साथ हो जो शेष हो, वह ईश्वर हो!

(Translation by Tapesh Saxena)